भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 360, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *
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था। किसी समय उस ज्योतिषीने राजा सत्यदत्तसे कहा—‘राजन् ! पुष्पनक्षत्रसे युक्त यह अभिजित् नामका मुहूर्त है। इस समय आप बाजार लगवायें, इसमें क्रय-विक्रय होनेसे आपको अतिशय लाभ होगा।’ तब राजाने डुगडुगी पिटवायी—‘बाजारमें जिसका सामान नहीं बिकेगा, उसे राजा खरीदेगा—यह हमारी सत्य घोषणा है।’ ऐसी घोषणा सुनकर बाजारमें अनेक वस्तुएँ बिकनेके लिये आ गयीं, परंतु दूसरे वणिक्-जनोंने उन सबको खरीद लिया। उसी समय एक लोहार लोहेका एक ‘दरिद्रपुरुष’ बनाकर बाजारमें लाया और उसका सौ रुपये मूल्य माँगा। परंतु उसे बाजारमें किसीने भी नहीं खरीदा। राजाने दरिद्रकी मूर्ति समझकर भी घोषणाके अनुसार उसे सौ रुपयेमें खरीद लिया और महलमें लाकर कोषागारमें रखवा दिया। उस मूर्तिके प्रभावसे रातमें राज्यसे सत्कर्म, धर्म और लक्ष्मी राजाके देखते-देखते जाने लगे। सत्यने पुरुषरूपमें राजासे कहा—‘राजन् ! जहाँ दरिद्रताका निवास रहता है, वहाँ कोई कर्मपरायण नहीं होता, कर्मके बिना पृथ्वीपर धर्म स्थिर नहीं हो सकता, धर्मके बिना लक्ष्मीकी कोई शोभा नहीं होती और लक्ष्मीके बिना मैं नहीं रह सकता।’ यह कहकर जानेकी इच्छा करते हुए सत्यको राजाने पकड़ा और नप्र वचनमें कहा—‘प्रभो ! मैंने आपका परित्याग नहीं किया है, मैंने सत्यका ही पालन किया है। अतः आप मेरा घर छोड़कर क्यों जा रहे हैं?’ यह सुनकर सत्यदेव पुनः राजाके घरमें चले गये, उनके पीछे-पीछे लक्ष्मी भी घरमें आने लगीं। राजाने लक्ष्मीसे कहा—‘देवि ! आप चञ्चला हैं, यदि अचल होकर रह सकती हैं तो मेरे घरमें आयें।’ यह सुनकर अचल होनेका वर प्रदान कर
लक्ष्मी भी राजाके घरमें प्रविष्ट हो गयीं।
राजा सत्यदत्तने पुनः अपने पुरोहित ज्योतिषीको बुलाकर उन्हें एक लक्ष मुद्रा प्रदान की और सभी बातें उनकी बता दीं। उस पुरोहितने पुत्रके जन्मके समय यह धन प्राप्त किया था, अतः उस सम्पूर्ण धनको श्रेष्ठ गणकने बालकके पालन-पोषणमें व्यय कर दिया और उसका ‘पूषा’ नाम रखा। पूषाने मार्गशीर्ष मासमें सूर्यकी आराधना की। उनकी कृपासे वह ज्योतिषशास्त्रमें पारङ्गत हो गया तथा सूर्यमें लीन हो गया। इसलिये हे देवेन्द्र ! तुम भी मार्गशीर्षमें भगवान् सूर्यकी पूजा करो।
सूतजी बोले—मुने ! बृहस्पतिके निर्देशानुसार इन्द्रने भी मार्गशीर्ष मासमें सूर्यकी आराधना की और प्रसन्न होकर पूषारूपमें भगवान् सूर्यने उसे प्रत्यक्ष दर्शन देकर कहा—‘देवगणो ! उज्जयिनीमें रुद्रपशुके घरपर मिहिंराचार्य (वराहमिहिर)-के नामसे मैं जन्म ग्रहण करूँगा। मैं ज्योतिषशास्त्रका प्रवर्तक होऊँगा। अनन्तर मूलगण्डान्त एवं अभिजित्के योगमें रुद्रपशु ब्राह्मणके घरपर एक बालकका जन्म हुआ। पिताने उत्पन्न पुत्रको काठकी पेटीमें रखकर रात्रिमें नदीमें बहा दिया। वह बहता हुआ समुद्रमें चला गया, पर वहाँ राक्षसियोंके द्वारा वह रक्षित हुआ। पुनः उसने लङ्कामें आकर ज्योतिषका अध्ययन किया। जातक, फलित, मूकप्रश्न आदि ज्योतिषके सभी अङ्गोंका भलीभाँति अध्ययन कर यह विभीषणके पास आया और इसने भक्तराज विभीषणको प्रणाम किया तथा कहा—‘मुझे राक्षसियोंने यहाँ पहुँचा दिया है, मैं आपकी शरणमें हूँ।’ विभीषणने उसे श्रेष्ठ वैष्णव समझकर उसकी जन्मभूमिमें भेज दिया। म्लेच्छोंके द्वारा विनष्ट ज्योतिषका इसने पुनः उद्धार किया। (अध्याय ८)
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