भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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पृष्ठ 362
  • प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *

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बृहस्पतिने पुनः कहा—देवराज! पूर्व समयमें रमणीय पम्पापुरमें हेली नामका एक ब्राह्मण रहता था। वह चौंसठ कलाओंका ज्ञाता और भगवान् सूर्यकी उपासनामें तत्पर रहता था। उसने प्रतिग्रह-वृत्तिका परित्याग कर हस्तकलासे वस्तुनिर्माणकी वृत्ति अपनायी। उसने लौह धातुकी एक सुन्दर मूर्ति बनाकर उसे अनेक चित्रकारीसे चित्रितकर पाँच हजार मुद्रामें बेचा। बेचनेसे उसे जो धन प्राप्त हुआ उस धनसे उसने माघ मासमें भगवान् सूर्यकी यज्ञोद्धारा आराधना की। हेलीने रमणीय पम्पासरोवरमें ज्योतिःस्वरूप एक उत्तम स्तम्भका निर्माण किया। भगवान् सूर्य भी उसकी भक्तिसे प्रसन्न होकर प्रत्येक मध्याह्नकालमें हेलीद्वारा निवेदित नैवेद्यका वहाँ भोग लगाते थे। भगवान् सूर्यकी कृपासे सहस्र वर्षपर्यन्त आयु भोगकर अपने प्राणोंका परित्याग कर वह हेली सूर्यस्वरूप हो गया और सूर्यमण्डलके बीच स्थित होकर माघ मासमें प्रकाशित होने लगा। देवेन्द्र! आप भी आदित्यमण्डलमें स्थित विश्वकर्मा भगवान् सूर्यकी उपासना कीजिये। वे आपका सब कार्य सम्पन्न कर देंगे। देवगुरुके इस वाक्यको सुनकर देवताओंके साथ इन्द्रने भगवान् सूर्यकी आराधना की। जिससे प्रसन्न हो भगवान् सूर्यने देवताओंसे कहा—‘देवगणो! मैं वंगदेशके बिलग्राम—बिल्वग्राममें निरुक्तकारके रूपमें उत्पन्न होऊँगा और कविशिरोमणि जयदेवके नामसे विख्यात होऊँगा।’

यह कहकर भगवान् सूर्य वंगदेशमें आये और कन्दुककी ब्राह्मणके घर पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए। वे पाँच वर्षकी अवस्थासे ही माता-पिताकी सेवामें विशेषरूपसे तत्पर रहने लगे। उन्होंने बारह वर्षतक माता-पिताकी बड़ी सेवा की। बारह वर्षकी अवस्थामें ही माता-पिताके मरणोपरान्त उनका उन्होंने विधिपूर्वक श्राद्ध-कृत्य किया और गयामें वे पितृरूपमें जयदेवके

सामने उपस्थित भी हुए तथा पुनः देवरूपमें स्वर्गमें प्रतिष्ठित हुए। अन्तमें जयदेवजीको वैराग्य उत्पन्न हो गया और वे वनमें रहकर भजन करने लगे। उनकी अवस्था तेईस वर्षकी हो गयी। इसी समय सत्यव्रत नामक ब्राह्मणने अपनी शुभ कन्या भगवान् जगन्नाथको समर्पित कर दी। पूजाके अन्तमें सनातन दारुब्रह्ममय भगवान्ने साक्षात् आकर उससे कहा—‘सत्यव्रत! जयदेव मेरी ही मूर्ति है, मेरी आज्ञासे अपनी पुत्री पद्मावती उसे प्रदान कर दो।’ यह सुनकर उस सत्यव्रत ब्राह्मणने अपनी कन्या पद्मावती वैरागी जयदेवके लिये बड़ी प्रसन्नतापूर्वक समर्पित कर दी, फिर वह सत्यव्रत अपने घर वापस आ गया।

पद्मावती अपने पति जयदेवकी आनन्दके साथ अनेक वर्षांतक सेवा करती रही। समाधिकालमें जयदेवने वेदाङ्गनिरुक्तकी रचना की। कलियुगमें नागवंशीय शूद्रोंने वैदिक प्रक्रियाएँ भ्रष्ट कर दी थीं। प्राकृत भाषाके रचयिता कलिप्रिय मूढ़ रचनाकारोंको उन्होंने जीतकर पाणिनिशास्त्रका उद्धार किया। कलियुगसे प्रेरित चोरोंने राजाद्वारा प्राप्त जयदेवकी सारी सम्पत्ति लूटकर उनका हाथ-पैर काटकर उन्हें गड्डेमें डाल दिया। पद्मावती अपने पतिकी यह दशा देखकर बहुत दुःखी हुई और रोती हुई उसने गड्डेसे पतिको निकालकर हाथसे सहलाकर उनकी पीड़ाको दूर किया।

एक दिन राजा धर्मपाल मृगया-प्रसंगमें वहाँ आया। उसने भक्त जयदेवको देखा और पूछा कि हाथ-पैरसे विहीन आपकी यह दशा किसने की है? जयदेवने कहा—‘महाराज! मैं अपने कर्मोंके फलस्वरूप ही इस दशाको प्राप्त हुआ हूँ। किसीने दुष्टता नहीं की है।’ इसपर राजा धर्मपाल जयदेवको पलीसहित शिविका (डोली)-में बैठाकर अपने महल ले आया। राजाने उनसे दीक्षा ग्रहणकर

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