भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 440, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरपर्व *
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'ॐ पूष्णे नमः' से उत्तरमें, 'ॐ आनन्दाय नमः' से ईशानकोणमें तथा उस कमलकी मध्यवर्ती कर्णिकामें 'ॐ सर्वात्मने पुरुषाय नमः' यह कहकर शुक्ल वस्त्र, नैवेद्य तथा माल्य एवं फलादि सभी उपचारोंसे भगवान् सूर्यका पूजन करे। ससमीको पूर्वाभिमुख मौन होकर तेल तथा लवण भक्षण करे। इस प्रकार प्रत्येक मासकी शुक्ल-षष्ठीको व्रतकर ससमीको पारण करे। वर्षके अन्तमें वही मूर्ति कलशके ऊपर स्थापित कर यथाशक्ति वस्त्र, गौ, सुवर्ण आदि ब्राह्मणको प्रदान करे और दान करते समय यह मन्त्र पढ़े—
नमो मन्दारनाथाय मन्दारभवनाय च। त्वं च वै तारयस्वास्मानस्मात् संसारकर्दमात्॥
(उत्तरपर्व ४०।११)
'हे मन्दारभवन, मन्दारनाथ भगवान् सूर्य! आप हमलोगोंका इस संसाररूपी पङ्कसे उद्धार कर दें, आपको नमस्कार है।'
इस विधिसे जो मन्दारषष्ठीका व्रत करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर एक कल्पतक सुखपूर्वक स्वर्गमें निवास करता है और जो इस विधानको पढ़ता है अथवा सुनता है, वह भी सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है*। (अध्याय ४०)
ललिताषष्ठी-व्रतकी विधि
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षकी षष्ठीको यह व्रत होता है। उस दिन उत्तम रूप, सौभाग्य और संतानकी इच्छावाली स्त्रीको चाहिये कि वह नदीमें स्नान करे और एक नये बाँसके पात्रमें बालू लेकर घर आये। फिर वस्त्रका मण्डप बनाकर उसमें दीप प्रज्वलित करे। मण्डपमें वह बाँसका बालुकामय पात्र स्थापित कर उसमें बालुकामयी, तपोवन-निवासिनी भगवती ललितागौरीका ध्यानकर पूजन करे और उस दिन उपवास रहे, तदनन्तर चम्पक, करवीर, अशोक, मालती, नीलोत्पल, केतकी तथा तगर-पुष्प—इनमेंसे प्रत्येककी १०८ या २८ पुष्पाञ्जलि अक्षतोंके साथ निम्नलिखित मन्त्रसे दे—
ललिते ललिते देवि सौख्यसौभाग्यदायिनि।
या सौभाग्यसमुत्पन्ना तस्यै देव्यै नमो नमः॥
(उत्तरपर्व ४१।८)
इस प्रकारसे पूजन करनेके पश्चात् तरह-तरहके सोहाल, मोदक आदि पक्वान, कूष्माण्ड, ककड़ी,
बिल्व, करेला, बैगन, करंज आदि फल भगवती ललिताको निवेदित करे और धूप, दीप, वस्त्राभूषण आदि भी समर्पित करे। इस विधिसे पूजनकर रात्रिको जागरण करे तथा गीत-नृत्यादि उत्सव करे। दूसरे दिन प्रातः गीत-वाद्यसहित मूर्तिको नदीके समीप ले जाय। वहाँ पूजनकर पूजन-सामग्री ब्राह्मणको निवेदित कर दे और भगवती ललिताकी बालुकामयी मूर्तिको नदीमें विसर्जित कर दे। घर आकर हवन करे और देवता, पितर, मनुष्य तथा सुवासिनी स्त्रियोंका पूजन करे। पंद्रह कुमारी कन्याओंको और उतने ही ब्राह्मणोंको अनेक प्रकारके स्वादिष्ट भोजनोंसे संतुष्ट कर दक्षिणा प्रदान करे और 'ललिता प्रीतियुक्ता अस्तु' यह कहकर उन्हें बिदा करे। जो पुरुष अथवा स्त्री इस ललिताषष्ठी-व्रतको करते हैं, उन्हें संसारमें कोई पदार्थ दुर्लभ नहीं रहता। व्रत करनेवाली स्त्री बहुत कालपर्यन्त सुख-सौभाग्यसे सम्पन्न रहकर अन्तमें गौरीलोकमें निवास करती है। (अध्याय ४१)
- मत्स्यपुराणके अध्याय ७९ में मन्दारससमी नामसे इसी व्रतका वर्णन हुआ है।
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