भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 438, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरपर्व *
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नारायणी, पद्मा, धृति, स्थिति, पुष्टि, ऋद्धि तथा सिद्धि—इन बारह नामोंसे क्रमशः बारह महिनोंमें भगवती लक्ष्मीकी पूजा करे और पूजनके अन्तमें 'प्रीयताम्' ऐसा उच्चारण करे। बारहवें महिनेकी पञ्चमीको वस्त्रसे उत्तम मण्डप बनाकर गन्ध-पुष्पादिसे उसे अलंकृतकर उसके मध्य शय्यापर उपकरणोंसहित भगवती लक्ष्मीकी मूर्ति स्थापित करे। आठ मोती, नेत्रपट्ट, ससधान्य, खड्गऊँ, जूता, छाता, अनेक प्रकारके पात्र और आसन वहाँ उपस्थापित करे। तदनन्तर लक्ष्मीका पूजन कर वेदवेत्ता और सदाचारसम्पन्न ब्राह्मणको सवत्सा गौसहित यह सब सामग्री प्रदान करे। यथाशक्ति ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन्हें दक्षिणा दे। अन्तमें भगवती लक्ष्मीसे ऋद्धिकी कामनासे इस प्रकार प्रार्थना करे—
क्षीराब्धिमथनोद्भूते विष्णोर्वक्षःस्थलालये। सर्वकामप्रदे देवि ऋद्धिं यच्छ नमोऽस्तु ते ॥
(उत्तरपर्व ३७।५४)
'हे देवि! आप क्षीरसागरके मन्थनसे उद्भूत हैं, भगवान् विष्णुका वक्षःस्थल आपका अधिष्ठान है, आप सभी कामनाओंको प्रदान करनेवाली हैं, अतः मुझे भी आप ऋद्धि प्रदान करें, आपको नमस्कार है।'
जो इस विधिसे श्रीपञ्चमीका व्रत करता है, वह अपने इक्कीस कुलोंके साथ लक्ष्मीलोकमें निवास करता है। जो सौभाग्यवती स्त्री इस व्रतको करती है, वह सौभाग्य, रूप, संतान और धनसे सम्पन्न हो जाती है तथा पतिको अत्यन्त प्रिय होती है।
(अध्याय ३७)
विशोक-षष्ठी-व्रत
राजा युधिष्ठिरने कहा—जनार्दन! आपके श्रीमुखसे पञ्चमी-व्रतोंका विधान सुनकर बहुत प्रसन्नता हुई। अब आप षष्ठीव्रतोंका विधान बतलायें। मैंने सुना है कि षष्ठीको भगवान् सूर्यकी पूजा करनेसे सभी व्याधियाँ शान्त हो जाती हैं और सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! सर्वप्रथम मैं विशोक-षष्ठी-व्रतका विधान बतलाता हूँ। इस तिथिको उपवास करनेसे मनुष्यको कभी शोक नहीं होता। माघ मासके शुक्ल पक्षकी पञ्चमीको प्रभातकालमें उठकर दन्तधावन करे, कृष्ण तिलोंसे स्नान आदिद्वारा पवित्र हो कृशर (खिचड़ी)-का भोजन करे, रात्रिमें ब्रह्मचर्यपूर्वक रहे। दूसरे दिन षष्ठीको प्रभातकालमें उठकर स्नान आदिसे पवित्र हो जाय। सुवर्णका एक कमल बनाये, उसे सूर्यनारायणका स्वरूप मानकर रक्तचन्दन, रक्तकरवीर-पुष्प और रक्तवर्णके दो वस्त्र, धूप,
दीप, नैवेद्य आदिसे उनका पूजन करे। तदनन्तर हाथ जोड़कर इस मन्त्रसे प्रार्थना करे—
यथा विशोकं भवनं त्वयैवादित्य सर्वदा।
तथा विशोकता मे स्यात् त्वद्भक्तिर्जन्मजन्मनि ॥
(उत्तरपर्व ३८।७)
'हे आदित्यदेव! जैसे आपने अपना स्थान शोकसे रहित बनाया है, वैसे ही मेरा भी भवन सदा शोकरहित हो तथा जन्म-जन्ममें मेरी आपमें भक्ति बनी रहे।'
इस विधिसे पूजनकर षष्ठीको ब्राह्मण-भोजन कराये। गोमूत्रका प्राशन करे। फिर गुड़, अन्न, उत्तम दो वस्त्र और सुवर्ण ब्राह्मणको प्रदान करे। सप्तमीको मौन होकर तेल और लवणरहित भोजन करे तथा पुराण भी श्रवण करे। इस प्रकार एक वर्षपर्यन्त दोनों पक्षोंकी षष्ठीका व्रतकर अन्तमें शुक्ल सप्तमीको सुवर्ण-कमलयुक्त कलश, श्रेष्ठ सामग्रियोंसे युक्त उत्तम शय्या और पयस्विनी
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