भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 356, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *
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बृहस्पतिने पुनः कहा—देवेन्द्र! ज्येष्ठ मासके सूर्यकी रमणीय कथा आप सुनें। प्राचीन कालमें सत्ययुगमें अर्यमा नामका एक विप्र उत्पन्न हुआ था, वह धर्मशास्त्रपरायण तथा वेद-वेदाङ्गोंके तत्त्वोंका ज्ञाता था। राजा श्राद्धयज्ञकी पितृमती नामकी पुत्री उसकी पत्नी थी। वह अतिशय साध्वी थी। उसने धर्मशास्त्रपरायण सात पुत्रोंको जन्म दिया। किसी समय उस बुद्धिमान् ब्राह्मण अर्यमाने हृदयमें भलीभाँति विचारकर धनकी कामनासे अनेक प्रकारकी उपासनाओंसे भगवान् भास्करको प्रसन्न किया। ज्येष्ठ मासमें भगवान् सूर्यने उसे एक दिव्य मणि प्रदान की। उसके प्रभावसे एक प्रस्थ स्वर्ण प्रतिदिन उत्पन्न होता था। उसने उस धनसे धर्मकार्यार्थ—वापी, कूप, तडाग, सुन्दर भवन आदिका निर्माण कराया। अन्तमें उसने सूर्यदेवकी कृपासे एक हजार वर्षतक निर्विघ्न जरा रहित जीवन बिताकर रमणीय सूर्यलोकको प्राप्त किया। वहाँ एक लक्ष वर्षतक सूर्यरूपमें निवास किया। देवेन्द्र! इस प्रकार मैंने भास्करके माहात्म्यको आपसे कहा। इसलिये देवताओंके साथ आप भी मण्डलस्थ भगवान् सूर्यकी पूजा करें।
ज्येष्ठ मासमें देवताओंने श्रद्धासम्पन्न हो भगवान् सूर्यको स्तुतियोंसे संतुष्ट किया। प्रसन्न हो भगवान् सूर्यने उपस्थित होकर कहा—‘देवगणो! द्वारके अन्तमें श्रीकृष्णकी आज्ञासे सुदर्शनका जन्म होगा, वह निम्बादित्य (निम्बार्कार्य) नामसे प्रसिद्ध होगा और क्षीण होते हुए धर्मकी रक्षा करेगा।’
सूतजीने कहा—ऋषियो! अब आप महात्मा निम्बार्कके चरित्रको सुनें, जिसको भगवान् श्रीकृष्णने कहा था। भगवान् श्रीकृष्णने सुदर्शनसे कहा था कि मेरी आज्ञासे आप देवकार्य सम्पन्न करें। मेरुके दक्षिण दिशामें नर्मदाके तटपर देवताओं और ऋषियोंसे सेवित तैलङ्ग नामक एक देश है। वहाँ आप अवतीर्ण होकर देवर्षि नारदसे उपदेश
प्राप्तकर मथुरा, नैमिषारण्य, द्वारावती, सुदर्शनान्त्रम आदि स्थानोंमें स्थित होकर धर्मका प्रचार करें। इस आदेशको ‘ओम्’ के द्वारा स्वीकारकर भक्तोंकी अभिलाषाको पूर्ण करनेवाले भगवान् श्रीसुदर्शन पृथ्वीतलपर अवतीर्ण हुए।
पवित्र सुदर्शनान्त्रममें भृगुवंशमें उत्पन्न वेदवेदाङ्ग-पारङ्गत अरुण नामके एक महामनस्वी द्विजश्रेष्ठ मुनि रहते थे। उनकी भार्याका नाम था जयन्ती। अरुणमुनिने ध्यानद्वारा भगवान् विष्णुके सुदर्शनचक्रके तेजको धारण किया और उस तेजको पतिपरायणा जयन्तीदेवीने मनसे धारण किया। उस तेजके प्रभावसे देवी जयन्ती चन्द्रमाके समान सुशोभित होने लगी। परम शुभ समय उपस्थित हुआ। दिशाएँ निर्मल हो गयीं। कार्तिक मासके शुक्ल पक्षकी पूर्णिमामें जब चन्द्रमा वृषराशिपर स्थित थे, कृतिका नक्षत्र था, पाँच ग्रह अपने उच्च स्थानपर स्थित थे, उस समय सायंकालमें मेघलग्नमें जयरूपिणी जयन्तीदेवीसे जगदीश्वर निम्बादित्य प्रादुर्भूत हुए, जिन्होंने इस विश्वको वेदधर्ममें नियोजित किया।
एक समय निम्बार्कके आश्रममें भगवान् विरिञ्चि पधारे। उन्होंने कहा—‘मैं भूखसे व्याकुल होकर आपके पास आया हूँ। जबतक आकाशमें भगवान् सूर्य स्थित हैं, तबतक ही मुझे भोजन करा दीजिये। विरिञ्चिकी इस बातको सुनकर निम्बार्कने उन्हें भोजन दिया। परंतु भगवान् सूर्य अस्ताचलपर पहुँच गये थे। तब निम्बार्कमुनिने अपने तेजसे भगवान् सुदर्शनके तेजको निकटस्थ एक निम्ब वृक्षपर प्रतिष्ठित कर दिया। ब्रह्मा सूर्यके समान उस तेजको देखकर आश्चर्यमें पड़ गये और एक-दूसरे सूर्यके समान उस बालमुनिको दण्डवत् प्रणाम कर उसे संतुष्ट किया और बार-बार साधुवाद देते हुए कहा कि आजसे आप सारी पृथ्वीपर निम्बादित्य नामसे प्रसिद्ध होंगे।’ (अध्याय ७)
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