भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 318, कुल 654 में से

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पृष्ठ 318
  • प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खण्ड *

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(चार मूर्खोंकी कथा)

वैतालने राजासे पुनः कहा—राजन्! रमणीय जयपुरमें वर्धमान नामका एक राजा था। उसके गाँवमें वेदवेदाङ्गपारंगत विष्णुस्वामी नामका एक ब्राह्मण निवास करता था। वह राधा-कृष्णका भक्त था। उसके चार पुत्र थे, जो विभिन्न व्यसनोंमें लगे रहते थे। वे जैसा निन्दित कर्म करते थे, वैसा ही उनका नाम भी निन्दित ही हो गया। पहला पुत्र दूतकर्मा था, दूसरा व्यभिचारी, तीसरा विषयी और चौथा नास्तिक था। संयोगसे दुर्भाग्यवश वे सभी निर्धन हो गये। एक बार वे सभी अपने पिता विष्णुशर्माके पास गये। उन लोगोंने विनयपूर्वक उन्हें नमस्कार किया और कहा—‘पिताजी! हमलोगोंकी लक्ष्मी कैसे नष्ट हो गयी?’ पिताने कहा—‘दूतकर्मन्! दूतकर्म धनको नष्ट कर देता है। यह पापका मूल है। दूतकर्मसे व्यभिचार, चौर्य और निर्दयता आदि उत्पन्न होते हैं। यह महान् दुष्परिणामकारी है। दूतकर्म करनेके कारण तुम्हारे द्रव्यका नाश हुआ।’ यह सुनकर उसने कहा—‘पितृचरण! आप मुझे कृपया धन-प्राप्तिका सही मार्ग बतायें।’ पिताने कहा—‘तीर्थ और व्रतके प्रभावसे तुम्हारे पाप नष्ट हो जायँगे। तुम अपने माता-पिताकी बातोंपर ध्यान दो, उनका कहना मानो।’ तदनन्तर पिताने द्वितीय पुत्रसे कहा—‘पुत्र! तुम व्यभिचारी हो। वेश्याका संग बड़ा अशुभ है। तुम इस अशुभ कर्मको त्यागकर ब्रह्मचर्यपूर्वक ब्रह्मपरायण हो। ब्रह्मचर्यव्रत धारण करो।’ तृतीय पुत्र विषयीसे कहा—‘मांस और मदिरा सदा पापकी वृद्धिके कारण हैं, इनके द्वारा तुम चौर्य-कर्म करोगे और नरकगामी होगे, इसलिये

तुम ऐश्वर्यसम्पन्न जगत्पति, सर्वोत्तम भगवान् विष्णुके निमित्त द्रव्योंको समर्पितकर मौन होकर भोजन करो’ और अपने नास्तिक पुत्रसे कहा—‘तुम देवनिन्दा आदि नास्तिकभावको छोड़कर शुद्ध आस्तिकमार्गका अवलम्बन करो, आत्मा शुद्ध-बुद्ध एवं नित्य है और महादेवी चण्डिका महाशक्ति हैं। सभी प्राणियोंके हृदय-गुहामें स्थित देवतागण परमात्माके अङ्ग हैं। उनका ज्ञान प्राप्तकर पापकी शान्तिके लिये उनकी पूजा करो।’

यह सुनकर वे चारों पुत्र अपने पिताके द्वारा निर्दिष्ट साधनोंमें प्रवृत्त हो गये और सुन्दर ज्ञानकी प्राप्तिके लिये सर्वेश्वर शिवकी आराधना भी करने लगे। भगवान् शंकरने वर्षभरमें उन्हें संजीवनी विद्या प्रदान कर दी। वे संजीवनी विद्या प्राप्त कर एक वनमें आये और वहाँ बिखरी व्याघ्रकी अस्थियोंपर विद्याकी परीक्षा करने लगे। प्रथम पुत्रने मरे हुए व्याघ्रकी अस्थियोंको एकत्र करके उसपर मन्त्रपूत जल छिड़का। उस मन्त्रके प्रभावसे वे अस्थियाँ पंजररूप हो गयीं। दूसरे व्यभिचारी पुत्रने उसपर मन्त्रपूत जल छिड़का, जिसके प्रभावसे वह पंजर मांस और रुधिरसे सम्पन्न हो गया। विषयी पुत्रने उसके ऊपर अभिमन्त्रित जल छिड़का। फलस्वरूप त्वचा और प्राण उसमें आ गये। सोये हुए व्याघ्रको जीवित करनेके लिये नास्तिक पुत्रने जल छिड़का। मन्त्रके प्रभावसे जीवित होनेपर उस व्याघ्रने उन सभीका भक्षण कर लिया।

वैतालने राजासे पूछा—राजन्! अब आप बतायें कि उन चारोंमें सबसे बड़ा मूर्ख कौन था? राजा बोले—जिसने मरे हुए व्याघ्रको जिलाया,

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