भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 441, कुल 654 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 441

४३०

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

कुमारषष्ठी-व्रतकी कथा

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—भरतसत्तम महाराज युधिष्ठिर! मार्गशीर्ष मासके शुक्ल पक्षकी षष्ठी तिथि समस्त पापनाशिनी, धन-धान्य तथा शान्ति-प्रदायिनी एवं अतिकल्याणकारिणी है। उसी दिन कार्तिकेयने तारकासुरका वध किया था, इसलिये यह षष्ठी तिथि स्वामिकार्तिकेयको बहुत प्रिय है। इस दिन किया हुआ स्नान-दान आदि कर्म अक्षय होता है। दक्षिण देशमें स्थित कार्तिकेयका जो इस तिथिमें दर्शन करता है, वह निःसंदेह ब्रह्महत्यादि पापोंसे मुक्त हो जाता है, इसलिये इस तिथिमें कुमारस्वामीकी सोने, चाँदी अथवा मिट्टीकी मूर्ति बनवाकर पूजा करनी चाहिये। अपराह्णमें स्नान तथा आचमनकर, पद्मासन लगाकर बैठ जाय और स्वामी कुमारका एकाग्रचित्तसे ध्यान करे। इस दिन उपवासपूर्वक निम्नलिखित मन्त्र पढ़ते हुए इनके मस्तकपर कलशसे अभिषेक करे—

चन्द्रमण्डलभूतानां भवभूतिपवित्रिता।

गङ्गाकुमार धारेर्यं पतिता तव मस्तके॥

(उत्तरपर्व ४२।७)

इस प्रकार अभिषेक कर भगवान् सूर्यका पूजन करे, तदनन्तर गन्ध, पुष्प, धूप, नैवेद्य आदि उपचारोंद्वारा कृतिकापुत्र कार्तिकेयकी निम्न मन्त्रसे पूजा करे—

देव सेनापते स्कन्द कार्तिकेय भवोद्भव।

कुमार गुह गाङ्ग्रेय शक्तिहस्त नमोऽस्तु ते॥

(उत्तरपर्व ४२।९)

दक्षिण-देशोत्पन्न अन्न, फल और मलय चन्दन भी चढ़ाये। इसके बाद स्वामिकार्तिकेयके परमप्रिय छाग, कुकुट, कलापयुक्त मयूर तथा उनकी माता भगवती पार्वती—इनका प्रत्यक्ष पूजन करे अथवा इनकी सुवर्णकी प्रतिमा बनाकर पूजन करे। पूजनके अनन्तर पूर्वोक्त देवसेनापति

तथा स्कन्द आदि नाम-मन्त्रोंसे आज्ययुक्त तिलोंसे हवन करे, अनन्तर फल भक्षण कर भूमिपर कुशाकी शय्यापर शयन करे। क्रमशः बारह महीनोंमें नारियल, मातुलुंग (बिजौरा नींबू), नारंगी, पनस (कटहल), जम्बीर (एक प्रकारका नींबू), दाड़िम, द्राक्षा, आम्र, बिल्व, आमलक, ककड़ी तथा केला—इन फलोंका भक्षण करे। ये फल उपलब्ध न हों तो उस कालमें उपलब्ध फलोंका सेवन करे। प्रातःकाल सोनेके बने छाग अथवा कुकुटका 'सेनानी प्रीयताम्' ऐसा कहकर ब्राह्मणको दे। बारह महीनोंमें क्रमसे सेनानी, सम्भूत, क्रीञ्चारि, षण्मुख, गुह, गाङ्ग्रेय, कार्तिकेय, स्वामी, बालग्रहाग्रणी, छागप्रिय, शक्तिधर तथा द्वार—इन नामोंसे कार्तिकेयका पूजन करे और नामोंके अन्तमें 'प्रीयताम्' यह पद योजित करे। यथा—'सेनानी प्रीयताम्' इत्यादि। इसके पश्चात् ब्राह्मणोंको भोजन कराकर स्वयं भी मौन होकर भोजन करे। वर्ष समाप्त होनेपर कार्तिक मासके शुक्ल पक्षकी षष्ठीको वस्त्र, आभूषण आदिसे कार्तिकेयका पूजन एवं हवन करे और सब सामग्री ब्राह्मणको निवेदित कर दे।

इस विधिसे जो पुरुष अथवा स्त्री इस व्रतको करते हैं, वे उत्तम फलोंको प्राप्त कर इन्द्रलोकमें निवास करते हैं, अतः राजन्! शंकरात्मज कार्तिकेयका सदा प्रयत्नपूर्वक पूजन करना चाहिये। राजाओंके लिये तो कार्तिकेयकी पूजाका विशेष महत्त्व है। जो राजा स्वामी कुमारका इस प्रकार पूजनकर युद्धके लिये जाता है, वह अवश्य ही विजय प्राप्त करता है। विधिपूर्वक पूजा करनेपर भगवान् कार्तिकेय पूर्ण प्रसन्न हो जाते हैं। जो षष्ठीको नक्तव्रत करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर कार्तिकेयके लोकमें निवास करता है। दक्षिण दिशामें जाकर

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth