भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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पृष्ठ 324
  • प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खण्ड *

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लिये भगवान् के चरण नौकारूप हैं। जो बुद्धिमान् व्यक्ति हैं, वे भगवान् की शरणमें जाते हैं, किंतु विषयोंमें व्याप्त विषयबुद्धिवाले व्यक्ति भगवान् की शरणमें न जाकर इसी संसार-सागरमें पड़े रहते हैं। इसलिये द्विज! संसारके कल्याणके लिये विविध उपचारोंसे भगवान् सत्यनारायण-देवकी पूजा, आराधना तथा ध्यान करते हुए तुम इस व्रतको प्रकाशमें लाओ।

विप्ररूपधारी भगवान् के ऐसा कहते ही उस ब्राह्मण शतानन्दने मेघोंके समान नीलवर्ण, सुन्दर चार भुजाओंमें शङ्खु, चक्र, गदा तथा पद्म लिये हुए और पीताम्बर धारण किये हुए, नवीन विकसित कमलके समान नेत्रवाले तथा मन्द-मन्द मधुर मुसकानवाले, वनमालायुक्त और भौरोंके द्वारा चुम्बित चरण-कमलवाले पुरुषोत्तम भगवान् नारायणके साक्षात् दर्शन किये।

भगवान् की वाणी सुनने और उनका प्रत्यक्ष दर्शन करनेसे उस विप्रके सभी अङ्ग पुलकित हो उठे, आँखोंमें प्रेमाश्रु भर आये। उसने भूमिपर गिरकर भगवान् को साष्टाङ्ग प्रणाम किया और गद्गद वाणीसे वह उनकी इस प्रकार स्तुति करने लगा—

संसारके स्वामी, जगत् के कारणके भी कारण, अनाथोंके नाथ, कल्याण-मङ्गलको देनेवाले, शरण देनेवाले, पुण्यरूप, पवित्र, अव्यक्त तथा व्यक्त होनेवाले और आधिभौतिक, आधिदैविक तथा आध्यात्मिक

तीनों प्रकारके तापोंका समूल उच्छेद करनेवाले भगवान् सत्यनारायणको मैं प्रणाम करता हूँ। इस संसारके रचयिता सत्यनारायणदेवको नमस्कार है। विश्वके भरण-पोषण करनेवाले शुद्ध सत्स्वरूपको नमस्कार है तथा विश्वका विनाश करनेवाले कराल महाकालस्वरूपको नमस्कार है। सम्पूर्ण संसारका मङ्गल करनेवाले आत्ममूर्तिस्वरूप हे भगवान्! आपको नमस्कार है। आज मैं धन्य हो गया, पुण्यवान् हो गया, आज मेरा जन्म लेना सफल हो गया, जो कि मन-वाणीसे अगम-अगोचर आपका मुझे प्रत्यक्ष दर्शन हुआ। मैं अपने भाग्यकी क्या सराहना करूँ। न जाने मेरे किस पुण्यकर्मका यह फल था, जो मुझे आपके दर्शन हुए। प्रभो! आपने क्रियाहीन इस मन्द-बुद्धिके शरीरको सफल कर दिया।

लोकनाथ! रमापते! किस विधिसे भगवान् सत्यनारायणका पूजन करना चाहिये, विभो! कृपाकर उसे भी आप बतायें। संसारको मोहित करनेवाले भगवान् नारायण मधुर वाणीमें बोले—‘विप्रेन्द्र! मेरी पूजामें बहुत अधिक धनकी आवश्यकता नहीं, अनायास जो धन प्राप्त हो जाय, उसीसे श्रद्धापूर्वक मेरा यजन करना चाहिये। जिस प्रकार मेरी स्तुतिसे, स्मृतिसे ग्राह-ग्रस्त गजेन्द्र, अजामिल संकटसे मुक्त हो गये, इसी प्रकार इस व्रतके आश्रयसे मनुष्य तत्काल क्लेशमुक्त हो जाता है।’ इस व्रतकी विधिको सुनें—

अभीष्ट कामनाकी सिद्धिके लिये पूजाकी सामग्री

१- दुःखोदधिनिमग्नानां तरणिश्वरणी हरेः। कुशलाः शरणं यान्ति नेतरे विषयात्मिकाः ॥ (प्रतिसर्गपर्व २।२५।१०)

२- प्रणमामि जगन्नाथं जगत्कारणकारणम्। अनाथनाथं शिवदं शरण्यमनधं शुचिम् ॥

अव्यक्तं व्यक्तं यातं तापत्रयविमोचनम् ॥

नमः सत्यनारायणायास्य कर्त्रे नमः शुद्धसत्त्वाय विश्वस्य भर्त्रे। करलाय कालाय विश्वस्य हर्त्रेनमस्ते जगन्मङ्गलायात्मभूर्ते ॥

धन्योऽस्यघ कृती धन्यो भवोऽघ सफलोमम। वाङ्मनोऽगोचरो यस्त्वं मम प्रत्यक्षमागतः ॥

दिष्टं किं वर्णयाम्याहो न जाने कस्य वा फलम्। क्रियाहीनस्य मन्दस्य देहोऽयं फलवान् कृतः ॥

(प्रतिसर्गपर्व २।२५।१५-१९)

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