भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 378, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड
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यादवोंके साथ आये और उनकी इच्छाओंको पूरा किया। परम वैष्णव भक्तराट् नरश्री काशीपुरीमें आकर रामानन्दके शिष्य हो गये।
बृहस्पतिजी बोले—देवेन्द्र! किसी समय गङ्गाके तटपर पतिव्रता अनसूयाके साथ भगवान् अत्रि आकर ध्यानमें समाधिस्थ हो गये। वहाँ ब्रह्मा, विष्णु और महेशने आकर कहा—‘वर माँगो।’ अत्रिमुनि परमात्माके ध्यानमें लीन थे। अतः कुछ भी नहीं बोले। वे तीनों उनके भावको समझकर उनकी पत्नी अनसूयादेवीके पास गये। पतिव्रताने देवोंके अन्यथा भावको समझकर पुत्ररूप होनेका शाप दे दिया। फलतः अत्रिके पुत्ररूपमें ब्रह्मा चन्द्रमा, शंकर दुर्वासा और विष्णु दत्तात्रेयके रूपमें बालक हो गये। बादमें ये ही क्रमशः अर्थात् चन्द्रमा सोम नामक छठे वसु, रुद्रांश दुर्वासा सातवें प्रत्यूप नामक वसु और विष्णु-अंश दत्तात्रेय प्रभास नामक आठवें वसु हुए।
सूतजीने कहा—मुने! बृहस्पतिकी यह बात
सुनकर वे तीनों वसु कलिकी शुद्धिके लिये अपने अंशसे पृथ्वीपर अवतीर्ण हुए। छठे वसु अर्थात् भगवान् अत्रिपुत्र सोम दक्षिणमें वैश्यवंशमें राजा सुदेवके घर पीपा नामक पुत्र हुए। जैसे राजाने उस नगरमें राज्य किया था, वैसे ही इन्होंने भी राज्य किया और वे रामानन्दके शिष्य हो द्वारकामें चले आये। भगवान् कृष्णद्वारा प्रेततत्त्वविनाशिनी स्वर्णमयी हरिकी मुद्राको प्राप्तकर उसे उसने वैष्णवोंको प्रदान कर दिया।
अत्रिपुत्र रुद्रके अंश सप्तम वसु अर्थात् प्रत्यूप पाञ्चाल देशमें वैश्यजातिमें मार्गपालके पुत्र हो नानक नामसे प्रसिद्ध हुए। रामानन्दके पास आकर नानक उनके शिष्य हो गये। उन्होंने म्लेच्छोंको वशमें करके सूक्ष्ममार्ग दिखाया।
अष्टम वसु प्रभास शान्तिपुरमें ब्राह्मणजातिमें उत्पन्न हुए। वे शुक्लदत्तके पुत्र नित्यानन्दके नामसे प्रसिद्ध हुए। शौनक! इस प्रकार मैंने आपको वसुदेवताओंका माहात्म्य बतलाया। (अध्याय १७)
अश्विनीकुमारोंके अंशसे सधन ( सदन कसाई ) और रैदासकी उत्पत्ति-कथा
सूतजीने कहा—मुने! देवगुरु बृहस्पतिने प्रयागमें समागत महेंद्र आदि देवताओंसे द्वादशादित्यों, रुद्रों तथा अष्ट वसु देवताओंका माहात्म्य बतलाया और फिर वे अश्विनीकुमारोंकी ओर देखकर उनकी गाथाका इस प्रकार वर्णन करने लगे।
भगवान् विवस्वान्को संज्ञासे दिव्य तेजस्वी वैवस्वत मनु, यम और यमुना तीन संतानें उत्पन्न हुई। संज्ञा तेजःस्वरूप अपने पतिको जानकर अपनी ही छाया उत्पन्न कर तपस्या करने चली गयी। सावर्णि मनु, शनि और तपती—ये छायासे उत्पन्न हुए। भगवान् सूर्यने छायाद्वारा संतानोंमें असमान व्यवहार देखकर उसे माया-स्वरूपा नारी मानकर क्रुद्ध हो भस्म कर दिया। विवस्वान्को
क्रोधयुक्त समझकर सावर्णिमनु और शनि सूर्यके प्रति क्रुद्ध हो युद्ध करने लगे। उसी समय वे सूर्यके द्वारा भस्मभूत होने लगे। फिर वे दोनों हिमालय पर्वतपर आकर परम तप करने लगे। तीन वर्ष तप करनेपर भक्तवत्सला महाकालीने प्रसन्न हो उन्हें वर दिया। वर प्राप्तकर पुनः वे दोनों भगवान् सूर्यसे युद्ध करने आये। तपके द्वारा प्रभावशाली सूर्य उनसे भयभीत होकर वहाँसे चले गये। रमणीय कुरुखण्डमें वडवा (अश्वा) रूपको धारणकर उनकी प्रिया संज्ञा सूर्यको प्राप्त करनेके लिये तपस्यामें संलग्न थी। भगवान् सूर्य उसे दृढ़ते हुए वहाँ पहुँचे। उन्होंने संज्ञाको अश्विनीरूपमें देखकर स्वयं भी अश्वका रूप बना
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