भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 361, कुल 654 में से

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

वैद्यराज धन्वन्तरि, सुश्रुत और भक्त कवि जयदेवजीका चरित्र

सूतजी बोले—मुने! देवगुरु बृहस्पतिने प्रयागमें भगवान् सूर्यके उत्तम माहात्म्यको इन्द्रादि देवताओंसे पुनः इस प्रकार कहा—हे देवेन्द्र! प्राचीन कालमें त्रेतायुगके अन्तमें जिस प्रकार भगवान् शंकरकी आज्ञासे भगवान् सूर्य रमणीय प्रतिष्ठानपुरमें प्रादुर्भूत हुए उसे आप सुनें।

त्रेतायुगके अन्तमें सिंहलद्दीपमें परीक्षित नामका एक राजा था, वह वेदधर्मपरायण तथा देवताओं एवं अतिथियोंका पूजक था। उसकी एक कन्या थी, जिसका नाम था भानुमती। वह सूर्यव्रतपरायणा थी। राजमहलमें वह प्रतिदिन भगवान् सूर्यकी आराधना कर उन्हें भोग निवेदित करती थी और उसकी भक्तिसे संतुष्ट होकर प्रत्येक मध्याह्नकालमें भगवान् सूर्य वहाँ आकर उस नैवेद्यको स्वीकार करते थे।

एक समयकी बात है, रविवारके दिन वह भानुमती स्नान करनेके लिये नलिनीसागरपर गयी और जलमें उतरकर स्नान करने लगी। उसी समय नारदमुनि उस जनशून्य प्रदेशमें पहुँचे और उन्होंने उस कन्यासे विवाह करनेकी इच्छा प्रकट की। परंतु कन्याने इसे अनुचित बताया। इससे देवर्षि नारद लज्जित हो गये और रोगसे भी ग्रस्त हो गये। देवर्षि नारदने भगवान् शंकरके पास आकर सारी घटना उनसे निवेदित की। तब शंकरने उनका रोग दूर करनेके लिये आराधनाद्वारा भगवान् भास्करको प्रसन्न किया। भगवान् सूर्यने प्रकट होकर देवर्षिका शरीर नीरोग एवं सुन्दर बना दिया और भगवान् शंकरसे कहा—‘हे प्रभो! मुझे आज्ञा दें, मैं आपका कौन-सा प्रिय कार्य

करूँ?’ भगवान् शंकरने कहा—‘भगवन्! आप ब्राह्मण होकर सविता नामसे मृत्युलोकमें जायँ और राजा परीक्षितकी कन्या भानुमतीसे विवाह करें।’ भगवान् सूर्यने वैसा ही किया। वे सविता भानुमतीके साथ भगवान् सूर्यकी आराधना करने लगे और उन्होंने सूर्यलोकको प्राप्त किया तथा वे ही पौष मासमें आकाशमें प्रकाशित होने लगे। महेन्द्र! तुम भी भगवान् सूर्यकी उपासना करो और देवताओंके कार्यको सिद्ध करो।’

सूतजीने कहा—मुने! बृहस्पतिकी बात सुनकर देवराज इन्द्रने देवताओंके साथ पौष मासमें भगवान् सूर्यकी आराधना की। प्रसन्न होकर सूर्य प्रकट हुए और उन्होंने कहा—‘देवगणो! मैं काशीमें धन्वन्तरि नामसे उत्पन्न होऊँगा और कलिके द्वारा निर्मित रोगोंसे पीड़ित संसारके प्राणियोंको रोगोंसे मुक्त करूँगा तथा वहाँ निवासकर देवताओंके कार्यको सिद्ध करूँगा।’ ऐसा कहकर भगवान् सूर्य काशीमें चले आये और कल्पदत्त ब्राह्मणके घरमें पुत्ररूपमें धन्वन्तरिनामसे उत्पन्न हुए। इन्होंने प्रौढ़ विद्वानोंके साथ राजपुत्र सुश्रुतको अपना शिष्य बनाया तथा कल्पवेद (आयुर्वेद—चिकित्साशास्त्र)-का प्रणयन किया। विद्वानोंने रोगोंद्वारा क्षीण होते हुए देहको ‘काल्प’ कहा है, इसीका ज्ञान इस तन्त्रमें निहित है, इसीलिये इसे कल्पवेद कहा गया है। कलियुगमें वे सूर्य ही भगवान् धन्वन्तरिके रूपमें प्रसिद्ध हुए, जिनके दर्शनमात्रसे ही समस्त रोग तत्काल नष्ट हो जाते हैं। आचार्य सुश्रुतने धन्वन्तरिप्रणीत कल्पवेदका अध्ययन करके सौ अध्यायोंवाले ‘सौश्रुत-तन्त्र’ का निर्माण किया।

१-अन्य पुराणों तथा आयुर्वेदग्रन्थोंमें काशिराज दिवोदासको समय समुद्रसे उत्पन्न हुए थे। स्कन्दपुराण काशीखण्डमें इनकी कथा बहुत विस्तारसे आयी है।

२-रोगेश्वर श्रयितं देहं काल्पमेतत् स्मृतं बुधैः। तस्य ज्ञानं च तन्त्रंऽस्मिन् कल्पवेदो ह्यतः स्मृतः ॥ (प्रतिसरूपपर्व ४। १। २१)

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