भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 331, कुल 654 में से

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

है। इसलिये ये चारों किसी-न-किसी रूपमें लक्ष्मीके किंकर हैं। परंतु जहाँ सत्य रहता है, वहीं धर्म रहता है और वहीं लक्ष्मी भी स्थिररूपमें रहती हैं।

वह वणिक् सत्य-धर्मसे च्युत हो गया था (उसने सत्यनारायणका व्रत न कर प्रतिज्ञाभंग की थी)। इसीलिये राजाने उस वणिक्के घरसे भी सारा धन हरण करवा लिया और घरमें चोरी भी हो गयी। बेचारी उसकी पत्नी लीलावती एवं पुत्री कलावतीके साथ अपने वस्त्र-आभूषण तथा मकान बेचकर जैसे-तैसे जीवन-यापन करने लगी।

एक दिन उसकी कन्या कलावती भूखसे व्याकुल होकर किसी ब्राह्मणके घर गयी और वहाँ उसने ब्राह्मणको भगवान् सत्यनारायणकी पूजा करते हुए देखा। जगन्नाथ सत्यदेवकी प्रार्थना करते हुए देखकर उसने भी भगवान्से प्रार्थना की—‘हे सत्यनारायणदेव! मेरे पिता और पति यदि घरपर आ जायेंगे तो मैं भी आपकी पूजा करूँगी।’ उसकी बात सुनकर ब्राह्मणोंने कहा—‘ऐसा ही होगा।’ इस प्रकार ब्राह्मणोंसे आश्वसनयुक्त आशीर्वाद प्राप्तकर वह अपने घर वापस आ गयी। रात्रिमें देरसे लौटनेके कारण माताने उससे डाँटते हुए पूछा कि ‘बेटी! इतनी राततक तुम कहाँ रही?’ इसपर उसने उसे प्रसाद देते हुए सत्यनारायणके पूजा-वृत्तान्तको बताया और कहा—‘माँ! मैंने वहाँ सुना कि भगवान् सत्यनारायण कलियुगमें प्रत्यक्ष फल देनेवाले हैं, उनकी पूजा मनुष्यगण सदा करते हैं। माँ! मैं भी उनकी पूजा करना चाहती हूँ, तुम मुझे आज्ञा प्रदान करो। मेरे पिता और स्वामी अपने घर आ जायें, यही मेरी कामना है।’

रातमें ऐसा मनमें निश्चयकर प्रातः वह कलावती शीलपाल नामक एक वणिक्के घरपर धन प्राप्त करनेकी इच्छासे गयी और उसने कहा—‘बन्धो! थोड़ा धन दें, जिससे मैं भगवान् सत्यनारायणकी

पूजा कर सकूँ।’ यह सुनकर शीलपालने उसे पाँच अशर्पिर्याँ दीं और कहा—‘कलावती! तुम्हारे पिताका कुछ ऋण शेष था, मैं उन्हें ही वापस कर रहा हूँ, इसे देकर आज मैं उन्मूल हो गया।’ यह कहकर शीलपाल गया-तीर्थमें श्राद्ध करने चला गया। कन्याने अपनी माँ लीलावतीके साथ उस द्रव्यसे कल्याणप्रद सत्यनारायणव्रतका श्रद्धा-भक्तिसे विधिपूर्वक अनुष्ठान किया। इससे सत्यनारायण- भगवान् संतुष्ट हो गये।

उधर नर्मदा-तटवासी राजा अपने राजमहलमें सो रहा था। रात्रिके अन्तिम प्रहरमें ब्राह्मण-वेषधारी भगवान् सत्यनारायणने स्वप्नमें उससे कहा—‘राजन्! तुम शीघ्र उठकर उन निर्दोष वणिकोंको बन्धनमुक्त कर दो। वे दोनों बिना अपराधके ही बंदी बना लिये गये हैं। यदि तुम ऐसा नहीं करोगे तो तुम्हारा कल्याण नहीं होगा।’ इतना कहकर वे अन्तर्हित हो गये। राजा निद्रासे सहसा जग उठा। वह परमात्माका स्मरण करने लगा। प्रातःकाल राजा अपनी सभामें आया और उसने अपने मन्त्रीसे देखे गये स्वप्नका फल पूछा। महामन्त्रीने भी राजासे कहा—‘राजन्! बड़े आश्चर्यकी बात है, मुझे भी आज ऐसा ही स्वप्न दिखलायी पड़ा। अतः उस वणिक् और उसके जामाताको बुलाकर भलीभाँति पूछ-ताछ कर लेनी चाहिये।’ राजाने उन दोनोंको बंदी-गृहसे बुलवाया और पूछा—‘तुम दोनों कहाँ रहते हो और तुम कौन हो?’ इसपर साधु वणिक्ने कहा—‘राजन्! मैं रत्नपुरका निवासी एक वणिक् हूँ। मैं व्यापार करनेके लिये यहाँ आया था, पर दैववश आपके सेवकोंने हमें चोर समझकर पकड़ लिया। साथमें यह मेरा जामाता है। बिना अपराधके ही हमें मणि-मुक्ताकी चोरी लगी है। राजेन्द्र! हम दोनों चोर नहीं हैं। आप भलीभाँति विचार कर लें।’

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