भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 330, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खण्ड *
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राजाने चोरीकी बात ज्ञात होनेपर अपने राजपुरुषोंको बुलाकर बहुत फटकारा और कहा कि 'यदि तुमलोगोंने चोरोंका पता लगाकर सारा धन यहाँ दो दिनोंमें उपस्थित नहीं किया तो तुम्हारी असावधानीके लिये तुम्हें मृत्यु-दण्ड दिया जायगा।' इसपर राजपुरुषोंने सर्वत्र व्यापक छान-बीन की, परंतु बहुत प्रयत्न करनेपर भी वे उन चोरोंका पता नहीं लगा सके। फिर वे सभी एकत्रित होकर विचार करने लगे—'अहो! बड़े कष्टकी बात है, चोर तो मिला नहीं, धन भी नहीं मिला, अब राजा हमलोगोंको परिवारके साथ मार डालेगा। मरनेपर भी हमें प्रेत-योनि प्राप्त होगी। इसलिये अब तो यही श्रेयस्कर है कि 'हमलोग पवित्र नर्मदा नदीमें डूबकर मर जायँ। क्योंकि नर्मदाके प्रभावसे हमें शिवलोककी प्राप्ति होगी।' वे सभी राजपुरुष आपसमें ऐसा निश्चयकर नर्मदा नदीके तटपर गये। वहाँ उन्होंने उस साधु वणिकको देखा और उसके कण्ठमें मोतीकी माला भी देखी। उन्होंने उस साधु वणिकको ही चोर समझ लिया और वे सभी प्रसन्न होकर उन दोनों (साधु
वणिक और उसके जामाता)-को धनसहित पकड़कर राजाके पास ले आये। भगवान् सत्यनारायण भी पूजा करनेमें असत्यका आश्रय लेनेके कारण वणिकके प्रतिकूल हो गये थे। इसी कारण राजाने भी विचार किये बिना ही अपने सेवकोंको आदेश दिया कि इनकी सारी सम्पत्ति जब्त कर खजानेमें जमा कर दो और इन्हें हथकड़ी लगाकर जेलमें डाल दो। सेवकोंने राजाज्ञाका पालन किया। वणिककी बातोंपर किसीने कुछ भी ध्यान नहीं दिया। अपने जामाताके साथ वह वणिक अत्यन्त दुःखित हुआ और विलाप करने लगा—'हा पुत्र! मेरा धन अब कहाँ चला गया, मेरी पुत्री और पत्नी कहाँ हैं? विधाताकी प्रतिकूलता तो देखो। हम दुःख-सागरमें निमग्न हो गये। अब इस संकटसे हमें कौन पार करेगा? मैंने धर्म एवं भगवान्के विरुद्ध आचरण किया। यह उन्हीं कर्मोंका प्रभाव है।' इस प्रकार विलाप करते हुए वे ससुर और जामाता कई दिनोंतक जेलमें भीषण संतापका अनुभव करते रहे।
(अध्याय २८)
[ सत्यनारायणव्रत-कथाका पञ्चम अध्याय ]
सत्य-धर्मके आश्रयसे सबका उद्धार
(लीलावती एवं कलावतीकी कथा)
सूतजीने कहा—ऋषियो! आध्यात्मिक, आधिदैविक तथा आधिभौतिक—इन तीनों तापोंको हरण करनेवाले भगवान् विष्णुके मङ्गलमय चरित्रको जो सुनते हैं, वे सदा हरिके धाममें निवास करते हैं, किंतु जो भगवान्का आश्रय नहीं ग्रहण करते—उन्हें विस्मृत कर देते हैं, उन्हें कष्टमय नरक प्राप्त होता है। भगवान् विष्णुकी पत्नीका नाम कमला (लक्ष्मी) है। इनके चार पुत्र हैं—धर्म, यज्ञ, राजा और चोर। ये सभी लक्ष्मी-प्रिय हैं अर्थात् ये लक्ष्मीकी
इच्छा करते हैं। ब्राह्मणों और अतिथियोंको जो दान दिया जाता है, वह धर्म कहा जाता है, उसके लिये धनकी आवश्यकता है। स्वाहा और स्वधाके द्वारा जो देवयज्ञ और पितृयज्ञ किया जाता है, वह यज्ञ कहा जाता है, उसमें भी धनकी अपेक्षा होती है। धर्म और यज्ञकी रक्षा करनेवाला राजा कहलाता है, इसलिये राजाको भी लक्ष्मी—धनकी अपेक्षा रहती है। धर्म और यज्ञको नष्ट करनेवाला चोर कहलाता है, वह भी धनकी इच्छासे चोरी करता
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