भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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पृष्ठ 352
  • प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *

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भगवान्से चारों वर्णोंकी उत्पत्ति, चारों युगोंमें भगवान्के अवतारों एवं चारों युगोंके मनुष्योंकी आयुका निरूपण

सूतजी बोले—शौनक! अय्यक्जन्मा ब्रह्माके मध्याह्नकाल आनेपर चाक्षुषान्तर (मन्वन्तर)-में बड़ा भारी झंझावात आया। यहाँतक कि उसके प्रभावसे हिमालय पर्वत भी काँपने लगा। इससे प्रायः सृष्टिके अधिकांश प्राणियोंका विनाश हो गया। सप्तद्वीपा वसुमती और समुद्र जलमय हो गये। बस उत्तर दिशास्थित लोकालोक पर्वत मात्र शेष रह गया। मुने! मन्वन्तरके लय होनेपर सम्पूर्ण भूमिका लय हो गया। एक हजार वर्षतक पृथ्वी जलके मध्यमें स्थित रही। तब भगवान् विष्णुने शंकर तथा ब्रह्माके साथ आकाशमें शिशुमारचक्रको स्थित किया और सभी नक्षत्र-मण्डल तथा ग्रहोंको पूर्ववत् यथास्थान स्थित किया। उन ज्योतिश्चक्रोंके द्वारा पृथ्वीका जल सूख गया और पृथ्वी भी सुस्थिर हो गयी। एक अयुत वर्ष बीतनेके पश्चात् पृथ्वी स्थलके रूपमें दिखायी दी। तब भगवान् ब्रह्माने अपने मुखसे महामनीषी एवं सर्वविद्याविशारद द्विजराज सोमको उत्पन्न किया, दोनों भुजाओंसे महाबलशाली, राजनीतिमें पारङ्गत क्षत्रियराज सूर्यको उत्पन्न किया तथा ऊरुओंसे सरिताओंके पति रत्नाकर वैश्यराज समुद्रको उत्पन्न किया एवं पैरोंसे कलाविशारद, शास्त्रविहित कर्म करनेवाले, उत्तम विश्वके रचयिता शुद्रराज दक्षको उत्पन्न किया। सोमसे ब्राह्मणों, सूर्यसे क्षत्रियों, समुद्रसे सभी वैश्यों और दक्षसे शुद्रोंकी उत्पत्ति हुई। सूर्यमण्डलसे स्वयं वैवस्वत मनु उत्पन्न हुए। उनका सभी प्राणियोंपर राज्य हुआ। विश्वरूप भगवान् विष्णु पूर्वार्धसे तथा वामन परार्धसे उत्पन्न हुए। सत्ययुगमें जो भगवान् सनातन विष्णु विश्वरूपमें अवतार लेते

हैं, वे बालस्वरूपमें रहते हैं। उस समय मनुष्योंकी परम आयु चार सौ वर्ष थी। त्रेतामें युवावस्था-प्राप्त श्रीहरि पूर्वार्धसे अवतरित हुए। इस युगमें मनुष्यकी परम आयु तीन सौ वर्ष थी। द्वापरमें वार्धक्यभावप्राप्त देव श्रीहरि हुए। इस समय मनुष्यकी आयु दो सौ वर्ष थी। कलियुगमें विश्वरूप भगवान् मरणधर्मारूपमें थे और धर्मशील व्यक्तियोंकी परम आयु सौ वर्ष हो गयी।

ब्रह्माके परार्धमें जब वामनका अवतार हुआ, तब वे भगवान् विष्णु महेन्द्र (इन्द्र)-के अनुज वामन बने। वे चार भुजाधारी, श्यामवर्ण एवं गरुड़के ऊपर विराजमान थे। विश्वरूपके हितके लिये ये त्रियुगी बने। सत्ययुगमें वामनके अर्धभागसे साक्षात् त्रियुगीनारायण श्वेतरूप हरि 'हंस' नामसे उत्पन्न हुए। त्रेतामें भगवान् यज्ञ रत्नरूप धारणकर उत्पन्न हुए। द्वापरमें स्वर्णगर्भ हरि पीतवर्ण-रूपमें उत्पन्न हुए। द्वापरयुगकी संध्यामें कलियुगके आनेपर विष्णुकी तथा वामनकी सभी कलाओंके एकीभूत होनेपर साक्षात् विष्णु देवकीके गर्भसे वसुदेवके घर मथुरामें उत्पन्न हुए। ब्रह्मा आदिने सनातन ब्रह्मकी स्तुति की। उस समय प्रसन्न हो भगवान्ने देवताओंसे यह कहा—'देवगणो! देवोंके हित और दैत्योंके विनाशके लिये मैं कलियुगमें उत्पन्न होऊँगा और कलियुगमें भूतलपर स्थित सूक्ष्म रमणीय दिव्य वृन्दावनमें रहस्यमय एकान्त-क्रीडा करूँगा। घोर कलियुगमें सभी श्रुतियाँ गोपीके रूपमें आकर रासमण्डलमें मेरे साथ रासक्रीडा करेंगी। कलियुगके अन्तमें राधासे प्रार्थित मैं इस रहस्यमयी क्रीडाको समाप्त कर कल्किके रूपमें अवतीर्ण होऊँगा*।

  • सर्वे वेदाः कली घोर गोपीभूताः समन्तः । रंयन्ते हि मया सार्धं त्यक्त्वा भूमण्डलं तदा ॥

राधया प्रार्थितोऽहं वै यदा कलियुगान्तके । समाप्य च रहः क्रीडां कल्कीं च भवितास्यहम् ॥ (प्रतिसर्गपर्व ४।५।२७-२८)

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