भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 322, कुल 654 में से

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पृष्ठ 322
  • प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खण्ड *

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किया और कहा—‘नारदजी! जिस विषयमें आप पूछ रहे हैं, उसके लिये मैं आपको एक सनातन व्रत बतलाता हूँ।’

भगवान् नारायण सत्ययुग और त्रेतायुगमें विष्णुस्वरूपमें फल प्रदान करते हैं और द्वापरमें अनेक रूप धारणकर फल देते हैं, परंतु कलियुगमें सर्वव्यापक भगवान् सत्यनारायण प्रत्यक्ष फल देते हैं, क्योंकि धर्मके चार पाद हैं—सत्य, शौच, तप और दान। इनमें सत्य ही प्रधान धर्म है। सत्यपर ही लोकका व्यवहार टिका है और सत्यमें ही ब्रह्म प्रतिष्ठित है, इसलिये सत्यस्वरूप भगवान् सत्यनारायणका व्रत परम श्रेष्ठ कहा गया है।

नारदजीने पुनः पूछा—भगवन्! सत्यनारायणकी पूजाका क्या फल है और इसकी क्या विधि है? देव! कृपासागर! सभी बातें अनुग्रहपूर्वक मुझे बतायें।

श्रीभगवान् बोले—नारद! सत्यनारायणकी पूजाका फल एवं विधि चतुर्मुख ब्रह्मा भी बतलानेमें समर्थ नहीं हैं, किंतु संक्षेपमें मैं उसका फल तथा विधि बतला रहा हूँ, आप सुनें—

सत्यनारायणके व्रत एवं पूजनसे निर्धन व्यक्ति धनाढ्य और पुत्रहीन व्यक्ति पुत्रवान् हो जाता है। राज्यच्युत व्यक्ति राज्य प्राप्त कर लेता है, दृष्टिहीन व्यक्ति दृष्टिसम्पन्न हो जाता है, बंदी बन्धनमुक्त हो जाता है और भयार्त व्यक्ति निर्भय हो जाता है। अधिक क्या? व्यक्ति जिस-जिस वस्तुकी इच्छा करता है, उसे वह सब प्राप्त हो जाती है। इसलिये मुने! मनुष्य-जन्ममें भक्तिपूर्वक सत्यनारायणकी अवश्य आराधना करनी चाहिये। इससे वह अपने अभिलषित वस्तुको निःसंदेह शीघ्र ही प्राप्त कर लेता है।

इस सत्यनारायणव्रतके करनेवाले व्रतीको चाहिये

कि वह प्रातः दन्तधावनपूर्वक स्नानकर पवित्र हो जाय। हाथमें तुलसी-मंजरीको लेकर सत्यमें प्रतिष्ठित भगवान् श्रीहरिका इस प्रकार ध्यान करे—

नारायणं सान्द्रघनावदातं चतुर्भुजं पीतमहार्हवाससम्। प्रसन्नवक्त्रं नवकञ्जलोचनं सन्नन्दनाद्यैरुपसेवितं भजे ॥ करोमि ते व्रतं देव सायंकाले त्वदर्चनम्। श्रुत्वा गाथां त्वदीयां हि प्रसादं ते भजाम्यहम्॥

(प्रतिसर्गपर्व २।२४।२६-२७)

‘सघन मेघके समान अत्यन्त निर्मल, चतुर्भुज, अतिश्रेष्ठ पीले वस्त्रको धारण करनेवाले, प्रसन्नमुख, नवीन कमलके समान नेत्रवाले, सनक-सनन्दनादिसे उपसेवित भगवान् नारायणका मैं सतत चिन्तन करता हूँ। देव! मैं आपके सत्यस्वरूपको धारणकर सायंकालमें आपकी पूजा करूँगा। आपके रमणीय चरित्रको सुनकर आपके प्रसाद अर्थात् आपकी प्रसन्नताका मैं सेवन करूँगा।’

इस प्रकार मनमें संकल्पकर सायंकालमें विधिपूर्वक भगवान् सत्यनारायणकी पूजा करनी चाहिये। पूजामें पाँच कलश रखने चाहिये। कदली-स्तम्भ और बंदनवार लगाने चाहिये। स्वर्णमण्डित भगवान् शालग्रामको पुरुषसूक्त (यजु० ३१।१—१६) द्वारा पञ्चामृत आदिसे भलीभाँति स्नान कराकर चन्दन आदि अनेक उपचारोंसे भक्तिपूर्वक उनकी अर्चना करनी चाहिये। अनन्तर भगवान्को निम्न मन्त्रका उच्चारण करते हुए प्रणाम करना चाहिये—

नमो भगवते नित्यं सत्यदेवाय धीमहि।

चतुःपदार्थदत्रे च नमस्तुभ्यं नमो नमः॥

(प्रतिसर्गपर्व २।२४।३०)

‘षडैश्वर्यरूप भगवान् सत्यदेवको नमस्कार है, मैं आपका सदा ध्यान करता हूँ। आप धर्म, अर्थ,

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