भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
काम और मोक्ष—इस चतुर्विध पुरुषार्थको प्रदान करनेवाले हैं, आपको बार-बार नमस्कार है।'
इस मन्त्रका यथाशक्ति जपकर १०८ बार हवन करे। उसके दशांशसे तर्पण तथा उसके दशांशसे मार्जन कर भगवान्की कथाको सुनना चाहिये, जो छः अध्यायोंमें उपनिबद्ध है। भगवान्की इस कथामें सत्य-धर्मकी ही मुख्यता है। कथा-श्रवणके अनन्तर भगवान्के प्रसादको चार भागोंमें विभक्तकर उसे भलीभाँति वितरण करे। प्रथम भाग आचार्यको दे, द्वितीय भाग अपने कुटुम्बको, तृतीय भाग श्रोताओंको और चतुर्थ भाग अपने लिये रखे। तत्पश्चात् ब्राह्मणोंको भोजन कराये एवं स्वयं भी मौन होकर भोजन करे। देवर्षि! इस विधिसे सत्यनारायणकी
पूजा करनी चाहिये। श्रद्धा-भक्तिपूर्वक सत्यनारायणकी पूजा करनेवाला व्रती सभी अभीष्ट कामनाओंको इसी जन्ममें प्राप्त कर लेता है। इस जन्ममें किये गये पुण्यफलको दूसरे जन्ममें भोगा जाता है और दूसरे जन्ममें किये गये कर्मोंका फल मनुष्यको यहाँ भोगना पड़ता है। श्रद्धापूर्वक किया गया सत्यनारायणका व्रत सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला होता है।
नारदजीने कहा—भगवन्! आज ही आपकी आज्ञासे भूमण्डलमें इस सत्यदेव-व्रतको मैं प्रतिष्ठित करूँगा। यह कहकर नारदजी तो पृथ्वीपर व्रतका प्रचार करने चले गये और भगवान् नारायणदेव अन्तर्धान हो काशीपुरीमें चले आये। (अध्याय २४)
[ सत्यनारायणव्रत-कथाका प्रथम अध्याय ]
सत्यनारायणव्रत-कथामें शतानन्द ब्राह्मणकी कथा
सूतजी बोले—ऋषियो! भगवान् नारायणने स्वयं कृपापूर्वक देवर्षि नारदजीद्वारा जिस प्रकार इस व्रतका प्रचार किया, अब मैं उस कथाको कहता हूँ, आपलोग सुनें—
लोकप्रसिद्ध काशी नगरीमें एक श्रेष्ठ विद्वान् ब्राह्मण रहते थे, जो विष्णुव्रतपरायण थे, वे गृहस्थ थे, दीन थे तथा स्त्री-पुत्रवान् थे। वे भिक्षा-वृत्तिसे अपना जीवन-यापन करते थे। उनका नाम शतानन्द था। एक समय वे भिक्षा माँगनेके लिये जा रहे थे। उन विनीत एवं अतिशय शान्त शतानन्दको मार्गमें एक वृद्ध ब्राह्मण दिखायी दिये, जो साक्षात् हरि ही थे। उन वृद्ध ब्राह्मणवेषधारी श्रीहरिने ब्राह्मण शतानन्दसे पूछा—'द्विजश्रेष्ठ! आप किस निमित्तसे कहाँ जा रहे हैं?' शतानन्द बोले—'सौम्य! अपने पुत्र-कलत्रादिके भरण-पोषणके लिये धन-याचनाकी
कामनासे मैं धनिकोंके पास जा रहा हूँ।'
नारायणने कहा—द्विज! निर्धनताके कारण आपने दीर्घकालसे भिक्षावृत्ति अपना रखी है, इसकी निवृत्तिके लिये सत्यनारायणव्रत कलियुगमें सर्वोत्तम उपाय है। इसलिये मेरे कथनके अनुसार आप कमलनेत्र भगवान् सत्यनारायणके चरणोंकी शरण-ग्रहण करें, इससे दारिद्र्य, शोक और सभी संतापोंका विनाश होता है तथा मोक्ष भी प्राप्त होता है।
करुणामूर्ति भगवान्के इन वचनोंको सुनकर ब्राह्मण शतानन्दने पूछा—'ये सत्यनारायण कौन हैं?'
ब्राह्मणरूपधारी भगवान् बोले—नानारूप धारण करनेवाले, सत्यव्रत, सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले तथा निरञ्जन वे देव इस समय विप्रका रूप धारणकर तुम्हारे सामने आये हैं। इस महान् दुःखरूपी संसार-सागरमें पड़े हुए प्राणियोंको तारनेके
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- प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खण्ड *
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लिये भगवान् के चरण नौकारूप हैं। जो बुद्धिमान् व्यक्ति हैं, वे भगवान् की शरणमें जाते हैं, किंतु विषयोंमें व्याप्त विषयबुद्धिवाले व्यक्ति भगवान् की शरणमें न जाकर इसी संसार-सागरमें पड़े रहते हैं। इसलिये द्विज! संसारके कल्याणके लिये विविध उपचारोंसे भगवान् सत्यनारायण-देवकी पूजा, आराधना तथा ध्यान करते हुए तुम इस व्रतको प्रकाशमें लाओ।
विप्ररूपधारी भगवान् के ऐसा कहते ही उस ब्राह्मण शतानन्दने मेघोंके समान नीलवर्ण, सुन्दर चार भुजाओंमें शङ्खु, चक्र, गदा तथा पद्म लिये हुए और पीताम्बर धारण किये हुए, नवीन विकसित कमलके समान नेत्रवाले तथा मन्द-मन्द मधुर मुसकानवाले, वनमालायुक्त और भौरोंके द्वारा चुम्बित चरण-कमलवाले पुरुषोत्तम भगवान् नारायणके साक्षात् दर्शन किये।
भगवान् की वाणी सुनने और उनका प्रत्यक्ष दर्शन करनेसे उस विप्रके सभी अङ्ग पुलकित हो उठे, आँखोंमें प्रेमाश्रु भर आये। उसने भूमिपर गिरकर भगवान् को साष्टाङ्ग प्रणाम किया और गद्गद वाणीसे वह उनकी इस प्रकार स्तुति करने लगा—
संसारके स्वामी, जगत् के कारणके भी कारण, अनाथोंके नाथ, कल्याण-मङ्गलको देनेवाले, शरण देनेवाले, पुण्यरूप, पवित्र, अव्यक्त तथा व्यक्त होनेवाले और आधिभौतिक, आधिदैविक तथा आध्यात्मिक
तीनों प्रकारके तापोंका समूल उच्छेद करनेवाले भगवान् सत्यनारायणको मैं प्रणाम करता हूँ। इस संसारके रचयिता सत्यनारायणदेवको नमस्कार है। विश्वके भरण-पोषण करनेवाले शुद्ध सत्स्वरूपको नमस्कार है तथा विश्वका विनाश करनेवाले कराल महाकालस्वरूपको नमस्कार है। सम्पूर्ण संसारका मङ्गल करनेवाले आत्ममूर्तिस्वरूप हे भगवान्! आपको नमस्कार है। आज मैं धन्य हो गया, पुण्यवान् हो गया, आज मेरा जन्म लेना सफल हो गया, जो कि मन-वाणीसे अगम-अगोचर आपका मुझे प्रत्यक्ष दर्शन हुआ। मैं अपने भाग्यकी क्या सराहना करूँ। न जाने मेरे किस पुण्यकर्मका यह फल था, जो मुझे आपके दर्शन हुए। प्रभो! आपने क्रियाहीन इस मन्द-बुद्धिके शरीरको सफल कर दिया।
लोकनाथ! रमापते! किस विधिसे भगवान् सत्यनारायणका पूजन करना चाहिये, विभो! कृपाकर उसे भी आप बतायें। संसारको मोहित करनेवाले भगवान् नारायण मधुर वाणीमें बोले—‘विप्रेन्द्र! मेरी पूजामें बहुत अधिक धनकी आवश्यकता नहीं, अनायास जो धन प्राप्त हो जाय, उसीसे श्रद्धापूर्वक मेरा यजन करना चाहिये। जिस प्रकार मेरी स्तुतिसे, स्मृतिसे ग्राह-ग्रस्त गजेन्द्र, अजामिल संकटसे मुक्त हो गये, इसी प्रकार इस व्रतके आश्रयसे मनुष्य तत्काल क्लेशमुक्त हो जाता है।’ इस व्रतकी विधिको सुनें—
अभीष्ट कामनाकी सिद्धिके लिये पूजाकी सामग्री
१- दुःखोदधिनिमग्नानां तरणिश्वरणी हरेः। कुशलाः शरणं यान्ति नेतरे विषयात्मिकाः ॥ (प्रतिसर्गपर्व २।२५।१०)
२- प्रणमामि जगन्नाथं जगत्कारणकारणम्। अनाथनाथं शिवदं शरण्यमनधं शुचिम् ॥
अव्यक्तं व्यक्तं यातं तापत्रयविमोचनम् ॥
नमः सत्यनारायणायास्य कर्त्रे नमः शुद्धसत्त्वाय विश्वस्य भर्त्रे। करलाय कालाय विश्वस्य हर्त्रेनमस्ते जगन्मङ्गलायात्मभूर्ते ॥
धन्योऽस्यघ कृती धन्यो भवोऽघ सफलोमम। वाङ्मनोऽगोचरो यस्त्वं मम प्रत्यक्षमागतः ॥
दिष्टं किं वर्णयाम्याहो न जाने कस्य वा फलम्। क्रियाहीनस्य मन्दस्य देहोऽयं फलवान् कृतः ॥
(प्रतिसर्गपर्व २।२५।१५-१९)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
एकत्रकर विधिपूर्वक भगवान् सत्यनारायणकी पूजा करनी चाहिये। सवा सेरके लगभग गोधूम-चूर्णमें दूध और शक्कर मिलाकर, उस चूर्णको घृतसे युक्तकर हरिको निवेदित करना चाहिये, यह भगवान्को अत्यन्त प्रिय है। पञ्चामृतके द्वारा भगवान् शालग्रामको स्नान कराकर गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य तथा ताम्बूलादि उपचारोंसे मन्त्रोंद्वारा उनकी अर्चना करनी चाहिये। अनेक मिष्टान्न तथा भक्ष्य-भोज्य पदार्थों एवं ऋतुकालोद्भूत विविध फलों तथा फूलोंसे भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिये। फिर ब्राह्मणों तथा स्वजनोंके साथ मेरी कथा, राजा (तुङ्गध्वज)-के इतिहास, भीलोंकी और वणिक (साधु)-की कथाको आदरपूर्वक श्रवण करना चाहिये। कथाके अनन्तर भक्तिपूर्वक सत्यदेवको प्रणामकर प्रसादका वितरण करना चाहिये। तदनन्तर भोजन करना चाहिये। मेरी प्रसन्नता द्रव्यादिसे नहीं, अपितु श्रद्धा-भक्तिसे ही होती है।
विप्रेन्द्र! इस प्रकार जो विधिपूर्वक पूजा करते हैं, वे पुत्र-पौत्र तथा धन-सम्पत्तिसे युक्त होकर श्रेष्ठ भोगोंका उपभोग करते हैं और अन्तमें मेरा सांनिध्य प्राप्त कर मेरे साथ आनन्दपूर्वक रहते हैं। व्रती जो-जो कामना करता है, वह उसे अवश्य ही प्राप्त हो जाती है।
इतना कहकर भगवान् अन्तर्धान हो गये और वे ब्राह्मण भी अत्यन्त प्रसन्न हो गये। मन-ही-मन उन्हें प्रणाम कर वे भिक्षाके लिये नगरकी ओर चले गये और उन्होंने मनमें यह निश्चय किया कि
‘आज भिक्षामें जो धन मुझे प्राप्त होगा, मैं उससे भगवान् सत्यनारायणकी पूजा करूँगा।’
उस दिन अनायास बिना माँगे ही उन्हें प्रचुर धन प्राप्त हो गया। वे आश्चर्यचकित हो अपने घर आये। उन्होंने सारा वृत्तान्त अपनी धर्मपत्नीको बताया। उसने भी सत्यनारायणके व्रत-पूजाका अनुमोदन किया। वह पतिकी आज्ञासे श्रद्धापूर्वक बाजारसे पूजाकी सभी सामग्रियोंको ले आयी और अपने बन्धु-बान्धवों तथा पड़ोसियोंको भगवान् सत्यनारायणकी पूजामें सम्मिलित होनेके लिये बुला ले आयी। अनन्तर शतानन्दने भक्तिपूर्वक भगवान्की पूजा की। कथाकी समाप्तिपर प्रसन्न होकर उनकी कामनाओंको पूर्ण करनेके उद्देश्यसे भक्तवत्सल भगवान् सत्यनारायणदेव प्रकट हो गये। उनका दर्शन कर ब्राह्मण शतानन्दने भगवान्से इस लोकमें तथा परलोकमें सुख एवं पराभक्तिकी याचना की और कहा—‘हे भगवन्! आप मुझे अपना दास बना लें।’ भगवान् भी ‘तथास्तु’ कहकर अन्तर्धान हो गये। यह देखकर कथामें आये सभी जन अत्यन्त विस्मित हो गये और ब्राह्मण भी कृतकृत्य हो गया। वे सभी भगवान्को दण्डवत् प्रणामकर आदरपूर्वक प्रसाद ग्रहणकर ‘यह ब्राह्मण धन्य है, धन्य है’, इस प्रकार कहते हुए अपने-अपने घर चले गये। तभीसे लोकमें यह प्रचार हो गया कि भगवान् सत्यनारायणका व्रत अभीष्ट कामनाओंकी सिद्धि प्रदान करनेवाला, क्लेशनाशक और भोग-मोक्षको प्रदान करनेवाला है। (अध्याय २५)
[ सत्यनारायणव्रत-कथाका द्वितीय अध्याय ]
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- प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खण्ड *
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सत्यनारायणव्रत-कथामें राजा चन्द्रचूडका आख्यान
सूतजी बोले—ऋषियो! प्राचीन कालमें केदारखण्डके मणिपूरक नामक नगरमें चन्द्रचूड नामक एक धार्मिक तथा प्रजावत्सल राजा रहते थे। वे अत्यन्त शान्तस्वभाव, मृदुभाषी, धीर-प्रकृति तथा भगवान् नारायणके भक्त थे। विन्ध्यदेशके म्लेच्छगण उनके शत्रु हो गये। उस राजाका उन म्लेच्छोंसे अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा भयानक युद्ध हुआ। उस युद्धमें राजा चन्द्रचूडकी विशाल चतुरङ्गिणी सेना अधिक नष्ट हुई, किंतु कूट-युद्धमें निपुण म्लेच्छोंकी सेनाकी क्षति बहुत कम हुई। युद्धमें दम्भी म्लेच्छोंसे परास्त होकर राजा चन्द्रचूड अपना राष्ट्र छोड़कर अकेले ही वनमें चले गये। तीर्थान्तके बहाने इधर-उधर घूमते हुए वे काशीपुरीमें पहुँचे। वहाँ उन्होंने देखा कि घर-घर सत्यनारायणकी पूजा हो रही है और यह काशी नगरी द्वारकाके समान ही भव्य एवं समृद्धिशाली हो गयी है।
वहाँकी समृद्धि देखकर चन्द्रचूड विस्मित हो गये और उन्होंने सदानन्द (शतानन्द) ब्राह्मणके द्वारा की गयी सत्यनारायण-पूजाकी प्रसिद्धि भी सुनी, जिसके अनुसरणसे सभी शील एवं धर्मसे समृद्ध हो गये थे। राजा चन्द्रचूड भगवान् सत्यनारायणकी पूजा करनेवाले ब्राह्मण सदानन्द (शतानन्द)-के पास गये और उनके चरणोंपर गिरकर उनसे सत्यनारायण-पूजाकी विधि पूछी तथा अपने राज्यभ्रष्ट होनेकी कथा भी बतलायी और कहा—‘ब्रह्मन्! लक्ष्मीपति भगवान् जनार्दन जिस व्रतसे प्रसन्न होते हैं, पापके नाश करनेवाले उस व्रतको बतलाकर आप मेरा उद्धार करें।’
सदानन्द (शतानन्द) -ने कहा—राजन्! श्रीपति
भगवान्को प्रसन्न करनेवाला सत्यनारायण नामक एक श्रेष्ठ व्रत है, जो समस्त दुःख-शोकादिका शामक, धन-धान्यका प्रवर्धक, सौभाग्य और संततिक प्रदाता तथा सर्वत्र विजय-प्रदायक है। राजन्! जिस किसी भी दिन प्रदोषकालमें इनके पूजन आदिका आयोजन करना चाहिये। कदलीदलके स्तम्भोंसे मण्डित, तोरणोंसे अलंकृत एक मण्डपकी रचनाकर उसमें पाँच कलशोंकी स्थापना करनी चाहिये और पाँच ध्वजार्ष भी लगानी चाहिये। व्रतीको चाहिये कि उस मण्डपके मध्यमें ब्राह्मणोंके द्वारा एक रमणीय वेदिकाकी रचना करवाये। उसके ऊपर स्वर्णसे मण्डित शिलारूप भगवान् नारायण (शालग्राम)-को स्थापित कर प्रेम-भक्तिपूर्वक चन्दन, पुष्प आदि उपचारोंसे उनकी पूजा करे। भगवान्का ध्यान करते हुए भूमिपर शयनकर सात रात्रि व्यतीत करे।
यह सुनकर राजा चन्द्रचूडने काशीमें ही भगवान् सत्यनारायणकी शीघ्र ही पूजा की। प्रसन्न होकर रात्रिमें भगवान्ने राजाको एक उत्तम तलवार प्रदान की। शत्रुओंको नष्ट करनेवाली तलवार प्राप्त कर राजा ब्राह्मणश्रेष्ठ सदानन्दको प्रणाम कर अपने नगरमें आ गये तथा छः हजार म्लेच्छ दस्युओंको मारकर उनसे अपार धन प्राप्त किया और नर्मदाके मनोहर तटपर पुनः भगवान् श्रीहरिकी पूजा की। वे राजा प्रत्येक मासकी पूर्णिमाको प्रेम और भक्तिपूर्वक विधि-विधानसे भगवान् सत्यदेवकी पूजा करने लगे। उस व्रतके प्रभावसे वे लाखों ग्रामोंके अधिपति हो गये और साठ वर्षतक राज्य करते हुए अन्तमें उन्होंने विष्णुलोकको प्राप्त किया। (अध्याय २६)
[ सत्यनारायणव्रत-कथाका तृतीय अध्याय ]
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३१६
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
सत्यनारायणव्रतके प्रसंगमें लकड़हारोंकी कथा
सूतजी बोले—ऋषियो! अब इस सम्बन्धमें सत्यनारायणव्रतके आचरणसे कृतकृत्य हुए भिल्लोंकी कथा सुनें। एक समयकी बात है, कुछ निषादगण वनसे लकड़ियाँ काटकर नगरमें लाकर बेचा करते थे। उनमेंसे कुछ निषाद काशीपुरीमें लकड़ी बेचने आये। उन्हींमेंसे एक बहुत प्यासा लकड़हारा विष्णुदास (शतानन्द)-के आश्रममें गया। वहाँ उसने जल पिया और देखा कि ब्राह्मणलोग भगवान्की पूजा कर रहे हैं। भिक्षुक शतानन्दका वैभव देखकर वह चकित हो गया और सोचने लगा—'इतने दरिद्र ब्राह्मणके पास यह अपार वैभव कहाँसे आ गया? इसे तो आजतक मैंने अकिंचन ही देखा था। आज यह इतना महान् धनी कैसे हो गया?' इसपर उसने पूछा—'महाराज! आपको यह ऐश्वर्य कैसे प्राप्त हुआ और आपको निर्धनतासे मुक्ति कैसे मिली? यह बतानेका कष्ट करें, मैं सुनना चाहता हूँ।'
शतानन्दने कहा—भाई! यह सब सत्यनारायणकी आराधनाका फल है, उनकी आराधनासे क्या नहीं होता। भगवान् सत्यनारायणकी अनुकम्पाके बिना किंचित् भी सुख प्राप्त नहीं होता।
निषादने उनसे पूछा—महाराज! सत्यनारायण-भगवान्का क्या माहात्म्य है? इस व्रतकी विधि क्या है? आप उनकी पूजाके सभी उपचारोंका वर्णन करें, क्योंकि उपकार-परायण संत-महात्मा अपने हृदयमें सबके लिये समान भाव रखते हैं, किसीसे कोई कल्याणकारी बात नहीं छिपाते।
शतानन्द बोले—एक समयकी बात है, केदारक्षेत्रके मणिपूरक नगरमें रहनेवाले राजा चन्द्रचूड मेरे आश्रममें आये और उन्होंने मुझसे
भगवान् सत्यनारायणव्रत-कथाके विधानको पूछा। हे निषादपुत्र! इसपर मैंने जो उन्हें बताया था, उसे तुम सुनो—
सकामभावसे अथवा निष्कामभावसे किसी भी प्रकार भगवान्की पूजाका मनमें संकल्पकर उनकी पूजा करनी चाहिये। सवा सेर गोधूमके चूर्णको मधु तथा सुगन्धित घृतसे संस्कृतकर नैवेद्यके रूपमें भगवान्को अर्पण करना चाहिये। भगवान् सत्यनारायण (शालग्राम)-को पञ्चामृतसे स्नान करकर चन्दन आदि उपचारोंसे उनकी पूजा करनी चाहिये। पायस, अपूप, संयाव, दधि, दुग्ध, ऋतुफल, पुष्प, धूप, दीप तथा नैवेद्य आदिसे भक्तिपूर्वक भगवान्की पूजा करनी चाहिये। यदि वैभव रहे तो और अधिक उत्साह एवं समारोहसे पूजा करनी चाहिये। भगवान् भक्तिसे जितना प्रसन्न होते हैं, उतना विपुल द्रव्योंसे प्रसन्न नहीं होते। भगवान् सम्पूर्ण विश्वके स्वामी एवं आसकाम हैं, उन्हें किसी वस्तुकी आवश्यकता नहीं, केवल भक्तोंके द्वारा श्रद्धासे अर्पित की हुई वस्तुको वे ग्रहण करते हैं। इसीलिये दुर्घोधनके द्वारा की जानेवाली राजपूजाको छोड़कर भगवान्ने विदुरजीके आश्रममें आकर शाक-भाजी और पूजाको ग्रहण किया। सुदामाके तण्डुल-कणको स्वीकार कर भगवान्ने उन्हें मनुष्यके लिये सर्वथा दुर्लभ सम्पत्तियाँ प्रदान कर दीं। भगवान् केवल प्रीतिपूर्वक भक्तिकी ही अपेक्षा करते हैं। गोप, गृध्र, वणिक्, व्याध, हनुमान्, विभीषणके अतिरिक्त अन्य वृत्रासुर आदि दैत्य भी नारायणके सान्निध्यको प्राप्त कर उनके अनुग्रहसे आज भी आनन्दपूर्वक रह रहे हैं।
१- साधूनां समचिन्तानामुपकारवतां सताम् । न गोप्यं विद्यते किंचिदार्तानामार्तिनाशनम् ॥
(प्रतिसर्गपर्व २।२७।८)
२- न तुष्येदद्रव्यसम्भारैर्भक्त्या केवलया यथा । भगवान् परितः पूर्णो न मानं वृणुयात् क्वचित् ॥
दुर्घोधनकृतां त्यक्त्वा राजपूजां जनार्दनः । विदुरस्याश्रमे वासमातिथ्यं जगृहे विभुः ॥
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- प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खण्ड *
३१७
निषादपुत्र! मेरी बात सुनकर उस राजा चन्द्रचूड़ने पूजा-सामग्रियोंको एकत्रितकर आदरपूर्वक भगवान्की पूजा की; फलस्वरूप वे अपना नष्ट हुआ द्रव्य प्राप्तकर आज भी आनन्दित हो रहे हैं। इसलिये तुम भी भक्तिसे सत्यनारायणकी उपासना करो। इससे तुम इस लोकमें सुखको प्राप्त कर अन्तमें भगवान् विष्णुका सान्निध्य प्राप्त करोगे।
यह सुनकर वह निषाद कृतकृत्य हो गया। विप्रश्रेष्ठ शतानन्दको प्रणाम कर अपने घर जाकर उसने अपने साथियोंको भी हरि-सेवाका माहात्म्य बताया। उन सबने भी प्रसन्नचित्त हो श्रद्धापूर्वक यह प्रतिज्ञा की कि आज काष्ठको बेचकर हमलोगोंको जितना धन प्राप्त होगा, उससे अपने सभी बन्धु-
बान्धवोंके साथ श्रद्धा एवं विधिपूर्वक हम सत्यनारायणकी पूजा करेंगे। उस दिन उन्हें काष्ठ बेचनेसे पहलेकी अपेक्षा चौगुना धन मिला। घर आकर उन सबने सारी बात स्त्रियोंको बतायी और फिर सबने मिलकर आदरपूर्वक भगवान् सत्यनारायणकी पूजा की और कथाका श्रवण किया तथा भक्तिपूर्वक भगवान्का प्रसाद सबको वितरितकर स्वयं भी ग्रहण किया। पूजाके प्रभावसे पुत्र, पत्नी आदिसे समन्वित निषादगणोंने पृथ्वीपर द्रव्य और श्रेष्ठ ज्ञान-दृष्टिको प्राप्त किया। द्विजश्रेष्ठ! उन सबने यथेष्ट भोगोंका उपभोग किया और अन्तमें वे सभी योगिजनोंके लिये भी दुर्लभ वैष्णवधामको प्राप्त हुए। (अध्याय २७)
[ सत्यनारायणव्रत-कथाका चतुर्थ अध्याय ]
सत्यनारायणव्रतके प्रसंगमें साधु वणिक एवं जामाताकी कथा
सूतजी बोले—ऋषियो! अब मैं एक साधु वणिककी कथा कहता हूँ। एक बार भगवान् सत्यनारायणका भक्त मणिपूरक नगरका स्वामी महायशस्वी राजा चन्द्रचूड़ अपनी प्रजाओंके साथ व्रतपूर्वक सत्यनारायणभगवान्का पूजन कर रहा था, उसी समय रत्नपुर (रत्नसारपुर)-निवासी महाधनी साधु वणिक अपनी नौकाको धनसे परिपूर्ण कर नदी-तटसे यात्रा करता हुआ वहाँ आ पहुँचा। वहाँ उसने अनेक ग्रामवासियोंसहित मणि-मुक्तासे निर्मित तथा श्रेष्ठ वितानादिसे विभूषित पूजन-मण्डपको देखा, गीत-वाद्य आदिकी ध्वनि तथा वेदध्वनि भी वहाँ उसे सुनायी पड़ी। उस रम्य स्थानको देखकर साधु वणिकने अपने नाविकको
आदेश दिया कि यहाँपर नौका रोक दो। मैं यहाँके आयोजनको देखना चाहता हूँ। इसपर नाविकने वैसा ही किया। नावसे उतरकर उस वणिकने लोगोंसे जानकारी प्राप्त की और वह सत्यनारायण- भगवान्की कथा-मण्डपमें गया तथा वहाँ उसने उन सभीसे पूछा— 'महाशय! आपलोग यह कौन-सा पुण्यकार्य कर रहे हैं?' इसपर उन लोगोंने कहा— 'हमलोग अपने माननीय राजाके साथ भगवान् सत्यनारायणकी पूजा-कथाका आयोजन कर रहे हैं। इसी व्रतके अनुष्ठानसे इन्हें निष्कण्टक राज्य प्राप्त हुआ है। भगवान् सत्यनारायणकी पूजासे धनकी कामनावाला द्रव्य-लाभ, पुत्रकी कामनावाला उत्तम पुत्र, ज्ञानकी कामनावाला ज्ञान-दृष्टि प्राप्त
सुदाम्न्स्तपङ्कलकणा जग्ध्वा मानुष्यदुर्लभाः । सम्पदोऽदाद्धरिः प्रीत्या भक्तिमात्रमपेक्ष्यते ॥
गोपौ गृध्रो वणिग्व्याधो हनुमान् सविभीषणः । येऽन्ये पापात्मका दैत्या वृत्रकायाधवादयः ॥
नारायणान्तिकं प्राप्य मोदोऽद्यापि यद्दृशाः ।
(प्रतिसर्गपर्व २।२७।१५-१९)
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३१८
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
करता है और भयातुर मनुष्य सर्वथा निर्भय हो जाता है। इनकी पूजासे मनुष्य अपनी सभी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है।'
यह सुनकर उसने गलेमें वस्त्रको कई बार लपेटकर भगवान् सत्यनारायणको दण्डवत् प्रणाम कर सभासदोंको भी सादर प्रणाम किया और कहा—'भगवन्! मैं संततिहीन हूँ, अतः मेरा सारा ऐश्वर्य तथा सारा उद्यम सभी व्यर्थ है, हे कृपासागर! यदि आपकी कृपासे पुत्र या कन्या मैं प्राप्त करूँगा तो स्वर्णमयी पताका बनाकर आपकी पूजा करूँगा।' इसपर सभासदोंने कहा—'आपकी कामना पूर्ण हो।' तदनन्तर उसने भगवान् सत्यनारायण एवं सभासदोंको पुनः प्रणामकर प्रसाद ग्रहण किया और हृदयसे भगवान्का चिन्तन करता हुआ वह साधु वणिक् सबके साथ अपने घर गया। घर आनेपर माङ्गलिक द्रव्योंसे स्त्रियोंने उसका यथोचित स्वागत किया। साधु वणिक् अतिशय आश्चर्यके साथ मङ्गलमय अन्तःपुरमें गया। उसकी पतिव्रता पत्नी लीलावतीने भी उसकी स्त्रियोचित सेवा की। भगवान् सत्यनारायणकी कृपासे समय आनेपर बन्धु-बान्धवोंको आनन्दित करनेवाली तथा कमलके समान नेत्रोंवाली उसे एक कन्या उत्पन्न हुई। इससे साधु वणिक् अतिशय आनन्दित हुआ और उस समय उसने पर्याप्त धनका दान किया। वेदज्ञ ब्राह्मणोंको बुलाकर उसने कन्याके जातकर्म आदि मङ्गलकृत्य सम्पन्न किये। उस बालिकाकी जन्मकुण्डली बनवाकर उसका नाम कलावती रखा। कलानिधि चन्द्रमाकी कलाके समान वह कलावती नित्य बढ़ने लगी। आठ वर्षकी बालिका गौरी, नौ वर्षकी रोहिणी, दस वर्षकी कन्या तथा उसके आगे (अर्थात्) बारह वर्षकी बालिका
प्रीढ़ा या रजस्वला कहलाती है*। समयानुसार कलावती भी बढ़ते-बढ़ते विवाहके योग्य हो गयी। उसका पिता कलावतीको विवाह-योग्य जानकर उसके सम्बन्धकी चिन्ता करने लगा।
काञ्चनपुर नगरमें एक शंखपति नामका वणिक् रहता था। वह कुलीन, रूपवान्, सम्पत्तिशाली, शील और उदारता आदि गुणोंसे सम्पन्न था। अपनी पुत्रीके योग्य उस वरको देखकर साधु वणिक्ने शंखपतिका वरण कर लिया और शुभ लग्गमें अनेक माङ्गलिक उपचारोंके साथ अग्निके सानिध्यमें वेद, वाद्य आदि ध्वनियोंके साथ यथाविधि कन्या उसे प्रदान कर दी, साथ ही मणि, मोती, मूँगा, वस्त्राभूषण आदि भी उस साधु वणिक्ने मङ्गलके लिये अपनी पुत्री एवं जामाताको प्रदान किये। साधु वणिक् अपने दामादको अपने घरमें रखकर उसे पुत्रके समान मानता था और वह भी पिताके समान साधु वणिक्का आदर करता था। इस प्रकार बहुत समय बीत गया। साधु वणिक्ने भगवान् सत्यनारायणकी पूजा करनेका पहले यह संकल्प लिया था कि 'संतान प्राप्त होनेपर मैं भगवान् सत्यनारायणकी पूजा करूँगा' पर वह इस बातको भूल ही गया। उसने पूजा नहीं की।
कुछ दिनोंके बाद वह अपने जामाताके साथ व्यापारके निमित्त सुदूर नर्मदाके दक्षिण तटपर गया और वहाँ व्यापारनिरत होकर बहुत दिनोंतक ठहरा रहा। पर वहाँ भी उसने सत्यदेवकी किसी प्रकार भी उपासना नहीं की और परिणामस्वरूप भगवान्के प्रकोपका भाजन बनकर वह अनेक संकटोंसे ग्रस्त हो गया। एक समय कुछ चोरोंने एक निस्तब्ध रात्रिमें वहाँके राजमहलसे बहुत-सा द्रव्य तथा मोतीकी मालाको चुरा लिया।
- अष्टवर्षा भवेद्गौरी नववर्षा च रोहिणी॥
दशवर्षा भवेत् कन्या ततः प्रीढ़ा रजस्वला। (प्रतिसर्गपर्व २।२८।२१-२२)
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- प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खण्ड *
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राजाने चोरीकी बात ज्ञात होनेपर अपने राजपुरुषोंको बुलाकर बहुत फटकारा और कहा कि 'यदि तुमलोगोंने चोरोंका पता लगाकर सारा धन यहाँ दो दिनोंमें उपस्थित नहीं किया तो तुम्हारी असावधानीके लिये तुम्हें मृत्यु-दण्ड दिया जायगा।' इसपर राजपुरुषोंने सर्वत्र व्यापक छान-बीन की, परंतु बहुत प्रयत्न करनेपर भी वे उन चोरोंका पता नहीं लगा सके। फिर वे सभी एकत्रित होकर विचार करने लगे—'अहो! बड़े कष्टकी बात है, चोर तो मिला नहीं, धन भी नहीं मिला, अब राजा हमलोगोंको परिवारके साथ मार डालेगा। मरनेपर भी हमें प्रेत-योनि प्राप्त होगी। इसलिये अब तो यही श्रेयस्कर है कि 'हमलोग पवित्र नर्मदा नदीमें डूबकर मर जायँ। क्योंकि नर्मदाके प्रभावसे हमें शिवलोककी प्राप्ति होगी।' वे सभी राजपुरुष आपसमें ऐसा निश्चयकर नर्मदा नदीके तटपर गये। वहाँ उन्होंने उस साधु वणिकको देखा और उसके कण्ठमें मोतीकी माला भी देखी। उन्होंने उस साधु वणिकको ही चोर समझ लिया और वे सभी प्रसन्न होकर उन दोनों (साधु
वणिक और उसके जामाता)-को धनसहित पकड़कर राजाके पास ले आये। भगवान् सत्यनारायण भी पूजा करनेमें असत्यका आश्रय लेनेके कारण वणिकके प्रतिकूल हो गये थे। इसी कारण राजाने भी विचार किये बिना ही अपने सेवकोंको आदेश दिया कि इनकी सारी सम्पत्ति जब्त कर खजानेमें जमा कर दो और इन्हें हथकड़ी लगाकर जेलमें डाल दो। सेवकोंने राजाज्ञाका पालन किया। वणिककी बातोंपर किसीने कुछ भी ध्यान नहीं दिया। अपने जामाताके साथ वह वणिक अत्यन्त दुःखित हुआ और विलाप करने लगा—'हा पुत्र! मेरा धन अब कहाँ चला गया, मेरी पुत्री और पत्नी कहाँ हैं? विधाताकी प्रतिकूलता तो देखो। हम दुःख-सागरमें निमग्न हो गये। अब इस संकटसे हमें कौन पार करेगा? मैंने धर्म एवं भगवान्के विरुद्ध आचरण किया। यह उन्हीं कर्मोंका प्रभाव है।' इस प्रकार विलाप करते हुए वे ससुर और जामाता कई दिनोंतक जेलमें भीषण संतापका अनुभव करते रहे।
(अध्याय २८)
[ सत्यनारायणव्रत-कथाका पञ्चम अध्याय ]
सत्य-धर्मके आश्रयसे सबका उद्धार
(लीलावती एवं कलावतीकी कथा)
सूतजीने कहा—ऋषियो! आध्यात्मिक, आधिदैविक तथा आधिभौतिक—इन तीनों तापोंको हरण करनेवाले भगवान् विष्णुके मङ्गलमय चरित्रको जो सुनते हैं, वे सदा हरिके धाममें निवास करते हैं, किंतु जो भगवान्का आश्रय नहीं ग्रहण करते—उन्हें विस्मृत कर देते हैं, उन्हें कष्टमय नरक प्राप्त होता है। भगवान् विष्णुकी पत्नीका नाम कमला (लक्ष्मी) है। इनके चार पुत्र हैं—धर्म, यज्ञ, राजा और चोर। ये सभी लक्ष्मी-प्रिय हैं अर्थात् ये लक्ष्मीकी
इच्छा करते हैं। ब्राह्मणों और अतिथियोंको जो दान दिया जाता है, वह धर्म कहा जाता है, उसके लिये धनकी आवश्यकता है। स्वाहा और स्वधाके द्वारा जो देवयज्ञ और पितृयज्ञ किया जाता है, वह यज्ञ कहा जाता है, उसमें भी धनकी अपेक्षा होती है। धर्म और यज्ञकी रक्षा करनेवाला राजा कहलाता है, इसलिये राजाको भी लक्ष्मी—धनकी अपेक्षा रहती है। धर्म और यज्ञको नष्ट करनेवाला चोर कहलाता है, वह भी धनकी इच्छासे चोरी करता
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
है। इसलिये ये चारों किसी-न-किसी रूपमें लक्ष्मीके किंकर हैं। परंतु जहाँ सत्य रहता है, वहीं धर्म रहता है और वहीं लक्ष्मी भी स्थिररूपमें रहती हैं।
वह वणिक् सत्य-धर्मसे च्युत हो गया था (उसने सत्यनारायणका व्रत न कर प्रतिज्ञाभंग की थी)। इसीलिये राजाने उस वणिक्के घरसे भी सारा धन हरण करवा लिया और घरमें चोरी भी हो गयी। बेचारी उसकी पत्नी लीलावती एवं पुत्री कलावतीके साथ अपने वस्त्र-आभूषण तथा मकान बेचकर जैसे-तैसे जीवन-यापन करने लगी।
एक दिन उसकी कन्या कलावती भूखसे व्याकुल होकर किसी ब्राह्मणके घर गयी और वहाँ उसने ब्राह्मणको भगवान् सत्यनारायणकी पूजा करते हुए देखा। जगन्नाथ सत्यदेवकी प्रार्थना करते हुए देखकर उसने भी भगवान्से प्रार्थना की—‘हे सत्यनारायणदेव! मेरे पिता और पति यदि घरपर आ जायेंगे तो मैं भी आपकी पूजा करूँगी।’ उसकी बात सुनकर ब्राह्मणोंने कहा—‘ऐसा ही होगा।’ इस प्रकार ब्राह्मणोंसे आश्वसनयुक्त आशीर्वाद प्राप्तकर वह अपने घर वापस आ गयी। रात्रिमें देरसे लौटनेके कारण माताने उससे डाँटते हुए पूछा कि ‘बेटी! इतनी राततक तुम कहाँ रही?’ इसपर उसने उसे प्रसाद देते हुए सत्यनारायणके पूजा-वृत्तान्तको बताया और कहा—‘माँ! मैंने वहाँ सुना कि भगवान् सत्यनारायण कलियुगमें प्रत्यक्ष फल देनेवाले हैं, उनकी पूजा मनुष्यगण सदा करते हैं। माँ! मैं भी उनकी पूजा करना चाहती हूँ, तुम मुझे आज्ञा प्रदान करो। मेरे पिता और स्वामी अपने घर आ जायें, यही मेरी कामना है।’
रातमें ऐसा मनमें निश्चयकर प्रातः वह कलावती शीलपाल नामक एक वणिक्के घरपर धन प्राप्त करनेकी इच्छासे गयी और उसने कहा—‘बन्धो! थोड़ा धन दें, जिससे मैं भगवान् सत्यनारायणकी
पूजा कर सकूँ।’ यह सुनकर शीलपालने उसे पाँच अशर्पिर्याँ दीं और कहा—‘कलावती! तुम्हारे पिताका कुछ ऋण शेष था, मैं उन्हें ही वापस कर रहा हूँ, इसे देकर आज मैं उन्मूल हो गया।’ यह कहकर शीलपाल गया-तीर्थमें श्राद्ध करने चला गया। कन्याने अपनी माँ लीलावतीके साथ उस द्रव्यसे कल्याणप्रद सत्यनारायणव्रतका श्रद्धा-भक्तिसे विधिपूर्वक अनुष्ठान किया। इससे सत्यनारायण- भगवान् संतुष्ट हो गये।
उधर नर्मदा-तटवासी राजा अपने राजमहलमें सो रहा था। रात्रिके अन्तिम प्रहरमें ब्राह्मण-वेषधारी भगवान् सत्यनारायणने स्वप्नमें उससे कहा—‘राजन्! तुम शीघ्र उठकर उन निर्दोष वणिकोंको बन्धनमुक्त कर दो। वे दोनों बिना अपराधके ही बंदी बना लिये गये हैं। यदि तुम ऐसा नहीं करोगे तो तुम्हारा कल्याण नहीं होगा।’ इतना कहकर वे अन्तर्हित हो गये। राजा निद्रासे सहसा जग उठा। वह परमात्माका स्मरण करने लगा। प्रातःकाल राजा अपनी सभामें आया और उसने अपने मन्त्रीसे देखे गये स्वप्नका फल पूछा। महामन्त्रीने भी राजासे कहा—‘राजन्! बड़े आश्चर्यकी बात है, मुझे भी आज ऐसा ही स्वप्न दिखलायी पड़ा। अतः उस वणिक् और उसके जामाताको बुलाकर भलीभाँति पूछ-ताछ कर लेनी चाहिये।’ राजाने उन दोनोंको बंदी-गृहसे बुलवाया और पूछा—‘तुम दोनों कहाँ रहते हो और तुम कौन हो?’ इसपर साधु वणिक्ने कहा—‘राजन्! मैं रत्नपुरका निवासी एक वणिक् हूँ। मैं व्यापार करनेके लिये यहाँ आया था, पर दैववश आपके सेवकोंने हमें चोर समझकर पकड़ लिया। साथमें यह मेरा जामाता है। बिना अपराधके ही हमें मणि-मुक्ताकी चोरी लगी है। राजेन्द्र! हम दोनों चोर नहीं हैं। आप भलीभाँति विचार कर लें।’
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- प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खण्ड *
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उसकी बातें सुनकर राजाको बड़ा पश्चाताप हुआ। उन्होंने उन्हें बन्धनमुक्त कर दिया। अनेक प्रकारसे उन्हें अलंकृत कर भोजन कराया और वस्त्र, आभूषण आदि देकर उनका सम्मान किया। साधु वणिकने कहा—‘राजन्! मैंने कारागारमें अनेक कष्ट भोगे हैं, अब मैं अपने नगर जाना चाहता हूँ, आप मुझे आज्ञा दें।’ इसपर राजाने अपने कोषाध्यक्षके माध्यमसे साधु वणिककी नौका रलों आदिसे परिपूर्ण करवा दी। फिर वह साधु वणिक अपने जामाताके साथ राजाद्वारा सम्मानित हो द्विगुणित धन लेकर रत्नपुरकी ओर चला।
साधु वणिकने अपने नगरके लिये प्रस्थान किया, पर भगवान् सत्यनारायणका पूजन वह उस समय भी भूल गया। भगवान् सत्यदेवने जो कलियुगमें तत्काल फल देते हैं, पुनः तपस्वीका रूप धारणकर वहाँ आकर उससे पूछा—‘साधो! तुम्हारी इस नौकामें क्या है?’ इसपर साधु वणिकने उत्तर दिया—‘आपको देनेके लिये कुछ भी धन मेरे पास नहीं है। नावमें केवल कुछ लताओंके पत्ते भरे पड़े हैं।’ साधु वणिकके ऐसा कहनेपर तपस्वीने कहा—‘ऐसा ही होगा।’ इतना कहकर तपस्वी अन्तर्धान हो गये। उनके ऐसा कहते ही नौकामें धनके बदले केवल पत्ते ही दीखने लगे। यह सब देखकर साधु अत्यन्त चकित एवं चिन्तित हो गया, उसे मूच्छा-सी आ गयी। वह अनेक प्रकारसे विलाप करने लगा। वज्रपात होनेके समान वह स्तब्ध होकर सोचने लगा कि मैं अब क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? मेरा धन कहाँ चला गया? जामाताके समझाने-बुझानेपर इसे तपस्वीका शाप समझकर वह पुनः उन्हीं तपस्वीकी शरणमें गया और गलेमें कपड़ा लपेटकर उन तपस्वीको प्रणाम कर कहा—‘महाभाग! आप कौन हैं? कोई गन्धर्व हैं या देवता हैं अथवा साक्षात् परमात्मा हैं?’
प्रभो! मैं आपकी महिमाको लेशमात्र भी नहीं जानता। आप मेरे अपराधोंको क्षमा कर दें और मेरी नौकाके धनको पुनः पूर्ववत् कर दें।’ इसपर तपस्वीरूप भगवान् सत्यनारायणने कहा कि तुमने चन्द्रचूड राजाके सत्यनारायणके मण्डपमें ‘संततिके प्राप्त होनेपर भगवान् सत्यदेवकी पूजा करूँगा’—ऐसी प्रतिज्ञा की थी। तुम्हें कन्या प्राप्त हुई, उसका विवाह भी तुमने किया, व्यापारसे धन भी प्राप्त किया, बंदी-गृहसे तुम मुक्त भी हो गये, पर तुमने भगवान् सत्यनारायणकी पूजा कभी नहीं की। इससे मिथ्याभाषण, प्रतिज्ञालोप और देवताकी अवज्ञा आदि अनेक दोष हुए, तुम भगवान्का स्मरणतक भी नहीं करते। इसी कारण है मूढ़! तुम कष्ट भोग रहे हो। सत्यनारायणभगवान् सर्वव्यापी हैं, वे सभी फलोंको देनेवाले हैं। उनका अनादर कर तुम कैसे सुख प्राप्त कर सकते हो। तुम भगवान्को याद करो, उनका स्मरण करो। इसपर साधु वणिकको भगवान् सत्यनारायणका स्मरण हो आया और वह पश्चाताप करने लगा। उसके देखते-ही-देखते वहाँ वे तपस्वी भगवान् सत्यनारायणरूपमें परिवर्तित हो गये और तब वह उनकी इस प्रकार स्तुति करने लगा—
‘सत्यस्वरूप, सत्यसंध, सत्यनारायण भगवान् हरिको नमस्कार है। जिस सत्यसे जगत्की प्रतिष्ठा है, उस सत्यस्वरूप आपको बार-बार नमस्कार है। भगवन्! आपकी मायासे मोहित होनेके कारण मनुष्य आपके स्वरूपको जान नहीं पाता और इस दुःखरूपी संसार-समुद्रको सुख मानकर उसीमें लिस रहता है। धनके गर्वसे मैं मूढ़ होकर मदान्धकारसे कर्तव्य और अकर्तव्यकी दृष्टिसे शून्य हो गया। मैं अपने कल्याणको भी नहीं समझ पा रहा हूँ। मेरे दौरात्म्य-भावके लिये आप क्षमा करें। हे तपोनिधे! आपको नमस्कार है। कृपासागर! आप
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
मुझे अपने चरणोंका दास बना लें, जिससे मुझे आपके चरण-कमलोंका नित्य स्मरण होता रहे*।'
इस प्रकार स्तुति कर उस साधु वणिकने एक लाख मुद्रासे पुरोहितके द्वारा घर आकर सत्यनारायणकी पूजा करनेके लिये प्रतिज्ञा की। इसपर भगवानने प्रसन्न होकर कहा—'वत्स! तुम्हारी इच्छा पूर्ण होगी, तुम पुत्र-पौत्रसे समन्वित होकर श्रेष्ठ भोगोंको भोगकर मेरे सत्यलोकको प्राप्त करोगे और मेरे साथ आनन्द प्राप्त करोगे।' यह कहकर भगवान् सत्यनारायण अन्तर्हित हो गये और साधुने पुनः अपनी यात्रा प्रारम्भ की।
सत्यदेवभगवान्से रक्षित हो वह साधु वणिक एक सप्ताहमें नगरके समीप पहुँच गया और उसने अपने आगमनका समाचार देनेके लिये घरपर दूत भेजा। दूतने घर आकर साधु वणिककी स्त्री लीलावतीसे कहा—'जामाताके साथ सफलमनोरथ साधु वणिक आ रहे हैं।' वह साध्वी लीलावती कन्याके साथ सत्यनारायणभगवान्की पूजा कर रही थी। पतिके आगमनको सुनकर उसने पूजा वहींपर छोड़ दी और पूजाका शेष दायित्व अपनी पुत्रीको सौंपकर वह शीघ्रतासे नौकाके समीप चली आयी। इधर कलावती भी अपनी सखियोंके साथ सत्यनारायणकी जैसे-तैसे पूजा समाप्त कर बिना प्रसाद लिये ही अपने पतिको देखनेके लिये उतावली हो नौकाकी ओर चली गयी।
भगवान् सत्यनारायणके प्रसादके अपमानसे जामातासहित साधु वणिककी नौका जलके मध्य अलक्षित हो गयी। यह देखकर सभी दुःखमें निमग्न हो गये। साधु वणिक भी मूर्च्छित हो
गया। कलावती भी यह देखकर मूर्च्छित हो पृथ्वीपर गिर पड़ी और उसका सारा शरीर आँसुओंसे भीग गया। वह हवाके वेगसे हिलते हुए कैलेके पत्तेके समान काँपने लगी। हा नाथ! हा कान्त! कहकर विलाप करने लगी और कहने लगी—'हे विधाता! आपने मुझे पतिते वियुक्त कर मेरी आशा तोड़ दी। पतिके बिना स्त्रीका जीवन अधूरा एवं निष्फल है।' कलावती आर्तस्वरमें भगवान् सत्यनारायणसे बोली—'हे सत्यसिन्धो! हे भगवान् सत्यनारायण! मैं अपने पतिके वियोगमें जलमें डूबनेवाली हूँ, आप मेरे अपराधोंको क्षमा करें। पतिको प्रकट कर मेरे प्राणोंकी रक्षा करें।' (इस प्रकार जब वह अपने पतिके पादुकाओंको लेकर जलमें प्रवेश करनेवाली ही थी) उसी समय आकाशवाणी हुई—'हे साधो! तुम्हारी पुत्रीने मेरे प्रसादका अपमान किया है। यदि वह पुनः घर जाकर श्रद्धापूर्वक प्रसादको ग्रहण कर ले तो उसका पति नौकासहित यहाँ अवश्य दीखेगा, चिन्ता मत करो।' इसपर आश्चर्यचकित हो कलावतीने वैसा ही किया और उसे उसका पति पुनः अपनी नौकासहित दीखने लगा। फिर क्या था? सभी परस्पर आनन्दसे मिले और घर आकर साधु वणिकने एक लाख मुद्राओंसे बड़े समारोहपूर्वक भगवान् सत्यदेवकी पूजा की और आनन्दसे रहने लगा। पुनः कभी भगवान् सत्यदेवकी उपेक्षा नहीं की। उस व्रतके प्रभावसे पुत्र-पौत्रसमन्वित अनेक भोगोंका उपभोग करते हुए सभी स्वर्गलोक चले गये। इस इतिहासको जो मनुष्य भक्तिपूर्वक सुनता है, वह भी विष्युका
- सत्यरूपं सत्यसन्मं सत्यनारायणं हरिम् । यत्सत्यत्वेन जगतस्तं सत्यं त्वां नमाम्यहम् ॥ त्वन्मायामोहितात्मानो न पश्यन्त्यात्मनः शुभम् । दुःखाम्भोधी सदा मग्न दुःखे च सुखमानिनः ॥ मूढोऽहं धनगर्वेण मदान्धीकृतलोचनः । न जाने स्वात्मनः क्षेत्रं कथं पश्यामि मूढधीः ॥ क्षमस्व मम दौरात्यं तपोधाम्ने हरे नमः । आज्ञापयात्मादस्य मे येन ते चरणौ स्मरे ॥
(प्रतिसर्गपर्व २।२९।४८-५९)
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- प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खण्ड *
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अत्यन्त प्रिय हो जाता है। अपनी मनःकामनाकी सिद्धि प्राप्त कर लेता है।
सूतजी बोले—ऋषिगणो! मैंने सभी व्रतोंमें
श्रेष्ठ इस सत्यनारायणव्रतको कहा। ब्राह्मणके मुखसे निकला हुआ यह व्रत कलिकालमें अतिशय पुण्यप्रद है। (अध्याय २९)
[ श्रीसत्यनारायणव्रत-कथाका षष्ठ अध्याय ]
( सत्यनारायणव्रत-कथा सम्पूर्ण )
पितृशर्मा और उनके वंशज—व्याडि, पाणिनि और वररुचि आदिकी कथा
ऋषियोंने कहा—भगवन्! तीनों दुःखोंके विनाश करनेवाले व्रतोंमें सर्वश्रेष्ठ सत्यनारायणव्रतको हमलोगोंने सुना, अब आपसे हमलोग ब्रह्मचर्यका महत्त्व सुनना चाहते हैं।
सूतजी बोले—ऋषियो! कलियुगमें पितृशर्मा नामका एक श्रेष्ठ ब्राह्मण था। वह वेदवेदाङ्गोंके तत्त्वोंको जाननेवाला था और पापकर्मोंसे डरता रहता था। कलियुगके भयंकर समयको देखकर वह बहुत चिन्तित हुआ। उसने सोचा कि किस आश्रमके द्वारा मेरा कल्याण होगा, क्योंकि कलिकालमें संन्यास-मार्ग दम्भ और पाखण्डके द्वारा खण्डित हो गया है, वानप्रस्थ तो समाप्त-सा ही है, बस, कहीं-कहीं ब्रह्मचर्य रह गया है, किंतु गार्हस्थ्य-जीवनका कर्म सभी कर्मोंमें श्रेष्ठ माना गया है। अतः इस घोर कलियुगमें मुझे गृहस्थ-धर्मका पालन करनेके लिये विवाह करना चाहिये। यदि भाग्यसे अपनी मनोवृत्तिके अनुसार आचरण करनेवाली स्त्री मिल जाती है, तब मेरा जन्म सफल एवं कल्याणकारी हो जायगा। इस प्रकार विचार करते हुए पितृशर्मोंने उत्तम पत्नी प्राप्त करनेके लिये विश्वेश्वरी जगन्माता भगवतीकी चन्दन आदिसे पूजा कर स्तुति प्रारम्भ की*।
पितृशर्माकी स्तुति सुनकर देवी प्रसन्न हो गयीं और उन्होंने कहा—‘हे द्विजश्रेष्ठ! मैंने तुम्हारी स्त्रीके रूपमें विष्णुयशा नामक ब्राह्मणकी कन्याको निर्दिष्ट किया है।’ तदनन्तर पितृशर्मा उस देवी ब्रह्मचारिणीसे विवाह करके मथुरामें निवास करते हुए गृहस्थ-धर्मानुसार जीवन-यापन करने लगा। चारों वेदोंको जाननेवाले उसे चार पुत्र उत्पन्न हुए। जिनके नाम थे—ऋक्, यजुष्, साम तथा अथर्व। ऋक्के पुत्र व्याडि थे, जो न्याय-शास्त्र-विशारद थे। यजुष्के पुत्र लोकविश्रुत मीमांस हुए। सामके पुत्र पाणिनि हुए जो व्याकरण-शास्त्रमें पारंगत थे और अथर्वके पुत्र वररुचि हुए।
एक समय वे चारों पितृशर्माके साथ मगध देशके अधिपति राजा चन्द्रगुप्तकी सभामें गये। अतिशय सम्मानपूर्वक राजाने उन लोगोंका पूजन कर पूछा—‘द्विजगण! कौन-सा ब्रह्मचर्यव्रत श्रेष्ठ है?’ इसपर व्याडिने कहा—‘महाराज! जो व्यक्ति उस परम पुरुषदेवकी न्यायपूर्वक आराधनामें तत्पर रहता है, वह श्रेष्ठ ब्रह्मचारी है।’ मीमांसने कहा—‘राजन्! जो श्रेष्ठ व्यक्ति यज्ञमें ब्रह्मा आदि देवताओंका यजन करता है और रोचना आदिसे उनका अर्चन एवं तर्पण आदि करता है तथा
- नमः प्रकृत्यै सर्वायै कैवल्यायै नमो नमः । त्रिगुणैक्यस्वरूपायै तुरीयायै नमो नमः ॥ महतत्त्वजनन्यै च द्रुहृकत्र्यै नमो नमः । ब्रह्मातर्नमस्तुभ्यै साहकारपितामहि ॥ पृथगुणायै शुद्धायै नमो मातर्नमो नमः । विद्यायै शुद्धसत्त्वायै लक्ष्यै सत्वरजोमयि ॥ नमो मातरविद्यायै ततः शुद्ध्यै नमो नमः । काल्यै सत्त्वतमोभूत्यै नमो मातर्नमो नमः ॥ स्त्रियै शुद्धरजोमूर्त्यै नमस्त्रैलोक्यवासिनि । नमो रजस्तमोमूर्त्यै दुर्गायै च नमो नमः ॥ (प्रतिसर्गपर्व २।३०।१०-१४)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
भगवान् के प्रसादको ग्रहण करता है, वह ब्रह्मचारी है।' यह सुनकर पाणिनिने कहा—'राजन्! उदात्त, अनुदात्त और स्वरित स्वरोंसे या परा, पश्यन्ती, मध्यमा वाणीसे शब्दब्रह्मका आराधक तथा लिङ्ग, धातु एवं गणोंसे समन्वित सूत्रपाठोंसे शब्दब्रह्मकी आराधना करनेवाला सच्चा ब्रह्मचारी है और वही ब्रह्मको प्राप्त करता है।' यह सुनकर वररुचिने कहा—'हे मगधाधिपते! जो व्यक्ति उपनीत होकर गुरुकुलमें निवास करता हुआ दण्ड, केश और नखधारी भिक्षार्थी वेदाध्ययनमें तत्पर रहते हुए गुरुकी आज्ञाके अनुसार गुरुके गृहमें निवास करता है, वह ब्रह्मचारी कहा गया है।'
इनके वचनोंको सुनकर पितृशर्मा ने कहा कि
'जो गृहस्थ-धर्ममें रहता हुआ पितरों, देवताओं और अतिथियोंका सम्मान करता है और इन्द्रिय-संयमपूर्वक ऋतुकालमें ही भार्याका उपगमन करता है, वही मुख्य ब्रह्मचारी है।' यह सुनकर राजाने कहा—'स्वामिन्! कलिकालके लिये आपका ही कथन उचित, सुगम और उत्तम धर्म है, यही मेरा भी मत है।'
यह कहकर वह राजा पितृशर्माका शिष्य हो गया और उसने अन्तमें स्वर्गलोकको प्राप्त किया। पितृशर्मा भी भगवान् श्रीहरिका ध्यान करते हुए हिमालय पर्वतपर जाकर योगध्यानपरायण हो गया।
(अध्याय ३०)
महर्षि पाणिनिका इतिवृत्त
ऋषियोंने पूछा—भगवन्! सभी तीर्थों, दानों आदि धर्मसाधनोंमें उत्तम साधन क्या है, जिसका आश्रय लेकर मनुष्य क्लेश-सागरको पार कर जाय और मुक्ति प्राप्त कर ले?
सूतजी बोले—प्राचीन कालमें सामके एक श्रेष्ठ पुत्र थे, जिनका नाम पाणिनि था। कणादके श्रेष्ठ शास्त्रज्ञ शिष्योंसे वे पराजित एवं लज्जित होकर तीर्थटनके लिये चले गये। प्रायः सभी तीर्थोंमें स्नान तथा देवता-पितरोंका तर्पण करते हुए वे केदार-क्षेत्रका जल पानकर भगवान् शिवके ध्यानमें तत्पर हो गये। पत्तोंके आहारपर रहते हुए वे सप्ताहान्तमें जल ग्रहण करते थे। फिर उन्होंने दस दिनतक जल ही ग्रहण किया। बादमें वे दस दिनोंतक केवल वायुके ही आहारपर रहकर भगवान् शिवका ध्यान करते रहे। इस प्रकार जब अट्टाईस दिन व्यतीत हो गये तो भगवान् शिवने प्रकट
होकर उनसे वर माँगनेको कहा। भगवान् शिवकी इस अमृतमय वाणीको सुनकर उन्होंने गद्गद् वाणीसे सर्वेश्वर, सर्वलिङ्गेश्वर, गिरिजावल्लभ हरकी इस प्रकार स्तुति की—
'महान् रुद्रको नमस्कार है। सर्वेश्वर सर्वहितकारी भगवान् शिवको नमस्कार है। अभय एवं विद्या प्रदान करनेवाले, नन्दीवाहन भगवान् को नमस्कार है। पापका विनाश करनेवाले तथा समस्त लोकोंके स्वामी एवं समस्त मायारूपी दुःखोंका हरण करनेवाले तेजःस्वरूप अनन्तमूर्ति भगवान् शंकरको नमस्कार है*।' देवेश! यदि आप प्रसन्न हैं तो मुझे मूल विद्या एवं परम शास्त्र-ज्ञान प्रदान करनेकी कृपा करें।
सूतजी बोले—यह सुनकर महादेवजीने प्रसन्न होकर 'अ इ उ ण्' आदि मङ्गलकारी सर्ववर्णमय सूत्रोंको उन्हें प्रदान किया। ज्ञानरूपी सरोवरके
- नमो रुद्राय महते सर्वशाय हितैषिणे । नन्दीसंस्थाय देवाय विद्याभयकराय च ॥
पापान्तकाय भार्याय नमोऽनन्ताय वैधसे । नमो मायाहरेणाय नमस्ते लोकशंकर ॥ (प्रतिसर्गपर्व २।३१।७-८)
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- प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खण्ड *
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सत्यरूपी जलसे जो राग-द्वेषरूपी मलका नाश करनेवाला है, उस मानसतीर्थको प्राप्त करनेपर अर्थात् उस मानसतीर्थमें अवगाहन करनेपर सभी तीर्थोंका फल प्राप्त हो जाता है। यह महान् मानस-ज्ञान-तीर्थ ब्रह्मके साक्षात्कार करानेमें समर्थ है। पाणिने ! मैंने यह सर्वोत्तम तीर्थ तुम्हें प्रदान किया है, इससे तुम कृतकृत्य हो जाओगे। यह कहकर भगवान् रुद्र अन्तर्हित हो गये और पाणिनि अपने
घरपर आ गये। पाणिनिने सूत्रपाठ, धातुपाठ, गणपाठ और लिङ्गसूत्र-रूप व्याकरण शास्त्रका निर्माण कर परम निर्वाण प्राप्त किया*। अतः भार्गवश्रेष्ठ ! तुम मनोमय ज्ञानतीर्थका अवलम्बन करो। उन्हींसे कल्याणमयी सर्वोत्तम तीर्थमयी गङ्गा प्रकट हुई हैं। गङ्गासे बढ़कर उत्तम तीर्थ न कोई हुआ है और न आगे होगा।
(अध्याय ३१)
बोपदेवके चरित्र-प्रसंगमें श्रीमद्भागवत-माहात्म्य
सूतजी बोले—महामुने शौनक ! तोताद्रिमें एक बोपदेव नामके ब्राह्मण रहते थे। वे कृष्णभक्त और वेद-वेदाङ्गपारंगत थे। उन्होंने गोप-गोपियोंसे प्रतिष्ठित वृन्दावन-तीर्थमें जाकर देवाधिदेव जनार्दनकी आराधना की। एक वर्ष बाद भगवान् श्रीहरिने प्रसन्न होकर उन्हें अतिशय श्रेष्ठ ज्ञान प्रदान किया। उसी ज्ञानके द्वारा उनके हृदयमें भागवती कथाका उदय हुआ। जिस कथाको श्रीशुकदेवजीने बुद्धिमान् राजा परीक्षितको सुनाया था, उस सनातनी मोक्ष-स्वरूपा कथाका बोपदेवने हरि-लीलामृत नामसे पुनः वर्णन किया। कथाकी समाप्तिपर जनार्दन भगवान् विष्णु प्रकट हुए और बोले 'महामते ! वर माँगो।' बोपदेवने अतिशय स्नेहमयी वाणीमें कहा—'भगवन् ! आपको नमस्कार है। आप सम्पूर्ण संसारपर अनुग्रह करनेवाले हैं। आपसे देव, मनुष्य, पशु-पक्षी सभी निर्मित हुए हैं। नरकसे दुःखी प्राणी भी इस कलियुगमें आपके ही नामसे कृतार्थ होते हैं। महर्षि वेदव्यासरचित श्रीमद्भागवतका ज्ञान तो आपने मुझे प्रदान किया है, पुनः यदि आप वर प्रदान करना चाहते हैं तो
उस भागवतका माहात्म्य मुझसे कहें।'
श्रीभगवान् बोले—बोपदेव ! एक समय भगवान् शंकर पार्वतीके साथ दम्भ और पाखण्डसे युक्त बौद्धोंके राज्य प्राप्त होनेपर काशीमें उत्तम भूमि देखकर वहाँ स्थित हो गये। भगवान् शंकरने आनन्दपूर्वक प्रणाम करते हुए कहा—'हे सच्चिदानन्द ! हे विभो ! हे जगत्को आनन्द प्रदान करनेवाले ! आपकी जय हो।' इस प्रकारकी वाणी सुनकर पार्वतीने भगवान् शंकरसे पूछा—'भगवन् ! आपके समान दूसरा अन्य देवता कौन है जिसे आपने प्रणाम किया।' इसपर भगवान् शिवने कहा—'महादेवि ! यह काशी परम पवित्र क्षेत्र है, यह स्वयं सनातन ब्रह्मस्वरूप है, यह प्रणाम करने योग्य है। यहाँ मैं ससाह-यज्ञ (भागवत-ससाह-यज्ञ) करूँगा।' उस यज्ञ-स्थलकी रक्षाके लिये भगवान् शंकरने चण्डीश, गणेश, नन्दी तथा गुह्यकोंको स्थापित किया और स्वयं ध्यानमें स्थित होकर माता पार्वतीसे सात दिनतक भागवती कथा कहते रहे। आठवें दिन पार्वतीको सोते देखकर उन्होंने पूछा कि 'तुमने कितनी कथा
- सूत्रपाठ धातुपाठ गणपाठ तथैव च। लिङ्गसूत्र तथा कृत्वा परं निर्वाणमाप्तवान्॥
(प्रतिसर्गपर्व २।३१।१३-१४)
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३२६
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
सुनी।' उन्होंने कहा—'देव! मैंने अमृत-मन्थनपर्यन्त विष्णुचरित्रका श्रवण किया।' इसी कथाको वहीं वृक्षके कोटरमें स्थित शुकरूपी शुकदेव सुन रहे थे। अमृत-कथाके श्रवणसे वे अमर हो गये। मेरी इस आज्ञासे वह शुक् साक्षात् तुम्हारे हृदयमें स्थित है। बौपदेव! तुमने इस दुर्लभ भागवत-माहात्म्यको मेरे द्वारा प्राप्त किया है। अब तुम
जाकर राजा विक्रमके पिता गन्धर्वसेनको नर्मदाके तटपर इसे सुनाओ। हरि-माहात्म्यका दान करना सभी दानोंमें उत्तम दान है। इसे विष्णुभक्त बुद्धिमान् सत्पात्रको ही सुनाना चाहिये। भूखेको अन्न-दान करना भी इसके समान दान नहीं है। यह कहकर भगवान् श्रीहरि अन्तर्हित हो गये और बौपदेव बहुत प्रसन्न हो गये। (अध्याय ३२)
श्रीदुर्गासप्तशतीके आदिचरित्रका माहात्म्य
(व्याधकर्मकी कथा)
ऋषियोंने पूछा —सूतजी महाराज! अब आप हमलोगोंको यह बतलानेकी कृपा करें कि किस स्तोत्रके पाठ करनेसे वेदोंके पाठ करनेका फल प्राप्त होता है और पाप विनष्ट होते हैं।
सूतजी बोले —ऋषियो! इस विषयमें आप एक कथा सुनें। राजा विक्रमादित्यके राज्यमें एक ब्राह्मण रहता था। उसकी स्त्रीका नाम था कामिनी। एक बार वह ब्राह्मण श्रीदुर्गासप्तशतीका पाठ करनेके लिये अन्यत्र गया हुआ था। इधर उसकी स्त्री कामिनी जो अपने नामके अनुरूप कर्म करनेवाली थी, पतिके न रहनेपर निन्दित कर्ममें प्रवृत्त हो गयी। फलतः उसे एक निन्द्य पुत्र उत्पन्न हुआ, जो व्याधकर्म नामसे प्रसिद्ध हुआ। वह भी अपने नामके अनुरूप कर्म करनेवाला था, धूर्त था तथा वेद-पाठसे रहित था। उस ब्राह्मणने अपनी स्त्री एवं पुत्रके निन्दित कर्म और पापमय आचरणको देखकर उन दोनोंको घरसे निकाल दिया तथा स्वयं धर्ममें तत्पर रहते हुए विन्ध्याचल पर्वतपर प्रतिदिन चण्डीपाठ करने लगा। जगदम्बाके अनुग्रहसे अन्तमें वह जीवन्मुक्त हो गया।
इधर वे दोनों माता-पुत्र (कामिनी और
व्याधकर्म) पूर्वपरिचित निषादके पास चले गये और वहीं निवास करने लगे। वहाँ भी वे दोनों अपने निन्दित आचरणको छोड़ न सके और इन्हीं बुरे कर्मोंसे धन-संग्रह करने लगे। व्याधकर्म चौर्य-कर्ममें प्रवृत्त हो गया। ऐसे ही भ्रमण करते हुए दैवयोगसे एक दिन वह व्याधकर्म देवीके मन्दिरमें पहुँचा। वहाँ एक श्रेष्ठ ब्राह्मण श्रीदुर्गासप्तशतीका पाठ कर रहे थे। दुर्गापाठके आदिचरित्र (प्रथम चरित्र)-के किंचित् पाठमात्रके श्रवणसे उसकी दुष्टबुद्धि धर्ममय हो गयी। फलतः धर्मबुद्धिसम्पन्न उस व्याधकर्मने उस श्रेष्ठ विप्रका शिष्यत्त्व ग्रहण कर लिया और अपना सारा धन उन्हें दे दिया। गुरुकी आज्ञासे उसने देवीके मन्त्रका जप किया। बीजमन्त्रके प्रभावसे उसके शरीरसे पापसमूह कृमिके रूपमें निकल गये। तीन वर्षतक इस प्रकार जप करते हुए वह निष्पाप श्रेष्ठ द्विज हो गया। इसी प्रकार मन्त्र-जप और आदिचरित्रका पाठ करते हुए उसे बारह वर्ष व्यतीत हो गये। तदनन्तर वह द्विज काशीमें चला आया। मुनि एवं देवोंसे पूजित महादेवी अन्नपूर्णाका उसने रोचनादि उपचारोंके द्वारा पूजन किया और
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- प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खण्ड *
३२७
उनकी इस प्रकार स्तुति की—
नित्यानन्दकरी पराभयकरी सौन्दर्यरत्नाकरी
निर्धूतारिखिलपापपावनकरी काशीपुराधीश्वरी ।
नानालोककरी महाभयहरी विश्वम्भरी सुन्दरी
विद्यां देहिकृपावलम्बनकरी मातात्रपूर्णाश्वरी * ॥
(प्रतिसर्गपर्व २।३३।२१)
इस स्तुतिका एक सौ आठ बार जपकर ध्यानमें नेत्रोंको बंदकर वह वहीँ सो गया। स्वप्नमें उसके सम्मुख अन्नपूर्णा शिवा उपस्थित हुई और
उसे ऋग्वेदका ज्ञान प्रदान कर अन्तर्हित हो गयीं। बादमें वह बुद्धिमान् ब्राह्मण श्रेष्ठ विद्या प्राप्तकर राजा विक्रमादित्यके यज्ञका आचार्य हुआ। यज्ञके बाद योग धारणकर हिमालय चला गया।
हे विप्रो! मैंने आपलोगोंको देवीके पुण्यमय आदिचरित्रके माहात्म्यको बतलाया, जिसके प्रभावसे उस व्याधकर्माने ब्राह्मीभाव प्राप्तकर परमोत्तम सिद्धिको प्राप्त कर लिया था।
(अध्याय ३३)
श्रीदुर्गासप्तशतीके मध्यमचरित्रका माहात्म्य
(कात्यायन तथा मगधके राजा महानन्दकी कथा)
सूतजी बोले—शौनक! उज्जयिनी नगरीमें एक हिंसापरायण मद्य-मांस-भक्षी भीमवर्मा नामका क्षत्रिय रहता था। वह अतिशय हिंसा एवं अधर्माचरणके कारण भयंकर व्याधियोंसे ग्रस्त हो गया और युवावस्थामें ही उसकी मृत्यु हो गयी। संयोगवश उसने कभी चण्डीपाठ भी कराया था। जिसके पुण्यके प्रभावसे इतना निकृष्ट पापी भी नरकमें नहीं गया। दूसरे जन्ममें वही राजनीतिपरायण मगधका विख्यात राजा महानन्द हुआ और उसे अपने पूर्वजन्मकी पूरी स्मृति थी। अतिशय समर्थ बुद्धिमान् कात्यायन (वररुचि)-का वह शिष्य हुआ। देवी महालक्ष्मीके बीजसहित मध्यमचरित्रका राजा महानन्दको उपदेश देकर कात्यायन स्वयं
विन्ध्यपर्वतपर शक्ति-उपासनाके लिये चले गये। इधर राजा भी प्रतिदिन महालक्ष्मीकी कस्तूरी, चन्दन आदिसे पूजा कर श्रीदुर्गासप्तशतीके मध्यम-चरित्रका पाठ करने लगा। बारह वर्ष व्यतीत होनेपर शक्तिकी उपासना करनेवाले कात्यायन पुनः अपने शिष्य महानन्दके पास आये और उन्होंने राजासे विधिपूर्वक लक्षचण्डीपाठ करवाया। फलस्वरूप सनातनी भगवती महालक्ष्मी प्रकट हुई और राजाको धर्म, अर्थ, कामसहित मोक्ष भी दे दिया। इस प्रकार महाभाग महानन्दने देवोंके समान अभीष्ट फलोंका उपभोग कर अन्तमें देवताओंसे नमस्कृत हो परम लोकको प्राप्त किया।
(अध्याय ३४)
- 'हे काशीपुरीकी अधीश्वरी अन्नपूर्णाश्वरी! आप नित्य आनन्ददायिनी हैं। शत्रुओंसे अभय प्रदान करनेवाली हैं तथा आप सौन्दर्यरत्नोंकी निधान और समस्त पापोंको नष्टकर पवित्र कर देनेवाली हैं। हे सुन्दरी! आप सम्पूर्ण लोकोंकी रचना करनेवाली, महान्-महान् भयोंको दूर करनेवाली, विश्वका भरण-पोषण करनेवाली तथा सबके ऊपर अनुग्रह करनेवाली हैं। हे मातः! आप मुझे विद्या प्रदान करें।'
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३२८
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
श्रीदुर्गासप्तशतीके उत्तरचरित्रकी महिमाके प्रसंगमें
योगाचार्य महर्षि पतञ्जलिका चरित्र
सूतजी बोले—अनेक धातुओंके द्वारा चित्रित रमणीय चित्रकूट पर्वतपर महाविद्वान् उपाध्याय पतञ्जलिमुनि रहते थे। वे वेद-वेदाङ्ग-तत्त्वज्ञ एवं गीता-शास्त्र-परायण थे। वे विष्णुके भक्त, सत्यवक्ता एवं व्याकरण-महाभाष्यके रचयिता भी माने गये हैं। एक समय वे शुद्धात्मा अन्य तीर्थोंमें गये। काशीमें उनका देवीभक्त कात्यायनके साथ शास्त्रार्थ हुआ। एक वर्षतक शास्त्रार्थ चलता रहा, अन्तमें पतञ्जलि पराजित हो गये। इससे लज्जित होकर उन्होंने सरस्वतीकी इस प्रकार आराधना की— नमो देव्यै महामूर्तयै सर्वमूर्तयै नमो नमः। शिवायै सर्वमाङ्गल्यै विष्णुमाये च ते नमः॥ त्वमेव श्रद्धा बुद्धिस्त्वं मेधा विद्या शिवंकरी। शान्तिवाणी त्वमेवासि नारायणि नमो नमः॥
(प्रतिसर्गपर्व २।३५।५-६)
‘महामूर्ति देवीको नमस्कार है। सर्वमूर्तिस्वरूपिणीको नमस्कार है। सर्वमङ्गलस्वरूपा शिवादेवीको नमस्कार है। हे विष्णुमाये! तुम्हें नमस्कार है। हे नारायण! तुम्हीं श्रद्धा, बुद्धि, मेधा, विद्या तथा कल्याणकारिणी हो। तुम्हीं शान्ति हो, तुम्हीं वाणी हो, तुम्हें बार-बार नमस्कार है।’
इस स्तुतिसे प्रसन्न होकर भगवती सरस्वतीने आकाशवाणीमें कहा—‘विप्रश्रेष्ठ! तुम एकाग्रचित्त होकर मेरे उत्तरचरित्रका जप करो। उसके प्रभावसे तुम निश्चय ही ज्ञानको प्राप्त करोगे। पतञ्जले! कात्यायन तुमसे परास्त हो जायेंगे।’ देवीकी इस वाणीको सुनकर पतञ्जलिनै विन्ध्यवासिनीदेवीके मन्दिरमें जाकर सरस्वतीकी आराधना की और वे प्रसन्न हो गयीं। इससे उन्होंने पुनः शास्त्रार्थमें कात्यायनको पराजित कर दिया, बादमें उन्होंने कृष्ण-मन्त्र और भक्तिके प्रचारमें तुलसीमाला आदिका भी महत्त्व बढ़ाया। भगवती विष्णुमायाकी कृपासे वे योगाचार्य अत्यन्त चिरजीवी हो गये।
मुनियो! इस प्रकार दुर्गासप्तशतीके उत्तरचरित्रकी महिमा निरूपित हुई। अब आगे आपलोग क्या सुनना चाहते हैं, वह बतायें। सभीका कल्याण हो, कोई भी दुःख प्राप्त न करे। गरुडध्वज, पुण्डरीकाक्ष भगवान् विष्णु मङ्गलमय हैं। भगवान् विष्णु मङ्गलमूर्ति हैं। जो व्यक्ति पवित्र होकर इस इतिहास-समुच्चयको प्रतिदिन सुनता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है।
(अध्याय ३५)
॥ प्रतिसर्गपर्व द्वितीय खण्ड सम्पूर्ण ॥
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॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
प्रतिसर्गपर्व
(तृतीय खण्ड)
[भविष्यपुराणके प्रतिसर्गपर्वका तीसरा खण्ड रामांश और कृष्णांश अर्थात् आल्हा और ऊदल (उदयसिंह)-के चरित्र तथा जयचन्द्र एवं पृथ्वीराज चौहानकी वीर-गाथाओंसे परिपूर्ण है। इधर भारतमें जगनिक भाटरचित आल्हाका वीरकाव्य बहुत प्रचलित है। इसके बुंदेलखण्डी, भोजपुरी आदि कई संस्करण हैं, जिनमें भाषाओंका थोड़ा-थोड़ा भेद है। इन कथाओंका मूल यह प्रतिसर्गपर्व ही प्रतीत होता है। इसीके आधारपर ये रचनाएँ प्रचलित हैं। प्रायः ये कथाएँ लोकरञ्जनके अनुसार अतिशयोक्तिपूर्ण-सी प्रतीत होती हैं, किंतु ऐतिहासिक दृष्टिसे महत्त्वकी भी हैं। यहाँ इनका सारमात्र प्रस्तुत किया गया है—सम्पादक]
आल्हा-खण्ड (आल्हा-ऊदलकी कथा)-का उपक्रम
ऋषियोंने पूछा—सूतजी महाराज! आपने महाराज विक्रमादित्यके इतिहासका वर्णन किया। द्वारपरयुगके समान उनका शासन धर्म एवं न्यायपूर्ण था और लम्बे समयतक इस पृथ्वीपर रहा। महाभाग! उस समय भगवान् श्रीकृष्णने अनेक लीलाएँ की थीं। आप उन लीलाओंका हमलोगोंसे वर्णन कीजिये, क्योंकि आप सर्वज्ञ हैं।
श्रीसूतजीने मङ्गल-स्मरणपूर्वक कहा— नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्। देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्॥
(प्रतिसर्गपर्व ३।१।३)
‘भगवान् नर-नारायणके अवतारस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण एवं उनके सखा नरश्रेष्ठ अर्जुन, उनकी लीलाओंको प्रकट करनेवाली भगवती सरस्वती तथा उनके चरित्रोंका वर्णन करनेवाले वेदव्यासको नमस्कारकर अष्टादश पुराण, रामायण और महाभारत आदि जय नामसे व्यपदिष्ट ग्रन्थोंका वाचन करना चाहिये।’
मुनिगणो! भविष्य नामक महाकल्पके वैवस्वत मन्वन्तरके अट्टाईसवें द्वारपरयुगके अन्तमें कुरुक्षेत्रका प्रसिद्ध महायुद्ध हुआ। उसमें युद्धकर दुरिभमानी सभी कौरवोंपर पाण्डवोंने अठारहवें दिन पूर्ण
विजय प्राप्त की। अन्तिम दिन भगवान् श्रीकृष्णने कालकी दुर्गतिको जानकर योगरूपी सनातन शिवजीकी मनसे इस प्रकार स्तुति की—
शान्तस्वरूपी, सब भूतोंके स्वामी, कपदी, कालकर्ता, जगद्भर्ता, पाप-विनाशक रुद्र! मैं आपको बार-बार प्रणाम करता हूँ। भगवन्! आप मेरे भक्त पाण्डवोंकी रक्षा कीजिये।
इस स्तुतिको सुनकर भगवान् शंकर नन्दीपर आरूढ़ हो हाथमें त्रिशूल लिये पाण्डवोंके शिविरकी रक्षाके लिये आ गये। उस समय महाराज युधिष्ठिरकी आज्ञासे भगवान् श्रीकृष्ण हस्तिनापुर गये थे और पाण्डव सरस्वतीके किनारे रहते थे।
मध्यरात्रिमें अश्वत्थामा, भोज (कृतवर्मा) और कृपाचार्य—ये तीनों पाण्डव-शिविरके पास आये और उन्होंने मनसे भगवान् रुद्रकी स्तुति कर उन्हें प्रसन्न कर लिया। इसपर भगवान् शंकरने उन्हें पाण्डव-शिविरमें प्रवेश करनेकी आज्ञा दे दी। बलवान् अश्वत्थामाने भगवान् शंकरद्वारा प्राप्त तलवारसे धृष्टद्युम्न आदि वीरोंकी हत्या कर दी, फिर वह कृपाचार्य और कृतवर्माके साथ वापस चला गया। वहाँ एकमात्र पार्षद सूत ही बचा रहा, उसने इस जनसंहारकी सूचना पाण्डवोंको दी। भीम आदि
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३३०
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
पाण्डवोंने इसे शिवजीका ही कृत्य समझा; वे क्रोधसे तिलमिला गये और अपने आयुधोंसे देवाधिदेव पिनाकीसे युद्ध करने लगे। भीम आदिद्वारा प्रयुक्त अस्त्र-शस्त्र शिवजीके शरीरमें समाहित हो गये। इसपर भगवान् शिवने कहा कि तुम श्रीकृष्णके उपासक हो अतः हमारे द्वारा तुमलोग रक्षित हो, अन्यथा तुमलोग वधके योग्य थे। इस अपराधका फल तुम्हें कलियुगमें जन्म लेकर भोगना पड़ेगा। ऐसा कहकर वे अदृश्य हो गये और पाण्डव बहुत दुःखी हुए। वे अपराधसे मुक्त होनेके लिये भगवान् श्रीकृष्णकी शरणमें आये। निःशस्त्र पाण्डवोंने श्रीकृष्णके साथ एकाग्र मनसे शंकरजीकी स्तुति की। इसपर भगवान् शंकरने प्रत्यक्ष प्रकट होकर उनसे वर माँगनेको कहा।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले— देव! पाण्डवोंके जो शस्त्रास्त्र आपके शरीरमें लीन हो गये हैं, उन्हें पाण्डवोंको वापस कर दीजिये और इन्हें शापसे भी मुक्त कर दीजिये।
श्रीशिवजीने कहा— श्रीकृष्णचन्द्र! मैं आपको प्रणाम करता हूँ। उस समय मैं आपकी मायासे मोहित हो गया था। उस मायाके अधीन होकर मैंने यह शाप दे दिया। यद्यपि मेरा वचन तो मिथ्या नहीं होगा तथापि ये पाण्डव तथा कौरव अपने अंशोंसे कलियुगमें उत्पन्न होकर अंशतः अपने पापोंका फल भोगकर मुक्त हो जायेंगे।
युधिष्ठिर वत्सरजका पुत्र होगा, उसका नाम
बलखानि (मलखान) होगा, वह शिरीष नगरका अधिपति होगा। भीमका नाम वीरण होगा और वह वनरसका राजा होगा। अर्जुनके अंशसे जो जन्म लेगा, वह महान् बुद्धिमान् और मेरा भक्त होगा। उसका जन्म परिमलके यहाँ होगा और नाम होगा ब्रह्मानन्द। महाबलशाली नकुलका जन्म कान्यकुब्जमें रत्नभानुके पुत्रके रूपमें होगा और नाम होगा लक्षण। सहदेव भीमसिंहका पुत्र होगा और उसका नाम होगा देवसिंह। धृतराष्ट्रके अंशसे अजमेरमें पृथ्वीराज जन्म लेगा और द्रौपदी पृथ्वीराजकी कन्याके रूपमें वेला नामसे प्रसिद्ध होगी। महादानी कर्ण तारक नामसे जन्म लेगा। उस समय रक्तबीजके रूपमें पृथ्वीपर मेरा भी अवतार होगा। कौरव माया-युद्धमें निष्पात होंगे तथा पाण्डु-पक्षके योद्धा धार्मिक और बलशाली होंगे।
सूतजी बोले— ऋषियो! यह सब बातें सुनकर श्रीकृष्ण मुस्कराये और उन्होंने कहा 'मैं भी अपनी शक्ति-विशेषसे अवतार लेकर पाण्डवोंकी सहायता करूँगा। मायादेवीद्वारा निर्मित महावती नामकी पुरीमें देशराजके पुत्र-रूपमें मेरा अंश उत्पन्न होगा, जो उदयसिंह (ऊदल) कहलायेगा, वह देवकीके गर्भसे उत्पन्न होगा। मेरे वैकुण्ठधामका अंश आह्लाद नामसे जन्म लेगा, वह मेरा गुरु होगा। अग्रिवंशसे उत्पन्न राजाओंका विनाश कर मैं (श्रीकृष्ण—उदयसिंह) धर्मकी स्थापना करूँगा।' श्रीकृष्णकी यह बात सुनकर शिवजी अन्तर्हित हो गये।
राजा शालिवाहन तथा ईशामसीहकी कथा
सूतजीने कहा— ऋषियो! प्रातःकालमें पुत्रशोकसे पीड़ित सभी पाण्डव प्रेतकार्य कर पितामह भीष्मके पास आये। उनसे उन्होंने राजधर्म, मोक्षधर्म और दानधर्मोंके स्वरूपको अलग-अलग रूपसे भलीभाँति समझा। तदनन्तर उन्होंने
उत्तम आचरणोंसे तीन अक्षमेध-यज्ञ किये। पाण्डवोंने छत्तीस वर्षतक राज्य किया और अन्तमें वे स्वर्ग चले गये। कलिधर्मकी वृद्धि होनेपर वे भी अपने अंशसे उत्पन्न होंगे।
अब आप सब मुनिगण अपने-अपने स्थानको
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- प्रतिसर्गपर्व, तृतीय खण्ड *
३३१
पथारें। मैं योगनिद्राके वशीभूत हो रहा हूँ, अब मैं समाधिस्थ होकर गुणातीत परब्रह्मका ध्यान करूँगा। यह सुनकर नैमिषारण्यवासी मुनिगण यौगिक सिद्धिका अवलम्बन कर आत्मसामीप्यमें स्थित हो गये। दीर्घकाल व्यतीत होनेपर शौनकादि मुनि ध्यानसे उठकर पुनः सूतजीके पास पहुँचे।
मुनियोंने पूछा—सूतजी महाराज! विक्रमाख्यानका तथा द्वापरमें शिवकी आज्ञासे होनेवाले राजाओंका आप वर्णन कीजिये।
सूतजी बोले—मुनियो! विक्रमादित्यके स्वर्गलोक चले जानेके बाद बहुतसे राजा हुए। पूर्वमें कपिल स्थानसे पश्चिममें सिन्धु नदीतक, उत्तरमें बदरीक्षेत्रसे दक्षिणमें सेतुबन्धतककी सीमावाले भारतवर्षमें उस समय अठारह राज्य या प्रदेश थे। उनके नाम इस प्रकार हैं—इन्द्रप्रस्थ, पाञ्चाल, कुरुक्षेत्र, कम्पिल, अन्तर्वेदी, ब्रज, अजमेर, मरुधन्व (मारवाड़), गुर्जर (गुजरात), महाराष्ट्र, द्रविड़ (तमिलनाडु), कलिंग (उड़ीसा), अवन्ती (उज्जैन), उडुप (आन्ध्र), बंग, गौड़, मागध तथा कौशल्य। इन राज्योंपर अलग-अलग राजाओंने शासन किया। वहाँकी भाषाएँ भिन्न-भिन्न रहीं और समय-समयपर विभिन्न धर्म-प्रचारक भी हुए। एक सौ वर्ष व्यतीत हो जानेपर धर्मका विनाश सुनकर शक आदि विदेशी राजा अनेक लोगोंके साथ सिन्धु नदीको पारकर आर्यदेशमें आये और कुछ लोग हिमालयके हिममार्गसे यहाँ आये। उन्होंने आर्योंको जीतकर उनका धन लूट लिया और अपने देशमें लौट गये। इसी समय विक्रमादित्यका पौत्र राजा शालिवाहन पिताके सिंहासनपर आसीन हुआ। उसने शक, चीन आदि देशोंकी सेनापर विजय पायी। बाह्लीक, कामरूप, रोम तथा खुर देशमें उत्पन्न हुए दुष्टोंको पकड़कर उन्हें कठोर दण्ड दिया और उनका सारा कोष
छीन लिया। उसने म्लेच्छों तथा आर्योंकी अलग-अलग देश-मर्यादा स्थापित की। सिन्धु-प्रदेशको आर्योंका उत्तम स्थान निर्धारित किया और म्लेच्छोंके लिये सिन्धुके उस पारका प्रदेश नियत किया।
एक समयकी बात है, वह शकाधीश शालिवाहन हिमशिखरपर गया। उसने हूण देशके मध्य स्थित पर्वतपर एक सुन्दर पुरुषको देखा। उसका शरीर गोरा था और वह श्वेत वस्त्र धारण किये था। उस व्यक्तिको देखकर शकराजने प्रसन्नतासे पूछा—‘आप कौन हैं?’ उसने कहा—‘मैं ईशपुत्र हूँ और कुमारीके गर्भसे उत्पन्न हुआ हूँ। मैं म्लेच्छ-धर्मका प्रचारक और सत्य-व्रतमें स्थित हूँ।’ राजाने पूछा—‘आपका कौन-सा धर्म है?’
ईशपुत्रने कहा—महाराज! सत्यका विनाश हो जानेपर मर्यादारहित म्लेच्छ-प्रदेशमें मैं मसीह बनकर आया और दस्युओंके मध्य भयंकर ईशामसी नामसे एक कन्या उत्पन्न हुई। उसीको म्लेच्छोंसे प्राप्त कर मैंने मसीहत्व प्राप्त किया। मैंने म्लेच्छोंमें जिस धर्मकी स्थापना की है, उसे सुनिये—
‘सबसे पहले मानस और दैहिक मलको निकालकर शरीरको पूर्णतः निर्मल कर लेना चाहिये। फिर इष्ट देवताका जप करना चाहिये। सत्य वाणी बोलनी चाहिये, न्यायसे चलना चाहिये और मनको एकाग्र कर सूर्यमण्डलमें स्थित परमात्माकी पूजा करनी चाहिये, क्योंकि ईश्वर और सूर्यमें समानता है। परमात्मा भी अचल हैं और सूर्य भी अचल हैं। सूर्य अनित्य भूतोंके सारका चारों ओरसे आकर्षण करते हैं। हे भूपाल! ऐसे कृत्यसे वह मसीहा विलीन हो गयी, पर मेरे हृदयमें नित्य विशुद्ध कल्याणकारिणी ईश-मूर्ति प्राप्त हुई है। इसलिये मेरा नाम ईशामसीह प्रतिष्ठित हुआ।’
यह सुनकर राजा शालिवाहने उस म्लेच्छ-
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