भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 364, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *
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दिनसे मैं जिस-किसी प्रकार लोहेके बर्तनोंके अभावमें आगमें ही भोजन बना रही हूँ।'
यह सुनकर वह यति आश्चर्यचकित हो गया। दिनभर वहीं रुका रहा। संध्यासमय ब्राह्मणके आनेपर उसने रक्षस्वरमें कहा—'ब्राह्मण! तुम दैवद्वारा मोहित प्रतीत होते हो; क्योंकि तुम दरिद्र भी हो और धन भी संग्रह नहीं करना चाहते हो। अतः मेरा पारस शीघ्र ही लौटा दो, नहीं तो मैं अपना प्राण त्याग दूँगा।' यतिके इस प्रकार कहनेपर विष्णुशर्मा ने कहा—'तुम घाघराके किनारे जाओ, वहीं तुम्हारा पारस मिल जायगा।' यह कहकर यतिके साथ वहाँ जाकर उसने बहुत-से कंटकोंसे ढके अनेक पारसमणियोंको उसे दिखाया। उस यतिने ब्राह्मणको नमस्कार कर नम्रतापूर्वक कहा—'मैंने बारह वर्षांतक भलीभाँति शिवकी आराधना की, तब मैंने इस शुभ रत्नको प्राप्त किया। विप्रश्रेष्ठ! आपके दर्शनमात्रसे ही मुझ लोभात्माने आज अनेकों पारसमणियोंको प्राप्त कर लिया।' यह कहकर उससे शुभ ज्ञान प्राप्त कर मोक्ष प्राप्त कर लिया। इधर विष्णुशर्मा ने एक हजार वर्षांतक पृथ्वीपर रहकर सूर्यकी आराधना करके विष्णुलोकको प्राप्त किया। वे ही विष्णुशर्मा वैष्णव तेज धारणकर फाल्गुनके महीनेमें तीनों लोकोंमें तप रहे हैं और देवकार्य सिद्ध कर रहे हैं।
देवेन्द्र! फाल्गुन मासमें उन सूर्यकी आराधना कर तुम भी सुख प्राप्त करो। उन्होंने देवताओंके साथ ऐसा ही किया। प्रसन्न हो भगवान् सूर्य सूर्यमण्डलसे प्रकट होकर सभी देवताओंके देखते-देखते इन्द्रके शरीरमें प्रविष्ट हो गये। उस तेजसे इन्द्रने अपना शरीर अयोनिज विप्ररूपमें धारण किया और शचीदेवी भी पृथ्वीमें ब्राह्मणीके रूपमें अवतीर्ण हुई। एक वर्षके बाद शचीदेवीके गर्भसे भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षमें गुरुवारको द्वादशी तिथिमें ब्राह्मवेलामें एक दिव्य बालकका जन्म हुआ। जो
वास्तवमें भगवान् विष्णुके कलावतार थे। उस समय रुद्र, वसु, विश्वेदेव, मरुद्रण, साध्य, सिद्ध तथा भास्कर आदि देवोंने उस सनातन हरिरूप बालककी दिव्य स्तुति की और कलियुगमें दितिपुत्रोंद्वारा पीड़ित देवताओं तथा अधर्मसे दुःखी पृथ्वीका उद्धार करनेके लिये प्रार्थना की। यही आगे चलकर श्रीकृष्णचैतन्यके नामसे विख्यात हुए।
सूतजी बोले—मुने! स्तुतिके अनन्तर सभी देवगण बृहस्पतिके पास आकर कहने लगे—महाभाग! हम सभी रुद्रगण, ये वसुगण तथा अश्विनीकुमार पृथ्वीपर किस-किस अंशरूपमें अवतरित होंगे, इसे आप बतलानेकी कृपा करें।
बृहस्पतिने कहा—देवगणो! इस विषयमें आप-लोगोंको मैं एक दूसरी बात बता रहा हूँ—प्राचीन कालमें मृगव्याध नामका एक अधम ब्राह्मण था। वह मार्गमें सदा धनुर्बाण धारणकर विप्रोंकी हिंसा किया करता था। वह महामूर्ख ब्राह्मणोंको मारकर उनके यज्ञोपवीतोंको ग्रहणकर उत्साहपूर्वक शोर मचाता था। वह दुष्ट द्विजाधम तीनों वर्णोंको, विशेषकर ब्राह्मणोंको मारता था। उस समय ब्राह्मणोंका विनाश देखकर देवगण भयभीत हो ब्रह्माके पास आये और सभी बातें उन्हें बतायीं। यह सुनकर दुःखी हो ब्रह्माने सभी लोकोंमें गमन करनेवाले सप्तर्षियोंसे कहा—'द्विजोत्तमो! आप सभी वहाँ जाकर मृगव्याधको समझाये।' यह सुनकर वसिष्ठ आदि ऋषियोंके साथ मरीचि मृगव्याधके वनमें गये। धनुर्बाणधारी महाबली मृगव्याधने उन लोगोंको देखकर भयंकर वचन कहा—'आज मैं तुमलोगोंको मारूँगा।' मरीचि आदिने हँसकर कहा—'तुम हमलोगोंको क्यों मारोगे? कुलके लिये मारोगे या अपने लिये, यह शीघ्र बताओ।' यह सुनकर उस मृगव्याधने कहा—'मैं अपने कुलके लिये और अपने कल्याणके लिये (तुमलोगोंको) मारूँगा।'
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