भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 355, कुल 654 में से
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
कहो।' इसपर धातुशर्माने कहा—' भगवन्! आपको बार-बार प्रणाम है, आप मुझे मोक्ष प्रदान करनेकी कृपा करें।' भगवान् सूर्यने ज्ञानी द्विज धातुशर्मासे कहा—'विप्र! मोक्ष चार प्रकारके हैं—तपसे उत्पन्न सालोक्य, भक्तिसे उत्पन्न सामीप्य, ध्यानसे उत्पन्न सारूप्य और ज्ञानसे उत्पन्न सायुज्य। इन चतुर्विध मोक्षोंके अधिष्ठाता परम परमेश्वर हैं। भगवान् विष्णुके उस परम पदको प्राप्त करनेपर पुनः आगमन नहीं होता। विप्रेन्द्र! तुमको सायुज्य-मोक्षकी प्राप्ति होगी और मन्वन्तरपर्यन्त तुम्हारा वह मोक्ष वर्तमान रहेगा।' ऐसा कहकर भगवान् भास्कर अन्तर्धान हो गये और विप्रको मोक्ष-प्राप्तिका वर प्राप्त हो गया।
सूतजीने कहा —मुने! इस प्रकार चैत्र मासमें देवाधिदेव दिवाकरने अपने स्वरूपका उन्हें दर्शन कराया और कहा — 'वंगदेशमें अपने अंशसे उत्पन्न होकर मैं देवकार्य सम्पन्न करूँगा।' यह कहकर दिवाकरने अपने मुखसे तेजको उत्पन्न किया और अपनी भक्त सुकन्या जो द्विज-पत्नी थी, उसके कल्याणके लिये उसे प्रदान किया। धातुशर्मा ब्राह्मण जिसने सूर्यकी आराधना कर मोक्ष प्राप्त किया था, वही उस तेजसे सम्पन्न होकर काव्यकर्ताके घरमें ईश्वरपुरी नामसे उत्पन्न हुआ। उसने वैदिक विप्रोंको शास्त्रार्थमें जीतकर महान् कीर्ति प्राप्त की।
ऋषियो! बृहस्पतिने जैसा मुझसे कहा था, वैसा ही मैंने आपसे कहा। पुनः बृहस्पतिद्वारा कही गयी एक अन्य रमणीय कथा सुनें।
मायावती (हरिद्वार) नगरीमें मित्रशर्मा नामका एक ब्राह्मण रहता था। वह काव्यप्रिय, विद्यापरायण और रसिक था। हरिद्वारमें कुम्भराशिपर बृहस्पतिके आनेपर महोत्सवके समय अनेक राजा उस स्थानपर आये। उस महोत्सवमें अनेक अलंकारोंसे अलंकृत मित्रशर्मा एवं असंख्य स्त्री-पुरुष आये।
वहीं दक्षिणात्य राजा कामसेनकी चित्रिणी नामकी एक कन्या भी आयी। उसकी अवस्था बारह वर्षकी थी। उसे मित्रशर्मासे बड़े ध्यानसे देखा। श्रेष्ठ मित्रशर्माको देखकर चित्रिणीके हृदयमें भी उसके प्रति प्रीति उत्पन्न हो गयी। घर आकर वह उसे प्राप्त करनेके लिये प्रतिदिन भगवान् भास्करकी श्रद्धापूर्वक आराधना करने लगी। इधर मित्रशर्मा भी वैशाख मासमें गङ्गामें स्नानकर जलके मध्य स्थित होकर भगवान् सूर्यका ध्यान करते हुए 'आदित्यहृदयस्तोत्र' का प्रतिदिन पाठ करने लगा। एक मास बाद भगवान् सूर्यने प्रसन्न होकर उसे मनोरथ पूर्ण होनेका वर प्रदान किया। वर प्राप्तकर वह अपने घर लौट आया। चित्रिणीने भी भगवान् भास्करसे अपने मनोऽनुकूल वर प्राप्त कर लिया। राजा कामसेनको भी भगवान् सूर्यने स्वप्नमें कहा कि 'तुम अपनी कन्याका विवाह मित्रशर्मासे कर दो', तब राजाने ऐसा ही किया।
विवाहके बाद दोनों ही भगवान् सूर्यका प्रतिदिन व्रत रखते थे और ताम्रपात्रपर सूर्ययन्त्र लिखकर रक्त पुष्पोंसे नित्य उनका श्रद्धा-भक्तिपूर्वक पूजन भी करते थे। उनकी अवस्था प्रायः सौ वर्षकी हो गयी, किंतु वे नीरोग रहे, उनका जीवन देवमय हो गया। मृत्युके अनन्तर उन्होंने भगवान् सूर्यकी सामीप्यता प्राप्त की। इन्हींके पुत्ररूपमें कान्यकुब्जमें देवल ब्राह्मणके घरमें भगवान् सूर्य अवतरित हुए। ये ही काशीमें रामानन्दके नामसे विख्यात हुए। बाल्यावस्थासे ही ये ज्ञानी, रामनाम-जप-परायण एवं रामभक्तिमें रत थे। पिता-माताका परित्याग कर ये राघवानन्द यतिकी शरणमें आये। उस समय भगवान् सीतापति श्रीराम उनके हृदयमें सहसा विराजमान हो गये। इस प्रकार भगवान् मित्रदेव (सूर्यदेव)-के अंशसे बलवान्, हरिभक्त रामानन्दका आविर्भाव हुआ।
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