भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

आदित्य-मण्डलदान-विधि

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! अब मैं समस्त अशुभोंके निवारण करनेवाले श्रेयस्कर आदित्य-मण्डलके दानका वर्णन करता हूँ। जो अथवा गोधूमके चूर्णमें गुड़ मिलाकर उसे गौके घृतमें भलीभाँति पकाकर सूर्यमण्डलके समान एक अति सुन्दर अपूप बनाये और फिर सूर्यभगवान्का पूजनकर उनके आगे रक्त चन्दनका मण्डप अंकितकर उसके ऊपर वह सूर्यमण्डलात्मक मण्डक (एक प्रकारका पिष्टक) रखे। ब्राह्मणको सादर आमन्त्रित कर रक्त वस्त्र तथा दक्षिणासहित वह मण्डक इस मन्त्रको पढ़ते हुए ब्राह्मणको प्रदान करे—

आदित्यतेजसोत्पन्नं राजतं विधिनिर्मितम्।

श्रेयसे मम विप्र त्वं प्रतिगृह्णैदमुत्तमम्॥

(उत्तरपर्व ४४।५)

ब्राह्मण भी उसे ग्रहणकर निम्नलिखित मन्त्र बोले— कामदं धनदं धर्म्यं पुत्रदं सुखदं तव। आदित्यप्रीतये दत्तं प्रतिगृह्णाहि मण्डलम्॥

(उत्तरपर्व ४४।६)

इस प्रकार विजयससमीको मण्डकका दान करे और सामर्थ्य होनेपर सूर्यभगवान्की प्रीतिके लिये शुद्धभावसे नित्य ही मण्डक प्रदान करे। इस विधिसे जो मण्डकका दान करता है, वह भगवान् सूर्यके अनुग्रहसे राजा होता है और स्वर्गलोकमें भगवान् सूर्यकी तरह सुशोभित होता है। (अध्याय ४४)

वर्ज्यससमी-व्रत

महाराज युधिष्ठिरने कहा—भगवन्! धन, सौख्य तथा समस्त मनोवाञ्छित कामनाओंको प्रदान करनेवाली किसी ससमीव्रतका आप वर्णन करें।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! उत्तरायणके व्यतीत हो जानेपर शुक्ल पक्षमें पुरुषवाची नक्षत्रमें आदित्यवारको ससमी-तिथि-व्रत ग्रहण करे। धान, तिल, जौ, उड़द, मूँग, गेहूँ, मधु, निन्द्य भोजन, मैथुन, कांस्यपात्रमें भोजन, तैलाभ्यङ्ग, अंजन और शिलापर पीसी हुई वस्तु—इन सबका

षष्ठी तिथिको प्रयोग न करे। इन पदार्थोंका षष्ठीके दिन परित्याग कर केवल चनाका भोग करे और देवता, मुनि तथा पित्र—इन सबका तर्पण कर भगवान् सूर्यका पूजन करे। घृतयुक्त तिल और जौका हवन कर भगवान् सूर्यका ध्यान करता हुआ भूमिपर शयन करे। इस विधिसे जो एक वर्षतक व्रत करता है, वह अपने सभी मनोवाञ्छित फलको प्राप्त कर लेता है।

(अध्याय ४५)

कुक्कुट-मर्कटी-व्रतकथा (मुक्ताभरण ससमीव्रत-कथा)

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज युधिष्ठिर! एक बार महर्षि लोमश मथुरा आये और वहाँ मेरे माता-पिता—देवकी-वसुदेवने उनकी बड़ी श्रद्धासे आवभगत की। फिर वे प्रेमसे बैठकर अनेक

प्रकारकी कथाएँ कहने लगे। उन्होंने उसी प्रसंगमें मेरी मातासे कहा—‘देवकी! कंसने तुम्हारे बहुतसे पुत्रोंको मार डाला है, अतः तुम मृतवत्सा एवं दुःखभागिनी बन गयी हो। इसी प्रकारसे प्राचीन

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