भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 363, कुल 654 में से
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
उनके लिये एक धर्मशालाका निर्माण कराया। किसी समय कलिये प्रेरित वे ही चोर वैष्णवका वेश बनाकर राजा धर्मपालके महलमें आये और राजासे कहने लगे—‘प्रभो! हमलोग शास्त्रमें निपुण हैं और आपके घर आये हैं। राजन्! हमलोगोंद्वारा निर्मित भोज्य-पदार्थ शिलास्थित भगवान् विष्णु (शालग्राम) प्रतिदिन ग्रहण करते हैं। नृपश्रेष्ठ! आप उसे देखें।’ ऐसा कहकर उन कलिभक्तोंने अपनी मायासे चतुर्भुज विष्णुरूपको भोजन करते हुए राजाको दिखाया। आश्चर्यचकित हो धर्मपालने जयदेवसे कहा—‘गुरुदेव! मेरे घरपर विष्णुपरायण वैष्णव आये हैं। मैंने उनके प्रभावसे साक्षात् हरिका दर्शन किया है। इसलिये आप भी शीघ्र आयें।’ यह सुनकर जयदेव भी चकित हो राजदरबारमें आये। उस समय उन पाखण्डियोंने हँसते हुए राजासे कहा—‘राजन्! यह ब्राह्मण तो गौड़देशके राजाके यहाँ भोजन आदि बनानेका कार्य करता था। इसने धनके लोभसे छलकर भोजनमें विष
मिलाकर राजाको खिला दिया था। अतः यह दुष्ट व्यक्ति है। यह जानकर उस राजाने इस ब्राह्मणको शूलीपर चढ़ा दिया। इसी बीच हमलोग वहाँ पहुँचे। द्विजको पापी समझकर हमलोगोंने बहुत उपदेश दिया। उस राजाको भी हमलोगोंने बहुत समझाया, तब राजाने शूलीसे उतारकर इसके हाथ-पैर कटवा लिये। वह राजा भी हमारा शिष्य हो गया।’
उन चोरोंके ऐसा कहते (मिथ्या भाषण करते) ही दुःखित होकर पृथ्वी फट पड़ी और वे चोर पृथ्वीमें धँस गये। दयालु जयदेव चोरोंकी यह स्थिति देखकर रोने लगे। इनके रोते ही उनके कटे हाथ-पैर प्रकृतरूपमें हो गये। यह देखकर राजा धर्मपालको महान् आश्चर्य हुआ। उन्होंने जयदेवजीसे इसके विषयमें पूछा। तब जयदेवजीने सत्य-सत्य सारी घटना उन्हें बता दी। यह सुनकर राजा अत्यन्त प्रसन्न हुआ। जयदेवद्वारा निर्मित ‘गीतगोविन्द’ पढ़कर उस राजाने मोक्ष प्राप्त किया। (अध्याय ९)
चैतन्य महाप्रभु, वाल्मीकि और शंकराचार्यके आविर्भावकी कथा
देवगुरु बृहस्पतिने कहा—देवेन्द्र! प्राचीन कालमें किसी समय वेदपारङ्गत विष्णुशर्मा नामके एक ब्राह्मण थे। वे प्रसन्नचित्तसे सर्वदेवमय विष्णुकी पूजा करते थे, इसलिये देवतालोग भी उनकी प्रतिष्ठा करते थे। वे भिक्षावृत्तिसे जीवननिर्वाह करते थे, उनकी स्त्री थी किंतु कोई पुत्र न था। एक समय उनके घरपर कोई अतिथि आया। दयालुहृदय उस महात्माने विष्णुशर्माकी स्त्रीकी आर्थिक स्थिति तथा नप्रता देख उसे तीन दिनोंके लिये एक पारसमणि दी और कहा कि इसके स्पर्शसे लोहा भी सोना हो जाता है। इतने दिनोंमें मैं सरयूमें स्नान कर तुम्हारे पास लौट आऊँगा। उसके जानेपर ब्राह्मणीने उस मणिसे पर्याप्त सोना
तैयार कर लिया। तबतक विष्णुशर्मा भी आ गये। उन्होंने अपार सुवर्णराशिसे सम्पन्न अपनी पत्नीको देखकर कहा—‘जहाँ वह पारसमणिका स्वामी गया है, तुम भी वहीं चली जाओ। मैं अकिञ्चन हूँ, विष्णुभक्त हूँ। चोर-डाकुओंके भयसे धनका संग्रह नहीं करता।’ इसपर उनकी पतिव्रता पत्नी डर गयी और पारसमणि उसे समर्पित कर पुनः उनकी सेवामें तत्पर हो गयी। ब्राह्मण विष्णुशर्माने उस सारे धन एवं पारसको घर्घरा—सरयू नदीमें फेंक दिया। तीन दिनोंके बाद उस अतिथिने आकर ब्राह्मणीसे पूछा कि क्या तुमने पारसमणिसे सोना नहीं बनाया? उसने कहा—‘मेरे पतिने उसे क्रोधपूर्वक ग्रहणकर घाघरामें फेंक दिया। उस
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