भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 379, कुल 654 में से

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

लिया। पाँच वर्षतक सूर्य अश्वरूपमें वडवा (संज्ञा)-के साथ रहे। तदनन्तर वडवासे पराक्रमी एवं दिव्य स्वरूपवाले दो पुत्र (अश्विनीकुमार) उत्पन्न हुए। वे पिताके दुःखको देखकर सूर्यमण्डलमें स्थित हो गये। वडवापुत्र अश्विनीकुमार सावर्णि और शनिको जीतकर उनको बाँध करके पिताके पास ले आये। भगवान् सूर्यने शृङ्खलाबद्ध शत्रुओंको आया देख उन्हें लौह-दण्डसे मारा, जिससे वे पंगु हो गये। भगवान् सूर्यने प्रसन्नतापूर्वक वडवापुत्र अश्विनीकुमारोंसे कहा—‘जिस प्रकार जीव और ईश तथा नर और नारायण दो नाम होते हुए भी एक हैं और परस्पर मित्र हैं, उसी प्रकार एक ही नाम नासत्यसे आपलोग प्रसिद्ध होंगे। सोमकी शक्ति इडादेवी तुम्हारी ज्येष्ठपत्नी होगी और सूर्यकी शक्ति पिंगला लघुपत्नी होगी। तुम दोनोंमेंसे एक इडापति होगा और दूसरा पिंगलापति होगा। मनुष्यकी राशिसे बारहवें स्थानपर यदि शनैश्चरकी क्रूर दृष्टि पड़ती हो तो इसकी शान्तिके लिये इडापतिकी आराधना लाभदायक होगी और राशिसे दूसरे स्थानपर स्थित सावर्णि भ्रमकारक होगा, इसके लिये पिंगलापतिकी आराधना शान्तिकर होगी। जन्म-राशिमें स्थित देवी तपत्नी (तपती) तापकारिणी होगी, तब इडा तथा पिंगला शान्ति करनेवाली होंगी।’

इन वचनोंको सुनकर अश्विनीकुमार देववैद्य

हो गये। सावर्णि एवं शनि दूसरे अंशोंसे राहु और केतु हो गये। इनसे सूर्य डरकर भागे थे, अब भी ये ग्रहण-रूपमें उन्हें पीड़ा देते रहते हैं। इसीलिये इन सबके परिहार एवं शान्तिके लिये अश्विनीकुमारोंका आविर्भाव हुआ था। अश्विनीकुमारोंकी आराधनासे इनकी शान्ति होती है।

सूतजी बोले—शौनक! देवगुरु बृहस्पतिद्वारा यह कथा सुनकर देवश्रेष्ठ वे अश्विनीकुमार प्रसन्न हो गये और अपने अंशसे महीतलमें शूद्रयोनियोंमें उत्पन्न हुए। इडापति अज (बकरी)-को मारनेवाले चाण्डालके घरमें उत्पन्न हुए। वे सधन (सदन कसाई*) नामसे विख्यात होकर पितृ-मातृपरायण हुए। वे शालग्रामशिलासे तौलकर मांस बेचते थे। फिर वे कबीरके समीप आकर उनके शिष्य होकर निवास करने लगे। पूर्वमें वे सधन सत्यनिधि नामक एक ब्राह्मण थे, किंतु उन्होंने भयभीत गौको चाण्डालको दिखाया। फलतः राजाके दरबारमें सधनके हाथ काट दिये गये।

पिंगलापति चर्मकारके घर उत्पन्न हुए। वे मानदासके पुत्र रैदासके नामसे प्रसिद्ध हुए। वे काशीपुरी जाकर श्रीरामपरायण कबीरको वाद-विवादमें जीतकर शंकराचार्यके पास आये और उनसे पराजित होकर रैदास रामानन्दके पास आये तथा उनकी शिष्यता स्वीकार कर ली।

(अध्याय १८)

यज्ञांश चैतन्यमहाप्रभुका चरित्र एवं अन्य आचार्योंका भी उनके भक्ति-भावसे प्रभावित होना

सूतजीने कहा—मुने! इस प्रकार देवगुरु बृहस्पति देवताओंके उत्तम माहात्म्यको कहकर अपने मुखसे अपना अंश उत्पन्नकर ब्रह्मयोनियोंमें आविर्भूत हुए। इष्टिका नगरीमें वे गुरुदत्तके पुत्र

हुए, उनका नाम रोपण हुआ। वे ब्रह्ममार्गप्रदर्शक थे। उन्होंने सूतसे गूँथी गयी माला धारण करना, जल-निर्मित तिलक लगाना और वासुदेवके मन्त्रका जप करना आदिका जन-जनमें प्रचार

  • विविध भक्तमालोंमें सदन कसाईकी कथा कुछ अन्तरसे प्राप्त होती है। कल्याणके ‘भक्तचरिताङ्क’ में भी इनका चरित्र अङ्कित है।

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