भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 354, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *
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कूट्ट हो देवराज इन्द्रने हाथमें वज्र उठा लिया और बड़े वेगसे तैत्तिर देशकी ओर फँका। उस वज्रके घोर शब्दसे उसका सारा देश टुकड़े-टुकड़े होकर खण्डित हो गया और वह म्लेच्छ अपने सभी सभासदोंके साथ मृत्युको प्राप्त हो गया। अनन्तर प्रसन्न हो देवताओंने उन सभी शालग्रामशिलाओंको ग्रहणकर गण्डकी नदीमें छोड़ दिया। पुनः वे सभी स्वर्गलोक चले आये। इन्द्रने देवताओंके साथ देवपूज्य बृहस्पतिसे कहा—‘भगवन्! कलियुगके आनेपर बहुत दैत्य उत्पन्न हो गये हैं। वे वेदधर्मका उल्लंघन करके हमलोगोंके विनाशके लिये तैयार हो गये हैं, अतः आप हमारी रक्षा करें।’
बृहस्पति बोले—महेन्द्र! तुम्हारी जो श्रेष्ठ शची नामकी पत्नी है, उसे भगवान् विष्णुने वर दिया है कि ‘कलियुगमें मैं तुम्हारे पुत्ररूपमें अवतरित होऊँगा। तुम्हारे आदेशसे वह देवी शची गौड़देशमें गङ्गाके किनारे शान्तिपुरमें ब्राह्मणीके रूपमें तथा तुम स्वयं ब्राह्मणरूपमें अवतरित होकर देवकार्यको सिद्ध करो।’ यह सुनकर देवराज इन्द्र एकादश रुद्रों, अष्ट वसुओं तथा अश्विनीकुमारोंके साथ सूर्यके अत्यन्त प्रिय तीर्थराज प्रयागमें आये और उन्होंने माघमें मकरमें सूर्य होनेपर भगवान् सूर्यकी आराधना की। बृहस्पतिने आकर उन्हें भगवान् सूर्यका माहात्म्य बतलाया। (अध्याय ६)
भगवान् सूर्यके तेजसे आचार्य ईश्वरपुरी, आचार्य रामानन्द और निम्बार्काचार्यका आविर्भाव *
ऋषियोंने पूछा—सूतजी महाराज! देवगुरु बृहस्पतिने देवताओंको मण्डलस्थ भगवान् सूर्यका कौन-सा माहात्म्य बतलाया, उसे आप बतलानेकी कृपा करें।
सूतजीने कहा—ऋषियो! प्रयागमें जब देवगुरु बृहस्पति अपने आसनपर आसीन थे, उस समय देवताओंके साथ इन्द्रने भगवान् सूर्यके तत्काल प्रसन्न होनेके लिये जिस माहात्म्यको बतलाया था, उसे आप सुनें।
बृहस्पतिने देवताओंसे कहा—देवगणो! बहिष्मती (बिदूर) नगरमें धातुशर्मा नामक एक ब्राह्मणने पुत्रप्राप्तिके लिये तपस्या कर प्रजापति ब्रह्माको संतुष्ट किया। पाँच वर्षमें भगवान् प्रजापति संतुष्ट हुए और उन्होंने पुत्र, कन्या एवं पुनः पुत्र इस प्रकार तीन संतान प्राप्त करनेका वर प्रदान किया। धातुशर्माको एक वर्षके अन्तरसे तीनों संतानों उत्पन्न हुई। पुत्रोंके लालन-पालनसे धातुशर्मा बहुत आनन्दित हुआ। धीरे-धीरे वे बड़े होने लगे। धातुशर्माको
इनके विवाहकी चिन्ता होने लगी। तब इन लोगोंके उत्तम विवाहके लिये उसने गन्धर्वपति तुम्बुरुको हवन आदिसे संतुष्ट किया। तुम्बुरुने आकर उनके मनोरथकी पूर्तिका वरदान दिया। धातुशर्मा वधू और जामाताको देखकर बहुत प्रसन्न हुआ, किंतु इन लोगोंके विविध अलंकारों और धन, वस्त्र आदिकी प्राप्तिके लिये वह चिन्तित हो गया। वह साठ वर्षका हो गया। उसने पुनः धनपति कुबेरकी विधिबत् पूजा की। प्रसन्न हो भगवान् कुबेरने उसे बहुत धन दिया और स्वर्ण प्रदान करनेवाली विद्या (मन्त्र) भी उसे प्रदान की। धीरे-धीरे समय बीतनेपर वह बीमार हो मरणासन्न हो गया। अपनी यह दशा देखकर उसने भगवान् शंकरको स्तुतियोंसे संतुष्ट किया। भगवान् शंकरने एक मासमें ही उसे ज्ञान प्रदान किया। नम्रबुद्धि धातुशर्मने रविवारके व्रतके द्वारा मोहनाशक भास्करकी आराधना की। पाँच वर्षमें उसके भक्तिभावसे संतुष्ट हो भगवान् सूर्यने कहा—‘वत्स! तुम क्या वर चाहते हो,
- इन आचार्योंकी विशेष जानकारीके लिये ‘कल्याण’ के २६वें वर्षके विशेषाङ्कको देखना चाहिये।
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