भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 442, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरपर्व *
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जो भक्तिपूर्वक कार्तिकेयका दर्शन और पूजन करता है वह शिवलोकको प्राप्त करता है। जो सदा शरवणोद्भव आदिदेव कार्तिकेयकी आराधना
करता है, वह बहुत कालतक स्वर्गका सुख भोगकर पृथ्वीपर जन्म ग्रहण करता तथा चक्रवर्ती राजाका सेनापति होता है। (अध्याय ४२)
विजयाससमी-व्रत
युधिष्ठिरने पूछा—देव! विजयाससमी-व्रतमें किसकी पूजा की जाती है, उसका क्या विधान है और क्या फल है? इसे आप बतलानेकी कृपा करें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! शुक्ल पक्षकी ससमी तिथिको यदि आदित्यवार हो तो उसे विजया ससमी कहते हैं। वह सभी पातकोंका विनाश करनेवाली है। उस दिन किया हुआ स्नान, दान, जप, होम तथा उपवास आदि कर्म अनन्त फलदायक होता है। जो उस दिन फल, पुष्प आदि लेकर भगवान् सूर्यकी प्रदक्षिणा करता है, वह सर्वगुणसम्पन्न उत्तम पुत्रको प्राप्त करता है। पहली प्रदक्षिणा नारियल-फलोंसे, दूसरी रक्तनागरसे, तीसरी बिजौरा नींबूसे, चौथी कदलीफलसे, पाँचवीं श्रेष्ठ कृष्णाण्डसे, छठी पके हुए तेंदुके फलोंसे और सातवीं वृन्ताक-फलोंसे करे अथवा अष्टोत्तरशत प्रदक्षिणा करे। मोती, पद्मराग, नीलम, पन्ना, गोमेद, हीरा और वैदूर्य आदिसे भी प्रदक्षिणा करे तथा अखरोट, बेर, बिल्व, करौंदा, आम्र, आम्रातक (आमड़ा), जामुन आदि जो भी उस कालमें फल-फूल मिले उससे प्रदक्षिणा करे। प्रदक्षिणा करते समय बीचमें बैठे नहीं, न किसीको स्पर्श करे और न किसीसे बात करे। एकाग्रचित्तसे प्रदक्षिणा करनेसे सूर्यभगवान् प्रसन्न होते हैं। गौके घृतसे वसोर्धारा भी दे। किंकिणीयुक्त ध्वजा तथा श्वेत छत्र चढ़ाये और फिर कुंकुम, गन्ध, पुष्प, धूप तथा नैवेद्य आदि उपचारोंसे पूजन कर इस मन्त्रसे भगवान् सूर्यसे क्षमा-प्रार्थना करे—
भानो भास्कर मार्तण्ड चण्डरश्मे दिवाकर।
आरोग्यमायुर्विजयं पुत्रं देहि नमोऽस्तु ते॥
(उत्तरपर्व ४३।१४)
इस व्रतमें उपवास, नक्तव्रत अथवा अयाचित-व्रत करे। इस विजयाससमीका नियमपूर्वक व्रत करनेसे रोगी रोगसे मुक्त हो जाता है, दरिद्र लक्ष्मी प्राप्त करता है, पुत्रहीन पुत्र प्राप्त करता है तथा विद्यार्थी विद्या प्राप्त करता है। शुक्ल पक्षकी आदित्यवारयुक्त सात ससमियोंमें नक्तव्रत कर मूँगका भोजन करना चाहिये। भूमिपर पलाशके पत्तोंपर शयन करना चाहिये। इस प्रकार व्रतकी समाप्तिपर सूर्यभगवान्का पूजनकर षडक्षर-मन्त्र ('खखोल्लाक्य नमः')-से अष्टोत्तरशत हवन करे। सुवर्णपात्रमें सूर्यप्रतिमा स्थापित कर रक्त वस्त्र, गौ और दक्षिणा इस मन्त्रका उच्चारण करते हुए ब्राह्मणको प्रदान करे—
ॐ भास्कराय सुदेवाय नमस्तुभ्यं यशस्कर॥
ममाद्य समीहितार्थप्रदो भव नमो नमः।
(उत्तरपर्व ४३।२३-२४)
तदनन्तर शय्या-दान, श्राद्ध, पितृर्पण आदि कर्म करे। इस व्रतके करनेसे यात्रियोंकी यात्रा प्रशस्त हो जाती है, विजयकी इच्छावाले राजाको युद्धमें विजय अवश्य प्राप्त होती है, इसलिये लोकमें यह विजया ससमीके नामसे विश्रुत है। इस व्रतको करनेवाला पुरुष संसारके समस्त सुखोंको भोगकर सूर्यलोकमें निवास करता है और फिर पृथ्वीपर जन्म ग्रहणकर दानी, भोगी, विद्वान्, दीर्घायु, नीरोग, सुखी और हाथी, घोड़े तथा रत्नोंसे सम्पन्न बड़ा प्रतापी राजा होता है। यदि स्त्री इस व्रतको करे तो वह पुण्यभागिनी होकर उत्तम फलोंको प्राप्त करती है। राजन्! इसमें आपको किंचित् भी संदेह नहीं करना चाहिये। (अध्याय ४३)
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