भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 358, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *
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अतिशय साधु, चोरी और हिंसासे रहित थे। वे भिक्षावृत्तिसे अपने पुत्र और स्त्रीकी रक्षा करते थे। एक दिन भिक्षाके लिये मार्गमें जाते समय उन्होंने मायावी कलिको देखा। कलिन एक मनोहर वाटिकाका निर्माण कर ब्राह्मणका वेश बनाया और प्रांशुशर्मासे कहा—‘प्रांशुशर्मा! मेरी बात सुनो। मेरी यह रमणीय वाटिका है। इसमें जाकर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करो।’ विप्रकी यह वाणी सुनकर प्रांशुशर्मा वाटिकाके अंदर आये। दुष्ट कलिन वाटिकामें आकर सुन्दर फलोंको तोड़कर उसे भोजनके लिये दिया और अञ्जलि बाँधकर प्रणत हो प्रांशुशर्मासे कहा—‘विप्र! मेरे साथ सुन्दर कलिन्दका फल खाओ।’ यह सुनकर उन्होंने हँसते हुए मधुर स्वरमें कहा—‘विद्वानोंने बताया है कि बहेड़ेके वृक्षपर और कलिन्दके फलमें कलि रहता है, अतः मैं इसे नहीं खाऊँगा। यदि तुम अतीव श्रद्धा-भक्तिके साथ ब्राह्मण-सेवाके उद्देश्यसे इस फलको खानेके लिये दे ही रहे हो तो मैं भगवान् शालग्रामको निवेदित करनेके बाद ही इस फलको ग्रहण कर सकता हूँ, क्योंकि शालग्राम सच्चिदानन्दविग्रहस्वरूप स्वयं ब्रह्म हैं। यह निश्चित बात है कि भगवान्की जिसपर दृष्टि पड़ जाती है, वह अभक्ष्य भी भक्ष्य बन जाता है।’ यह सुनकर कलि लज्जित होकर निराश हो गया। ब्राह्मण उस फलको लेकर भूमिग्राममें चले आये। पुनः कलियुग राजाके वेशमें प्रांशुशर्माके पास आया और उसने प्रसन्न होकर कहा—‘ब्राह्मण देवता! क्या तुमने फल ग्रहण कर लिया, उसे मुझे शीघ्र दिखलाओ।’ यह सुनकर प्रांशुशर्माने वत्समुण्डके समान उस फलको लाकर उसे दिखला दिया। इसपर क्रुद्ध हो उस कलिन ब्राह्मणको बैतोंसे मारकर लौहमय कारागारमें बंद कर दिया।
प्रातःकाल सूर्योदय होनेपर दुःखी प्रांशुशर्माने भगवान् भास्करको ऋग्वेदके सूक्तोंसे संतुष्ट किया। प्रसन्न हो साक्षात् सनातन रविने आकाशवाणीसे विप्रके कानमें यह वाक्य कहा—‘महाभाग विप्र! कालरूप स्वयं हरिने विश्वके पालन आदिके लिये चारों युगोंका निर्माण किया है। उन्होंने ही कलिको विश्वसमूहकी मृत्युके लिये रचा है। इसलिये घोर कलियुग आनेपर विष्णुमायासे विनिर्मित कलिंजर नगरमें जाकर आनन्दपूर्वक जीवन बिताओ।’ भगवान् सूर्यने ऐसा कहकर उस ब्राह्मणकी रक्षाके लिये उसे कलिंजर भेज दिया। ब्राह्मण प्रांशुशर्मा वहाँ एक सौ पचीस वर्षोंतक रहकर भगवान् सूर्यकी आराधना करते हुए पुत्र और पत्नीके साथ सूर्यलोक चला गया। वे ही प्रांशुशर्मा अट्टाईसवें कलियुगमें भाद्रपद मासकी पूर्णिमाको शिवदत्तके पुत्ररूपमें कलिंजरमें विष्णुशर्मा—विष्णुस्वामी* नामसे प्रसिद्ध हुए। वे वेदशास्त्र एवं कलाओंके ज्ञाता थे और देवताओंके पूजक तथा परम वैष्णव थे।
देवेन्द्र! पूर्वकालमें चैत्ररथ नामक स्थानमें मेधावीमुनिका मंजुघोषा अप्सरासे भगशर्मा नामका पुत्र हुआ। जन्म लेते ही माता-पिताने जब उसे छोड़ दिया, तब वह किसी प्रकार सौभाग्यसे भगवान् सूर्यकी आराधनामें तत्पर हो गया और तपह्वारा सौ वर्षोंतक उनकी निरन्तर आराधना करता रहा। अन्तमें सूर्यमण्डलकी अधिदेवता भगवती सावित्री उसपर प्रसन्न हो प्रकट हुई। आश्विन मासमें उन्होंने उस ब्राह्मणको मण्डलका राजा बना दिया और वह आश्विन मासमें सूर्यरूप होकर प्रकाशमान हो उठा। सारा संसार उसकी पूजा करने लगा, इसलिये हे इन्द्र! तुम भी उन्हीं सूर्यकी आराधना करो। वे तुम्हारा भी परम कल्याण करेंगे।
- श्रीधरस्वामी और विष्णुस्वामीके विस्तृत चरित्र ‘भक्तमाल’ और ‘कल्याण’ के भक्तचरितार्द्धमें प्रकाशित हैं। दोनों भगवान्के परम श्रेष्ठ भक्त हुए हैं। श्रीधरस्वामीकी गीता, भागवत एवं विष्णुपुराणपर भक्तिपूर्ण टीकाएँ प्राप्त हैं।
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