भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
शान्तिव्रत
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! अब मैं पञ्चमी-कल्पमें शान्तिव्रतका वर्णन करता हूँ। इसके करनेसे गृहस्थोंको सब प्रकारकी शान्ति प्राप्त होती है। कार्तिक मासके शुक्ल पक्षकी पञ्चमीसे लेकर एक वर्षपर्यन्त खट्टे पदार्थोंका भोजन न करे। नक्तव्रत कर शेषनागके ऊपर स्थित भगवान् विष्णुका पूजन करे और निम्नलिखित मन्त्रोंसे उनके अङ्गोंकी पूजा करे—
‘ॐ अनन्ताय नमः, पादौ पूजयामि’ से भगवान् विष्णुके दोनों पैरोंकी, ‘ॐ धृतराष्ट्राय नमः, कटि पूजयामि’ से कटिप्रदेशकी, ‘ॐ तक्षकाय नमः, उदरं पूजयामि’ से उदरदेशकी, ‘ॐ कर्कोटकाय नमः, उरः पूजयामि’ से हृदयकी, ‘ॐ पञ्चाय नमः, कर्णौ पूजयामि’ से दोनों कानोंकी,
‘ॐ महापञ्चाय नमः, दोर्युगं पूजयामि’ से दोनों भुजाओंकी, ‘ॐ शङ्खुपालाय नमः, वक्षः पूजयामि’ से वक्षःस्थलकी तथा ‘ॐ कुलिकाय नमः, शिरः पूजयामि’ से उनके मस्तककी पूजा करे। तदनन्तर मौन हो भगवान् विष्णुको दूधसे स्नान कराये, फिर दुग्ध और तिलोंसे हवन करे। वर्ष पूरा होनेपर नारायण तथा शेषनागकी सुवर्णप्रतिमा बनवाकर उनका पूजन कर ब्राह्मणको दान दे, साथ ही उसे सवत्सा गौ, पायससे पूर्ण कांस्यपात्र, दो वस्त्र और यथाशक्ति सुवर्ण भी प्रदान करे। तत्पश्चात् ब्राह्मण-भोजन कराकर व्रत समाप्त करे। जो व्यक्ति इस व्रतको भक्तिपूर्वक करता है, वह नित्य शान्ति प्राप्त करता है और उसे नागोंका कभी भी कोई भय नहीं रहता। (अध्याय ३४)
सरस्वतीव्रतका विधान और फल
राजा युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! किस व्रतके करनेसे वाणी मधुर होती है? प्राणीको सौभाग्य प्राप्त होता है? विद्यामें अतिकौशल प्राप्त होता है? पति-पत्नीका और बन्धुजनोंका कभी वियोग नहीं होता तथा दीर्घ आयुष्य प्राप्त होता है? उसे आप बतलायें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! आपने बहुत उत्तम बात पूछी है। इन फलोंको देनेवाले सारस्वतव्रतका विधान आप सुनें। इस व्रतके कीर्तनमात्रसे भी भगवती सरस्वती प्रसन्न हो जाती हैं। इस व्रतको वत्सरारम्भमें चैत्र मासके शुक्ल पक्षकी पञ्चमीको आदित्यवारसे प्रारम्भ करना चाहिये। इस दिन भक्तिपूर्वक ब्राह्मणके द्वारा स्वस्तित्वाचन कराकर गन्ध, श्वेत माला, शुक्ल
अक्षत और श्वेत वस्त्रादि उपचारोंसे, वीणा, अक्षमाला, कमण्डलु तथा पुस्तक धारण की हुई एवं सभी अलंकारोंसे अलंकृत भगवती गायत्रीका पूजन करे। फिर हाथ जोड़कर इन मन्त्रोंसे प्रार्थना करे— यथा तु देवि भगवान् ब्रह्मा लोकपितामहः। त्वां परित्यज्य नो तिष्ठेत् तथा भव वरप्रदा॥ वेदशास्त्राणि सर्वाणि नृत्यगीतादिकं च यत्। वाहितं यत् त्वया देवि तथा मे सन्तु सिद्धयः॥ लक्ष्मीर्मधा वरा रिष्टिर्गौरी तुष्टिः प्रभा मतिः। एताभिः पाहि तनुभिरष्टाभिर्मा सरस्वति॥
(उत्तरपर्व ३५।७—९)
‘देवि! जिस प्रकार लोकपितामह ब्रह्मा आपका परित्यागकर कभी अलग नहीं रहते, उसी प्रकार
अक्षतस्तु नरा स्नाता विष्णोर्दत्त्वा तथाक्षतान्॥ (मत्स्यपुराण ६५।४)
(सामान्यतया अक्षतके द्वारा विष्णुपूजन निषिद्ध है, पर केवल इस दिन अक्षतसे उनकी पूजा की जाती है। अन्यत्र अक्षतके स्थानपर सफेद तिलका विधान है।)
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