भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
वरसे कुछ भी लेना नहीं चाहिये। जिन कन्याओंके निमित्त वर-पक्षसे दिया हुआ वस्त्राभूषणादि पिता-भ्राता आदि नहीं लेते, प्रत्युत कन्याको ही देते हैं, वह विक्रय नहीं है। यह कुमारियोंका पूजन है, इसमें कोई हिंसादि दोष नहीं है। इस प्रकार उत्तम विवाह करके उत्तम देशमें निवास करना चाहिये, इससे बहुत यशकी प्राप्ति होती है।
ऋषियोंने पूछा— ब्रह्मन्! वह कौन-सा देश है, जहाँ निवास करनेसे धर्म और यशकी वृद्धि होती है?
ब्रह्माजी बोले— मुनीश्वरो! जिस देशमें धर्म अपने चारों चरणोंके साथ रहे, जहाँ विद्वान् लोग निवास करते हों और सारे व्यवहार शास्त्रोक्त-रीतिसे सम्पन्न होते हों, वही देश उत्तम और निवास करने योग्य है।
ऋषियोंने पूछा— महाराज! विद्वान् जिस शास्त्रोक्त आचरणको ग्रहण करते हैं और धर्मशास्त्रमें जैसी विधि निर्दिष्ट की गयी है उसे हमें बतलायें, हमें इस विषयमें महान् कौतूहल हो रहा है।
ब्रह्माजी बोले— राग-द्वेषसे रहित सज्जन एवं विद्वान् जिस धर्मका नित्य अपने शुद्ध अन्तःकरणसे आचरण करते हैं, उसे आप सुनें—
इस संसारमें किसी वस्तुकी कामना करना श्रेष्ठ नहीं है। वेदोंका अध्ययन करना और वेदविहित कर्म करना भी काम्य है। संकल्पसे कामना उत्पन्न होती है। वेद पढ़ना, यज्ञ करना, व्रत-
नियम, धर्म आदि कर्म सब संकल्पमूलक ही हैं। इसीलिये सभी यज्ञ, दान आदि कर्म संकल्पपठनपूर्वक किये जाते हैं। ऐसी कोई भी क्रिया नहीं है, जिसमें काम न हो। जो कोई भी जो कुछ करता है वह इच्छासे ही करता है।
श्रुति, स्मृति, सदाचार और अपने आत्माकी प्रसन्नता—इन चार बातोंसे धर्मका निर्णय होता है। श्रुति तथा स्मृतिमें कहे गये धर्मके आचरणसे इस लोकमें बहुत यश प्राप्त होता है और परलोकमें इन्द्रलोककी प्राप्ति होती है। श्रुति वेदको कहते हैं और स्मृति धर्मशास्त्रका नाम है। इन दोनोंसे सभी बातोंका विचार करें, क्योंकि धर्मकी जड़ ये ही हैं, जो धर्मके मूल इन दोनोंका तर्क आदिके द्वारा अपमान करता है, उसे सत्पुरुषोंको तिरस्कृत कर देना चाहिये, क्योंकि वह वेदनिन्दक होनेसे नास्तिक ही है।
जिनके लिये मन्त्रोंद्वारा गर्भाधानसे श्मशानतक संस्कारकी विधि कही गयी है, उन्हीं लोगोंको वेद तथा जपमें अधिकार है। सरस्वती तथा दृषद्वती—इन दो देवनदियोंके बीचका जो देश है वह देवताओंद्वारा बनाया गया है, उसे ब्रह्मावर्त कहते हैं। उस देशमें चारों वर्ण और उपवर्णोंमें जो आचार परम्परासे चला आया है, उसका नाम सदाचार है। कुरुक्षेत्र, मत्स्यदेश, पाञ्चाल और शूरसेन देश (मथुरा)—ये ब्रह्मर्षियोंके द्वारा सेवित हैं, परंतु ब्रह्मावर्तसे कुछ न्यून हैं। इन देशोंमें
१- कामकी गणना चार पुरुषार्थोंमें है। भोगकी कामनाके विरुद्ध योग, यज्ञ, जप-तप, धर्मसंस्थापन और गति-मुक्तिकी कामना ही शुभ कामना है। गीता (७।११)-में भी भगवान् 'धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ॥' कहकर मनको इन्हीं सत्कर्मोंकी ओर प्रेरित करनेकी आज्ञा देते हैं। यह एक प्रकारसे निष्कामताकी जननी है। वैदिक कर्मयोगको भी भविष्यपुराणमें सकाम कहनेका यही भाव है।
२- निगमो धर्ममूलं स्यात् स्मृतिशीले तथैव च । तथाचारश्च साधुनामात्मनस्तुष्टिरेव च ॥
श्रुतिस्मृत्युदितं धर्ममनुतिष्ठन् सदा नरः । प्राप्य चेह परां कीर्तिं याति शक्रसलोकताम् ॥
श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः । ते सर्वाथैषु मीमांस्वे ताभ्यां धर्मां हि निर्बभी ॥
योऽवमन्येत ते चोभे हेतुशास्त्राश्रयाद् द्विजः । स साधुर्बिर्बहिष्कार्यां नास्तिको वेदनिन्दकः ॥
वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्थ च प्रियमात्मनः । एतच्चतुर्विधं विप्राः साक्षाद्भर्त्स्य लक्षणम् ॥ (ब्राह्मपर्व ७।५२, ५४-५७)
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