भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 359, कुल 654 में से

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

अपने गुरु बृहस्पतिके वचनोंके अनुसार देवेन्द्रने भी आश्विन मासमें सूर्यकी आराधना की। भगवान् सूर्यने प्रत्यक्ष हो इन्द्रसे कहा—‘देवराज! कान्यकुब्जमें सत्यदेव ब्राह्मणके घरपर मैं उनके पुत्र-रूपमें ‘वाणीभूषण’ नामसे अवतार ग्रहण करूँगा। अनन्तर उन्होंने ऐसा ही किया और कालक्रममें वाणीभूषणने अपने नामसे छन्दःशास्त्रके ग्रन्थकी रचना की और पाखण्डियोंको परास्त किया। उन्होंने भगवान् विष्णुकी उपासनासे वैष्णवी शक्ति प्राप्त की थी।

बृहस्पति पुनः बोले— देवराज इन्द्र! किसी समय सरयू नदीके किनारे देवयाजी नामक एक ब्राह्मण रहते थे। वे सभी देवोंकी उपासना करनेवाले और नित्य वेदपाठी थे। उनके एक पुत्र उत्पन्न हुआ, किंतु उत्पन्न होते ही वह मृत्युको प्राप्त हो गया। यह जानकर दुःखी हो देवयाजीने भगवान् सूर्यकी आराधना की। भगवान् सूर्यकी कृपासे वह मृत बालक पुनः जीवित हो गया और उसका नाम पड़ा विवस्वान्। यह सोलह वर्षकी अवस्थामें ही सभी शास्त्रोंका प्रकाण्ड विद्वान् हो गया। यह धर्मपरायण तथा सूर्यव्रतपरायण था। इसका विवाह भी सम्पन्न हो गया। एक दिन शिवरात्रिका पुण्य पर्व था। विवस्वान्ने व्रत ग्रहण किया था। उस दिन पत्नी सुशीलासे कामवश सम्पर्क करनेके कारण वह भयंकर कुष्ठरोगसे ग्रस्त हो गया। वह बहुत दुःखी हो गया। पुनः किसीसे द्वादश रविवार-व्रतोंका उपदेश प्राप्तकर निराहार रहते हुए उसने जितेन्द्रिय होकर भगवान् सूर्यकी आराधना की। इस भक्तिसे तथा भगवान् सूर्यकी कृपासे उसका कुष्ठरोग दूर हो गया और उसकी सारी पीड़ा समाप्त हो गयी। इससे उसकी भगवान् सूर्यमें अत्यन्त श्रद्धा उत्पन्न हो गयी और वह ‘आदित्यहृदयस्तोत्र’ का पाठ करने लगा, इसके प्रभावसे वह कामदेवके समान सुन्दर रूपवान् हो

गया। पूर्वमें स्त्रियोंद्वारा भत्सित वही विवस्वान् अब उनका प्रियभाजन बन गया, किंतु विवस्वान् अखण्ड ब्रह्मचर्यव्रत धारणकर ब्रह्मध्यानपरायण हो गया। सौ वर्षोंतक वह नीरोग एवं ज्ञानवान् रहा। अन्तमें अपने प्राणोंका परित्याग कर वह सूर्यरूप हो गया और सूर्यमण्डलके बीचसे कार्तिक मासमें एक लाख वर्षतक प्रकाश करता रहा। हे महेन्द्र! तुम भी देवताओंके साथ उन भगवान् सूर्यकी पूजा करो।

सूतजीने कहा— मुने! देवराज इन्द्रने बृहस्पतिके वचनोंको सुनकर श्रद्धापूर्वक एक मासतक भगवान् सूर्यकी कार्तिक मासमें विधिवत् पूजा की। कार्तिक पूर्णिमामें भगवान् सूर्यने प्रकट होकर इन्द्रसे कहा—‘इन्द्र! मैं अवतार धारण कर देवकार्यको सिद्ध करूँगा। विद्याभिमानी भट्टोंने सूत्रपाठ तथा धातुपाठका अन्यथा अर्थ किया है, अर्थका अनर्थ किया है तथा स्वर और वर्णके अर्थको भ्रंश कर दिया है। मैं उन पाखण्डियोंको जीतकर वेदका उद्धार करूँगा।’ ऐसा कहकर वे भगवान् सूर्य काशीमें वेदशर्माके घरमें दीक्षित-वंशमें उत्पन्न हुए। वे यथानाम तथा-गुण थे। वे बारह वर्षकी अवस्थामें ही सभी शास्त्रोंमें पारङ्गत हो गये। भगवती पार्वतीके प्रिय तथा संसारके स्वामी भगवान् विश्वनाथकी उन्होंने आराधना की। तीन वर्षके बाद भगवान् शंकरने उन्हें महान् ज्ञान प्रदान किया। उस दिव्य ज्ञानके प्रभावसे उन्हें व्यक्त तथा अव्यक्तका सब ज्ञान स्पष्ट हो गया और उन्होंने सिद्धान्तकौमुदी नामक व्याकरणग्रन्थकी रचना की। पाखण्डों भट्टोंको उन्होंने परास्त कर जीत लिया था, इसलिये उनका ‘भट्टोजिदीक्षित’ नाम संसारमें विख्यात हुआ।

देवगुरु बृहस्पति बोले— देवराज इन्द्र! पूर्वकालमें काञ्चीपुरीमें एक दैवज्ञ ज्योतिषी ब्राह्मण रहता था। वह वेदमार्गानुगामी राजा सत्यदत्तका पुरोहित

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