भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 439, कुल 654 में से
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
कपिला गौ ब्राह्मणको दान करे। इस विधिसे कृपणता छोड़कर जो इस व्रतको करता है, वह करोड़ों वर्षोंसे भी अधिक समयतक शोक, रोग, दुर्गति आदिसे मुक्त रहता है। यदि किसी कामनासे यह व्रत किया जाय तो उसकी वह कामना
अवश्य पूर्ण होती है और यदि निष्काम होकर व्रत करे तो उसे मोक्षकी प्राप्ति होती है। जो इस शोक-विनाशिनी विशेष-षष्ठीको एक बार भी उपवास करता है, वह कभी दुःखी नहीं होता और इन्द्रलोकमें निवास करता है। (अध्याय ३८)
कमलषष्ठी ( फलषष्ठी )-व्रत
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! अब मैं कमल-षष्ठी नामक व्रतको बतलाता हूँ, जिसमें उपवास करनेसे व्यक्ति पापमुक्त होकर स्वर्गको प्राप्त करता है। मार्गशीर्ष मासके शुक्ल पक्षकी पञ्चमीको नियतव्रत होकर षष्ठीको उपवास करे। कृष्ण सप्तमीको सुवर्णकमल, सुवर्णफल तथा शर्कराके साथ कलश ब्राह्मणको प्रदान करे। इसी विधिसे एक वर्षपर्यन्त दोनों पक्षोंमें प्रत्येक षष्ठीको उपवास करे। भानु, अर्क, रवि, ब्रह्मा, सूर्य, शुक्र, हरि, शिव, श्रीमान्, विभावसु, त्वष्टा तथा वरुण—इन बारह नामोंसे क्रमशः बारह महीनोंमें पूजन करे और 'भानुमें प्रीयताम्', 'अर्को मे प्रीयताम्' इस प्रकार प्रतिमास सप्तमीको दान और षष्ठी-पूजन आदिके समय उच्चारण करे। व्रतके अन्तमें ब्राह्मण-दम्पतिकी पूजाकर वस्त्र-आभूषण, शर्करापूर्ण कलश और
सुवर्णकमल तथा स्वर्णफल ब्राह्मणको देकर निम्नलिखित मन्त्र पढ़कर व्रत पूर्ण करे—
यथा फलकरो मासस्त्वद्भक्तानां सदा रवे। तथानन्तफलावासिरस्तु जन्मनि जन्मनि॥
(उत्तरपर्व ३९।११)
'हे सूर्यदेव! जिस प्रकार आपके भक्तोंके लिये यह मास-व्रत फलदायी होता है, उसी प्रकार मुझे भी जन्म-जन्ममें अनन्त फलोंकी प्राप्ति होती रहे।'
इस अनन्त फल देनेवाली फलषष्ठी-व्रतको जो करता है, वह सुरापानादि सभी पापोंसे मुक्त हो सूर्यलोकमें सम्मानित होता है और अपने आगे-पीछेकी इक्कीस पीढ़ियोंका उद्धार करता है। जो इसका माहात्म्य श्रवण करता है, वह भी कल्याणका भागी होता है।*
(अध्याय ३९)
मन्दारषष्ठी-व्रत
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! अब मैं सभी पापोंको दूर करनेवाले तथा समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले मन्दारषष्ठी नामक व्रतका विधान बतलाता हूँ। व्रती माघ मासके शुक्ल पक्षकी पञ्चमी तिथिको स्वल्प भोजन कर नियमपूर्वक रहे और षष्ठीको उपवास करे। ब्राह्मणोंका पूजन करे तथा मन्दारका पुष्प भक्षण कर रात्रिमें शयन करे। षष्ठीको प्रातः उठकर स्नानादि करे तथा ताम्रपत्रमें काले तिलोंसे एक अष्टदल कमल बनाये।
उसपर हाथमें कमल लिये भगवान् सूर्यकी सुवर्णकी प्रतिमा स्थापित करे। आठ सोनेके अर्कपुष्पोंसे तथा गन्धादि उपचारोंसे अष्टदल-कमलके दलोंमें पूर्वदि क्रमसे भगवान् सूर्यके नाम-मन्त्रोंद्वारा इस प्रकार पूजा करे—'ॐ भास्कराय नमः' से पूर्व दिशामें, 'ॐ सूर्याय नमः' से अग्रिकोणमें, 'ॐ अर्काय नमः' से दक्षिणमें, 'ॐ अर्यम्नो नमः' से नैऋत्यमें, 'ॐ वसुधात्रे नमः' से पश्चिममें, 'ॐ चण्डभानवे नमः' से वायव्यमें,
- मत्स्यपुराणके अध्याय ७६ में फलसप्तमी नामसे इसी व्रतका वर्णन हुआ है।
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