भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 323, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें३१२
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
काम और मोक्ष—इस चतुर्विध पुरुषार्थको प्रदान करनेवाले हैं, आपको बार-बार नमस्कार है।'
इस मन्त्रका यथाशक्ति जपकर १०८ बार हवन करे। उसके दशांशसे तर्पण तथा उसके दशांशसे मार्जन कर भगवान्की कथाको सुनना चाहिये, जो छः अध्यायोंमें उपनिबद्ध है। भगवान्की इस कथामें सत्य-धर्मकी ही मुख्यता है। कथा-श्रवणके अनन्तर भगवान्के प्रसादको चार भागोंमें विभक्तकर उसे भलीभाँति वितरण करे। प्रथम भाग आचार्यको दे, द्वितीय भाग अपने कुटुम्बको, तृतीय भाग श्रोताओंको और चतुर्थ भाग अपने लिये रखे। तत्पश्चात् ब्राह्मणोंको भोजन कराये एवं स्वयं भी मौन होकर भोजन करे। देवर्षि! इस विधिसे सत्यनारायणकी
पूजा करनी चाहिये। श्रद्धा-भक्तिपूर्वक सत्यनारायणकी पूजा करनेवाला व्रती सभी अभीष्ट कामनाओंको इसी जन्ममें प्राप्त कर लेता है। इस जन्ममें किये गये पुण्यफलको दूसरे जन्ममें भोगा जाता है और दूसरे जन्ममें किये गये कर्मोंका फल मनुष्यको यहाँ भोगना पड़ता है। श्रद्धापूर्वक किया गया सत्यनारायणका व्रत सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला होता है।
नारदजीने कहा—भगवन्! आज ही आपकी आज्ञासे भूमण्डलमें इस सत्यदेव-व्रतको मैं प्रतिष्ठित करूँगा। यह कहकर नारदजी तो पृथ्वीपर व्रतका प्रचार करने चले गये और भगवान् नारायणदेव अन्तर्धान हो काशीपुरीमें चले आये। (अध्याय २४)
[ सत्यनारायणव्रत-कथाका प्रथम अध्याय ]
सत्यनारायणव्रत-कथामें शतानन्द ब्राह्मणकी कथा
सूतजी बोले—ऋषियो! भगवान् नारायणने स्वयं कृपापूर्वक देवर्षि नारदजीद्वारा जिस प्रकार इस व्रतका प्रचार किया, अब मैं उस कथाको कहता हूँ, आपलोग सुनें—
लोकप्रसिद्ध काशी नगरीमें एक श्रेष्ठ विद्वान् ब्राह्मण रहते थे, जो विष्णुव्रतपरायण थे, वे गृहस्थ थे, दीन थे तथा स्त्री-पुत्रवान् थे। वे भिक्षा-वृत्तिसे अपना जीवन-यापन करते थे। उनका नाम शतानन्द था। एक समय वे भिक्षा माँगनेके लिये जा रहे थे। उन विनीत एवं अतिशय शान्त शतानन्दको मार्गमें एक वृद्ध ब्राह्मण दिखायी दिये, जो साक्षात् हरि ही थे। उन वृद्ध ब्राह्मणवेषधारी श्रीहरिने ब्राह्मण शतानन्दसे पूछा—'द्विजश्रेष्ठ! आप किस निमित्तसे कहाँ जा रहे हैं?' शतानन्द बोले—'सौम्य! अपने पुत्र-कलत्रादिके भरण-पोषणके लिये धन-याचनाकी
कामनासे मैं धनिकोंके पास जा रहा हूँ।'
नारायणने कहा—द्विज! निर्धनताके कारण आपने दीर्घकालसे भिक्षावृत्ति अपना रखी है, इसकी निवृत्तिके लिये सत्यनारायणव्रत कलियुगमें सर्वोत्तम उपाय है। इसलिये मेरे कथनके अनुसार आप कमलनेत्र भगवान् सत्यनारायणके चरणोंकी शरण-ग्रहण करें, इससे दारिद्र्य, शोक और सभी संतापोंका विनाश होता है तथा मोक्ष भी प्राप्त होता है।
करुणामूर्ति भगवान्के इन वचनोंको सुनकर ब्राह्मण शतानन्दने पूछा—'ये सत्यनारायण कौन हैं?'
ब्राह्मणरूपधारी भगवान् बोले—नानारूप धारण करनेवाले, सत्यव्रत, सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले तथा निरञ्जन वे देव इस समय विप्रका रूप धारणकर तुम्हारे सामने आये हैं। इस महान् दुःखरूपी संसार-सागरमें पड़े हुए प्राणियोंको तारनेके
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth