भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
देवराज इन्द्रने अपने गुरु बृहस्पतिसे पूछा— महाराज! कोई ऐसा व्रत बतायें, जिसका अनुष्ठान करनेसे पुनः स्थिर लक्ष्मीकी प्राप्ति हो जाय।
देवगुरु बृहस्पति बोले—देवेन्द्र! मैं इस सम्बन्धमें आपको अत्यन्त गोपनीय श्रीपञ्चमीव्रतका विधान बतलाता हूँ। इसके करनेसे आपका अभीष्ट सिद्ध होगा। ऐसा कहकर देवगुरु बृहस्पतिने देवराज इन्द्रको श्रीपञ्चमीव्रतकी साङ्गोपाङ्ग विधि बतलाई। तदनुसार इन्द्रने उसका विधिवत् आचरण किया। इन्द्रको व्रत करते देखकर विष्णु आदि सभी देवता, दैत्य, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, सिद्ध, विद्याधर, नाग, ब्राह्मण, ऋषिगण तथा राजागण भी यह व्रत करने लगे। कुछ कालके अनन्तर व्रत समाप्तकर उत्तम बल और तेज पाकर सबने विचार किया कि समुद्रको मथकर लक्ष्मी और अमृतको ग्रहण करना चाहिये। यह विचारकर देवता और असुर मन्दरपर्वतको मथानी और वासुकिनागको रस्सी बनाकर समुद्र-मन्थन करने लगे। फलस्वरूप सर्वप्रथम शीतल किरणोंवाले अति उज्ज्वल चन्द्रमा प्रकट हुए, फिर देवी लक्ष्मीका प्रादुर्भाव हुआ। लक्ष्मीके कृपाकटाक्षको पाकर सभी देवता और दैत्य परम आनन्दित हो गये। भगवती लक्ष्मीने भगवान् विष्णुके वक्षःस्थलका आश्रय ग्रहण किया, भगवान् विष्णुने इस व्रतको किया था, फलस्वरूप लक्ष्मीने इनका वर्ण किया। इन्द्रने राजस-भावसे व्रत किया था, इसलिये उन्होंने त्रिभुवनका राज्य प्राप्त किया। दैत्योंने तामस-भावसे व्रत किया था, इसलिये ऐश्वर्य पाकर भी वे ऐश्वर्यहीन हो गये। महाराज! इस प्रकार इस व्रतके प्रभावसे श्रीविहीन सम्पूर्ण जगत् फिरसे श्रीयुक्त हो गया।
महाराज युधिष्ठिरने पूछा—यदूतम! यह श्रीपञ्चमीव्रत किस विधिसे किया जाता है, कबसे यह प्रारम्भ होता है और इसकी पारणा कब होती है? आप इसे बतानेकी कृपा करें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! यह व्रत मार्गशीर्ष मासके शुक्ल पक्षकी पञ्चमीको करना चाहिये। प्रातः उठकर शौच, दन्तधावन आदिसे निवृत्त हो व्रतके नियमको धारण करे। फिर नदीमें अथवा घरपर ही स्नान करे। दो वस्त्र धारण कर देवता और पितरोंका पूजन-तर्पण कर घर आकर लक्ष्मीका पूजन करे। सुवर्ण, चाँदी, ताम्र, आरकूट, काष्ठकी अथवा चित्रपटमें भगवती लक्ष्मीकी ऐसी प्रतिमा बनाये जो कमलपर विराजमान हो, हाथमें कमल-पुष्प धारण किये हो, सभी आभूषणोंसे अलंकृत हो, उनके लोचन कमलके समान हों और जिन्हें चार श्वेत हाथी सुवर्णके कलशोंके जलसे स्नान करा रहे हों। इस प्रकारकी भगवती लक्ष्मीकी प्रतिमाकी निम्नलिखित नाम-मन्त्रोंसे ऋतुकालोद्भूत पुष्पोंद्वारा अङ्गपूजा करे—
‘ॐ चपलायै नमः, पादौ पूजयामि’, ‘ॐ चञ्चलायै नमः, जानुनी पूजयामि’, ‘ॐ कमलवासिन्यै नमः, कटि पूजयामि’, ‘ॐ ख्यात्यै नमः, नाभि पूजयामि’, ‘ॐ मन्मथवासिन्यै नमः, स्तनौ पूजयामि’, ‘ॐ ललितायै नमः, भुजद्वयं पूजयामि’, ‘ॐ उत्कण्ठितायै नमः, कण्ठ पूजयामि’, ‘ॐ माधव्यै नमः, मुखमण्डलं पूजयामि’ तथा ‘ॐ श्रियै नमः, शिरः पूजयामि’ आदि नाम-मन्त्रोंसे पैरसे लेकर सिरतक पूजा करे। इस प्रकार प्रत्येक अङ्गोंकी भक्तिपूर्वक पूजाकर अंकुरित विविध धान्य और अनेक प्रकारके फल नैवेद्यमें देवीको निवेदित करे। तदनन्तर पुष्प और कुंकुम आदिसे सुवासिनी स्त्रियोंका पूजन कर उन्हें मधुर भोजन कराये और प्रणाम कर बिदा करे। एक प्रस्थ (सेरभर) चावल और घृतसे भरा पात्र ब्राह्मणको देकर ‘श्रीशः सम्प्रीयताम्’ इस प्रकार कहकर प्रार्थना करे। इस तरह पूजन कर मौन हो भोजन करे। प्रतिमास यह व्रत करे और श्री, लक्ष्मी, कमला, सम्पत्, रमा,
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