भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 380, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *
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किया। वे कृष्णचैतन्यके पास आये और उनकी आज्ञासे उनका कम्बल ग्रहणकर अपनी नगरीमें आकर कृष्णके ध्यानमें रत हो गये।
हे मुने! अब आप भगवान् विष्णुका चरित्र सुनें, जिस चरित्रके सुननेसे घोर कलियुगमें भी भय नहीं होता, जब यज्ञांश कृष्णचैतन्यकी अवस्था पाँच वर्षकी हुई, उन दिनों बंगाल प्रान्तमें महात्मा ईश्वरपुरीका विशेष प्रभाव था। शारदाकी उपासनासे उनको विशेष सिद्धि प्राप्त थी, जिससे उनके मनमें अहंकार हो गया था। एक बार वे घूमते-फिरते शान्तिपुरमें आये तथा गङ्गाके तटपर रमणीय दिव्य स्तवकी रचना कर उसका पाठ करने लगे। उसी समय उधरसे चैतन्य महाप्रभु आ गये और उन्होंने स्तुति करते हुए महात्मा ईश्वरपुरीसे कहा—‘महात्मन्! आपकी रचना कुछ दोषयुक्त प्रतीत होती है।’ यह सुनकर वे विद्वान् ईश्वरपुरी आश्चर्यचकित हो गये। सर्वमङ्गला शारदाने अपने आत्मीयजन ईश्वरपुरीको लज्जित देखकर हँसते हुए कहा—‘यह साक्षात् यज्ञांश हरि कृष्णचैतन्य हैं।’ यह सुनकर ईश्वरपुरी उनके शिष्य होकर कृष्णमन्त्रके उपासक बन गये। वे वैष्णवोंमें श्रेष्ठ हुए और कृष्णचैतन्यके सेवक हो गये।
मुने! श्रीधर नामक एक शिवपूजक ब्राह्मण थे। पतननगरके राजाने उनसे श्रीमद्भागवत-सहाहकी कथा सुनी और उन्हें बहुत धन दिया। श्रीधर धन लेकर राजाके यहाँसे चलकर अपने ससुराल आये। वहाँ एक मासतक निवास करके स्त्रीके साथ पुनः घरकी ओर चल पड़े। उनके साथ-साथ सात चोर मैत्रीके विश्वासके लिये भगवान् रामकी शपथ लेकर (किंतु बुरी नीयतसे) चलने लगे। उन चोरोंने रास्तेमें एक वन मिलनेपर उसके अन्तिम छोरपर श्रीधरको
मार डाला और उनकी पत्नी एवं धनसहित बैलगाड़ीको लेकर भागने लगे। उनकी पत्नी बार-बार पीछे देखने लगी। चोरोंने कहा कि अब उधर क्या देख रही हो, तुम्हारा पति तो मर गया है। इसपर विप्रपत्नीने कहा कि ‘मैं उन भगवान् रामको देख रही हूँ, जिनकी तुम लोगोंने शपथ ली थी।’ इसपर सच्चिदानन्दविग्रह भगवान् श्रीराम प्रकट हो गये और उन्होंने उन सातों चोरोंको मार डाला तथा उस ब्राह्मणको जीवित कर वृन्दावनमें भेज दिया। उस दिनसे वे ब्राह्मण श्रीधर वैष्णव हो गये। यज्ञांश श्रीकृष्णचैतन्यके सातवें वर्षमें उन्होंने शान्तिपुरीमें चैतन्यदेवके पास जाकर ब्रह्मज्ञानको प्राप्त किया और उनके शिष्य हो गये। फिर उन्होंने श्रीमद्भागवतकी टीका की।
सूतजीने पुनः कहा—‘शौनक! काशीमें शंकरकी पूजामें तत्पर रामशर्मा नामक एक विद्वान् ब्राह्मण रहते थे। शिवरात्रिके समय उन्होंने अविमुक्तेक्षर स्थानमें एकाकी जागते हुए ध्यानपूर्वक शिवपञ्चाक्षरका जप किया। लोककल्याणकारी भगवान् शंकरने प्रसन्न होकर उस द्विजश्रेष्ठसे वर माँगनेको कहा। रामशर्माने भगवान् शिवको प्रणामकर कहा—‘प्रभो! आप जिसके ध्यानमें समाधिस्थ रहते हैं, वे देवता मेरे हृदयमें निवास करें।’ यह कहनेपर भगवान् महेश्वरने हँसते हुए कहा—‘मैं भगवान् राम-लक्ष्मणका तथा बलभद्रजीका सदा ही ध्यान-पूजन करता रहता हूँ, उनको प्राप्त कर तुम भी सुखी होओ।’ यह कहकर भगवान् शिव अन्तर्हित हो गये। अनन्तर रामशर्मा भगवान् रामके उपासक बन गये और जब कृष्णचैतन्य बारह वर्ष हो गये, तब उनके पास आकर शिष्य होकर उनके पूजक हो गये। इन्होंने कृष्णचैतन्यके आदेशपर अध्यात्मरामायणकी* रचना की।
- यद्यपि यहाँ अध्यात्मरामायणका रचयिता कोई रामशर्मा नामका व्यक्ति बताया गया है, किंतु प्रायः सभी विद्वान् इस ग्रन्थको व्यासदेवकी रचना मानते हैं। आनन्दरामायणमें भी इस ग्रन्थकी प्रशंसा उपलब्ध है।
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