भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 321, कुल 654 में से
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
( श्रीसूतजीने प्रार्थना करते हुए कहा— )
‘प्रफुल्लित नवीन कमलके समान नेत्रवाले, भगवती लक्ष्मीके क्रीडापात्र, चतुर्भुज, सुवर्णकान्तिके समान सुन्दर शरीरवाले, संसारकी रक्षा करनेके एकमात्र मूल कारण तथा शत्रुओंके लिये धूम्रकेतुस्वरूप भगवान् सत्यनारायणदेवकी मैं स्तुति करता हूँ।’ श्रीरामं सहलक्ष्मणं सकरुणं सीतान्वितं सात्त्विकं
वैदेहीमुखपद्मलुब्धमधुरं पौलस्त्यसंहारकम्।
वन्दे वन्द्यपदाम्बुजं सुरवरं भक्तानुकम्पाकरं
शत्रुघ्नैन हनूमता च भरतेनासेवितं राघवम्॥
(प्रतिसर्गपर्व २।२४।५)
‘जो भगवान् करुणाके निधान हैं, जिनके चरणकमल वन्दनीय हैं, जो भक्तोंपर अनुकम्पा करनेवाले हैं, जो लक्ष्मणजीके साथ रहते हैं और माता श्रीसीतासे समन्वित हैं तथा माता वैदेही श्रीजनकनन्दिनीजीके मुख-कमलकी ओर स्निग्धभावसे देखते रहते हैं, उन शत्रुघ्न, हनुमान् तथा भरतसे सेवित, पुलस्त्यकुलका संहार करनेवाले, सत्स्वरूप सुरश्रेष्ठ राघवेन्द्र श्रीरामचन्द्रकी मैं वन्दना करता हूँ।’
सूतजीने कहा— ऋषियो! अब मैं आपसे श्रेष्ठ राजाओंके चरित्रोंसे सम्बद्ध एक इतिहासका वर्णन करता हूँ, उसे आपलोग श्रवण करें। यह पवित्र आख्यान कलियुगके सम्पूर्ण पापोंका विनाश करनेवाला, कामनाओंको पूर्ण करनेवाला, देवताओंद्वारा आभासित, ब्राह्मणोंद्वारा प्रकाशित, विद्वानोंको आनन्दित करनेवाला तथा विशेष रूपसे सत्संगके चर्चस्वरूप है*।
ऋषियो! एक समय योगी देवर्षि नारदजी सबके कल्याणकी कामनासे विविध लोकोंमें भ्रमण करते हुए इस मृत्युलोकमें आये। यहाँ
उन्होंने देखा कि अपने-अपने किये गये कर्मोंके अनुसार संसारके प्राणी नाना प्रकारके क्लेशों एवं दुःखोंसे दुःखी हैं और विविध आधि एवं व्याधिसे ग्रस्त हैं। यह देखकर उन्होंने सोचा कि कौन-सा ऐसा उपाय है, जिससे इन प्राणियोंके दुःखका नाश हो। ऐसा विचारकर वे विष्णुलोकमें गये। वहाँ उन्होंने शङ्खु, चक्र, गदा, पद्म और वनमालासे अलंकृत, प्रसन्नमुख, शान्त, सनक-सनन्दन तथा सनत्कुमारदिसे संस्तुत भगवान् नारायणका दर्शन किया। उन देवाधिदेवका दर्शन कर नारदजी उनकी इस प्रकार स्तुति करने लगे—‘वाणी और मनसे जिनका स्वरूप परे है और जो अनन्तशक्तिसम्पन्न हैं, आदि, मध्य और अन्तसे रहित हैं, ऐसे महान् आत्मा निर्गुणस्वरूप आप परमात्माको मेरा नमस्कार है। सभीके आदिपुरुष लोकोपकारपरायण, सर्वत्र व्याप्त, तपोमूर्ति आपको मेरा बार-बार नमस्कार है।’
देवर्षि नारदकी स्तुति सुनकर भगवान् विष्णु बोले—‘देवर्षि! आप किस कारणसे यहाँ आये हैं? आपके मनमें कौन-सी चिन्ता है? महाभाग! आप सभी बातें बतायें। मैं उचित उपाय कहूँगा।
नारदजीने कहा—प्रभो! लोकोंमें भ्रमण करता हुआ मैं मृत्युलोकमें गया था, वहाँ मैंने देखा कि संसारके सभी प्राणी अनेक प्रकारके क्लेश-तापोंसे दुःखी हैं। अनेक रोगोंसे ग्रस्त हैं। उनकी वैसी दुर्दशा देखकर मेरे मनमें बड़ा कष्ट हुआ और मैं सोचने लगा कि किस उपायसे इन दुःखी प्राणियोंका उद्धार होगा? भगवन्! उनके कल्याणके लिये आप कोई श्रेष्ठ एवं सुगम उपाय बतलानेकी कृपा करें। नारदजीके इन वचनोंको सुनकर भगवान् नारायणने साधु-साधु शब्दोंसे उनका अभिनन्दन
- कलिकल्पविनाशं कामसिद्धिप्रकाशं सुरवरमुखभासं भूसुरेण प्रकाशम्।
विबुधवृषिबिलासं साधुचर्याविशेषं नृपतिवरचरित्रं भोः शृणुव्येतिहासम्॥ (प्रतिसर्गपर्व २।२४।६)
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