भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 353, कुल 654 में से
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
कलियुगके अन्तमें प्रलयके बाद पुनः सत्ययुगमें सत्यधर्मके रूपमें प्रतिष्ठित होऊँगा।' यह सुनकर देवगण वहीं अन्तर्लीन हो गये।
मुने! इस प्रकार युग-युगमें भगवान् श्रीहरिकी क्रीडाएँ होती रहती हैं। विश्वव्यापक भगवान्के
इस रहस्यको विष्णुभक्त ही जानते हैं। विष्णुकी इच्छाके अनुसार ही सनातनी विष्णुमाया विविध लोकोंकी रचना कर महाकाली हो सम्पूर्ण चराचर विश्वको कालकवलित कर महागौरीके रूपमें हो जायँगी। (अध्याय ५)
दिल्ली नगरपर पठानोंका शासन और तैमूरलंगका उत्पात
महर्षि शौनकने पूछा—सूतजी महाराज! पृथ्वीराजके बाद कौन-कौन राजा उत्पन्न हुए? इसे आप बतायें।
सूतजीने कहा—मुने! पैशाच (पठान) राजा कुतुकोदीन (कुतुबुद्दीन) दिल्लीका शासक था और अति सुरम्य वलीगढ़ यादवोंसे रक्षित था। कुतुकोदीन दस हजार सैनिकोंको साथ लेकर युद्धके लिये वहाँ गया और वीरसेनके पौत्र श्रेष्ठ भूपसेनको जीतकर दिल्ली नगरमें राज्य करने लगा। इसी समय अनेक देशोंके राजागण वहाँ आये। उन लोगोंने कुतुकोदीनको जीतकर देशसे बाहर कर दिया। इस समाचारको सुनकर सहोद्दीन (शहाबुद्दीन) पुनः (गौरसे) दिल्ली पहुँच गया। उस दैत्यराजने राजाओंको जीतकर अनेक मूर्तियों और देवमन्दिरोंको खण्डित कर दिया। इसके बाद बहुत-से म्लेच्छ वहाँ आकर रहने लगे। पाँच-छः अथवा सात वर्षोंतक राज्यकर वे दिवंगत हो गये।
मुनिगणो! इन सभी म्लेच्छ राजाओंने अनेक मन्दिरोंको तोड़ा है, सभी तीर्थों और आश्रमोंको दूषित कर दिया है, अतः आपलोग मेरे साथ हिमालयके ऊपर बदरीवनकी ओर प्रस्थान कीजिये। यह सुनकर नैमिषारण्यवासी सभी ऋषिगण दुःखी होकर सूतजीके साथ नैमिषको छोड़कर बदरीक्षेत्र चले गये। वहाँ सभी लोग समाधिस्थ होकर सर्वमय श्रीहरिके ध्यानमें स्थित हो गये।
कुछ समय बाद समाधिसे जगनेपर ऋषियोंने
सूतजी महाराजसे पुनः कल्पके इतिहासके विषयमें जिज्ञासा प्रकट की।
सूतजीने पुनः कहा—श्रेष्ठ मुनिगण! मैंने योगनिद्रामें जो देखा है, उस कल्पके वृत्तान्तको कह रहा हूँ। उसे आपलोग सुनिये। अनन्तर मुकुल (मुगलवंशी) म्लेच्छ राजा हुआ। वह म्लेच्छराज तिमिरिलङ्ग (तैमूरलंग) मध्यदेशमें आया। उस कालस्वरूप म्लेच्छ राजाने सभी आर्यों तथा म्लेच्छ राजाओंको जीतकर देहली नगरीमें बहुत उपद्रव किया और उसने आर्योंको बुलाकर कहा—'तुम सभी मूर्तिपूजक हो। शालग्राम तो पत्थर है, उसका पूजन कैसे उचित है? तुम सब उसे विष्णु मानते हो, वह विष्णु तो है नहीं, अतः तुम सभीके जितने वेद-शास्त्र हैं, उन्हें मुनियोंने संसारको ठगनेके लिये बनाया है।' ऐसा कहकर तैमूरलंगने शालग्रामकी मूर्तिको जबरदस्ती छीन लिया और जलती हुई आगमें फेंक दिया तथा पूजित सभी शालग्रामशिलाओंको ऊँटोंपर लादकर वह अपने देश चला गया। उसने तैत्तिर (तातार) देशमें आकर अपना एक सुदृढ़ किला बनवाया। अपने सिंहसनपर आरोहण करनेके लिये शालग्रामशिलाका पादपीठ बनवाया।
यह देखकर सभी देवता दुःखी होकर देवराज इन्द्रके पास गये और विलाप करते हुए इन्द्रसे बोले—'भगवन्! हमलोगोंकी स्थिति तो शालग्राम-शिलामें है, परंतु म्लेच्छराज तैमूरलंगने शालग्रामको पादपीठ बनवा लिया है।' देवताओंकी बात सुनकर
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