भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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  • उत्तरपर्व *

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प्रणाम कर क्षमा माँगें। इस प्रकार इस आनन्तर्य-व्रतकी समाप्ति करे। जो स्त्री या पुरुष इस व्रतको करता है, वह दिव्य विमानमें बैठकर गन्धर्वलोक, यक्षलोक, देवलोक तथा विष्णुलोकमें जाता है। वहाँ बहुत समयतक उत्तम भोगोंको भोगकर शिवलोकको प्राप्त करता है और फिर भूमिपर जन्म लेकर प्रतापी चक्रवर्ती राजा होता है। व्रत करनेवाली उसकी स्त्री उसकी पटरानी होती

है। जिस प्रकार शिवजीके साथ पार्वती, इन्द्रके साथ शची, वसिष्ठके साथ अरुन्धती, विष्णुके साथ लक्ष्मी, ब्रह्माके साथ सावित्री सदा विराजमान रहती हैं, उसी प्रकार वह नारी भी जन्म-जन्ममें अपने पतिके साथ सुख भोगती है। इस व्रतको करनेवाली नारी पतिसे वियुक्त नहीं होती तथा पुत्र, पौत्र आदि सभी वस्तुओंको प्राप्त करती है। (अध्याय २९)

अक्षय-तृतीयाव्रतके प्रसंगमें धर्म वणिकका चरित्र

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! अब आप वैशाख मासके शुक्ल पक्षकी अक्षय-तृतीयाकी कथा सुनें। इस दिन स्नान, दान, जप, होम, स्वाध्याय, तर्पण आदि जो भी कर्म किये जाते हैं, वे सब अक्षय हो जाते हैं*। सत्ययुगका आरम्भ भी इसी तिथिको हुआ था, इसलिये इसे कृतयुगादि तृतीया भी कहते हैं। यह सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाली एवं सभी सुखोंको प्रदान करनेवाली है। इस सम्बन्धमें एक आख्यान प्रसिद्ध है, आप उसे सुनें—

शाकल नगरमें प्रिय और सत्यवादी, देवता और ब्राह्मणोंका पूजक धर्म नामक एक धर्मात्मा वणिक रहता था। उसने एक दिन कथाप्रसंगमें सुना कि यदि वैशाख शुक्लकी तृतीया रोहिणी नक्षत्र एवं बुधवारसे युक्त हो तो उस दिनका दिया हुआ दान अक्षय हो जाता है। यह सुनकर उसने अक्षय तृतीयाके दिन गङ्गामें अपने पितरोंका तर्पण किया और घर आकर जल और अन्नसे पूर्ण घट, सत्तू दही, चना, गेहूँ, गुड़, ईख, खाँड़ और सुवर्ण श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणोंको दान दिया। कुटुम्बमें आसक्त

रहनेवाली उसकी स्त्री उसे बार-बार रोकती थी, किंतु वह अक्षय तृतीयाको अवश्य ही दान करता था। कुछ समयके बाद उसका देहान्त हो गया। अगले जन्ममें उसका जन्म कुशावती (द्वारका) नगरीमें हुआ और वह वहाँका राजा बना। दानके प्रभावसे उसके ऐश्वर्य और धनकी कोई सीमा न थी। उसने पुनः बड़ी-बड़ी दक्षिणावाले यज्ञ किये। वह ब्राह्मणोंको गौ, भूमि, सुवर्ण आदि देता रहता और दीन-दुःखियोंको भी संतुष्ट करता, किंतु उसके धनका कभी ह्रास नहीं होता। यह उसके पूर्वजन्ममें अक्षय तृतीयाके दिन दान देनेका फल था। महाराज! इस तृतीयाका फल अक्षय है। अब इस व्रतका विधान सुनें—सभी रस, अन्न, शहद, जलसे भरे घड़े, तरह-तरहके फल, जूता आदि तथा ग्रीष्म-ऋतुमें उपयुक्त सामग्री, अन्न, गौ, भूमि, सुवर्ण, वस्त्र जो पदार्थ अपनेको प्रिय और उत्तम लेंगे, उन्हें ब्राह्मणोंको देना चाहिये। यह अतिशय रहस्यकी बात मैंने आपको बतलायी। इस तिथिमें किये गये कर्मका क्षय नहीं होता, इसीलिये मुनियोंने इसका नाम अक्षय-तृतीया रखा है। (अध्याय ३०—३३)

  • मत्स्यपुराणके अध्याय ६५ में इसके विषयमें एक दूसरी कथा आती है, जिसमें कहा गया है कि 'इस दिन अक्षतसे भगवान् विष्णुकी पूजा करनेसे वे विशेष प्रसन्न होते हैं और उसकी संतति भी अक्षय बनी रहती है—

अक्षया संततिस्तस्य तस्यां सुकृतमक्षयम्। अक्षतैः पूज्यते विष्णुस्तेन साक्षया स्मृता।

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