भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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आप हमें भी वर दीजिये कि हमारा भी कभी अपने परिवारके लोगोंसे वियोग न हो। हे देवि! वेदादि सम्पूर्ण शास्त्र तथा नृत्य-गीतादि जो भी विद्याएँ हैं, वे सभी आपके अधिष्ठानमें ही रहती हैं, वे सभी मुझे प्राप्त हों। हे भगवती सरस्वती देवि! आप अपनी—लक्ष्मी, मेधा, वरा, रिष्टि, गौरी, तुष्टि, प्रभा तथा मति—इन आठ मूर्तियोंके द्वारा मेरी रक्षा करें।’

इस विधिसे प्रार्थनाकर मौन होकर भोजन करे। प्रत्येक मासके शुक्ल पक्षकी पञ्चमीको सुवासिनी स्त्रियोंका भी पूजन करे और उन्हें तिल तथा चावल, घृतपात्र, दुग्ध एवं सुवर्ण प्रदान करे और देते समय ‘गायत्री प्रीयताम्’ ऐसा उच्चारण करे। सार्यकाल

मौन रहे। इस तरह वर्षभर व्रत करे। व्रतकी समासिपर ब्राह्मणको भोजनके लिये पूर्णपात्रमें चावल भरकर प्रदान करे। साथ ही दो श्वेत वस्त्र, सवत्सा गौ, चन्दन आदि भी दे। देवीको निवेदित किये गये वितान, घण्टा, अन्न आदि पदार्थ भी ब्राह्मणको दान कर दे। पूज्य गुरुका भी वस्त्र, माल्य तथा धन-धान्यसे पूजन करे। इस विधिसे जो पुरुष सारस्वतव्रत करता है, वह विद्वान्, धनवान् और मधुर कण्ठवाला होता है। भगवती सरस्वतीकी कृपासे वह वेदव्यासके समान कवि हो जाता है। नारी भी यदि इस व्रतका पालन करे तो उसे भी पूर्वोक्त फल प्राप्त होता है। (अध्याय ३५-३६)

श्रीपञ्चमीव्रत-कथा

राजा युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! तीनों लोकोंमें लक्ष्मी दुर्लभ है; पर व्रत, होम, तप, जप, नमस्कार आदि किस कर्मके करनेसे स्थिर लक्ष्मी प्राप्त होती है? आप सब कुछ जाननेवाले हैं, कृपाकर उसका वर्णन करें।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! सुना जाता है कि प्राचीन कालमें भृगुमुनिकी ‘ख्याति’ नामकी स्त्रीसे लक्ष्मीका आविर्भाव हुआ। भृगुने विष्णुभगवान्के साथ लक्ष्मीका विवाह कर दिया। लक्ष्मी भी संसारके पति भगवान् विष्णुको वरके रूपमें प्राप्तकर अपनेको कृतार्थ मानकर अपने कृपाकटाक्षसे सम्पूर्ण जगत्को आनन्दित करने लगीं। उन्हींसे प्रजाओंमें क्षेम और सुभिक्ष होने लगा। सभी उपद्रव शान्त हो गये। ब्राह्मण हवन करने लगे, देवगण हविष्य-भोजन प्राप्त करने लगे और राजा प्रसन्नतापूर्वक चारों वर्णोंकी रक्षा करने लगे। इस प्रकार देवगणोंको अतीव आनन्दमें निमग्न देखकर विरोचन आदि दैत्यगण लक्ष्मीकी प्राप्तिके लिये तपस्या एवं यज्ञ-यागादि करने लगे।

वे सब भी सदाचारी और धार्मिक हो गये। फिर दैत्योंके पराक्रमसे सारा संसार आक्रान्त हो गया।

कुछ समय बाद देवताओंको लक्ष्मीका मद हो गया, उन लोगोंके शौच, पवित्रता, सत्यता और सभी उत्तम आचार नष्ट होने लगे। देवताओंको सत्य आदि शील तथा पवित्रतासे रहित देखकर लक्ष्मी दैत्योंके पास चली गयीं और देवगण श्रीविहीन हो गये। दैत्योंको भी लक्ष्मीकी प्राप्ति होते ही बहुत गर्व हो गया और दैत्यगण परस्पर कहने लगे कि ‘मैं ही देवता हूँ, मैं ही यज्ञ हूँ, मैं ही ब्राह्मण हूँ, सम्पूर्ण जगत् मेरा ही स्वरूप है, ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, चन्द्र आदि सब मैं ही हूँ।’ इस प्रकार अतिशय अहंकारयुक्त हो वे अनेक प्रकारका अनर्थ करने लगे। अहंकारमति दैत्योंकी भी यह दशा देखकर व्याकुल हो वह भृगुकन्या भगवती लक्ष्मी क्षीरसागरमें प्रविष्ट हो गयीं। क्षीरसागरमें लक्ष्मीके प्रवेश करनेसे तीनों लोक श्रीविहीन होकर अत्यन्त निस्तेज-से हो गये।

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