भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 431, कुल 654 में से

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पृष्ठ 431

४२० * संक्षिप्त भविष्यपुराण * देवता प्रसन्न होते हैं। ताम्बूल, कुंकुम और उत्तम- चैत्र-तृतीयाकी भाँति पूर्वोक्त क्रियाओंको करनेके उत्तम पुष्प सुवासिनी स्त्रीको अर्पित करे। पश्चात् कुन्द-पुष्पोंसे तुलादान करे तथा चतुर्थीको प्रातः-स्नानके अनन्तर पार्वतीजीकी पूजा कर गणेशजीका भी पूजन करे। गुड़, लवण, कुंकुम, कपूर, अगरु, चन्दन आदि इस विधिसे जो स्त्री व्रत और तुलादान द्रव्योंसे यथाशक्ति तुलादान करे और देवीसे क्षमा- करती है, वह अपने पतिके साथ इन्द्रलोकमें प्रार्थना करे। ब्राह्मणों तथा सुवासिनी स्त्रियोंको निवास कर ब्रह्मलोकमें और वहाँसे शिवलोकमें भोजन कराये। नैवेद्यका वितरण करे। इससे उसका जाती है। इस लोकमें भी वह रूप, सौभाग्य, कर्म सफल हो जाता है। संतान, धन आदि प्राप्त करती है। उसके वंशमें भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको भी दुर्भगा कन्या और दुर्विनीत पुत्र कभी भी उत्पन्न चैत्र-तृतीयाकी भाँति व्रत एवं पूजन करना चाहिये। नहीं होता। घरमें दारिद्र्य, रोग, शोक आदि इसमें सप्तधान्योंसे एक सूपमें उमाकी मूर्ति बनाकर नहीं होते। जो कन्या इस व्रतको करती है तथा पूजा करनी चाहिये तथा गोमूत्र-प्राशन करना ब्राह्मणकी पूजा करती है, वह अभीष्ट वर प्राप्त चाहिये। यह व्रत उत्तम सौन्दर्य-प्रदायक है। कर संसारका सुख भोगती है। इसी प्रकार माघ मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको (अध्याय २८) आनन्तर्य-तृतीया-व्रत महाराज युधिष्ठिरने कहा - भगवन्! आपने प्राशन करे। काम-क्रोधका त्याग कर रात्रिमें शयन शुक्ल पक्षके अनेक तृतीया-व्रतोंको बतलाया। करे एवं प्रातः उठकर ब्राह्मण-दम्पतिका पूजन करे। अब आप आनन्तर्य-व्रतका स्वरूप बतलायें। ऐसा करनेसे अनेक यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। भगवान् श्रीकृष्ण बोले - महाराज! ब्रह्मा, विष्णु पौष मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको उपवासकर और महेशने देवताओंको बतलाया है कि यह गौरीका पूजन करे, लड्डूका नैवेद्य निवेदित करे आनन्तर्य-व्रत अत्यन्त गुह्य है, फिर भी मैं आपसे और घृतका प्राशन कर शयन करे। प्रातः उठकर इस व्रतका वर्णन करता हूँ। इस व्रतका आरम्भ सपत्नीक ब्राह्मणका पूजन करे। इससे महान् यज्ञका मार्गशीर्ष मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयासे करना फल मिलता है। इसी प्रकार पौषकी कृष्ण- चाहिये। द्वितीयाके दिन रातमें व्रतकर तृतीयाको तृतीयाको भगवती पार्वतीकी पूजा करे और नैवेद्य उपवास करे। गन्ध, पुष्प आदिसे उमादेवीका पूजन अर्पण करे, रातमें पूरी और गोमयका प्राशन कर शर्करा और पूरीका नैवेद्य समर्पित करे। स्वयं करना चाहिये। प्रातःकाल ब्राह्मण-दम्पतिका पूजन दहीका प्राशन कर रात्रिमें शयन करे। प्रातःकाल करे। इससे अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है। उठकर भक्तिपूर्वक ब्राह्मण-दम्पतिको भोजन कराये। माघ मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको भगवती इस विधिसे जो स्त्री व्रत करती है, वह सम्पूर्ण पार्वतीका 'सुरनायिका' नामसे पूजन कर खाँड़ अश्वमेध-यज्ञके फलको प्राप्त करती है। और बिल्वका नैवेद्य समर्पित करे। कुशोदकका मार्गशीर्ष मासके कृष्ण पक्षकी तृतीयाको भगवती प्राशन कर जितेन्द्रिय रहे, भूमिपर शयन करे। कात्यायनीके पूजनमें नारिकेल समर्पित कर दुग्धका प्रातः ब्राह्मण-दम्पतिको भोजन कराये। इससे In Public Domain. Digitzed by S84-SunRishipta-Bhavishya Puran_Section_15_2_Back

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