भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

आचार्य मध्व, श्रीधरस्वामी, विष्णुस्वामी, वाणीभूषण, भट्टोजिदीक्षित तथा वराहमिहिर आदिके आविर्भावकी कथा

देवगुरु बृहस्पतिजीने कहा—देवेन्द्र! त्रेतायुगमें अयोध्यानगरीमें शक्रशर्मा नामके एक देवोपासक ब्राह्मण रहते थे। वे अश्विनीकुमार, रुद्र, वसु, सूर्य आदिकी पृथक्-पृथक् मन्त्रोंसे विधिपूर्वक पूजा, हवन आदि करते थे। उनकी श्रद्धा-भक्तिसे की गयी आराधनाद्वारा प्रसन्न होकर तैंतीसों देवता अपने गणोंके साथ उनके दुर्लभ मनोरथको भी सुलभ कर देते थे। वे विघ्न एवं जरारहित हो दस हजार वर्षांतक देवाराधन करते रहे। देहावसानके बाद उन्होंने सूर्य-सायुज्य प्राप्त किया। उनकी ऐसी शुभ गतिको देखकर देवताओंके साथ देवराज इन्द्र (आप)-ने भी भगवान् सूर्यकी आराधना की। आषाढ़ पूर्णिमाको पृथ्वीपर भगवान् भास्कर प्रत्यक्षरूपसे आये और उन्होंने देवताओंसे कहा—‘मैं कलियुगमें अतिशय रमणीय वृन्दावनमें द्विजरूपमें जन्म ग्रहण करूँगा और वह सूर्यरूपसे देवताओंका कार्य सिद्ध करेगा तथा वही द्विज माधव ब्राह्मणका वेदमार्गपरायण पुत्र मधु (मध्वाचार्य) नामसे प्रसिद्ध होगा।’ यह कहकर भगवान् सूर्य देवताओंके कार्यके लिये उद्यत हो गये। उन्होंने अपने अङ्गसे तेजको उत्पन्न कर वृन्दावन भेजा। वे माधवके पुत्र पृथ्वीपर मध्वाचार्यके नामसे प्रसिद्ध हुए। उन्होंने मधुर वचनोंद्वारा वेदमार्गसे विमुखोंको सभी तरहसे वशमें कर लिया और उन्हें भुक्ति-मुक्ति देनेवाली वैष्णवी शक्ति भी प्रदान की।

देवेन्द्र! द्वापरमें कृषिकार्यसे जीवनयापन करनेवाले मेघशर्मा नामके एक ब्राह्मण थे। वे ज्ञानी, बुद्धिमान्, धार्मिक तथा वेदमार्गपरायण थे। प्रतिदिन अपने धनके दशांशसे सभी देवताओंकी भक्तिपूर्वक पूजा करते थे। एक बार शंतनूके राज्यकालमें पाँच वर्षांतक अनावृष्टि हो गयी। केवल एक कोसपर्यन्त ही वृष्टि

होती थी। उस समय धान्यका भाव एक मुद्रामें द्रोणमात्र हो गया। केवल मेघशर्मा नामका वह ब्राह्मण सूर्यकी कृपासे धन-धान्यसम्पन्न था। अन्य पीड़ित प्रजागण राजाकी शरणमें गये। दुःखित राजाने मेघशर्माको बुलाया और प्रणामकर कहा—‘द्विजश्रेष्ठ! आप मेरे गुरु हैं। आप कोई ऐसा उपाय करें, जिससे मेरे राज्यमें सुवृष्टि हो।’ इसपर मेघशर्माने कहा—‘राजन्! श्रावण मासमें बारह ब्राह्मणोंद्वारा विधिपूर्वक सूर्य-मन्त्रका जप, हवन, तर्पण, ब्राह्मण-भोजन आदिद्वारा सूर्यकी आराधना करनेसे आपके राज्यमें सुवृष्टि होगी।’ राजाने वैसा ही किया। भगवान् सूर्यकी कृपासे प्रचुर वृष्टि हुई और सूर्यव्रतपरायण राजा शंतनु उस व्रतद्वारा अतिशय पुण्यवान् नृपश्रेष्ठ हो गये। जिस किसी वृद्ध पुरुषको भी वे अपने हाथसे स्पर्श कर देते थे, वह युवा एवं नीरोग हो जाता था। सूर्यदेवके प्रभावसे मेघशर्मा भी युवक हो गया। वह वृद्धावस्थासे रहित होकर सभी विघ्नोंसे शून्य हो पाँच सौ वर्षांतक जीवित रहा। अन्तमें प्राणका परित्याग कर उसने सूर्यलोक प्राप्त किया। अनन्तर वह ब्रह्मलोक चला गया। पुनः भगवान् सूर्यने प्रयागमें आकर पर्जन्यके रूपमें अपना दर्शन कराया और प्रसन्नचित्त होकर देवताओंसे कहा—‘देवगणो! घोर कलियुगमें स्लेच्छ-राज्य होगा, उस समय मैं वृन्दावनमें आकर देवकार्य करूँगा।’ यह कहकर भगवान् सूर्य वृन्दावन चले गये और वेदशर्माके पुत्र होकर ‘श्रीधर’ नामसे विख्यात हुए। उन्होंने श्रीमद्भागवतकी भक्तिपूर्ण भावार्थदीपिका टीका लिखी और भागवतकी अपार महिमा बतलाई।

बृहस्पतिजीने पुनः कहा—देवेन्द्र! कलियुगमें प्रोशुशर्मा नामके एक ब्राह्मण थे। वे नित्य वेदशास्त्र-परायण तथा देवता और अतिथिके पूजक, सत्यवादी,

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