भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
३४८
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
अपने गुरु बृहस्पतिके वचनोंके अनुसार देवेन्द्रने भी आश्विन मासमें सूर्यकी आराधना की। भगवान् सूर्यने प्रत्यक्ष हो इन्द्रसे कहा—‘देवराज! कान्यकुब्जमें सत्यदेव ब्राह्मणके घरपर मैं उनके पुत्र-रूपमें ‘वाणीभूषण’ नामसे अवतार ग्रहण करूँगा। अनन्तर उन्होंने ऐसा ही किया और कालक्रममें वाणीभूषणने अपने नामसे छन्दःशास्त्रके ग्रन्थकी रचना की और पाखण्डियोंको परास्त किया। उन्होंने भगवान् विष्णुकी उपासनासे वैष्णवी शक्ति प्राप्त की थी।
बृहस्पति पुनः बोले— देवराज इन्द्र! किसी समय सरयू नदीके किनारे देवयाजी नामक एक ब्राह्मण रहते थे। वे सभी देवोंकी उपासना करनेवाले और नित्य वेदपाठी थे। उनके एक पुत्र उत्पन्न हुआ, किंतु उत्पन्न होते ही वह मृत्युको प्राप्त हो गया। यह जानकर दुःखी हो देवयाजीने भगवान् सूर्यकी आराधना की। भगवान् सूर्यकी कृपासे वह मृत बालक पुनः जीवित हो गया और उसका नाम पड़ा विवस्वान्। यह सोलह वर्षकी अवस्थामें ही सभी शास्त्रोंका प्रकाण्ड विद्वान् हो गया। यह धर्मपरायण तथा सूर्यव्रतपरायण था। इसका विवाह भी सम्पन्न हो गया। एक दिन शिवरात्रिका पुण्य पर्व था। विवस्वान्ने व्रत ग्रहण किया था। उस दिन पत्नी सुशीलासे कामवश सम्पर्क करनेके कारण वह भयंकर कुष्ठरोगसे ग्रस्त हो गया। वह बहुत दुःखी हो गया। पुनः किसीसे द्वादश रविवार-व्रतोंका उपदेश प्राप्तकर निराहार रहते हुए उसने जितेन्द्रिय होकर भगवान् सूर्यकी आराधना की। इस भक्तिसे तथा भगवान् सूर्यकी कृपासे उसका कुष्ठरोग दूर हो गया और उसकी सारी पीड़ा समाप्त हो गयी। इससे उसकी भगवान् सूर्यमें अत्यन्त श्रद्धा उत्पन्न हो गयी और वह ‘आदित्यहृदयस्तोत्र’ का पाठ करने लगा, इसके प्रभावसे वह कामदेवके समान सुन्दर रूपवान् हो
गया। पूर्वमें स्त्रियोंद्वारा भत्सित वही विवस्वान् अब उनका प्रियभाजन बन गया, किंतु विवस्वान् अखण्ड ब्रह्मचर्यव्रत धारणकर ब्रह्मध्यानपरायण हो गया। सौ वर्षोंतक वह नीरोग एवं ज्ञानवान् रहा। अन्तमें अपने प्राणोंका परित्याग कर वह सूर्यरूप हो गया और सूर्यमण्डलके बीचसे कार्तिक मासमें एक लाख वर्षतक प्रकाश करता रहा। हे महेन्द्र! तुम भी देवताओंके साथ उन भगवान् सूर्यकी पूजा करो।
सूतजीने कहा— मुने! देवराज इन्द्रने बृहस्पतिके वचनोंको सुनकर श्रद्धापूर्वक एक मासतक भगवान् सूर्यकी कार्तिक मासमें विधिवत् पूजा की। कार्तिक पूर्णिमामें भगवान् सूर्यने प्रकट होकर इन्द्रसे कहा—‘इन्द्र! मैं अवतार धारण कर देवकार्यको सिद्ध करूँगा। विद्याभिमानी भट्टोंने सूत्रपाठ तथा धातुपाठका अन्यथा अर्थ किया है, अर्थका अनर्थ किया है तथा स्वर और वर्णके अर्थको भ्रंश कर दिया है। मैं उन पाखण्डियोंको जीतकर वेदका उद्धार करूँगा।’ ऐसा कहकर वे भगवान् सूर्य काशीमें वेदशर्माके घरमें दीक्षित-वंशमें उत्पन्न हुए। वे यथानाम तथा-गुण थे। वे बारह वर्षकी अवस्थामें ही सभी शास्त्रोंमें पारङ्गत हो गये। भगवती पार्वतीके प्रिय तथा संसारके स्वामी भगवान् विश्वनाथकी उन्होंने आराधना की। तीन वर्षके बाद भगवान् शंकरने उन्हें महान् ज्ञान प्रदान किया। उस दिव्य ज्ञानके प्रभावसे उन्हें व्यक्त तथा अव्यक्तका सब ज्ञान स्पष्ट हो गया और उन्होंने सिद्धान्तकौमुदी नामक व्याकरणग्रन्थकी रचना की। पाखण्डों भट्टोंको उन्होंने परास्त कर जीत लिया था, इसलिये उनका ‘भट्टोजिदीक्षित’ नाम संसारमें विख्यात हुआ।
देवगुरु बृहस्पति बोले— देवराज इन्द्र! पूर्वकालमें काञ्चीपुरीमें एक दैवज्ञ ज्योतिषी ब्राह्मण रहता था। वह वेदमार्गानुगामी राजा सत्यदत्तका पुरोहित
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- प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *
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था। किसी समय उस ज्योतिषीने राजा सत्यदत्तसे कहा—‘राजन् ! पुष्पनक्षत्रसे युक्त यह अभिजित् नामका मुहूर्त है। इस समय आप बाजार लगवायें, इसमें क्रय-विक्रय होनेसे आपको अतिशय लाभ होगा।’ तब राजाने डुगडुगी पिटवायी—‘बाजारमें जिसका सामान नहीं बिकेगा, उसे राजा खरीदेगा—यह हमारी सत्य घोषणा है।’ ऐसी घोषणा सुनकर बाजारमें अनेक वस्तुएँ बिकनेके लिये आ गयीं, परंतु दूसरे वणिक्-जनोंने उन सबको खरीद लिया। उसी समय एक लोहार लोहेका एक ‘दरिद्रपुरुष’ बनाकर बाजारमें लाया और उसका सौ रुपये मूल्य माँगा। परंतु उसे बाजारमें किसीने भी नहीं खरीदा। राजाने दरिद्रकी मूर्ति समझकर भी घोषणाके अनुसार उसे सौ रुपयेमें खरीद लिया और महलमें लाकर कोषागारमें रखवा दिया। उस मूर्तिके प्रभावसे रातमें राज्यसे सत्कर्म, धर्म और लक्ष्मी राजाके देखते-देखते जाने लगे। सत्यने पुरुषरूपमें राजासे कहा—‘राजन् ! जहाँ दरिद्रताका निवास रहता है, वहाँ कोई कर्मपरायण नहीं होता, कर्मके बिना पृथ्वीपर धर्म स्थिर नहीं हो सकता, धर्मके बिना लक्ष्मीकी कोई शोभा नहीं होती और लक्ष्मीके बिना मैं नहीं रह सकता।’ यह कहकर जानेकी इच्छा करते हुए सत्यको राजाने पकड़ा और नप्र वचनमें कहा—‘प्रभो ! मैंने आपका परित्याग नहीं किया है, मैंने सत्यका ही पालन किया है। अतः आप मेरा घर छोड़कर क्यों जा रहे हैं?’ यह सुनकर सत्यदेव पुनः राजाके घरमें चले गये, उनके पीछे-पीछे लक्ष्मी भी घरमें आने लगीं। राजाने लक्ष्मीसे कहा—‘देवि ! आप चञ्चला हैं, यदि अचल होकर रह सकती हैं तो मेरे घरमें आयें।’ यह सुनकर अचल होनेका वर प्रदान कर
लक्ष्मी भी राजाके घरमें प्रविष्ट हो गयीं।
राजा सत्यदत्तने पुनः अपने पुरोहित ज्योतिषीको बुलाकर उन्हें एक लक्ष मुद्रा प्रदान की और सभी बातें उनकी बता दीं। उस पुरोहितने पुत्रके जन्मके समय यह धन प्राप्त किया था, अतः उस सम्पूर्ण धनको श्रेष्ठ गणकने बालकके पालन-पोषणमें व्यय कर दिया और उसका ‘पूषा’ नाम रखा। पूषाने मार्गशीर्ष मासमें सूर्यकी आराधना की। उनकी कृपासे वह ज्योतिषशास्त्रमें पारङ्गत हो गया तथा सूर्यमें लीन हो गया। इसलिये हे देवेन्द्र ! तुम भी मार्गशीर्षमें भगवान् सूर्यकी पूजा करो।
सूतजी बोले—मुने ! बृहस्पतिके निर्देशानुसार इन्द्रने भी मार्गशीर्ष मासमें सूर्यकी आराधना की और प्रसन्न होकर पूषारूपमें भगवान् सूर्यने उसे प्रत्यक्ष दर्शन देकर कहा—‘देवगणो ! उज्जयिनीमें रुद्रपशुके घरपर मिहिंराचार्य (वराहमिहिर)-के नामसे मैं जन्म ग्रहण करूँगा। मैं ज्योतिषशास्त्रका प्रवर्तक होऊँगा। अनन्तर मूलगण्डान्त एवं अभिजित्के योगमें रुद्रपशु ब्राह्मणके घरपर एक बालकका जन्म हुआ। पिताने उत्पन्न पुत्रको काठकी पेटीमें रखकर रात्रिमें नदीमें बहा दिया। वह बहता हुआ समुद्रमें चला गया, पर वहाँ राक्षसियोंके द्वारा वह रक्षित हुआ। पुनः उसने लङ्कामें आकर ज्योतिषका अध्ययन किया। जातक, फलित, मूकप्रश्न आदि ज्योतिषके सभी अङ्गोंका भलीभाँति अध्ययन कर यह विभीषणके पास आया और इसने भक्तराज विभीषणको प्रणाम किया तथा कहा—‘मुझे राक्षसियोंने यहाँ पहुँचा दिया है, मैं आपकी शरणमें हूँ।’ विभीषणने उसे श्रेष्ठ वैष्णव समझकर उसकी जन्मभूमिमें भेज दिया। म्लेच्छोंके द्वारा विनष्ट ज्योतिषका इसने पुनः उद्धार किया। (अध्याय ८)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
वैद्यराज धन्वन्तरि, सुश्रुत और भक्त कवि जयदेवजीका चरित्र
सूतजी बोले—मुने! देवगुरु बृहस्पतिने प्रयागमें भगवान् सूर्यके उत्तम माहात्म्यको इन्द्रादि देवताओंसे पुनः इस प्रकार कहा—हे देवेन्द्र! प्राचीन कालमें त्रेतायुगके अन्तमें जिस प्रकार भगवान् शंकरकी आज्ञासे भगवान् सूर्य रमणीय प्रतिष्ठानपुरमें प्रादुर्भूत हुए उसे आप सुनें।
त्रेतायुगके अन्तमें सिंहलद्दीपमें परीक्षित नामका एक राजा था, वह वेदधर्मपरायण तथा देवताओं एवं अतिथियोंका पूजक था। उसकी एक कन्या थी, जिसका नाम था भानुमती। वह सूर्यव्रतपरायणा थी। राजमहलमें वह प्रतिदिन भगवान् सूर्यकी आराधना कर उन्हें भोग निवेदित करती थी और उसकी भक्तिसे संतुष्ट होकर प्रत्येक मध्याह्नकालमें भगवान् सूर्य वहाँ आकर उस नैवेद्यको स्वीकार करते थे।
एक समयकी बात है, रविवारके दिन वह भानुमती स्नान करनेके लिये नलिनीसागरपर गयी और जलमें उतरकर स्नान करने लगी। उसी समय नारदमुनि उस जनशून्य प्रदेशमें पहुँचे और उन्होंने उस कन्यासे विवाह करनेकी इच्छा प्रकट की। परंतु कन्याने इसे अनुचित बताया। इससे देवर्षि नारद लज्जित हो गये और रोगसे भी ग्रस्त हो गये। देवर्षि नारदने भगवान् शंकरके पास आकर सारी घटना उनसे निवेदित की। तब शंकरने उनका रोग दूर करनेके लिये आराधनाद्वारा भगवान् भास्करको प्रसन्न किया। भगवान् सूर्यने प्रकट होकर देवर्षिका शरीर नीरोग एवं सुन्दर बना दिया और भगवान् शंकरसे कहा—‘हे प्रभो! मुझे आज्ञा दें, मैं आपका कौन-सा प्रिय कार्य
करूँ?’ भगवान् शंकरने कहा—‘भगवन्! आप ब्राह्मण होकर सविता नामसे मृत्युलोकमें जायँ और राजा परीक्षितकी कन्या भानुमतीसे विवाह करें।’ भगवान् सूर्यने वैसा ही किया। वे सविता भानुमतीके साथ भगवान् सूर्यकी आराधना करने लगे और उन्होंने सूर्यलोकको प्राप्त किया तथा वे ही पौष मासमें आकाशमें प्रकाशित होने लगे। महेन्द्र! तुम भी भगवान् सूर्यकी उपासना करो और देवताओंके कार्यको सिद्ध करो।’
सूतजीने कहा—मुने! बृहस्पतिकी बात सुनकर देवराज इन्द्रने देवताओंके साथ पौष मासमें भगवान् सूर्यकी आराधना की। प्रसन्न होकर सूर्य प्रकट हुए और उन्होंने कहा—‘देवगणो! मैं काशीमें धन्वन्तरि नामसे उत्पन्न होऊँगा और कलिके द्वारा निर्मित रोगोंसे पीड़ित संसारके प्राणियोंको रोगोंसे मुक्त करूँगा तथा वहाँ निवासकर देवताओंके कार्यको सिद्ध करूँगा।’ ऐसा कहकर भगवान् सूर्य काशीमें चले आये और कल्पदत्त ब्राह्मणके घरमें पुत्ररूपमें धन्वन्तरिनामसे उत्पन्न हुए। इन्होंने प्रौढ़ विद्वानोंके साथ राजपुत्र सुश्रुतको अपना शिष्य बनाया तथा कल्पवेद (आयुर्वेद—चिकित्साशास्त्र)-का प्रणयन किया। विद्वानोंने रोगोंद्वारा क्षीण होते हुए देहको ‘काल्प’ कहा है, इसीका ज्ञान इस तन्त्रमें निहित है, इसीलिये इसे कल्पवेद कहा गया है। कलियुगमें वे सूर्य ही भगवान् धन्वन्तरिके रूपमें प्रसिद्ध हुए, जिनके दर्शनमात्रसे ही समस्त रोग तत्काल नष्ट हो जाते हैं। आचार्य सुश्रुतने धन्वन्तरिप्रणीत कल्पवेदका अध्ययन करके सौ अध्यायोंवाले ‘सौश्रुत-तन्त्र’ का निर्माण किया।
१-अन्य पुराणों तथा आयुर्वेदग्रन्थोंमें काशिराज दिवोदासको समय समुद्रसे उत्पन्न हुए थे। स्कन्दपुराण काशीखण्डमें इनकी कथा बहुत विस्तारसे आयी है।
२-रोगेश्वर श्रयितं देहं काल्पमेतत् स्मृतं बुधैः। तस्य ज्ञानं च तन्त्रंऽस्मिन् कल्पवेदो ह्यतः स्मृतः ॥ (प्रतिसरूपपर्व ४। १। २१)
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- प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *
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बृहस्पतिने पुनः कहा—देवराज! पूर्व समयमें रमणीय पम्पापुरमें हेली नामका एक ब्राह्मण रहता था। वह चौंसठ कलाओंका ज्ञाता और भगवान् सूर्यकी उपासनामें तत्पर रहता था। उसने प्रतिग्रह-वृत्तिका परित्याग कर हस्तकलासे वस्तुनिर्माणकी वृत्ति अपनायी। उसने लौह धातुकी एक सुन्दर मूर्ति बनाकर उसे अनेक चित्रकारीसे चित्रितकर पाँच हजार मुद्रामें बेचा। बेचनेसे उसे जो धन प्राप्त हुआ उस धनसे उसने माघ मासमें भगवान् सूर्यकी यज्ञोद्धारा आराधना की। हेलीने रमणीय पम्पासरोवरमें ज्योतिःस्वरूप एक उत्तम स्तम्भका निर्माण किया। भगवान् सूर्य भी उसकी भक्तिसे प्रसन्न होकर प्रत्येक मध्याह्नकालमें हेलीद्वारा निवेदित नैवेद्यका वहाँ भोग लगाते थे। भगवान् सूर्यकी कृपासे सहस्र वर्षपर्यन्त आयु भोगकर अपने प्राणोंका परित्याग कर वह हेली सूर्यस्वरूप हो गया और सूर्यमण्डलके बीच स्थित होकर माघ मासमें प्रकाशित होने लगा। देवेन्द्र! आप भी आदित्यमण्डलमें स्थित विश्वकर्मा भगवान् सूर्यकी उपासना कीजिये। वे आपका सब कार्य सम्पन्न कर देंगे। देवगुरुके इस वाक्यको सुनकर देवताओंके साथ इन्द्रने भगवान् सूर्यकी आराधना की। जिससे प्रसन्न हो भगवान् सूर्यने देवताओंसे कहा—‘देवगणो! मैं वंगदेशके बिलग्राम—बिल्वग्राममें निरुक्तकारके रूपमें उत्पन्न होऊँगा और कविशिरोमणि जयदेवके नामसे विख्यात होऊँगा।’
यह कहकर भगवान् सूर्य वंगदेशमें आये और कन्दुककी ब्राह्मणके घर पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए। वे पाँच वर्षकी अवस्थासे ही माता-पिताकी सेवामें विशेषरूपसे तत्पर रहने लगे। उन्होंने बारह वर्षतक माता-पिताकी बड़ी सेवा की। बारह वर्षकी अवस्थामें ही माता-पिताके मरणोपरान्त उनका उन्होंने विधिपूर्वक श्राद्ध-कृत्य किया और गयामें वे पितृरूपमें जयदेवके
सामने उपस्थित भी हुए तथा पुनः देवरूपमें स्वर्गमें प्रतिष्ठित हुए। अन्तमें जयदेवजीको वैराग्य उत्पन्न हो गया और वे वनमें रहकर भजन करने लगे। उनकी अवस्था तेईस वर्षकी हो गयी। इसी समय सत्यव्रत नामक ब्राह्मणने अपनी शुभ कन्या भगवान् जगन्नाथको समर्पित कर दी। पूजाके अन्तमें सनातन दारुब्रह्ममय भगवान्ने साक्षात् आकर उससे कहा—‘सत्यव्रत! जयदेव मेरी ही मूर्ति है, मेरी आज्ञासे अपनी पुत्री पद्मावती उसे प्रदान कर दो।’ यह सुनकर उस सत्यव्रत ब्राह्मणने अपनी कन्या पद्मावती वैरागी जयदेवके लिये बड़ी प्रसन्नतापूर्वक समर्पित कर दी, फिर वह सत्यव्रत अपने घर वापस आ गया।
पद्मावती अपने पति जयदेवकी आनन्दके साथ अनेक वर्षांतक सेवा करती रही। समाधिकालमें जयदेवने वेदाङ्गनिरुक्तकी रचना की। कलियुगमें नागवंशीय शूद्रोंने वैदिक प्रक्रियाएँ भ्रष्ट कर दी थीं। प्राकृत भाषाके रचयिता कलिप्रिय मूढ़ रचनाकारोंको उन्होंने जीतकर पाणिनिशास्त्रका उद्धार किया। कलियुगसे प्रेरित चोरोंने राजाद्वारा प्राप्त जयदेवकी सारी सम्पत्ति लूटकर उनका हाथ-पैर काटकर उन्हें गड्डेमें डाल दिया। पद्मावती अपने पतिकी यह दशा देखकर बहुत दुःखी हुई और रोती हुई उसने गड्डेसे पतिको निकालकर हाथसे सहलाकर उनकी पीड़ाको दूर किया।
एक दिन राजा धर्मपाल मृगया-प्रसंगमें वहाँ आया। उसने भक्त जयदेवको देखा और पूछा कि हाथ-पैरसे विहीन आपकी यह दशा किसने की है? जयदेवने कहा—‘महाराज! मैं अपने कर्मोंके फलस्वरूप ही इस दशाको प्राप्त हुआ हूँ। किसीने दुष्टता नहीं की है।’ इसपर राजा धर्मपाल जयदेवको पलीसहित शिविका (डोली)-में बैठाकर अपने महल ले आया। राजाने उनसे दीक्षा ग्रहणकर
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
उनके लिये एक धर्मशालाका निर्माण कराया। किसी समय कलिये प्रेरित वे ही चोर वैष्णवका वेश बनाकर राजा धर्मपालके महलमें आये और राजासे कहने लगे—‘प्रभो! हमलोग शास्त्रमें निपुण हैं और आपके घर आये हैं। राजन्! हमलोगोंद्वारा निर्मित भोज्य-पदार्थ शिलास्थित भगवान् विष्णु (शालग्राम) प्रतिदिन ग्रहण करते हैं। नृपश्रेष्ठ! आप उसे देखें।’ ऐसा कहकर उन कलिभक्तोंने अपनी मायासे चतुर्भुज विष्णुरूपको भोजन करते हुए राजाको दिखाया। आश्चर्यचकित हो धर्मपालने जयदेवसे कहा—‘गुरुदेव! मेरे घरपर विष्णुपरायण वैष्णव आये हैं। मैंने उनके प्रभावसे साक्षात् हरिका दर्शन किया है। इसलिये आप भी शीघ्र आयें।’ यह सुनकर जयदेव भी चकित हो राजदरबारमें आये। उस समय उन पाखण्डियोंने हँसते हुए राजासे कहा—‘राजन्! यह ब्राह्मण तो गौड़देशके राजाके यहाँ भोजन आदि बनानेका कार्य करता था। इसने धनके लोभसे छलकर भोजनमें विष
मिलाकर राजाको खिला दिया था। अतः यह दुष्ट व्यक्ति है। यह जानकर उस राजाने इस ब्राह्मणको शूलीपर चढ़ा दिया। इसी बीच हमलोग वहाँ पहुँचे। द्विजको पापी समझकर हमलोगोंने बहुत उपदेश दिया। उस राजाको भी हमलोगोंने बहुत समझाया, तब राजाने शूलीसे उतारकर इसके हाथ-पैर कटवा लिये। वह राजा भी हमारा शिष्य हो गया।’
उन चोरोंके ऐसा कहते (मिथ्या भाषण करते) ही दुःखित होकर पृथ्वी फट पड़ी और वे चोर पृथ्वीमें धँस गये। दयालु जयदेव चोरोंकी यह स्थिति देखकर रोने लगे। इनके रोते ही उनके कटे हाथ-पैर प्रकृतरूपमें हो गये। यह देखकर राजा धर्मपालको महान् आश्चर्य हुआ। उन्होंने जयदेवजीसे इसके विषयमें पूछा। तब जयदेवजीने सत्य-सत्य सारी घटना उन्हें बता दी। यह सुनकर राजा अत्यन्त प्रसन्न हुआ। जयदेवद्वारा निर्मित ‘गीतगोविन्द’ पढ़कर उस राजाने मोक्ष प्राप्त किया। (अध्याय ९)
चैतन्य महाप्रभु, वाल्मीकि और शंकराचार्यके आविर्भावकी कथा
देवगुरु बृहस्पतिने कहा—देवेन्द्र! प्राचीन कालमें किसी समय वेदपारङ्गत विष्णुशर्मा नामके एक ब्राह्मण थे। वे प्रसन्नचित्तसे सर्वदेवमय विष्णुकी पूजा करते थे, इसलिये देवतालोग भी उनकी प्रतिष्ठा करते थे। वे भिक्षावृत्तिसे जीवननिर्वाह करते थे, उनकी स्त्री थी किंतु कोई पुत्र न था। एक समय उनके घरपर कोई अतिथि आया। दयालुहृदय उस महात्माने विष्णुशर्माकी स्त्रीकी आर्थिक स्थिति तथा नप्रता देख उसे तीन दिनोंके लिये एक पारसमणि दी और कहा कि इसके स्पर्शसे लोहा भी सोना हो जाता है। इतने दिनोंमें मैं सरयूमें स्नान कर तुम्हारे पास लौट आऊँगा। उसके जानेपर ब्राह्मणीने उस मणिसे पर्याप्त सोना
तैयार कर लिया। तबतक विष्णुशर्मा भी आ गये। उन्होंने अपार सुवर्णराशिसे सम्पन्न अपनी पत्नीको देखकर कहा—‘जहाँ वह पारसमणिका स्वामी गया है, तुम भी वहीं चली जाओ। मैं अकिञ्चन हूँ, विष्णुभक्त हूँ। चोर-डाकुओंके भयसे धनका संग्रह नहीं करता।’ इसपर उनकी पतिव्रता पत्नी डर गयी और पारसमणि उसे समर्पित कर पुनः उनकी सेवामें तत्पर हो गयी। ब्राह्मण विष्णुशर्माने उस सारे धन एवं पारसको घर्घरा—सरयू नदीमें फेंक दिया। तीन दिनोंके बाद उस अतिथिने आकर ब्राह्मणीसे पूछा कि क्या तुमने पारसमणिसे सोना नहीं बनाया? उसने कहा—‘मेरे पतिने उसे क्रोधपूर्वक ग्रहणकर घाघरामें फेंक दिया। उस
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- प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *
३५३
दिनसे मैं जिस-किसी प्रकार लोहेके बर्तनोंके अभावमें आगमें ही भोजन बना रही हूँ।'
यह सुनकर वह यति आश्चर्यचकित हो गया। दिनभर वहीं रुका रहा। संध्यासमय ब्राह्मणके आनेपर उसने रक्षस्वरमें कहा—'ब्राह्मण! तुम दैवद्वारा मोहित प्रतीत होते हो; क्योंकि तुम दरिद्र भी हो और धन भी संग्रह नहीं करना चाहते हो। अतः मेरा पारस शीघ्र ही लौटा दो, नहीं तो मैं अपना प्राण त्याग दूँगा।' यतिके इस प्रकार कहनेपर विष्णुशर्मा ने कहा—'तुम घाघराके किनारे जाओ, वहीं तुम्हारा पारस मिल जायगा।' यह कहकर यतिके साथ वहाँ जाकर उसने बहुत-से कंटकोंसे ढके अनेक पारसमणियोंको उसे दिखाया। उस यतिने ब्राह्मणको नमस्कार कर नम्रतापूर्वक कहा—'मैंने बारह वर्षांतक भलीभाँति शिवकी आराधना की, तब मैंने इस शुभ रत्नको प्राप्त किया। विप्रश्रेष्ठ! आपके दर्शनमात्रसे ही मुझ लोभात्माने आज अनेकों पारसमणियोंको प्राप्त कर लिया।' यह कहकर उससे शुभ ज्ञान प्राप्त कर मोक्ष प्राप्त कर लिया। इधर विष्णुशर्मा ने एक हजार वर्षांतक पृथ्वीपर रहकर सूर्यकी आराधना करके विष्णुलोकको प्राप्त किया। वे ही विष्णुशर्मा वैष्णव तेज धारणकर फाल्गुनके महीनेमें तीनों लोकोंमें तप रहे हैं और देवकार्य सिद्ध कर रहे हैं।
देवेन्द्र! फाल्गुन मासमें उन सूर्यकी आराधना कर तुम भी सुख प्राप्त करो। उन्होंने देवताओंके साथ ऐसा ही किया। प्रसन्न हो भगवान् सूर्य सूर्यमण्डलसे प्रकट होकर सभी देवताओंके देखते-देखते इन्द्रके शरीरमें प्रविष्ट हो गये। उस तेजसे इन्द्रने अपना शरीर अयोनिज विप्ररूपमें धारण किया और शचीदेवी भी पृथ्वीमें ब्राह्मणीके रूपमें अवतीर्ण हुई। एक वर्षके बाद शचीदेवीके गर्भसे भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षमें गुरुवारको द्वादशी तिथिमें ब्राह्मवेलामें एक दिव्य बालकका जन्म हुआ। जो
वास्तवमें भगवान् विष्णुके कलावतार थे। उस समय रुद्र, वसु, विश्वेदेव, मरुद्रण, साध्य, सिद्ध तथा भास्कर आदि देवोंने उस सनातन हरिरूप बालककी दिव्य स्तुति की और कलियुगमें दितिपुत्रोंद्वारा पीड़ित देवताओं तथा अधर्मसे दुःखी पृथ्वीका उद्धार करनेके लिये प्रार्थना की। यही आगे चलकर श्रीकृष्णचैतन्यके नामसे विख्यात हुए।
सूतजी बोले—मुने! स्तुतिके अनन्तर सभी देवगण बृहस्पतिके पास आकर कहने लगे—महाभाग! हम सभी रुद्रगण, ये वसुगण तथा अश्विनीकुमार पृथ्वीपर किस-किस अंशरूपमें अवतरित होंगे, इसे आप बतलानेकी कृपा करें।
बृहस्पतिने कहा—देवगणो! इस विषयमें आप-लोगोंको मैं एक दूसरी बात बता रहा हूँ—प्राचीन कालमें मृगव्याध नामका एक अधम ब्राह्मण था। वह मार्गमें सदा धनुर्बाण धारणकर विप्रोंकी हिंसा किया करता था। वह महामूर्ख ब्राह्मणोंको मारकर उनके यज्ञोपवीतोंको ग्रहणकर उत्साहपूर्वक शोर मचाता था। वह दुष्ट द्विजाधम तीनों वर्णोंको, विशेषकर ब्राह्मणोंको मारता था। उस समय ब्राह्मणोंका विनाश देखकर देवगण भयभीत हो ब्रह्माके पास आये और सभी बातें उन्हें बतायीं। यह सुनकर दुःखी हो ब्रह्माने सभी लोकोंमें गमन करनेवाले सप्तर्षियोंसे कहा—'द्विजोत्तमो! आप सभी वहाँ जाकर मृगव्याधको समझाये।' यह सुनकर वसिष्ठ आदि ऋषियोंके साथ मरीचि मृगव्याधके वनमें गये। धनुर्बाणधारी महाबली मृगव्याधने उन लोगोंको देखकर भयंकर वचन कहा—'आज मैं तुमलोगोंको मारूँगा।' मरीचि आदिने हँसकर कहा—'तुम हमलोगोंको क्यों मारोगे? कुलके लिये मारोगे या अपने लिये, यह शीघ्र बताओ।' यह सुनकर उस मृगव्याधने कहा—'मैं अपने कुलके लिये और अपने कल्याणके लिये (तुमलोगोंको) मारूँगा।'
584 Sankshipta Bhavishya Puran_Section 13.1 From Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
यह सुनकर उन लोगोंने कहा—‘धनुर्धर ! अपने घरमें यह पूछकर शीघ्र आओ कि विग्रहत्यासे किये गये पापोंको कौन भोगेगा ? यह विचार करो ।’ यह सुनकर उस घोरात्माने अपने कुलवालोंसे पूछा—‘आजतक मैंने जो पाप अर्जित किया है, उसे तुमलोग भी वैसे ही ग्रहण करो, जैसे धनको ग्रहण किया है ।’ उस अधम ब्राह्मणके इस वचनको सुनकर उसके कुटुम्बियोंने कहा—‘हमलोग तुम्हारे किये गये पापको ग्रहण नहीं करेंगे, क्योंकि यह भूमि और ये सूर्य साक्षी हैं, हमलोगोंने कोई पाप नहीं किया है ।’ यह सुनकर उस मृगव्याधने मुनियोंके पास जाकर हाथ जोड़कर कहा—‘महात्माओ ! जिस प्रकार मेरे पापोंका क्षय हो, आपलोग वैसा उपाय बतायें ।’ मृगव्याधके यह कहनेपर ऋषियोंने कहा—‘एक उत्तम मन्त्र है, उसे सुनो—वह है ‘रामका नाम ।’ यह सभी प्रकारके पापोंको दूर करनेवाला है । अब हमलोग जा रहे हैं, जबतक वापस तुम्हारे पास न आ जायें, तबतक तुम इस महामन्त्र अर्थात् राम-नामका जप करो ।’ यह कहकर मुनिगण तीर्थान्तरोमें भ्रमण करने चले गये और वह मूर्ख व्याध विप्र ‘मरा-मरा’ का हजार वर्षतक निरन्तर जप करता रहा । उसके जपके प्रभावसे वह अरण्य उत्पलों (कमलों)–से परिव्याप्त हो गया और तभीसे वह स्थान पृथ्वीपर उत्पलारण्यके नामसे प्रसिद्ध हो गया१ ।
अनन्तर सप्तर्षि वल्मीक बने उस मृगव्याधके पास आये और उसकी मिट्टी हटाकर उसको शुद्ध विप्रके रूपमें देखकर आश्चर्यचकित होकर कहने लगे—‘वल्मीकसे निकलनेके कारण तुम वाल्मीकि कहे जाओगे । त्रिकालज्ञ महामति हे विप्र ! तुम इसी
नामसे प्रसिद्ध होओगे२ ।’ यह कहकर वे सप्तर्षि अपने-अपने स्थानपर चले गये । वाल्मीकिमुनिने अष्टादश कल्पसमन्वित शतकोटिविस्तृत तथा सभी पापोंका विनाशक निर्मल पद्यबद्ध रामायणका निर्माण किया । अनन्तर वे शिव होकर वहीं निवास करने लगे । देवगणों ! हरको प्रिय लगनेवाले उस मृगव्याध शिवके चरित्रको आपलोग सुनें ।
वैवस्वत मन्वन्तरके आद्य सत्ययुगमें ब्रह्माने उत्पलारण्यमें आकर एक यज्ञ किया । उस समय वहाँपर सरस्वतीदेवी नदी होकर आ गयीं । अनन्तर ब्रह्माने अपने मुखसे कल्याणकारी ब्राह्मणों, बाहुओंसे क्षत्रियों, ऊरुसे उत्तम वैश्यों और पैरोंसे शुभाचारसम्पन्न शूद्रोंको उत्पन्न किया । द्विजराज सोम (चन्द्रमा), सूर्य, तेज-वीर्यकी रक्षा करनेवाले कश्यप, मरीचि, रत्नाकर अर्थात् समुद्र एवं प्रजापति आदिको भी उत्पन्न किया । दक्षके मनसे अनेक कन्याएँ उत्पन्न हुईं । विष्णुमायाके प्रभावसे वे कलाओंके रूपमें पृथ्वीपर स्थित हुईं । भगवान् ब्रह्माने अश्विनी आदि सताईस नक्षत्र लोककी अभिवृद्धिके लिये सोमको तथा तेरह अदिति आदि कन्याएँ कश्यपको और कीर्ति आदि कन्याएँ धर्मको प्रदान कीं । उन्होंने वैवस्वत मन्वन्तरमें अनेक सृष्टियाँ कीं । ब्रह्माकी आज्ञाके अनुसार पृथ्वीपर दक्ष उन लोगोंके प्रजापति हुए । यज्ञमें तत्पर दक्ष प्रजापतिने स्वयं वहाँ निवास किया । सभी देवगण दक्षको नमस्कार कर वहाँ विचरण करते थे, किंतु भूतनाथ महादेवने कभी उनको नमस्कार नहीं किया । इससे क्रुद्ध होकर दक्षने यज्ञमें उन्हें भाग नहीं दिया । मृगव्याध शिव क्रुद्ध होकर वीरभद्रके रूपमें प्रकट हो गये । उनके
१-रामनाम हि तज्ञेयं सर्वाधोघविनाशनम् । (प्रतिसर्गपर्व ४।१०।५२)
२-मरामरामरेत्येवं सहस्राब्दं जजाप ह ॥
जपप्रभावादभवद्वनमुत्पलसंकुलम्
। तत्स्थानमुत्पलारण्यं प्रसिद्धमभवदभुवि ॥ (प्रतिसर्गपर्व ४।१०।५३-५४)
३-वल्मीकाग्निःसुतो यस्मात् तस्माद्वाल्मीकिरुतमम् । तव नाम भवेद्विप्र त्रिकालज्ञ महामते ॥ (प्रतिसर्गपर्व ४।१०।५६)
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- प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *
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साथ त्रिशिरा, त्रिनेत्र और त्रिपद शिवगण भी वहाँ आये। वीरभद्र आदिके द्वारा देव, मुनिगण और पितृगण पीड़ित होने लगे। उस समय यज्ञपुरुष भयभीत हो मृग होकर शीघ्रतासे भागने लगा। तब शिवने व्याधरूपको धारण किया। रुद्ररूपी व्याधके द्वारा वह मृग छिन्न-भिन्न अङ्गवाला हो गया। तब भगवान् ब्रह्मणे मधुर स्तुतियोंसे रुद्रव्याधको संतुष्ट किया। संतुष्ट मृगव्याधने दक्षके यज्ञको पूर्ण कराया। तुलाराशिमें सूर्यके आनेपर उस रुद्रको सताईस नक्षत्रवाले चन्द्रमण्डलमें स्थापित कर
स्वयं ब्रह्मा सत्यलोकको चले गये और रुद्र चन्द्रके समान रूपवान् हो गये। वीरभद्र रुद्रने यह सुनकर प्रसन्नचित्त हो अपने शरीरसे एक तेजको उत्पन्न कर भैरवदत्त नामक विप्रके घरमें भेजा। घोर कलियुगमें वही शिव शंकर (शंकराचार्य) नामसे उसके पुत्ररूपमें अवतरित हुए। वह बालक गुणवान्, सकल शास्त्रवेत्ता एवं ब्रह्मचारी हुआ। उसने शंकरभाष्यकी रचना कर शैवमतको प्रतिष्ठित किया और त्रिपुण्ड्र, अक्ष (रुद्राक्ष)-माला और पञ्चाक्षर-मन्त्र प्रदान किया। (अध्याय १०)
गिरिशर्मा, वनशर्मा तथा पुरीशर्माके आविर्भावका आख्यान
देवगुरु बृहस्पति बोले—देवेन्द्र! प्राचीन कालमें नैमिषारण्यमें अजगर नामका एक ब्राह्मण था। वह वेदान्तशास्त्रमें विशारद, ज्ञानवान् और भगवान् शंकरका उपासक था। उसने बारह वर्षमें पार्थिव-पूजाके द्वारा भगवान् रुद्रको संतुष्ट किया। भगवान् शिवने उसे ज्ञान प्रदानकर जीवन-मुक्ति प्रदान की। पुनः उस द्विजोत्तमने संकर्षणकी आराधना कर अनेक स्तुतियोंद्वारा उन्हें प्रसन्न किया। भगवान् संकर्षणने उसे सायुज्य प्रदान किया और अन्तमें वह भगवान्का आभूषण सर्प बन गया। वह हजार फणोंसे युक्त गौराङ्ग—गौरविग्रह था। उसका स्थान क्षीरसागरमें था। ब्रह्माजीने स्वयं आकर सूर्यके कर्कराशिस्य होनेपर चन्द्रमाके नक्षत्रमण्डलमें उस रुद्रको स्थापित किया और वह चन्द्रमाके रूपमें हो गया।
इस प्रकार गुरुके द्वारा कहे गये वचनोंको सुनकर शेषनाग रुद्रने प्रसन्नचित्त हो अपने मुखसे तेज उत्पन्न कर विन्ध्याद्रिमें देवदत्त ब्राह्मणके घरपर स्थापित किया और वही गिरिशर्मा विप्रके रूपमें उत्पन्न हुआ। वह विद्वानोंको जीतकर काशीपुरीमें आया और शंकरका शिष्य हो गया।
सूतजी बोले—मुने! अब आप देवगुरु बृहस्पतिद्वारा देवताओंसे कही गयी एक अन्य कथा सुनें। बृहस्पतिजीने कहा था—‘देवेन्द्र! पूर्वकालमें प्रयागमें नैऋत नामका एक प्रसिद्ध ब्राह्मण था, वह दरिद्रतासे दुःखी तथा मन्दभाग्य था। बहुत कष्टसे दिनभर माँगनेके बाद उसे भिक्षा प्राप्त होती थी। पुत्र-पत्नीके बाद वह नैऋत नित्य दरिद्रतासे पीड़ित रहता था। एक समय वैष्णवप्रिय देवर्षि नारद उसके पास आये और कहने लगे—विप्रश्रेष्ठ! यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड देवमय है और सभीके स्वामी भव (शंकर) हैं। इसलिये तुम भी शीघ्र ही भवका भजन करो। वे तुम्हारे कार्यको सिद्ध कर देंगे। देवर्षि नारदसे यह उपदेश पाकर नैऋतने परम भक्तिसे वर्षपर्यन्त पार्थिवार्चनद्वारा भगवान् शिवको संतुष्ट किया। भगवान् महेश्वरने प्रसन्न होकर कुबेरके समान उसे दिव्य विपुल धन प्रदान किया। उसने उस धनसे धर्म-कार्य सम्पन्न किया। इस कारण वह पुण्यात्माओंमें प्रसिद्ध हुआ। शिवभक्तिके प्रभावसे वह अकंटक द्रव्य प्राप्तकर हजार वर्षतक जीवित रहकर अन्तमें प्राण परित्यागकर स्वर्गमें चला गया और वृषराशिमें सूर्यके स्थित
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
रहनेपर चन्द्रके समान सुशोभित होकर सर्वजनप्रिय नैऋत रुद्रके नामसे विख्यात हुआ।'
सूतजीने कहा—शौनक! वही नैऋत अपने अंशसे पृथ्वीपर आकर गिरिनालगिरिके वनमें वनवासी सिद्ध सांख्ययोगीके पुत्ररूपमें उत्पन्न हुआ और वेदशास्त्रपरायण वनशर्माके नामसे विख्यात हुआ। उसने बारह वर्षकी अवस्थामें अनेक विद्वानोंको जीत लिया। पुनः तत्त्वज्ञानकी प्राप्तिकी अभिलाषासे काशीमें आकर श्रेष्ठ शंकराचार्यको प्रणाम कर उनका शिष्य हो गया।
बृहस्पतिजीने पुनः कहा—देवेन्द्र! माहिष्मतीमें एक शिवभक्त वसुशर्मा नामक ब्राह्मण रहता था। वह पुत्रकी कामनासे पार्थिवार्चनमें विशेषरूपसे तत्पर रहता था। अनेक प्रयत्न करनेके बाद भगवान् शंकरने प्रकट होकर वर माँगनेको कहा। तब उस विप्रने कहा—'शरणागतवत्सल! आप मुझे पुत्र प्रदान करें।' इसपर शंकरने कहा—'वत्स! तुम्हारे भाग्यमें पुत्र नहीं लिखा है, फिर भी मैं तुम्हें अपने अंशसे एक तेजस्वी पुत्र दे रहा हूँ।' ऐसा कहकर उन्होंने
एक तेज प्रकट किया और उसी तेजसे उसे एक सुन्दर पुत्र उत्पन्न हुआ। उस पुत्रका एक पैर मनुष्यके समान और दूसरा पैर अजके समान था। अतः पृथ्वीपर वह अजैकपाद नामसे विख्यात हुआ। चार सौर वर्ष बीतनेपर मृत्युदेवता अपने गणोंके साथ वहाँ आये। अजैकपादके साथ उनका भयंकर युद्ध हुआ। अन्तमें अजैकपाद युद्धमें विजयी होकर मृत्युञ्जय नामसे पृथ्वीपर प्रसिद्ध हुए। उससे पराजित एवं दुःखी होकर मृत्युदेवताने अपना कष्ट ब्रह्माजीसे कहा, तब भगवान् ब्रह्माने सभी देवोंके साथ सूर्यके कुम्भस्थ होनेपर उस ब्राह्मणको भयहारी रुद्रके रूपमें चन्द्रमण्डलका अधिपति बनाया।
सूतजी बोले—मुने! अनन्तर वही अजैकपाद माहिष्मतीपुरीमें आकर कलिको शुद्धि प्रदान करनेवाले प्रभुके रूपमें पुरीशर्माके नामसे विख्यात हुआ और यतिदत्तके पुत्रके रूपमें पुनः अवतीर्ण हुआ। उसने सोलह वर्षमें वेदपारङ्गत विद्वानोंको जीतकर शंकराचार्यके पास आकर उनका शिष्यत्व स्वीकार किया। (अध्याय ११)
भारती, नाथशर्मा, क्षेत्रशर्मा तथा ढुंडिराजकी उत्पत्ति-कथा
बृहस्पतिजी बोले—देवेन्द्र! पूर्वकालमें संसारके लिये कंटक बना हुआ हिर्बु नामका एक दानव था। वह निकुम्भकी वंशपरम्परामें उत्पन्न हुआ था और इन्द्रके समान पराक्रमी था। जब हजार वर्षतक तपस्या करके उसने देवताओंको पराजित किया, तब लोकरक्षाके लिये उद्यत लोकपति ब्रह्माने उससे वर माँगनेको कहा। उसने उन्हें प्रणाम कर विश्वके सभी प्राणिपदार्थोंसे 'मैं मारा न जा सकूँ' यह वर माँगा। 'ऐसा ही होगा' यह कहकर ब्रह्मा ब्रह्मलोक चले गये। वर प्राप्तकर उस भयंकर दैत्यने देवताओंको जीतकर स्वर्गसे भगा दिया
और दैत्योंको वहाँ बसाया। इस प्रकार देवताओंने भीषण यन्त्रणा भोगी। उनकी दुर्दशा देखकर नारदजीने कहा—'देवगणो! आपलोग शंकरकी उपासना करें। भगवान् शंकर ब्रह्माण्डके स्वामी हैं तथा विपत्तियोंके नाशक हैं।' यह सुनकर देवताओंने देवदेव भगवान् उमापतिकी पार्थिवपूजा प्रारम्भ कर दी। पूजा करते हुए ग्यारह वर्ष व्यतीत होनेपर लोककल्याणकारी भगवान् शिव प्रसन्न हो गये और ज्योतिर्लिङ्गमय होकर देवभक्तोंको छोड़ शेष सभी असुरोंको दग्ध करने लगे। इससे प्रसन्न होकर ब्रह्माने विष्णुके साथ आनन्दपूर्वक सामसूक्तोंसे महारुद्रको प्रसन्न
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- प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *
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किया। सूर्यके मिथुन राशिमें स्थित होनेपर हिर्बु दैत्यका विनाश करनेवाले महारुद्रको देवताओंके कल्याणके लिये शशिमण्डलका राजा बनाया। यह महारुद्र देवकार्यके लिये तत्पर हो गया। अनन्तर यही महारुद्र रमणीय हिमालयपर्वतपर साधकर्मके पुत्ररूपमें उत्पन्न हुआ और बादमें कलाओंका ज्ञाता भारतीय नामसे प्रसिद्ध हुआ। विद्वत्समुदायको जीतकर फिर वह काशी नगरीमें चला आया और शंकराचार्यका शिष्य हो गया।
बृहस्पतिजीने पुनः कहा— देवेन्द्र ! मयका एक पुत्र था मायी, वह एक पैरपर खड़ा होकर एक हजार वर्षोंतक घोर तपस्या करता रहा। उसने अपनी तपस्याके द्वारा संसारके सभी प्राणियोंको संतप्त कर दिया। अनन्तर भगवान् परमेशी पितामहने प्रसन्न होकर तीन गाँवों (तीन पुरों—त्रिपुर) को उसके भोगके लिये निर्मित किया। सोलह योजनावाले विस्तृत स्वर्गके समान सुवर्णमय, उसके नीचे भुवलोकके समान एक योजन विस्तृत रजतमय तथा उसके नीचे भूलोकके समान एक योजन विस्तृत लौहमय तीन पुर बनवाये। इस प्रकार उस त्रिपुरमें सौ करोड़ दैत्य तथा दैत्यपत्नियाँ निवास करने लगीं। वे देवताओंके यज्ञभागको ग्रहणकर देवताओंके समान हो गये। यज्ञभाग न मिलनेके कारण निर्बल देवगण भूखसे पीड़ित हो भगवान् विष्णुके पास गये और उनकी स्तुति कर कहने लगे—‘ भगवन् ! प्रभो ! मयपुत्र मायीके द्वारा प्राप्त दुःखोंको भोगते हुए हमें बहुत ही दीर्घ समय हो गया है, हम सभी अधिकारविहीन होकर रह रहे हैं। स्वर्गमें मायी दैत्यका ही राज्य है। देवताओंकी बात सुनकर भगवान् मधुसूदन संस्कृतवार्ता करनेवाले त्रिपुरस्थित धर्मपरायण दैत्योंको देखकर भयानक कलियुगमें बौद्धरूपमें अजिन द्विजके पुत्र होकर उत्पन्न हुए। उस बौद्धने वेदधर्मपरायण विप्रोंको
मोहित कर दिया। तामस मन्वन्तरमें तीनों वर्ण वेदविहीन, कर्मरहित तथा वैराग्यसम्पन्न हो गये। सोलहवें कलिकी प्राप्ति होनेपर वे सभी यज्ञरहित हो गये। इस कारण त्रिपुरनिवासियोंको यज्ञभाग मिलना बंद हो गया, अतः सभी त्रिपुरनिवासी दैत्यगण क्रोधाविष्ट हो वेदरहित तथा यज्ञशून्य उन मनुष्योंको पीड़ित करने लगे। कल्पान्तमें दैत्योंसे भक्षित हो सभी मनुष्य विनष्ट हो गये।
पुनः सत्यलोकके आनेपर देवताओंने कैलासमें सभी लोगोंका कल्याण चाहनेवाले भगवान् शम्भुकी आराधना की। भगवान् शंकर ज्योतिर्लिङ्गरूप धारण कर वहाँ अवस्थित हो गये। इस कारण देवता प्रसन्न हो गये। उन्होंने भूमिके सारको ग्रहणकर विधिपूर्वक एक रथका निर्माण किया। चन्द्र और सूर्यके सारसे रथके दो चक्र बनाये। इसी प्रकार सुमेरुके सारसे रथका ध्वज बनाकर वह स्यन्दनरूपी यान भगवान् शिवको प्रदान किया। भगवान् ब्रह्मा स्वयं यहाँ आकर रथके सारथि बने। उन देवाधिदेवके रथके घोड़े चारों वेद हुए। उनका धनुष लोकालोक पर्वतका सार—तत्त्व ही आजगव नामसे प्रसिद्ध हुआ। वह घोर शब्द करनेवाला था। भगवान् शंकर जब प्रत्यञ्चा बनाकर धनुषपर चढ़ाने लगे तब देवाधिदेवके क्रोधके कारण वह चाप टूट गया। यह देखकर भगवान् विष्णु आश्चर्यचकित हो गये। तदनन्तर उन्होंने स्वर्गके सारको ग्रहण कर पिनाक नामक एक दिव्य धनुषका निर्माण किया। रुद्रने पुनः उस धनुषकी प्रत्यञ्चा चढ़ायी। वह धनुष दूढ़ था, अतः भग्रीभूत नहीं हुआ। इस कारण ब्रह्मादि देवताओंने प्रसन्नचित्तसे उनकी स्तुति की और तबसे भगवान् महेश्वर ‘पिनाकी’ नामसे प्रसिद्ध हुए। शेषनाग उस चापकी डोरी थे और इन्द्र बाणरूप बने। बाणके पक्षपर वहि और वायु तथा शल्यपर सनातन विष्णु स्थित हुए। उस
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
धनुष-बाणसे करोड़ों दैत्य आकाशमें मारे गये। भगवान् शिवने मायीसे पालित उस त्रिपुरको जला दिया।
उस भयंकर त्रिपुरके भस्मीभूत होनेपर लोकपति ब्रह्माने मीन राशिमें रविके स्थित होनेपर पिनाकी महारुद्रको चन्द्रमण्डलका राजा बनाया और तामस मन्वन्तरमें देवताओंने अपने-अपने अधिकारको पुनः प्राप्त कर लिया।
सूतजीने कहा— मुने! अनन्तर पिनाकीने अपने मुखसे अपने उत्तम अंशको उत्पन्न कर हरिद्वारमें अवस्थित मच्छन्द* नामक योगीके मुखमें अपने तेजको प्रविष्ट कराया। वह मच्छन्द भगवान् शम्भुकी पूजा करनेवाला तथा गोरखका गुरु था। उस तेजसे नाथशर्मा नामक एक बड़ा विद्वान्, श्रेष्ठ एवं सुन्दर पुत्र उत्पन्न हुआ। वह पृथ्वीके सभी विद्वानोंको जीतकर काशीपुरीमें चला आया और शंकराचार्यका शिष्य हो गया।
देवेन्द्र! चाक्षुष मन्वन्तरके बारहवें द्वारमें तालजंघवंशमें उत्पन्न क्षत्रियोंके द्वारा भृगुवंशमें उत्पन्न ब्राह्मणोंका कुरुक्षेत्रमें विनाश हुआ और उनके प्रचुर धनको लेकर वे क्षत्रिय दैत्योंके पक्षपाती हो गये। उसी समय किसी ब्राह्मणकी गर्भवती स्त्री डरकर तपस्याके प्रभावसे सौ वर्षोंतक अपने गर्भको धारण किये रह गयी। इसे सहन न कर गर्भस्थ शिशु माताके ऊरुप्रदेशको विदीर्णकर पृथ्वीपर आ गया। उसके तेजसे सम्पूर्ण जगत् भस्मीभूत होने लगा। तब सभी देवगण प्रजापतिको आगे कर भयसे आतुर हो उसके पास आये। उस बालकने पितरों और देवताओंकी आज्ञासे उस लोकनाशकारी तेजको जलके बीचमें फेंक दिया। जलदेवीने वडवा-स्वरूप धारणकर उस उत्तम तेजका पान कर लिया, किंतु रौद्र तेजसे पीड़ित
हो उसने उस तेजका वमन कर दिया। ब्रह्माजीने त्रिकुटगिरिपर आकर उसके नीचे घोर सागरमें लोककी रक्षाकी दृष्टिसे उस तेजको स्थापित कर दिया। पुनः परमेष्ठी पितामहने मेघ राशिमें सूर्यके आनेपर उस रौद्र तेजको रुद्ररूपमें शशिमण्डलके स्वामीके रूपमें स्थापित किया। वह ऊरुसे उत्पन्न होनेके कारण वीर्य, संसारका दहन करनेके कारण दहन और वडवाके मुखसे उत्पन्न होनेके कारण वाडव नामसे प्रसिद्ध हुआ।
सूतजी बोले— मुने! उस दहनेने अपने मुखसे तेज उत्पन्न किया और वही कुरुक्षेत्रनिवासी सारस्वत ब्राह्मणके घरमें क्षेत्रशर्माके नामसे विख्यात हुआ। वह विद्वानोंमें श्रेष्ठ हुआ। शंकराचार्यसे पराजित हो उनका शिष्य हुआ और ब्रह्मचर्यव्रत धारणकर भगवान् शंकरकी उपासना करता हुआ काशीमें स्थित हो गया।
बृहस्पतिने पुनः कहा— देवेन्द्र! पूर्वकालमें सारे संसारके एकार्णव हो जाने तथा स्थावर और जंगम सभीके नष्ट हो जानेपर एवं अव्यक्तजन्मा ब्रह्माके सौ वर्ष बीतनेपर मायारूपी प्रकृतिने आनन्दपूर्वक उस जलका पान कर लिया। फिर तमोमयी महाकाली उस दारुण प्राकृत जगत्में एकाकी उत्पन्न हुई। अनन्तर नित्य शुद्ध सनातन प्रकृति स्वेच्छासे महागौरीके रूपमें परिणत हो गयी। उनके पाँच मुख, दस भुजाएँ तथा तीन नेत्र थे। वह शिवा नामवाली हुई। ललाटस्थ नेत्रद्वारा उस माताने सूक्ष्म तेजका दर्शन किया। वह तेज नित्य, अविकारी, निरञ्जन तथा सर्वत्र दिशाओंमें परिव्याप्त था। उस ब्रह्मको प्रकृतिने ग्रहण करनेकी इच्छा की, परंतु समर्थ न हो सकी। आश्चर्यचकित हो उस प्रकृतिने अपने पाँचों मुखोंसे भक्तिपूर्वक प्रार्थनाकर परात्पर पूर्ण ब्रह्मको प्रसन्न किया। वह
- इस कथानकमें नाथसम्प्रदायका इतिहास अन्तर्निहित दीखता है।
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- प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *
३५९
सर्वज्ञ ब्रह्म प्रकृतिके पाँचों मुखोंमें प्रविष्ट हो गया। वह ब्रह्म पुरुषत्वको प्राप्तकर स्वयम्भू नामसे प्रसिद्ध हुआ और अव्यक्त प्रकृतिसे उत्पन्न होनेके कारण वे अव्यक्तजन्मा कहे गये। उनके निमित्त वरदा, लोकरूपिणी अष्टादश भुजाओंसे युक्त देवी महालक्ष्मी उत्पन्न हुई। वे संसारकी रक्षा करने लगीं। उनके अद्भुत रूपको देखकर स्वयम्भू आश्चर्यचकित हो गये। अनेक रूपोंमें प्रवेश करके भी स्वयम्भू उनके अन्तको प्राप्त नहीं कर सके। बृहत् और बहुरूप होनेके कारण वे ब्रह्मा नामसे विख्यात हुए। थककर भगवान् ब्रह्मा सत्यलोकमें चले आये। उन्होंने मुखसे आविर्भूत वेदोंसे शंकरकी दीर्घकालतक स्तुति की। उनके अङ्गसे नदी-नद उत्पन्न हुए। पुनः जलमय समुद्र हो जानेसे वहाँ स्वयं प्रभुने शयन किया। अव्यक्त स्वयम्भूने सहस्रयुगपर्यन्त वहाँ निवासकर सत्यलोकमें आकर पुनः सृष्टि आरम्भ कर दी। गणरूपा अनन्त सृष्टियाँ पृथक्-पृथक् उत्पन्न हुई। उससे महालक्ष्मीमय व्यक्त जगत् हुआ। महासनातनी महालक्ष्मीदेवी सृष्टिके अनेकत्वको देखकर आश्चर्यचकित हो गयीं और सर्वेश्वर भगवान्के पास आयीं तथा अव्यक्त मङ्गलरूप विष्णुको नमस्कारकर कहने लगीं— 'भगवन्! आप नित्य और शुद्धात्मा हैं, संसारमें बहुत-से प्राणी हो गये हैं, मैं इन लोगोंकी गणना कैसे कर सकती हूँ।' महालक्ष्मीके इस वचनको सुनकर वे ब्रह्म दो रूपोंमें विभक्त हो गये। पूर्वार्धसे रक्ताङ्ग और परार्धसे गौराङ्ग। रक्ताङ्ग और गौराङ्ग दोनों चतुर्भुज हुए। सम्पूर्ण सृष्टिगणोंका स्वामी रक्ताङ्ग गणेश हुआ, वही ईश्वर कहलाता है। परार्धसे उत्पन्न गौरवर्ण जो चतुर्भुजी है उसका ध्यान योगीलोग करते हैं, वह निरञ्जन है।
एक बार पार्वतीवल्लभ भगवान् शिवने एक हजार वर्षतक प्रयत्नपूर्वक गणेशकी पूजा की। तब
शर्वपूजक भगवान् गणेशने प्रसन्न होकर पार्वतीसहित हरको वर माँगनेके लिये कहा। इसपर भगवान् शंकरने उनकी भक्तिपूर्वक इस प्रकार स्तुति की—
नमो विष्णुस्वरूपाय गणेशाय परात्मने। चतुर्भुजाय रक्ताय यज्ञपूर्णकराय च॥ विघ्नहन्त्रे जगद्भद्रं सर्वानन्दप्रदायिने। सिद्धीनां पतये तुभ्यं निधीनां पतये नमः॥ प्रसन्नो भव देवेश पुत्रो भव मम प्रियः।
(प्रतिसर्गपर्व ४।१२।१०—१२)
'विष्णुस्वरूप परात्मा गणेशको नमस्कार है। चतुर्भुजधारी, रक्तवर्ण, यज्ञमूर्ति, विघ्नहन्ता, जगत्का धारण-पोषण करनेवाले, सभीके आनन्ददाता, निधिपति तथा सिद्धिपति भगवान् गणेश! आपको नमस्कार है। देवेश! आप प्रसन्न हों, मेरे प्रिय पुत्रके रूपमें उत्पन्न हों।' इसपर गणेशजी पार्वतीजीके तेजोमय शरीरसे उत्पन्न हुए। इन्द्रके साथ सभी देवगण कैलासशिखरपर उनका मङ्गलमय दर्शन करनेके लिये आये। वहाँ सर्वसुखद महोत्सव हो रहा था। इसी समय क्रूरदृष्टि कालात्मा, सूर्यपुत्र शनिदेव मण्डपमें आये। उनके दर्शनमात्रसे वह बालक मस्तकविहीन हो गया। तब गुह्यकोंके निवासस्थान उस कैलासमें महान् हाहाकार मच गया। वह कटा हुआ सिर सूर्यके तुला राशिस्थ होनेपर चन्द्रलोकमें स्थित हो सताईस दिनतक पृथ्वीपर प्रकाशित होता है। सभी देवताओंसे विनिन्दित भयंकर शनिदेवने एक दाँतवाले गजके रँगें हुए मस्तकको काटकर उस बालकके स्कन्धपर जोड़ दिया और ब्रह्माने उसकी माताके द्वारा स्तुति किये जानेपर कर्कटके सिरको गजके ऊपर स्थितकर गजयोनिवाला बना दिया और कर्कटको बिना सिरका कर दिया। इस प्रकार साक्षात् ईश्वरस्वरूप गजानन गणेश उत्पन्न हुए।
सूतजीने कहा—बृहस्पतिसे ऐसा सुनकर भगवान्
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
गणेशने अपने मुखसे स्कन्ध उत्पन्न किया और वही ईश्वररूप स्कन्ध काशीमें एक दैवज्ञ द्विजके पुत्ररूपमें उत्पन्न हुआ और महीतलमें दुंदिराजके नामसे प्रसिद्ध हुआ। फलितज्योतिषके 'जातकाभरण'
नामक ग्रन्थका निर्माण कर वह वेदकी रक्षाके लिये शंकराचार्यके पास आया। वह प्रसन्नतामा उनका शिष्य होकर गुरुसेवामें तत्पर हो गया। (अध्याय १२)
अघोरपंथी भैरव तथा बालशर्माकी उत्पत्तिकी कथामें रावण तथा हनुमान्जीका चरित्र
सूतजी बोले—शौनक! भगवान् कपाली शिव अपने अंशसे काशीमें अयोनिजरूपसे उत्पन्न हुए। वे कपालमोचनकुण्डसे पृथ्वीपर आकर यतिरूप वेदनिधि भैरव नामसे प्रख्यात हुए और उन्होंने दुष्कर अघोरमार्गका अपने शिष्योंमें प्रवर्तन किया। फिर वे शंकराचार्यके पास आकर उनके शिष्य हो गये। उन्होंने मन्त्रमय डामरतन्त्रका प्रवर्तन किया और कीलित मन्त्रोंके उत्कीलनका मार्ग बतलाया।
बृहस्पतिजीने कहा—देवेन्द्र! मय दानवकी पुत्री मन्दोदरी त्रिपुरके अधिपति मायीकी बहन थी। त्रिपुरके नष्ट होनेपर वह देवी मन्दोदरी सनातन महाविष्णुको गुप्तभावसे निरन्तर संतुष्ट करती रहती थी। भगवान् विष्णुमें भक्तिभावना करनेसे मन्दोदरीको उत्तम योग प्राप्त हुआ और वह भयंकर विन्ध्याद्रिकी गुफामें विलीन हो गयी। उसकी समाधिमें चारों युग दो सौ बार बीत गये। वैवस्वत मन्वन्तरके बारहवें सत्ययुगमें ब्रह्माजीके पुत्र पुलस्त्य हुए, जिनसे विश्रवा नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। सौ वर्षतक विश्रवामुनिने तपस्याकर सुमाली दैत्यकी पुत्री कैकसीके साथ विवाह किया और उससे रावण और कुम्भकर्ण दो राक्षस पुत्र उत्पन्न हुए। रावण मातृभक्त था और भाई कुम्भकर्ण पितृभक्त। वरकी कामनासे उन दोनोंने हजार वर्षोंतक घोर तपस्या की। भगवान् परमेश्वी पितामहने प्रसन्न होकर उन दोनोंको देव और दानवोंसे अजेय होनेका वर दिया। उन दोनोंने वर प्राप्तकर क्रुद्ध हो श्रेष्ठ
पुष्पकयानको ग्रहणकर देवताओंसे युद्ध किया। उन दोनोंसे पराजित देवताओंने सुखप्रद स्वर्गको छोड़कर पार्थिवार्चनके द्वारा कैलासमें स्थित भगवान् शिवकी ग्यारह वर्षोंतक आराधना की और उनसे वर प्राप्तकर वे सभी निर्भय हो गये।
इधर गौतम-ऋषिके शरीरसे उत्पन्न केशरीकी पत्नी अञ्जनाके गर्भसे हनुमान्जीके रूपमें भगवान् शंकरने भी अपने अंशसे अवतार लिया और आकाशमें उगते हुए लाल सूर्यको देख फल समझकर निगल लिया। अन्धकार देखकर इन्द्रने उनकी टुट्टी (हनु)- पर अपने वज्रसे प्रहार किया। इसी बीच रावण भी उनकी पूँछ पकड़कर लटक गया, फिर भी उन्होंने सूर्यको नहीं छोड़ा। रावणसे एक वर्षतक मुष्टियुद्ध होता रहा। अन्तमें थका हुआ रावण रुद्ररूपी हनुमान्से भयभीत हो इधर-उधर भागा। इसी समय ऋषि विश्रवा वहाँ आये और वेदमय स्तोत्रोंसे परावाणीद्वारा हनुमान्को प्रसन्न किया। प्रसन्न हो रुद्ररूपी हनुमान्ने संसारको रूलानेवाले रावणको छोड़ दिया। फिर बलवान् केशरीपुत्र पम्पापुरके तटपर निवास करने लगे और अचलरूपसे स्थित होनेके कारण स्थाणु नामसे प्रसिद्ध हुए। संसारको रूलानेवाले तथा देवताओंको मारनेवाले रावणको मुष्टिकासे हनन करनेके कारण इनका नाम हनुमान् पड़ गया*। हनुमान्जीकी तपस्यासे प्रसन्न हो भगवान् ब्रह्मने कहा—'तपोनिधे रुद्र! आप मेरी बात सुनें। वैवस्वत मन्वन्तर अट्टाईसवें त्रेतायुगके प्रथम चरणमें
- निवृत्तं च सुरान् मुख्यान् रावणं लोकरावणम् ॥ निहन्ति मुष्टिर्भयः स हनुमानिति विश्वतः ॥ (प्रतिसर्गपर्व ४।१३।४४-४५)
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- प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *
३६१
साक्षात् भगवान् राम अवतीर्ण होंगे। उनकी भक्ति प्राप्तकर आप कृतकृत्य हो जायेंगे। देवेन्द्र! ऐसा कहकर ब्रह्माजीने भाद्रपद मासके चन्द्रमाके प्रकाशरूपमें उन्हें प्रतिष्ठित किया और इधर मयपुत्री मन्दोदरीका विवाह रावणके साथ करा दिया। वह रावण नैऋत दिशाका दिक्पाल हुआ। भगवान् हरिने रामरूपमें अवतरित होकर रावणको मारा।'
सूतजी बोले—मुने! अनन्तर वे ही हनुमान् पुनः मनुष्य-शरीर धारणकर पृथ्वीपर कदलीवनमें आकर बालशर्मा नामसे प्रसिद्ध हुए और काशी नगरीमें मणिकर्णिकापर रहने लगे। वे शंकराचार्य यतिके शिष्य होकर गुरुसेवामें तत्पर हो गये और उन्होंने तन्त्र-मन्त्रशास्त्रका निर्माण किया।
(अध्याय १३)
रुद्रमाहात्म्य, भवके अंशसे रामानुजाचार्यका आविर्भाव
देवगुरु बृहस्पतिजीने कहा—देवेन्द्र! सृष्टिके प्रारम्भमें विराट् पुरुषकी नाभिसे एक विस्तृत कमल उत्पन्न हुआ। जिससे कमलासन ब्रह्मा उत्पन्न हुए। वे दो भुजा, चार मुख और दो पैरोंवाले थे। उन्हें चिन्ता हुई कि मैं कौन हूँ, कहाँसे आया हूँ और मेरा उत्पत्तिकर्ता कौन है? इस प्रकार चिन्तित होते ही हृदयस्थ देवताने कहा—'तुम तप करो।' यह सुनकर ब्रह्माजीने महान् तप किया। चतुर्भुज, योगगम्य सनातन विष्णुका कमलासन ब्रह्माने हजार वर्षतक समाधिस्थ होकर ध्यान किया। इसी समय नवीन मेघके समान श्यामल, चतुर्भुज भगवान् विष्णु आयुध एवं दिव्य अलंकारोंसे अलंकृत होकर बालकरूपमें ब्रह्माके सामने प्रकट हुए। समाधिसे जागकर ब्रह्मा उन्हें देखकर चकित हो गये। भगवान् विष्णुने हँसकर कहा—'वत्स! मैं ही तुम्हारा पिता हूँ।' ब्रह्मा स्वयंको उनका पिता मानते थे। इस प्रकार दोनोंमें विवाद होने लगा। उसी समय तमोमय रुद्र ज्योतिर्लिङ्गरूपमें प्रकट हुआ। हंसरूपमें ब्रह्मा और वराहरूपमें हरि सौ वर्षतक क्रमशः ऊपर-नीचे आते-जाते रहे, परंतु उसका अन्त न पाकर असफल हो उन दोनोंने लौटकर भगवान् शिवकी स्तुति की। प्रसन्न हो भगवान् भव दर्शन देकर कैलास चले गये और वहाँ समाधिमें योगी रुद्रके दिव्य पाँच युग बीत गये। इसी बीच तारकासुर
नामके भयंकर दानवने हजार वर्ष तपकर ब्रह्मासे वर प्राप्त किया कि 'भवसे उत्पन्न पुत्रसे ही तुम्हारी मृत्यु होगी।' वर प्राप्तकर तारकासुरने देवताओंको जीतकर महेन्द्रका स्थान ग्रहण कर लिया। दुःखी देवगणोंने कैलासमें जाकर रुद्रकी स्तुति की। शिवने कहा—'वर माँगो।' उन लोगोंने नतमस्तक हो प्रणामपूर्वक कहा—'भगवन्! भगवान् ब्रह्माने तारकको यह वर प्रदान किया है कि शिव-शक्तिसे उत्पन्न पुत्र ही तुम्हें मारेगा। इसलिये भगवन्! आप हमलोगोंकी रक्षा करें और विवाह करें। स्वायम्भुव मन्वन्तरमें दक्षप्रजापतिकी साठ कन्याएँ हुई। उनमें एक सती नामकी भी कन्या थी। उसने एक वर्षतक आपकी पार्थिव पूजा की। उस सतीको आपने वर प्रदान किया और वह आपकी प्रिया हुई। उसके पिता दक्षने आपका अपमान किया और दक्षसे उत्पन्न शरीरको सतीने यज्ञमें समर्पित कर दिया। उस सतीका दिव्य तेज हिमालयमें प्रविष्ट हुआ। अब वह अपना शरीर छोड़कर हिमालय तथा मेनाकी पुत्री पार्वतीके रूपमें उत्पन्न हुई है। वे गौरी उत्पन्न होते ही नौ वर्षकी हो गयीं। आपकी प्रासिके निमित्त उन्होंने सौ वर्षतक जलमें रहकर, सौ वर्ष पञ्चाग्रिका सेवनकर, सौ वर्षतक वायुमात्रका पानकर और सौ वर्षतक बिना साँस लिये आकाश-मण्डल तथा चन्द्रमण्डल आदिमें
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३६२
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
रहकर तपस्या भी की है। अतः हे भगवन्! अब आप शिवा—पार्वतीके साथ विवाह करें।'
शिवने कहा—देवगणो! आपकी बात अनुचित प्रतीत होती है, क्योंकि हमसे ज्येष्ठ ज्योतिसे उत्पन्न दस रुद्र अभी अविवाहित हैं, मैं उन सबसे छोटा भव नामक रुद्र हूँ, मैं उनके विवाहसे पूर्व ही कैसे विवाह कर सकता हूँ? दूसरी बात यह है कि वे साक्षात् अव्यक्तरूपा पराम्बा हैं, उनसे सम्पूर्ण चराचर ब्रह्माण्ड परिव्याप्त है। योगीश्वर! मैं मातुरूपा भगवतीका वरण कैसे कर सकता हूँ? अतः आपलोगोंके कल्याणके लिये मैं अपनी शक्ति आपलोगोंको देता हूँ, वह आपलोगोंकी कामना पूर्ण करेगी। अनन्तर भगवान् शंकर अपनी शक्ति अग्निको समर्पित कर स्वयं पुनः समाधिस्थ हो गये। वहिके साथ इन्द्रादि देवगणोंने सत्यलोकमें आकर ब्रह्माको सम्पूर्ण वृत्तान्त सूचित किया। पुनः देवताओंके समुद्योग तथा गिरिजाकी तपस्यासे भगवान् शंकर प्रसन्न हो गये। उन्होंने पार्वतीको पाणिग्रहण करनेका वर प्रदान किया। इसपर भगवती पार्वतीने नमस्कार कर कहा—'देव! मैं पिता-माताकी आज्ञाके अनुसार ही कार्य करनेवाली हूँ, अतः विवाहके लिये उनकी अनुमति चाहिये।'
भगवान् शंकरने ससर्पियोंको बुलाकर सबकी सम्मतिसे हिमवान्के पास संदेश भेजा और विधिपूर्वक विवाह भी सम्पन्न हो गया। उस विवाहमें बारतियोंकी
सेवाके लिये पार्वतीने अपनी तपःसिद्धिसे ऋद्धि-सिद्धिको उत्पन्न कर यथाविधि सेवा-सत्कार कर सबको संतुष्ट किया। यह देखकर ब्रह्मादि देवगण आश्चर्यमें पड़ गये और उन्होंने अनेक प्रकारसे उनकी स्तुति तथा दैत्योंसे रक्षाकी प्रार्थना भी की। पार्वतीदेवीने प्रसन्न होकर उन्हें अभय-दान दिया। विवाहके पश्चात् भगवान् शिव पार्वतीके साथ कैलास चले आये और हजार वर्षांतक आनन्दमें निमग्न रहे। काम—प्रद्युम्नकी धृष्टता देखकर भगवान् शंकरने उसे भस्म कर अनङ्गरूपमें कर दिया। उसकी पत्नी रतिकी प्रार्थनापर भगवान्ने कहा—'तुम प्राणियोंके हृदयमें निवास करोगी। यह स्वारोचिष मन्वन्तर है। वैवस्वत मन्वन्तरके अट्टाईसवें द्वापरमें भगवान् श्रीकृष्णके पुत्र प्रद्युम्नको तुम पतिरूपमें प्राप्त करोगी। ऐसा कहकर भगवान् शंकर अन्तर्धान हो गये।' (बादमें कुमारस्वामी स्कन्दकी उत्पत्ति हुई, जिन्होंने तारकासुरका वधकर देवताओंको शान्त एवं प्रसन्न किया तथा सम्पूर्ण संसारके साथ स्वर्गको सुस्थिर कर दिया।)
सूतजीने कहा—मुने! देवगुरु बृहस्पतिसे यह सुनकर भगवान् भवने अपने मुखसे अपने उत्तम अंशको उत्पन्न कर गोदावरीके किनारे आचार्यशर्माके पुत्ररूपमें जन्म ग्रहण किया। वे आचार्य रामानुजके नामसे विख्यात हुए और रामशर्माके अनुज हुए। (अध्याय १४)
वसुदेवताओंके अंशसे कुबेर आदिकी उत्पत्ति, रामायणकी संक्षिप्त कथा एवं त्रिलोचन भक्तका वृत्तान्त
सूतजी बोले—भृगुश्रेष्ठ शौनक! बृहस्पतिने देवराज इन्द्रसे वसुदेवताओंका जो माहात्म्य कहा था, उसे कहता हूँ, आप सुनें। वैवस्वत मन्वन्तरके आदि सत्ययुगमें विश्वामुनिकी इल्वला नामकी पत्नी थी। वह सती पार्थिवार्चनसे शिवकी आराधना
करती थी। इसी समय दीक्षितकुलमें उत्पन्न यक्षशर्मा नामक एक द्विज यक्षिणी—पूजनमें रत था। वह धूर्त अपने मित्रकी पुत्रवधूके साथ दुःसम्बन्ध रखनेके कारण कुष्ठरोगसे ग्रस्त हो गया। उस कुष्ठी द्विजको त्यागकर मन्त्रवत्सला यक्षिणीदेवी
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- प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *
३६३
कैलासपर शिवलोकको चली गयी। शुधासे व्याकुल यक्षशर्मा उत्तम शिवरात्रिके दिन शिवके दर्शन, पूजन और उपदेशसे संतुष्ट हुआ। प्रातःकाल होनेपर उस द्विजने पारण किया और वह कुष्ठि उसी शिवमन्दिरमें मर गया। उस पुण्यके प्रभावसे वह कर्णाटकदेशमें राजा हुआ। राजराजके नामसे प्रसिद्ध वह मण्डलीक राजा हुआ। प्रतिदिन उस महाबली राजाने शिवार्चन आदि मङ्गलकार्य ब्राह्मणोंसे कराये और सौ वर्षतक पृथ्वीपर राज्य किया। राजाने अपने श्रेष्ठ पुत्रको राज्याधिकार देकर काशी आकर भगवान् शिवको संतुष्ट किया। तीन वर्ष बीतनेपर ज्योतिर्लिङ्गसे महादेव प्रकट हुए। वे शिव राजराजेश्वरके नामसे प्रसिद्ध हुए। भगवान् शिवद्वारा पवित्र वह राजा प्राणोंका परित्याग कर इल्त्वलाके गर्भमें आकर घोर अन्धकारसे आच्छन्न रात्रिकी कुत्सित वेलामें पुत्रके रूपमें उत्पन्न हुआ। अतः वह कुबेर नामसे प्रसिद्ध हुआ। वह शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न था। उस बालकने तपके द्वारा परमेष्ठि (ब्रह्मा)-को प्रसन्न किया। भगवान् ब्रह्माने सुवर्णमय रमणीय सुन्दर लङ्कापुरीका निर्माण कराकर उसे दे दिया। कुबेर तीन करोड़ यक्षोंका स्वामी यक्षराट्के नामसे प्रसिद्ध हुआ। उसके आदेशमें निवास करनेवाले अनेक रूपवाले किन्नर थे। गुह्यकोंके स्वामी स्वयं भगवान् कुबेर थे। रावणको जब यह पता लगा कि लङ्का आरम्भसे राक्षसोंकी पुरी रही है और कुबेरने उसपर बलात् अधिकार जमाकर अपने सेवक यक्षोंको बसाया है तो उन्हें वहाँसे मारकर भगा दिया और स्वयं अपनी राजधानी बनाकर वहाँका राजा हो गया। इससे दुःखी हो कुबेरने दुःखनाशक शंकरकी शरण ली। भगवान् हरने कुबेरके साथ सुन्दर मैत्री कर ली और विश्वकर्माने अलका नामकी पुरीकी रचना की। सज्जनोंको
मङ्गल देनेवाले कुबेरने उसे सहर्ष प्राप्त किया। यह सुनकर संसारको रूलानेवाला राक्षसराज रावण कैलास पर्वतपर आकर भगवान् शंकरकी तपस्या करने लगा, तब अहंकारदेवता भगवान् रुद्र प्रसन्न होकर जैसे कुबेरके मित्र थे, वैसे ही रावणके भी मित्र हो गये और एक-एक सिरसे करोड़ों सिर उत्पन्न होनेका उसे वरदान दे दिया। देवाधिदेवके प्रसादसे उसका शरीर वज्र हो गया। इस प्रकार वह रावण वरदानके कारण भयंकर बली और उद्दण्ड हो गया। उस राक्षसद्वारा सम्पूर्ण विश्व दुःखसे संतप्त हो गया। यज्ञके अभावमें सभी देवता, प्राणी भूखे रहने लगे। ब्रह्माको आगेकर क्षीरसागरमें जाकर दुःखी सभी देवगणोंने एकत्र हो परमेश्वरको स्तुतियोंसे संतुष्ट किया। तब सगुण-निर्गुण हरिने प्रसन्न होकर देवताओंसे कहा—‘देवगणो! मेरी आज्ञासे आपलोग सनातनी विष्णुमायाकी शरणमें जाकर जगत्के कल्याणके लिये प्रार्थना करें।’
यह सुनकर देवताओंने परा प्रकृतिको स्तुतियोंसे संतुष्ट किया। ब्रह्म-ज्योतिर्मयी शिवादेवीने प्रसन्न होकर अपने शरीरको दो रूपोंमें विभक्त किया और सीता-रामके रूपमें पृथ्वीपर आर्यी। परा प्रकृति सीता मङ्गलदायिनी हुई। जगत्-कारणभूता वे सीता भूमिसे उत्पन्न हुई, अयोनिजा होनेपर भी वे सबकी माता हैं। सहस्र ‘राम’ नामके जपके समान सीताके एक बार नाम लेनेका फल जानना चाहिये*। परात्पर भगवान् रामने रावण आदि राक्षसोंको मारा तथा अपनी पवित्र कीर्तिको लोकमें प्रतिष्ठित कर पुष्पक विमान कुबेरको समर्पित कर दिया। ग्यारह हजार वर्षतक राज्यकर वे परम धामको चले गये।
सूतजीने कहा—शौनक! यह सुनकर प्रथम
- सहस्रं रामरामेति जपितं येन धीमता। सीतानाम्ना च तस्यैव फलं ज्ञेयं च तत्सम्म॥ (प्रतिसर्गपर्व ४। १५। ५७)
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३६४
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
वसुदेवता कुबेर अपने अंशसे पृथ्वीपर धरदत्त वैश्यके पुत्र होकर त्रिलोचन नामसे मथुरामें उत्पन्न हुए। सभी द्रव्योंको हर्षपूर्वक तीर्थोंमें खर्चकर काशीपुरीमें आकर वैष्णव रामानन्दको नमस्कारकर त्रिलोचन उनके शिष्य हो गये। गुरुकी आज्ञासे वे पुनः अपने घरपर आकर रामभक्तिपरायण होकर साधु-सेवामें तत्पर हो गये। भगवान् राम उनके घरमें सभी अभीष्ट फलको देनेवाले दासके रूपमें तेरह मासतक स्थित रहे। वे उनके घरमें मणि, रत्न, विविध वस्त्र, विविध व्यञ्जन देते थे, जिसे भक्त त्रिलोचन स्वयं ब्राह्मणों, वैष्णवों और यतियोंको
भी सभी मनोवाञ्छित वस्तु प्रदान करते थे। भगवान् श्रीरामने त्रिलोचनसे कहा—‘वत्स! मैं राम हूँ, दास नहीं। मैंने तुम्हारी भक्तिसे प्रसन्न होकर तुम्हारे घरमें दासके रूपमें निवास किया है। हे वैश्य! आजसे मैं तुम्हारे हृदयमें निवास करूँगा।’ यह कहकर वे अन्तर्हित हो गये। यह सुनकर वह वैश्य बहुत प्रसन्न हुआ। उसने स्त्री-पुत्र सभीका परित्याग कर दिया और वह परम वैराग्यके साथ श्रीरामके ध्यानमें तत्पर रहकर सरयूतटपर निवास करने लगा*।
(अध्याय १५)
रामानन्दजीके शिष्य नामदेव, भक्त रंकण (राँका) एवं यंकणा (बाँका)-का चरित्र, वरुणदेव और पराम्बाकी महिमा
देवगुरु बृहस्पतिने कहा—देवेन्द्र! संसारमें जो जलको एक जगहसे दूसरी जगह पहुँचाता है, वही आपव कहलाता है। उसीका दूसरा नाम वरुण है। वे जलों तथा समुद्रोंके अधिपति हैं। दैत्योंके बन्धनके लिये ब्रह्माने उन्हें पाश प्रदान किया। पाश प्राप्त होनेपर महात्मा वरुणका नाम पाशी हो गया।
वे वरुण पहले शक्तिके पूजक एक ब्राह्मण थे और उनका नाम था आपव। वे भद्रकालीके प्रिय भक्त थे, प्रतिदिन उनके पूजनमें तत्पर रहते थे। अनेक प्रकारके रक्त पुष्पोंकी मालाओंको बनाकर, रक्त चन्दनसे संयुक्तकर मन्त्रोंद्वारा भद्रकालीको समर्पित करते थे। नवार्णजपमें तत्पर हो धूप-दीप-नैवेद्य, ताम्बूल, ऋतुफल आदिसे सनातनी महालक्ष्मी भद्रकालीकी पूजा करते रहते। तिल, शर्करायुक्त मधुसे हवन भी करते थे। वे दुर्गासप्तशतीके
मध्यम चरित्रका पाठकर नवार्णमन्त्र-जपमें तत्पर हो तीन वर्षतक पूजामें संलग्न रहे। अनन्तर सर्वमङ्गला भगवतीदेवी प्रसन्न हुई और बोली—‘द्विजसत्तम! तुम वर माँगो।’ देवीके इस प्रिय वचनको सुनकर नम्रधी द्विज आपवने उन्हें दण्डवत् प्रणाम कर उन भद्रकाली सनातनीदेवीकी अनेक प्रकारसे स्तुति की।
फिर देवी भद्रकालीने प्रसन्न होकर आपवसे कहा—द्विज! प्रलयके आने तथा स्थावर-जंगमके विनष्ट हो जानेपर एकार्णवमें मेरी कृपासे तुम सुखी होओगे। यह कहकर वे देवी अन्तर्लीन हो गयीं और वे ब्राह्मण वरुणदेवके रूपमें विशेष समादृत हुए।
सूतजी बोले—मुने! देवगुरुके इन वाक्योंको सुनकर द्वितीय वसु भगवान् वरुणने अपने मुखसे पृथ्वीपर एक तेज उत्पन्न किया। वह तेज देहलीमें
- रामानन्दजीकी शिष्य-परम्पराके भक्तों—त्रिलोचन वैश्य, नामदेव, रंकण-यंकणा (राँका-बाँका), कबीर, नरसी मेहता तथा सधन कसाई आदिका उदात्त चरित्र एवं आचार्योंके महनीय चरित्र गीताप्रेससे प्रकाशित ‘भक्तचरितार्द्ध’ में विस्तारसे दिये गये हैं। उससे भी लाभ उठाना चाहिये।
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- प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *
३६५
धर्मभक्तके घर उत्पन्न हुआ। उसकी विधवा कन्याने हरिके उस तेजको धारण किया। यह जानकर धर्मभक्त पुत्रकी उत्पत्तिसे अत्यन्त प्रसन्न हुआ। उसका नाम नामदेव हुआ। वह सांख्ययोगपरायण था। चराचर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड विष्णुमय है, यह जानकर और देखकर वे काशीमें हरिप्रिय रामानन्दके पास आये और उनकी शिष्यता ग्रहण कर वहाँ निवास किये। उस समय म्लेच्छपति सिकन्दरका देहलीमें राज्य था। उसने नामदेवको बुलाकर और भलीभाँति उनकी परीक्षाकर प्रसन्न हो पचास लाख मुद्राएँ दीं। नामदेवने उस द्रव्यसे काशीमें श्रेष्ठ शुभ्र शिलामय घाटका निर्माण कराया और अपने योगबलसे मेरे हुए दस ब्राह्मणों, पाँच राजाओं, पाँच वैश्यों तथा सौ गौओंको पुनः जीवित किया।
देवगुरु बृहस्पतिने कहा—देवेन्द्र! पूर्वकालमें विश्वानर नामका एक ब्राह्मण था। उसके पुत्र नहीं था। पुत्रकी प्राप्तिके लिये उसने आराधनाद्वारा ब्रह्माको संतुष्ट किया। एक वर्षमें ही भगवान् परमेश्वी पितामहने संतुष्ट होकर वर माँगनेको कहा। इसपर उसने कहा—‘भगवन्! आपको नमस्कार है। प्रकृतिसे भी जो परे है, वह मेरा पुत्र हो।’
यह सुनकर आश्चर्यचकित हो ब्रह्माने उस ब्राह्मणसे कहा—‘हे ब्राह्मण! वह तो नित्य सनातन पुरुष है, वह तुम्हारा पुत्र कैसे हो सकता है? इसलिये विश्वानर मुने! मायाभूत हरि स्वयं जनार्दन मेरे वरदानसे तुम्हारे पुत्ररूपमें आयेगे।’
यह कहकर ब्रह्मा अन्तर्धान हो गये और विश्वानरका पावक नामसे पुत्र उत्पन्न हुआ। वह पावक आठ वसुओंका पति हुआ और वैश्वानर नामसे प्रसिद्ध हुआ तथा स्वाहादेवीका स्वामी हुआ। यह वैश्वानर पुराकल्पमें अनल था और निषधका बुद्धिमान् ब्राह्मण था।
सूतजी बोले—मुने! बृहस्पतिके इन वचनोंको सुनकर भगवान् पावकने अपने मुखसे अपने अंशको उत्पन्न किया। वही पावकांश वसु होकर लक्ष्मीदत्तका पुत्र रंकण*। (रँका) नामसे प्रसिद्ध हुआ। कांचनपुर नगरमें वैश्यकुलमें उसकी उत्पत्ति हुई। उसकी पतिव्रता पत्नी यंकणा (बाँका) थी। वे दोनों धर्मकार्यमें अपने सभी द्रव्योंको खर्चकर काष्ठ बेचकर उससे उपाजित धनद्वारा भगवान्की पूजा करके प्रभुके प्रसादसे अपना जीवन-निर्वाह किया करते थे। महात्मा रंकणके गुरु रामानन्द थे। (अध्याय १६)
संत कबीर, भक्त नरसी मेहता, पीपा, नानक तथा साधु
नित्यानन्दजीके पूर्वजन्मोंकी कथा
देवगुरु बृहस्पतिजी बोले—देवेन्द्र! पूर्वकालमें दितिके पुत्र हिरण्यकशिपु एवं हिरण्याक्षका भगवान् विष्णुने क्रमशः नृसिंह एवं वराहरूप धारणकर वध किया था। दुःखी हो दितिने महर्षि कश्यपकी आराधना की। बारह वर्ष बाद कश्यपजीने उससे कहा—‘वरानने! वर माँगो।’ हर्षित होकर दितिने कहा—‘प्रभो! मेरी सपत्नी अदिति बारह पुत्रोंसे युक्त है।
मेरे दो ही पुत्र थे। वे भी अदितिपुत्र देवरक्षक विष्णुके द्वारा विनष्ट कर दिये गये। इस कारण मैं बहुत दुःखी हूँ। अतः मुझे द्वादशादित्य-विनाशक पुत्र प्रदान करें।’ यह भयंकर वाणी सुनकर कश्यपने कहा—‘ब्रह्माने संसारमें दो मार्ग बनाये—धर्ममार्ग और अधर्ममार्ग। जिन्हें क्रमशः परमार्ग और अपरमार्ग भी कहा गया है। धर्मका पक्ष लेनेवाले मनुष्य ब्रह्माके
- कल्याणके ‘भक्तचरिताङ्क’ में यह कथा कुछ अन्तरसे आयी है। धन-सम्पत्ति साधना और भक्तिभावनामें कितनी बाधक है, यह इनके चरित्रसे स्पष्ट हो जाता है।
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३६६
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
प्रिय हैं और अधर्मका पक्ष लेनेवाले उस धीमान्के वैरी हैं। अतः अधर्मके पक्षपाती होनेके कारण ही तुम्हारे पुत्रोंकी मृत्यु हुई। इसलिये धर्मप्रिये! तुम अपने विचारको शुद्ध करो। तुम्हें महाबलशाली, चिरञ्जीवी, बुद्धिमान् पुत्र होगा।' यह सुनकर दितिदेवी कश्यपके द्वारा उत्तम गर्भ धारण कर व्रत-आचारपूर्वक जीवन-यापन करने लगी। उसके गर्भ धारण करनेके कारण भयभीत देवराज इन्द्र देवगुरुकी आज्ञासे दितिकी व्रत-परिचर्यामें लग गये। गर्भके सात मास बीत जानेपर शक्रकी मायासे विमोहित वह दितिदेवी अपने घरमें अपवित्ररूपसे सो गयी। उसी समय अङ्गुष्ठमात्रका रूप बनाकर वज्रके साथ भगवान् महेन्द्रने दितिके उदरमें प्रविष्ट हो उस गर्भके पहले सात और फिर एक-एकके सात-सात खण्ड-खण्ड कर डाले। महेन्द्रने उन लोगोंको नम्रीभूत देखकर उनके साथ गर्भसे बाहर आकर दितिको प्रणाम किया। दितिने प्रसन्न होकर महेन्द्रको उन देवताओंको दे दिया। इस प्रकार वे उनचास मरुद्गण शक्रके सेवक हो गये।
वे मरुत् पूर्व भवमें लोकविश्रुत अनिल नामक वेदज्ञ ब्राह्मण हुए।
उस विप्रने पावकको स्तुतियोंद्वारा संतुष्ट किया। वह अपने सिरको काट-काटकर अग्निको चढ़ाता था और पुनः उसका सिर उत्पन्न हो जाता था। इस प्रकार आराधना करनेपर धनञ्जयदेव प्रसन्न हुए और बोले कि तुम उनचास मरुद्गणोंके रूपमें हो जाओगे, तब मैं तुम्हारा मित्र होकर तुम्हारी कामनाको पूर्ण करूँगा। जैसे भगवान् कुबेर छब्बीस वरुणदेवोंके प्रिय हैं, वैसे उनचास रूपधारी तुम्हारा मैं मित्र होऊँगा। इस प्रकार दितिके उदरमें पावकके प्रिय मित्रके रूपमें वायु नामसे उत्पन्न हुए।
सूतजीने कहा—मुने! देवगुरु बृहस्पतिसे इतनी कथा सुननेके बाद वही वायु वैश्यजातीय धान्यपालके
घरमें मूलगण्डान्तमें उत्पन्न हुआ। पिता और माताने काशीके विन्ध्यवनमें उसे छोड़ दिया। वहाँपर एक निःसंतान अलिक नामका वस्त्रनिर्माता (जुलाहा) व्यक्ति आया और उस बालकको लेकर अपने घर आ गया। वह सुन्दर मुखवाला बालक 'कबीर' नामसे प्रसिद्ध हुआ। गोदुग्ध-पान करनेवाले उस बालकने सात वर्षकी अवस्थामें रामानन्दको गुरु माना और वह भगवान् श्रीरामके ध्यानमें परायण हो गया। वह अपने हाथसे भोजन निर्माणकर भगवान् विष्णुको समर्पित करता था। उसका प्रिय करनेके लिये भगवान् साक्षात् उसकी इच्छाएँ पूरी करने लगे।
देवगुरु बृहस्पतिजी बोले—देवेन्द्र! प्राचीन कालमें उत्तानपाद नामके एक क्षत्रिय राजा थे। उनका पुत्र ध्रुव नामसे विख्यात हुआ। पिता-मातासे परित्यक्त उस पाँच वर्षके बालक ध्रुवने देवर्षि नारदजीके उपदेशसे गोवर्धन पर्वतपर आकर महान् व्रत धारणकर छः महीनेतक भगवान्का ध्यान किया। भगवान् विष्णुने प्रसन्न होकर आकाशमण्डलमें उसे नभोमय स्थान दिया।
यह ध्रुव पूर्व भवमें माधव नामक एक ब्राह्मण था, साठ वर्षांतक उसने प्रातःकाल तीर्थोंमें स्नान किया था। तीर्थ-सेवनके पुण्य-प्रतापसे वह भगवान् माधवका प्रिय पात्र बन गया। वह माधव भगवान्की भक्ति एवं तपस्याके फलसे अगले जन्ममें सुनीतिके गर्भसे ध्रुवरूपमें उत्पन्न हुआ। छत्तीस वर्षतक राज्यकर ध्रुव नभोमण्डलमें स्थित हो गया।
सूतजीने कहा—मुने! बृहस्पतिकी बात सुनकर पाँचवाँ वसु वह ध्रुव अपने अंशसे गुजरात प्रान्तमें भक्त नरश्री (नरसी मेहता)-के रूपमें उत्पन्न हुआ। भगवान् शंकरके अनुग्रहसे इन्होंने वृन्दावनमें भगवान्की दिव्य रासलीलाओंका दर्शन किया था। इनके पुत्री-पुत्रके विवाहके समय भक्तवत्सल भगवान् श्रीकृष्ण
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प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड
३६७
यादवोंके साथ आये और उनकी इच्छाओंको पूरा किया। परम वैष्णव भक्तराट् नरश्री काशीपुरीमें आकर रामानन्दके शिष्य हो गये।
बृहस्पतिजी बोले—देवेन्द्र! किसी समय गङ्गाके तटपर पतिव्रता अनसूयाके साथ भगवान् अत्रि आकर ध्यानमें समाधिस्थ हो गये। वहाँ ब्रह्मा, विष्णु और महेशने आकर कहा—‘वर माँगो।’ अत्रिमुनि परमात्माके ध्यानमें लीन थे। अतः कुछ भी नहीं बोले। वे तीनों उनके भावको समझकर उनकी पत्नी अनसूयादेवीके पास गये। पतिव्रताने देवोंके अन्यथा भावको समझकर पुत्ररूप होनेका शाप दे दिया। फलतः अत्रिके पुत्ररूपमें ब्रह्मा चन्द्रमा, शंकर दुर्वासा और विष्णु दत्तात्रेयके रूपमें बालक हो गये। बादमें ये ही क्रमशः अर्थात् चन्द्रमा सोम नामक छठे वसु, रुद्रांश दुर्वासा सातवें प्रत्यूप नामक वसु और विष्णु-अंश दत्तात्रेय प्रभास नामक आठवें वसु हुए।
सूतजीने कहा—मुने! बृहस्पतिकी यह बात
सुनकर वे तीनों वसु कलिकी शुद्धिके लिये अपने अंशसे पृथ्वीपर अवतीर्ण हुए। छठे वसु अर्थात् भगवान् अत्रिपुत्र सोम दक्षिणमें वैश्यवंशमें राजा सुदेवके घर पीपा नामक पुत्र हुए। जैसे राजाने उस नगरमें राज्य किया था, वैसे ही इन्होंने भी राज्य किया और वे रामानन्दके शिष्य हो द्वारकामें चले आये। भगवान् कृष्णद्वारा प्रेततत्त्वविनाशिनी स्वर्णमयी हरिकी मुद्राको प्राप्तकर उसे उसने वैष्णवोंको प्रदान कर दिया।
अत्रिपुत्र रुद्रके अंश सप्तम वसु अर्थात् प्रत्यूप पाञ्चाल देशमें वैश्यजातिमें मार्गपालके पुत्र हो नानक नामसे प्रसिद्ध हुए। रामानन्दके पास आकर नानक उनके शिष्य हो गये। उन्होंने म्लेच्छोंको वशमें करके सूक्ष्ममार्ग दिखाया।
अष्टम वसु प्रभास शान्तिपुरमें ब्राह्मणजातिमें उत्पन्न हुए। वे शुक्लदत्तके पुत्र नित्यानन्दके नामसे प्रसिद्ध हुए। शौनक! इस प्रकार मैंने आपको वसुदेवताओंका माहात्म्य बतलाया। (अध्याय १७)
अश्विनीकुमारोंके अंशसे सधन ( सदन कसाई ) और रैदासकी उत्पत्ति-कथा
सूतजीने कहा—मुने! देवगुरु बृहस्पतिने प्रयागमें समागत महेंद्र आदि देवताओंसे द्वादशादित्यों, रुद्रों तथा अष्ट वसु देवताओंका माहात्म्य बतलाया और फिर वे अश्विनीकुमारोंकी ओर देखकर उनकी गाथाका इस प्रकार वर्णन करने लगे।
भगवान् विवस्वान्को संज्ञासे दिव्य तेजस्वी वैवस्वत मनु, यम और यमुना तीन संतानें उत्पन्न हुई। संज्ञा तेजःस्वरूप अपने पतिको जानकर अपनी ही छाया उत्पन्न कर तपस्या करने चली गयी। सावर्णि मनु, शनि और तपती—ये छायासे उत्पन्न हुए। भगवान् सूर्यने छायाद्वारा संतानोंमें असमान व्यवहार देखकर उसे माया-स्वरूपा नारी मानकर क्रुद्ध हो भस्म कर दिया। विवस्वान्को
क्रोधयुक्त समझकर सावर्णिमनु और शनि सूर्यके प्रति क्रुद्ध हो युद्ध करने लगे। उसी समय वे सूर्यके द्वारा भस्मभूत होने लगे। फिर वे दोनों हिमालय पर्वतपर आकर परम तप करने लगे। तीन वर्ष तप करनेपर भक्तवत्सला महाकालीने प्रसन्न हो उन्हें वर दिया। वर प्राप्तकर पुनः वे दोनों भगवान् सूर्यसे युद्ध करने आये। तपके द्वारा प्रभावशाली सूर्य उनसे भयभीत होकर वहाँसे चले गये। रमणीय कुरुखण्डमें वडवा (अश्वा) रूपको धारणकर उनकी प्रिया संज्ञा सूर्यको प्राप्त करनेके लिये तपस्यामें संलग्न थी। भगवान् सूर्य उसे दृढ़ते हुए वहाँ पहुँचे। उन्होंने संज्ञाको अश्विनीरूपमें देखकर स्वयं भी अश्वका रूप बना
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