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भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 432, कुल 654 में से

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  • उत्तरपर्व *

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सुवर्णदानका फल मिलता है। इसी प्रकार माघ कृष्ण तृतीयाको पवित्र होकर 'आर्या' नामसे पार्वतीका पूजन कर भक्ष्य पदार्थोंका नैवेद्य समर्पित कर मधुका प्राशन करे। देवीके आगे शयन करे, दूसरे दिन भक्तिपूर्वक ब्राह्मण-दम्पतिका पूजन करे। इससे वाजपेय-यज्ञका फल मिलता है।

फाल्गुन मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको पवित्र होकर उपवास करे और देवी पार्वतीका 'भद्रा' नामसे पूजन कर कासारका नैवेद्य निवेदित करे। शर्कराका प्राशन कर रात्रिमें शयन करे। प्रातःकाल सपत्नीक ब्राह्मणको भोजन कराये। इससे सौत्रामणि-यागका फल प्राप्त होता है। इसी प्रकार कृष्ण पक्षकी तृतीयामें 'विशालाक्षी' नामसे भगवती पार्वतीका पूजन कर पूरीका भोग लगाये। जल तथा चावल निवेदित कर भूमिपर शयन करे। प्रातःकाल सपत्नीक ब्राह्मणको भोजन कराये। इससे अग्निष्टोम-यज्ञका फल प्राप्त होता है।

चैत्र मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको जितेन्द्रिय और पवित्र होकर भगवती पार्वतीका 'श्री' नामसे पूजन करे। वटक (दहीबड़ा)-का नैवेद्य निवेदित करे, बिल्बपत्रका प्राशन करे एवं देवीका ध्यान करता हुआ विश्राम करे। प्रातःकाल भक्तिपूर्वक ब्राह्मण-दम्पतिकी पूजा करे, इससे राजसूय-यज्ञका फल प्राप्त होता है। इसी प्रकार कृष्ण-तृतीयाको देवीकी 'काली' नामसे पूजा करे। अपूपका नैवेद्य निवेदित करे, पीठीका प्राशन करे और रात्रिमें विश्राम करे। प्रातःकाल सपत्नीक ब्राह्मणको भोजन कराये। इससे अतिरात्र-यज्ञका फल प्राप्त होता है।

वैशाख मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको जितेन्द्रिय होकर उपवास करे। भगवती पार्वतीकी 'चण्डिका' नामसे पूजा कर मधुक निवेदित करे। श्रीखण्ड-चन्दनसे लिस कर देवीके सम्मुख विश्राम करे। प्रातःकाल सपत्नीक ब्राह्मणकी पूजा करे। इससे

चान्द्रायणव्रतका फल मिलता है। ऐसे ही कृष्ण पक्षकी तृतीयाको विमत्सर होकर उपवास करे। देवीकी 'कालरात्रि' नामसे गन्ध, पुष्प, धूप, दीप आदिसे पूजा करे। घी तथा जौके आटेसे बना नैवेद्य निवेदित करे। तिलका प्राशन कर रात्रिमें शयन करे। प्रातःकाल सपत्नीक ब्राह्मणको भोजन कराये। इससे अतिकृच्छ्रव्रतका फल प्राप्त होता है।

ज्येष्ठ मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको उपवासकर पार्वतीकी पूजा 'शुभा' नामसे करे तथा आम्र-फलका नैवेद्य निवेदित करे एवं आँवलेका प्राशन कर गौरीका ध्यान करते हुए सुखपूर्वक सोये। प्रातःकाल सपत्नीक ब्राह्मणको भोजन कराये। इससे तीर्थयात्राका फल प्राप्त होता है। इसी प्रकार ज्येष्ठ कृष्ण तृतीयाको सुवासिनी स्त्री उपवास करे। 'स्कन्दमाता' की पूजा कर भोग लगाये। पञ्चगव्यका प्राशन कर देवीके सामने शयन करे। प्रातःकाल ब्राह्मण-दम्पतिकी पूजा करे। इससे कन्यादानका फल प्राप्त होता है।

आषाढ़ मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको सतीका पूजन कर दहीका नैवेद्य समर्पित करे। गोशृङ्ग-जलका प्राशन कर शयन करे। प्रातः ब्राह्मण-दम्पतिका पूजन करे, इससे कन्यादानका फल प्राप्त होता है। पुनः आषाढ़ मासके कृष्ण पक्षकी तृतीयामें कृष्णाण्डीका पूजन कर गुड़ और घृतके साथ सत्तूका नैवेद्य अर्पित करे। कुशोदकका प्राशन कर शयन करे। प्रातःकाल ब्राह्मण-दम्पतिकी पूजा करे। इससे गोसहस्र-दानका फल प्राप्त होता है।

श्रावण मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको उपवासकर चन्द्रघण्टाका पूजन करे। कुल्माष (कुलथी)-को नैवेद्यरूपमें समर्पित कर पुष्पोदकका प्राशन कर शयन करे, प्रातःकाल ब्राह्मण-दम्पतिका पूजन करे। ऐसा करनेसे अभयदानका फल प्राप्त होता है। इसी प्रकार श्रावणकी कृष्ण-तृतीयाको 'रुद्राणी'

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