भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
३४
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
वरसे कुछ भी लेना नहीं चाहिये। जिन कन्याओंके निमित्त वर-पक्षसे दिया हुआ वस्त्राभूषणादि पिता-भ्राता आदि नहीं लेते, प्रत्युत कन्याको ही देते हैं, वह विक्रय नहीं है। यह कुमारियोंका पूजन है, इसमें कोई हिंसादि दोष नहीं है। इस प्रकार उत्तम विवाह करके उत्तम देशमें निवास करना चाहिये, इससे बहुत यशकी प्राप्ति होती है।
ऋषियोंने पूछा— ब्रह्मन्! वह कौन-सा देश है, जहाँ निवास करनेसे धर्म और यशकी वृद्धि होती है?
ब्रह्माजी बोले— मुनीश्वरो! जिस देशमें धर्म अपने चारों चरणोंके साथ रहे, जहाँ विद्वान् लोग निवास करते हों और सारे व्यवहार शास्त्रोक्त-रीतिसे सम्पन्न होते हों, वही देश उत्तम और निवास करने योग्य है।
ऋषियोंने पूछा— महाराज! विद्वान् जिस शास्त्रोक्त आचरणको ग्रहण करते हैं और धर्मशास्त्रमें जैसी विधि निर्दिष्ट की गयी है उसे हमें बतलायें, हमें इस विषयमें महान् कौतूहल हो रहा है।
ब्रह्माजी बोले— राग-द्वेषसे रहित सज्जन एवं विद्वान् जिस धर्मका नित्य अपने शुद्ध अन्तःकरणसे आचरण करते हैं, उसे आप सुनें—
इस संसारमें किसी वस्तुकी कामना करना श्रेष्ठ नहीं है। वेदोंका अध्ययन करना और वेदविहित कर्म करना भी काम्य है। संकल्पसे कामना उत्पन्न होती है। वेद पढ़ना, यज्ञ करना, व्रत-
नियम, धर्म आदि कर्म सब संकल्पमूलक ही हैं। इसीलिये सभी यज्ञ, दान आदि कर्म संकल्पपठनपूर्वक किये जाते हैं। ऐसी कोई भी क्रिया नहीं है, जिसमें काम न हो। जो कोई भी जो कुछ करता है वह इच्छासे ही करता है।
श्रुति, स्मृति, सदाचार और अपने आत्माकी प्रसन्नता—इन चार बातोंसे धर्मका निर्णय होता है। श्रुति तथा स्मृतिमें कहे गये धर्मके आचरणसे इस लोकमें बहुत यश प्राप्त होता है और परलोकमें इन्द्रलोककी प्राप्ति होती है। श्रुति वेदको कहते हैं और स्मृति धर्मशास्त्रका नाम है। इन दोनोंसे सभी बातोंका विचार करें, क्योंकि धर्मकी जड़ ये ही हैं, जो धर्मके मूल इन दोनोंका तर्क आदिके द्वारा अपमान करता है, उसे सत्पुरुषोंको तिरस्कृत कर देना चाहिये, क्योंकि वह वेदनिन्दक होनेसे नास्तिक ही है।
जिनके लिये मन्त्रोंद्वारा गर्भाधानसे श्मशानतक संस्कारकी विधि कही गयी है, उन्हीं लोगोंको वेद तथा जपमें अधिकार है। सरस्वती तथा दृषद्वती—इन दो देवनदियोंके बीचका जो देश है वह देवताओंद्वारा बनाया गया है, उसे ब्रह्मावर्त कहते हैं। उस देशमें चारों वर्ण और उपवर्णोंमें जो आचार परम्परासे चला आया है, उसका नाम सदाचार है। कुरुक्षेत्र, मत्स्यदेश, पाञ्चाल और शूरसेन देश (मथुरा)—ये ब्रह्मर्षियोंके द्वारा सेवित हैं, परंतु ब्रह्मावर्तसे कुछ न्यून हैं। इन देशोंमें
१- कामकी गणना चार पुरुषार्थोंमें है। भोगकी कामनाके विरुद्ध योग, यज्ञ, जप-तप, धर्मसंस्थापन और गति-मुक्तिकी कामना ही शुभ कामना है। गीता (७।११)-में भी भगवान् 'धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ॥' कहकर मनको इन्हीं सत्कर्मोंकी ओर प्रेरित करनेकी आज्ञा देते हैं। यह एक प्रकारसे निष्कामताकी जननी है। वैदिक कर्मयोगको भी भविष्यपुराणमें सकाम कहनेका यही भाव है।
२- निगमो धर्ममूलं स्यात् स्मृतिशीले तथैव च । तथाचारश्च साधुनामात्मनस्तुष्टिरेव च ॥
श्रुतिस्मृत्युदितं धर्ममनुतिष्ठन् सदा नरः । प्राप्य चेह परां कीर्तिं याति शक्रसलोकताम् ॥
श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः । ते सर्वाथैषु मीमांस्वे ताभ्यां धर्मां हि निर्बभी ॥
योऽवमन्येत ते चोभे हेतुशास्त्राश्रयाद् द्विजः । स साधुर्बिर्बहिष्कार्यां नास्तिको वेदनिन्दकः ॥
वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्थ च प्रियमात्मनः । एतच्चतुर्विधं विप्राः साक्षाद्भर्त्स्य लक्षणम् ॥ (ब्राह्मपर्व ७।५२, ५४-५७)
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sanskrit Peeth Bhavishya Puran_Section_3_1_Back
- ब्राह्मपर्व *
३५
उत्पन्न हुए ब्राह्मणोंसे सब देशके मनुष्य अपना-अपना आचार सीखते हैं१। हिमालय और विन्ध्यपर्वतके बीच, विनशनसे पूर्व और प्रयागसे पश्चिम जो देश है उसे मध्यदेश कहते हैं। इन्हीं दोनों पर्वतोंके बीच पूर्व समुद्रसे पश्चिम समुद्रतक जो देश है वह आर्यावर्त कहलाता है२।
जिस देशमें कृष्णसार मृग अपनी इच्छासे नित्य विचरण करें, वह देश यज्ञ करने योग्य होता है। इन शुभ देशोंमें ब्राह्मणको निवास करना चाहिये। इससे भिन्न म्लेच्छ देश हैं। हे मुनीश्वरो! इस प्रकार मैंने यह देशव्यवस्था आप सबको संक्षेपमें सुनायी है। (अध्याय ७)
धन एवं स्त्रीके तीन आश्रय तथा स्त्री-पुरुषोंके पारस्परिक व्यवहारका वर्णन
ब्रह्माजी बोले—मुनीश्वरो! उत्तम रीतिसे विवाह सम्पन्न कर गृहस्थको जो करना चाहिये, उसका मैं वर्णन करता हूँ।
सर्वप्रथम गृहस्थको उत्तम देशमें ऐसा आश्रय दूँदना चाहिये, जहाँ वह अपने धन तथा स्त्रीकी भलीभाँति रक्षा कर सके। बिना आश्रयके इन दोनोंकी रक्षा नहीं हो सकती। ये दोनों—धन एवं स्त्री—त्रिवर्गके हेतु हैं, इसलिये इनकी प्रयत्नपूर्वक रक्षा अवश्य करनी चाहिये। पुरुष, स्थान और घर—ये तीनों आश्रय कहलाते हैं। इन तीनोंसे धन आदिका रक्षण और अर्थोपार्जन होता है। कुलीन, नीतिमान्, बुद्धिमान्, सत्यवादी, विनयी, धर्मात्मा और दृढव्रती पुरुष आश्रयके योग्य होता है। जहाँ धर्मात्मा पुरुष रहते हों, ऐसे नगर अथवा ग्राममें निवास करना चाहिये। ऐसे स्थानमें गुरुजनोंकी अनुमति लेकर अथवा उस ग्राम आदिमें बसनेवाले श्रेष्ठजनोंकी सहमति प्राप्त कर रहनेके लिये अविवादित स्थलमें घर बनाना चाहिये, परंतु किसी पड़ोसीको कष्ट नहीं देना चाहिये। नगरके द्वार, चौक, यज्ञशाला, शिल्पियोंके रहनेके स्थान, जुआ खेलने तथा मांस-मद्यादि बेचनेके स्थान, पाखण्डियों और राजाके नौकरोंके रहनेके स्थान, देवमन्दिरके मार्ग तथा राजमार्ग और राजाके महल—इन स्थानोंसे दूर,
रहनेके लिये अपना घर बनाना चाहिये। स्वच्छ, मुख्य मार्गवाला, उत्तम व्यवहारवाले लोगोंसे आवृत तथा दुष्टोंके निवाससे दूर—ऐसे स्थानमें गृहका निर्माण करना चाहिये। गृहके भूमिकी ढाल पूर्व अथवा उत्तरकी ओर हो। रसोईघर, स्नानागार, गोशाला, अन्तःपुर तथा शयन-कक्ष और पूजाघर आदि सब अलग-अलग बनाये जायँ। अन्तःपुरकी रक्षाके लिये वृद्ध, जितेन्द्रिय एवं विश्वस्त व्यक्तियोंको नियुक्त करना चाहिये। स्त्रियोंकी रक्षा न करनेसे वर्णसंकर उत्पन्न होते हैं और अनेक प्रकारके दोष भी होते देखे गये हैं। स्त्रियोंको कभी स्वतन्त्रता न दे और न उनपर विश्वास करे। किंतु व्यवहारमें विश्वस्तके समान ही चेष्टा दिखानी चाहिये। विशेषरूपसे उसे पाकादि क्रियाओंमें ही नियुक्त करना चाहिये। स्त्रीको किसी भी समय खाली नहीं बैठना चाहिये।
दरिद्रता, अति-रूपवत्ता, असत्-जनोंका सङ्ग, स्वतन्त्रता, पेयादि द्रव्यका पान करना तथा अभक्ष्य-भक्षण करना, कथा, गोष्ठी आदि प्रिय लगना, काम न करना, जादू-टोना करनेवाली, भिक्षुकी, कुट्टिनी, दाई, नटी आदि दुष्ट स्त्रियोंके सङ्ग उद्यान, यात्रा, निमन्त्रण आदिमें जाना, अत्यधिक तीर्थयात्रा करना अथवा देवताके दर्शनोंके लिये घूमना, पतिके
१-एतद्देशप्रसृतस्य
सकाशादग्रजन्मनः । स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेत् पृथिव्यां सर्वमानवाः ॥ (ब्राह्मपर्व ७।५३)
२-आसमुद्रातु वै पूर्वदासमुद्रातु पश्चिमात् । तयोरैवान्तरं गिर्यौरार्यावर्तं विदुर्बुधाः ॥ (ब्राह्मपर्व ७।६५)
584 Sankshipta Bhavishya Puran Section Dhan Pm.dj Created by Sarvagya Sharda Peeth
३६ * संक्षिप्त भविष्यपुराण *
साथ बहुत वियोग होना, कठोर व्यवहार करना, पुरुषोंसे अत्यधिक वार्तालाप करना, अति क्रूर, अति सौम्य, अति निडर होना, ईर्ष्यालु तथा कृपण होना और किसी अन्य स्त्रीके वशीभूत हो जाना—ये सब स्त्रीके दोष उसके विनाशके हेतु हैं। ऐसी स्त्रियोंके अधीन यदि पुरुष हो जाता है तो वह भी निन्दनीय हो जाता है। यह पुरुषकी ही अयोग्यता है कि उसके भृत्य बिगड़ जाते हैं। स्वामी यदि कुशल न हो तो भृत्य और स्त्री बिगड़ जाते हैं, इसलिये समयके अनुसार यथोचित रीतिसे ताडन और शासनसे जिस भाँति हो इनकी रक्षा करनी चाहिये। नारी पुरुषका आधा शरीर है, उसके बिना धर्म-क्रियाओंकी साधना नहीं हो सकती। इस कारण स्त्रीका सदा आदर करना चाहिये। उसके प्रतिकूल नहीं करना चाहिये।
स्त्रीके पतिव्रता होनेके प्रायः तीन कारण देखे जाते हैं—(१) पर-पुरुषमें विरक्ति, (२) अपने पतिमें प्रीति तथा (३) अपनी रक्षामें समर्थता$^१$।
उत्तम स्त्रीको साम तथा दाननीतिसे अपने अधीन रखे। मध्यम स्त्रीको दान और भेदसे और अधम स्त्रीको भेद और दण्डनीतिसे वशीभूत करे। परंतु दण्ड देनेके अनन्तर भी साम-दान आदिसे उसको प्रसन्न कर ले। भर्ताका अहित करनेवाली और व्यभिचारिणी स्त्री कालकूट विषके समान होती है, इसलिये उसका परित्याग कर देना चाहिये। उत्तम कुलमें उत्पन्न पतिव्रता, विनीत और भर्ताका हित चाहनेवाली स्त्रीका सदा आदर करना चाहिये। इस रीतिसे जो पुरुष चलता है वह त्रिवर्गकी प्राप्ति करता है और लोकमें सुख पाता है।
**ब्रह्माजी बोले—**मुनीश्वरो! मैंने संक्षेपमें पुरुषोंको स्त्रियोंके साथ कैसे व्यवहार करना चाहिये, यह बताया। अब पुरुषोंके साथ स्त्रियोंको कैसा व्यवहार करना चाहिये, उसे बता रहा हूँ आप सब सुनें—
पतिकी सम्यक् आराधना करनेसे स्त्रियोंको पतिका प्रेम प्राप्त होता है तथा फिर पुत्र तथा स्वर्ग आदि भी उसे प्राप्त हो जाते हैं, इसलिये स्त्रीको पतिकी सेवा करना आवश्यक है। सम्पूर्ण कार्य विधिपूर्वक किये जानेपर ही उत्तम फल देते हैं और विधि-निषेधका ज्ञान शास्त्रसे जाना जाता है। स्त्रियोंका शास्त्रमें अधिकार नहीं है और न ग्रन्थोंके धारण करनेमें अधिकार है। इसलिये स्त्रीद्वारा शासन अनर्थकारी माना जाता है$^२$। स्त्रीको दूसरेसे विधि-निषेध जाननेकी अपेक्षा रहती है। पहले तो उसे भर्ता सब धर्मोंका निर्देश करता है और भर्ताके मरनेके अनन्तर पुत्र उसे विधवा एवं पतिव्रताके धर्म बतलाये। बुद्धिके विकल्पोंको छोड़कर अपने बड़े पुरुष जिस मार्गपर चले हों, उसीपर चलनेमें उसका सब प्रकारसे कल्याण है। पतिव्रता स्त्री ही गृहस्थके धर्मोंका मूल है। (अध्याय ८-९)
पतिव्रता स्त्रियोंके कर्तव्य एवं सदाचारका वर्णन, स्त्रियोंके लिये गृहस्थ-धर्मके उत्तम व्यवहारकी आवश्यक बातें$^३$
**ब्रह्माजी बोले—**मुनीश्वरो! गृहस्थ-धर्मका मूल पतिव्रता स्त्री है, पतिव्रता स्त्री पतिका आराधन किस विधिसे करे, उसका अब मैं वर्णन करता हूँ। आप सब इसे ध्यानपूर्वक सुनें।
१. सतीत्वे प्रायशः स्त्रीणां प्रदृष्टं कारणत्रयम्। परपुंसामसम्प्रीतिः प्रिये प्रीतिः स्वरक्षणे॥ (ब्राह्मपर्व ८।६६)
२. शास्त्राधिकारो न स्त्रीणां न ग्रन्थानां च धारणे। तस्मादिहान्ये मन्यन्ते तच्छासनमनर्थकम्॥ (ब्राह्मपर्व ९।६)
३. इस प्रकरणमें आगेके कुछ अंश—गोरक्षा, व्यापार, कृषि और लोक-संचालन आदि विषय प्रायः वार्ताशास्त्रसे सम्बन्धित हैं, जो लगभग नष्टप्राय हो गये हैं। इनका संक्षिप्त विवरण भविष्यपुराणमें मिलता है, जिसके कुछ अंश यहाँ दिये जा रहे हैं।
- ब्राह्मपर्व *
३७
आराधना करने योग्य पतिके आराधनकी विधि यह है कि उसकी चितवृत्तिको भलीभाँति जानकर उसके अनुकूल चलना और सदा उसका हित चाहते रहना अर्थात् पतिके चितके अनुकूल चलना और यथोचित व्यवहार करना, यह पतिव्रताका मुख्य धर्म है—
आराध्यानां हि सर्वेषामयमाराधने विधिः । चित्तज्ञानानुवृत्तिश्च हितैषित्वं च सर्वदा ॥
(ब्राह्मपर्व १०।१९)
पतिके माता-पिता, बहिन, ज्येष्ठ भाई, चाचा, आचार्य, मामा तथा वृद्ध स्त्रियों आदिका उसे आदर करना चाहिये और जो सम्बन्धमें अपनेसे छोटे हों, उनको स्नेहपूर्वक आज्ञा देनी चाहिये। जहाँ भी अपनेसे बड़े सास-ससुर या गुरु विद्यमान हों या अपना पति उपस्थित हो वहाँ उनके अनुकूल ही आचरण करना चाहिये; क्योंकि यही चरित्र स्त्रियोंके लिये प्रशस्त माना गया है। हास-परिहास करनेवाले पतिके मित्र और देवर आदिके साथ भी एकान्तमें बैठकर हास-परिहास नहीं करना चाहिये। किसी पुरुषके साथ एकान्तमें बैठना, स्वच्छन्दता और अत्यधिक हास-परिहास करना प्रायः कुलीन स्त्रियोंके पातिव्रत-धर्मको नष्ट करनेके कारण बनते हैं। सहसा दुष्टके संसर्गमें आकर युवकोंके साथ हास-परिहास करना उचित नहीं होता, क्योंकि स्वतन्त्र स्त्रियोंकी निर्भीकता एकान्तमें बुरे आचरणके लिये सफल हो जाती है। अतः उत्तम स्त्रीको ऐसा नहीं करना चाहिये। इस रीतिसे स्त्रीका शील नहीं बिगड़ता और कुलकी निन्दा भी नहीं होती। बुरे संकेत करनेवाले और बुरे भावोंको प्रकट करनेवाले पुरुषोंको भाई या पिताके समान देखते हुए स्त्रीको चाहिये कि उनका सर्वथा परित्याग कर दे। दुष्ट पुरुषोंका अनुचित आग्रह स्वीकार करना, उनके साथ वार्तालाप
करना, हासयुक्त संकेत अथवा कुट्टुष्टिपर ध्यान देना, दूसरे पुरुषके हाथसे कुछ लेना या उसे देना सर्वथा परित्याज्य है। घरके द्वारपर बैठने या खड़ा होने, राजमार्गकी ओर देखने, किसी अपरिचित देश या घरमें जाने, उद्यान और प्रदर्शनी आदिमें रुचि रखनेसे स्त्रीको बचना चाहिये। बहुत पुरुषोंके मध्यसे निकलना, ऊँचे स्वरसे बोलना, हँसी-मजाक करना एवं अपनी दृष्टि, वाणी तथा शरीरसे चापल्य प्रकट करना, खँखारना तथा सीत्कारी भरना, दुष्ट स्त्री, भिक्षुकी, तान्त्रिक, मान्त्रिक आदिमें आसक्ति और उनके मण्डलोंमें निवास करनेकी इच्छा—ये सब बातें पतिव्रता स्त्रीके लिये त्याज्य हैं। इस प्रकारके आचरण तो प्रायः दुष्टोंके लिये ही उचित होते हैं, कुलीन स्त्रियोंके लिये नहीं। इन निन्दनीय बातोंसे अपनी रक्षा करते हुए स्त्रियोंको चाहिये कि वे अपने पातिव्रत-धर्म तथा कुलकी मर्यादाकी रक्षा करें।
उत्तम स्त्री पतिको मन, वचन तथा कर्मसे देवताके समान समझे और उसकी अर्धाङ्गिनी बनकर सदा उसके हित करनेमें तत्पर रहे। देवता और पितरोंके कृत्य तथा पतिके स्नान, भोजन एवं अभ्यागतोंके स्वागत-सत्कार आदिमें बड़ी ही सावधानी और समयका ध्यान रखे। वह पतिके मित्रोंको मित्र तथा शत्रुओंको शत्रुके समान समझे। अधर्म और अनर्थसे दूर रहकर पतिको भी उससे बचाये। पतिको क्या प्रिय है और कौन-सा भोजनादि पदार्थ उसके लिये हितकर है तथा कैसे पतिके साथ विचारों आदिमें समानता आये इस बातको सर्वदा उसे ध्यानमें रखना चाहिये, साथ ही उसे सेवकोंको असंतुष्ट नहीं रखना चाहिये।
रहनेका घर और शरीर—ये दो गृहणियोंके लिये मुख्य हैं। इसलिये प्रयत्नपूर्वक वह सर्वप्रथम अपने घर तथा शरीरको सुसंस्कृत (पवित्र) रखे।
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
३८
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
शरीरसे भी अधिक स्वच्छ और भूषित घरको रखे। तीनों कालोंमें पूजा-अर्चना करे और व्यवहारकी सभी वस्तुओंको यथाविधि साफ रखे। प्रातः, मध्याह्न और सायंकालके समय घरका मार्जन कर स्वच्छ करे। गोशाला आदिको स्वच्छ करवा ले। दास-दासियोंको भोजन आदिसे संतुष्ट कर उन्हें अपने-अपने कार्योंमें लगाये। स्त्रीको उचित है कि वह प्रयोगमें आनेवाले शाक, कन्द, मूल, फल आदिके बीजोंका अपने-अपने समयपर संग्रह कर ले और समयपर इन्हें खेत आदिमें बुआ दे। ताँबे, काँसे, लोहे, काष्ठ और मिट्टीसे बने हुए अनेक प्रकारके बर्तनोंका घरमें संग्रह रखे। जल रखने तथा जल निकालने और जल पीनेके कलशादि पात्र, शाक-भाजी आदिसे सम्बद्ध विभिन्न पात्र, घी, तेल, दूध, दही आदिसे सम्बद्ध बर्तन, मूसल, ओखली, झाडू, चलनी, सँडूसी, सिल, लोढ़ा, चक्की, चिमटा, कड़ाही, तवा, तराजू, बाट, पिटार, संदूक, पलंग तथा चौकी आदि गृहस्थीके प्रयोगमें आनेवाले आवश्यक उपकरणोंकी प्रयत्नपूर्वक व्यवस्था करनी चाहिये। उसे चाहिये कि वह हाँग, जीरा, पिप्पल, राई, मरिच, धनिया तथा सोंठ आदि अनेक प्रकारके मसाले, लवण, अनेक प्रकारके क्षार-पदार्थ, सिरका, अचार आदि, अनेक प्रकारकी दालें, सब प्रकारके तेल, सूखा काष्ठ, विविध प्रकारके दूध-दहीसे बने पदार्थ और अनेक प्रकारके कन्द आदि जो-जो भी वस्तु नित्य तथा नैमित्तिक कार्योंमें अपेक्षित हों, उन्हें अपनी सामर्थ्यके अनुसार प्रयत्नपूर्वक पहलेसे ही संग्रह करना चाहिये, जिससे समयपर उन्हें दूँढ़ना न पड़े। जिस वस्तुकी भविष्यमें आवश्यकता पड़े, उसे पहलेसे ही संग्रहमें रखना चाहिये। सूखे-गीले, पिसे, बिना पिसे तथा कच्चे और पक्के अन्नदि पदार्थोंका अच्छी तरह हानि-लाभ विचारकर ही संग्रह करना चाहिये।
पतिव्रता नारी गुरु, बालक, वृद्ध, अभ्यागत और पतिकी सेवामें आलस्य न करे। पतिकी शय्या स्वयं बिछाये। देवर आदिके द्वारा पहिने हुए वस्त्र, माला तथा आभूषणोंको वह कभी न तो धारण करे और न इनके शय्या, आसन आदिपर बैठे। गौका इतना दूध निकाले कि जिसमें बछड़े भूखे न रह जायें। दहीसे घी बनाये। वर्षा, शरद और वसन्त-ऋतुमें गायको दो बार दुहना चाहिये, शेष ऋतुओंमें एक ही बार दुहे। चरवाहे, ग्वाले आदिको चरवाहीके बदले रुपये अथवा अनाज दे। गोदोहक बछड़ोंका भाग अपने प्रयोगमें न ला सकें, यह देखता रहे, साथ ही यह भी ध्यान रखे कि दूध दुहनेवाला समयपर दूध दुह रहा है या नहीं, क्योंकि दोहनेके यथोचित समयपर ही गायको दुहना चाहिये। समयका अतिक्रमण अच्छा नहीं होता। जब गाय ब्याय जाय, तब एक महीनेतक उसका दूध नहीं निकालना चाहिये, उसे बछड़ेको ही पीने देना चाहिये। फिर एक महीनेतक एक थनका, तदनन्तर एक महीनेतक दो थनका और फिर तीन थनका दूध निकालना चाहिये। एक या दो थन बछड़ेके लिये अवश्य छोड़ना चाहिये। यथासमय तिलकी खली, कोमल हरी घास, नमक तथा जल आदिसे बछड़ोंका पालन करना चाहिये। बूढ़ी, गर्भिणी, दूध देनेवाली, बछड़ेवाली तथा बछियावाली—इन पाँचों गायोंका घास आदिके द्वारा समानरूपसे बराबर पालन-पोषण करते रहना चाहिये। किसीको भी न्यून तथा अधिक न समझे। गौके गलेमें घंटी अवश्य बाँधनी चाहिये। एक तो घंटी बाँधनेसे गौकी शोभा होती है, दूसरे उसके शब्दोंसे कोई जीव-जन्तु डरकर उसके पास नहीं आते, इससे उसकी रक्षा भी होती है और गौ कहीं चली जाय तो उसके शब्दसे उसे दूँढ़ा भी जा सकता है। हिंसक
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
- ब्राह्मपर्व *
३९
पशुओं और सर्पोंसे रहित, घास और जलसे युक्त, छायादार घने वृक्षोंवाले तथा पशुओंके रोगसे रहित स्थानपर गायोंके रहनेके लिये गोष्ठ या गोशाला बनानी चाहिये। कृषि-कार्यमें लगे सेवकोंके लिये देश-काल और उनके कार्यके अनुरूप भोजन तथा वेतनका प्रबन्ध करना चाहिये। खेत, खलिहान अथवा वाटिका आदिमें जहाँ भी सेवक कामपर लगे हों वहाँ बार-बार जाकर उनके कार्य एवं कार्यके प्रति उनके मनोयोगकी जानकारी करनी चाहिये। उनमेंसे जो योग्य हो, अच्छा कार्य करता हो, उसका अधिक सत्कार करे और उसके लिये भोजन, आवास आदिकी औरोंसे विशेष व्यवस्था करे। समय-समयपर सब प्रकारके अन्न और कन्द-मूलके बीजोंका संग्रह करे तथा यथासमय उनकी बुआई कर दे।
घरका मूल है स्त्री और गृहस्थाश्रमका मूल है अन्न। इसलिये भोज्यादि अन्न पदार्थोंमें घरकी स्त्रीको मुक्तहस्त नहीं होना चाहिये अर्थात् अन्नको वह वृथा नष्ट न करे, सदा सँजोकर रखे। उसे मितव्ययी होना चाहिये। अन्नदिमें मुक्तहस्त होना गृहिणियोंके लिये अच्छा नहीं माना जाता। वह संचय करनेमें और खर्च करनेमें मधुमक्खी, वल्मीक और अंजनके समान हानि-लाभ देखकर अन्नको थोड़ा-सा समझकर उसकी अवज्ञा न करे। क्योंकि थोड़ा-थोड़ा ही मधु एकत्र करती हुई मधुमक्खी कितना एकत्र कर लेती है? इसी प्रकार दीमक जरा-जरा-सी मिट्टी लाकर कितना ऊँचा वल्मीक बना लेती है? किंतु इसके विपरीत बहुत-सा बनाया गया अंजन भी नित्य थोड़ा-थोड़ा आँखमें डालते रहनेसे कुछ दिनोंमें समाप्त हो जाता है। इसी रीतिसे सभी वस्तुओंका संग्रह और खर्च हो जाता है। इसमें थोड़ी वस्तुकी अवज्ञा नहीं करनी चाहिये। घरके सभी कार्य स्त्री-पुरुषके एकमत
होनेपर ही अच्छे होते हैं।
जगत्में ऐसे भी हजारों पुरुष हैं, जिनके सब कार्यमें स्त्रीकी प्रधानता रहती है। यदि स्त्री बुद्धिमान् और सुशील हो तो कुछ हानि नहीं होती, किंतु इसके विपरीत होनेपर अनेक प्रकारके दुःख होते हैं। इसलिये स्त्रीकी योग्यता-अयोग्यताको ठीकसे समझकर बुद्धिमान् पुरुषको उसे कार्यमें नियुक्त करना चाहिये। इस प्रकार योग्यतासे कार्यमें नियुक्त की गयी स्त्रीको चाहिये कि वह सौभाग्यवश या अपने उद्यम आदिसे अपने पतिकी भलीभाँति सेवा कर उसे अपने अनुकूल बनाये।
ब्रह्माजी बोले—हे मुनीश्वरो! घरमें स्त्री प्रातःकाल सबसे पहले उठे और अपने कार्यमें प्रवृत्त हो जाय तथा रात्रिमें सबसे पीछे भोजन करे और सबके बादमें सोये। पति तथा ससुर आदिके उपस्थित न रहनेपर स्त्रीको घरकी देहली पार नहीं करनी चाहिये। वह बड़े सबेरे ही जग जाय। स्त्री पतिके समीप बैठकर ही सब सेवकोंको कामकी आज्ञा दे, बाहर न जाय। जब पति भी जग उठे तब वहाँके सभी आवश्यक कार्य करके, घरके अन्य कार्योंको भी प्रमादरहित होकर करे। रात्रिके पहले ही उत्तम वस्त्राभूषणोंको उतारकर घरके कार्योंको करने योग्य साधारण वस्त्रोंको पहनकर तत्त् समयमें करने योग्य कार्योंको यथाक्रम करना चाहिये। उसे चाहिये कि सबसे पहले रसोई, चूल्ला आदिको भलीभाँति लीप-पोतकर स्वच्छ करे। रसोईके पात्रोंको माँज-धो और पोंछकर वहाँ रखे तथा अन्य भी सब रसोईकी सामग्री वहाँ एकत्र करे। रसोई-घर न तो अधिक गुप्त (बंद) हो और न एकदम खुला ही हो। स्वच्छ, विस्तीर्ण और जिसमेंसे धुआँ निकल जाय ऐसा होना चाहिये। रसोई-घरके भोजन पकानेवाले पात्रोंको तथा दूध-दहीके पात्रोंको सीपी, रस्सी अथवा वृक्षकी छालसे खूब रगड़कर अंदर-बाहरसे
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
४०
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
अच्छी तरह धो लेना चाहिये। रात्रिमें धुएँ-आगके द्वारा तथा दिनमें धूपमें उन्हें सुखा लेना चाहिये, जिससे उन पात्रोंमें रखा जानेवाला दूध-दही आदि खराब न होने पाये। बिना शोधित पात्रोंमें रखा दूध-दही विकृत हो जाता है। दूध-दही, घी तथा बने हुए पाकादिको सावधानीसे रखना चाहिये और उसका निरीक्षण करते रहना चाहिये।
स्नानादि आवश्यक कृत्य करके उसे अपने हाथसे पतिके लिये भोजन बनाना चाहिये। उसे यह विचार करना चाहिये कि मधुर, क्षार, अम्ल आदि रसोंमें कौन-कौन-सा भोजन पतिको प्रिय है, किस भोजनसे अग्निकी वृद्धि होती है, क्या पथ्य है और कौन भोजन कालके अनुरूप होगा, क्या अपथ्य है, उत्तम स्वास्थ्य किस भोजनसे प्राप्त होगा और कौन भोजन कालके अनुरूप होगा आदि बातोंका भलीभाँति विचारकर और निर्णयकर उसे वैसा ही भोजन प्रीतिपूर्वक बनाना चाहिये। रसोई-घरमें सदासे काम करनेवाले, विश्वस्त तथा आहारका परीक्षण करनेवाले व्यक्तिको ही सूपकारके रूपमें नियुक्त करना चाहिये। रसोईके स्थानमें किसी अन्य दुष्ट स्त्री-पुरुषोंको न आने दे। इस विधिसे भोजन बनाकर सब पदार्थोंको स्वच्छ पात्रोंसे आच्छादित कर देना चाहिये, फिर रसोई-घरसे बाहर आकर पसीने आदिको पोंछकर, स्वच्छ होकर, गन्ध, ताम्बूल, माला-वस्त्र आदिसे अपनेको थोड़ा-सा भूषित करे। फिर भोजनके निमित्त यथोचित समयपर विनयपूर्वक पतिको बुलाये। सब प्रकारके व्यञ्जन परोसे, जो देश-कालके विपरीत न हो और जिनका परस्पर विरोध भी न हो, जैसे दूध और लवणका है। जिस पदार्थमें पतिकी अधिक रुचि देखे उसे और परसे। इस प्रकार पतिको प्रीतिपूर्वक भोजन कराये।
सपत्नियोंको अपनी बहिनके समान तथा उनकी
संतानोंको अपनी संतानसे भी अधिक प्रिय समझे। उनके भाई-बन्धुओंको अपने भाइयोंके समान ही समझे। भोजन, वस्त्र, आभूषण, ताम्बूल आदि जबतक सपत्नियोंको न दे दे, तबतक स्वयं भी ग्रहण न करे। यदि सपत्नीको अथवा किसी आश्रित जनको कुछ रोग हो जाय तो उसकी चिकित्साके लिये औषधि आदिकी भलीभाँति व्यवस्था कराये। नौकर, बन्धु और सपत्नीको दुःखी देख स्वयं भी उन्हींके समान दुःखी होवे और उनके सुखमें सुख माने। सभी कार्योंसे अवकाश मिलनेपर सो जाय और रात्रिमें उठकर अनावश्यक धन-व्यय कर रहे पतिको एकान्तमें धीरे धीरे समझाये। घरका सब वृत्तान्त पतिको एकान्तमें बताये, परंतु सपत्नियोंके दोषोंको न कहे, किंतु यदि कोई उनका व्यभिचार आदि बड़ा दोष देखें, जिसे गुप्त रखनेसे कोई अनर्थ हो तो ऐसा दोष पतिको अवश्य बता देना चाहिये। दुर्भगा, निःसंतान तथा पतिद्वारा तिरस्कृत सपत्नियोंको सदा आश्वासन दे। उन्हें भोजन, वस्त्र, आभूषण आदिसे दुःखी न होने दे। यदि किसी नौकर आदिपर पति कोप करे तो उसे भी आश्वस्त करना चाहिये, परंतु यह अवश्य विचार कर लेना चाहिये कि इसे आश्वासन देनेसे कोई हानि नहीं होनेवाली है।
इस प्रकार स्त्री अपने पतिकी सम्पूर्ण इच्छाओंको पूर्ण करे। अपने सुखके लिये जो अभीष्ट हो, उसका भी परित्याग कर पतिके अनुकूल ही सब कार्य करे; क्योंकि स्त्रियोंके देवता पति, वर्णोंके देवता ब्राह्मण हैं तथा ब्राह्मणोंके देवता अग्नि हैं और प्रजाओंका देवता राजा है।
स्त्रियोंके त्रिवर्ग-प्राप्तिके दो मुख्य उपाय हैं—प्रथम सब प्रकारसे पतिको प्रसन्न रखना और द्वितीय आचरणकी पवित्रता। पतिके चित्तेके अनुकूल चलनेसे जैसी प्रीति पतिकी स्त्रीपर होती
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
- ब्राह्मपर्व *
४९
है वैसी प्रीति रूपसे, यौवनसे और अलंकारादि आभूषणोंसे नहीं होती *। क्योंकि प्रायः यह देखा जाता है कि उत्तम रूप और युवावस्थावाली स्त्रियाँ भी पतिके विपरीत आचरण करनेसे दौर्भाग्यको प्राप्त करती हैं और अति कुरूप तथा हीन अवस्थावाली स्त्रियाँ भी पतिके चित्तेके अनुकूल चलनेसे उनकी अत्यन्त प्रिय हो जाती हैं। इसलिये पतिके चित्तका अभिप्राय भलीभाँति समझना और उसके अनुकूल आचरण करना यही स्त्रियोंके लिये सब सुखोंका हेतु है तथा यही समस्त श्रेष्ठ योग्यताओंका कारण है। इसके बिना तो स्त्रीके अन्य सभी गुण बन्धत्वको प्राप्त हो जाते हैं अर्थात् निष्फल हो जाते हैं और अनर्थके कारण बन जाते हैं। इसलिये स्त्रीको अपनी योग्यता (परचितज्ञता) सर्वथा बढ़ाते रहना चाहिये।
पतिके आनेका समय जानकर उनके आनेके पूर्व ही वह घरको स्वच्छकर बैठनेके लिये उत्तम आसन बिछा दे तथा पतिदेवके आनेपर स्वयं अपने हाथसे उनके चरण धोकर उन्हें आसनपर बैठाये और पंखा हाथमें लेकर धीरे-धीरे डुलाये तथा सावधान होकर उनकी आज्ञा प्राप्त करनेकी प्रतीक्षा करे। ये सब काम दासी आदिसे न करवाये। पतिके स्नान, आहार, पानादिमें स्पृहा दिखाये। पतिके संकेतोंको समझकर सावधानीपूर्वक सभी कार्योंको करे और भोजनादि निवेदित करे। अपने बन्धु-बान्धवों तथा पतिके बन्धुओं और सपत्नीके साथ स्वागत-सत्कार पतिके इच्छानुसार करे अर्थात् जिसपर पतिकी रुचि न देखे उससे अधिक शिष्टाचार न करे। स्त्रियोंके लिये सभी अवस्थाओंमें स्वकुलकी अपेक्षा पतिकुल ही विशेष पूज्य होता है; क्योंकि
कोई भी कुलीन पुरुष अपनी कन्यासे उपकारकी आशा भी नहीं रखता और जो रखता है वह अनुचित ही है। कन्याका विवाह करनेके बाद फिर उससे अपनी आजीविकाकी इच्छा करना यह महात्मा और कुलीन पुरुषोंकी रीति नहीं है, अतः स्त्रीके सम्बन्धियोंको चाहिये कि वे केवल मित्रताके लिये, प्रीतिके लिये ही सम्बन्ध बढ़ानेकी इच्छा करें और प्रसंगवश यथाशक्ति उसे कुछ देते भी रहें। उससे कोई वस्तु लेनेकी इच्छा न रखें। कन्याके मायकेवालोंको कन्याके स्वामीकी रक्षाका प्रयत्न सर्वथा करना चाहिये, उनके परस्पर प्रीति-सम्बन्धकी चर्चा सर्वत्र करनी चाहिये और अपनी मिथ्या प्रशंसा नहीं करनी चाहिये। साधु-पुरुषोंका व्यवहार अपने सम्बन्धियोंके प्रति ऐसा ही होता है।
जो स्त्री इस प्रकारके सदवृत्तको भलीभाँति जानकर व्यवहार करती है, वह पति और उसके बन्धु-बान्धवोंको अत्यन्त मान्य होती है। पतिकी प्रिय, साधु वृत्तवाली तथा सम्बन्धियोंमें प्रसिद्धिको प्राप्त होनेपर भी स्त्रीको लोकापवादसे सर्वदा डरते रहना चाहिये; क्योंकि सीता आदि उत्तम पतिव्रताओंको भी लोकापवादके कारण अनेक कष्ट भोगने पड़े थे। भोग्य होनेके कारण, गुण-दोषोंका ठीक-ठीक निर्णय न कर पानेसे तथा प्रायः अविनयशीलताके कारण स्त्रियोंके व्यवहारको समझना अत्यन्त दुष्कर है। ठीक प्रकारसे दूसरेकी मनोवृत्तिको न समझनेके कारण तथा कपट-दृष्टिके कारण एवं स्वच्छन्द हो जानेसे ऐसी बहुत ही कम स्त्रियाँ हैं जो कलंकित नहीं हो जातीं। दैवयोग अथवा कुयोगसे या व्यवहारकी अनभिज्ञतासे शुद्ध हृदयवाली स्त्री भी लोकापवादको प्राप्त हो
- भर्ताधिवेत्ता नार्यं वर्णा ब्राह्मणदेवताः। ब्राह्मणा ह्यग्निदेवास्तु प्रजा राजन्यदेवताः ॥ तासां त्रिवर्गसंसिद्धौ प्रदिष्टं कारणद्वयम्। भर्तृयदनुकूलत्वं यच्च शीलमविप्लुतम् ॥ न तथा यौवनं लोके नापि रूपं न भूषणम्। यथा प्रियानुकूलत्वं सिद्धं शश्वदनौषधम् ॥ (ब्राह्मपर्व १३।३५—३७)
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
४२
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
जाती है। स्त्रियोंका यह दौर्भाग्य ही दुःख भोगनेका कारण है। इसका कोई प्रतीकार नहीं, यदि है तो इसकी ओषधि है उत्तम चरित्रका आचरण और लोक-व्यवहारको ठीकसे समझना।
ब्रह्माजी बोले— मुनीश्वरो! उत्तम आचरणवाली स्त्री भी यदि बुरा सङ्ग करे या अपनी इच्छासे जहाँ चाहे चली जाय तो उसे अवश्य कलंक लगता है और झूठा दोष लगनेसे कुल भी कलंकित हो जाता है। उत्तम कुलकी स्त्रियोंके लिये यह आवश्यक है कि वे किसी भी भाँति अपने कुल—मातृकुल, पितृकुल एवं संततिको कलंक न लगने दें। ऐसी कुलीन स्त्रीसे ही धर्म, अर्थ तथा काम—इस त्रिवर्गकी सिद्धि हो सकती है। इसके विपरीत बुरे आचरणवाली स्त्रियाँ अपने कुलोंको नरकमें डालती हैं और चरित्रको ही अपना आभूषण माननेवाली स्त्रियाँ नरकमें गिरे हुओंको भी निकाल लेती हैं। जिन स्त्रियोंका चित्त पतिके अनुकूल है और जिनका उत्तम आचरण है, उनके लिये रत्न, सुवर्ण आदिके आभूषण भारस्वरूप ही हैं अर्थात् स्त्रियोंके यथार्थ आभूषण ये दो हैं—पतिकी अनुकूलता और उत्तम आचरण। जो स्त्री पतिकी और लोककी अपने यथोचित व्यवहारदिसे आराधना करती है अर्थात् पतिके अनुकूल चलती है और लोकव्यवहारको ठीक-ठीक समझकर तदनुकूल आचरण करती है, वह स्त्री धर्म, अर्थ तथा कामकी अबाधसिद्धि प्राप्त कर लेती है—
भर्तृचित्तानुकूलत्वं यासां शीलमविच्युतम् ।
तासां रत्नसुवर्णादि भार एव न मण्डनम् ॥
लोकज्ञाने परा कोटिः पत्न्यौ भक्तिश्च शाश्वती ।
शुद्धान्वयानां नारीणां विद्यादेतत्कुलव्रतम् ॥
तस्माल्लोकश्च भर्ता च सम्यगाराधितौ यया ।
धर्ममर्थ च कामं च सैवाप्रेति निरत्यया ॥
(ब्राह्मपर्व १३।६४—६६)
जिस स्त्रीका पति परदेशमें गया हो, उस स्त्रीको अपने पतिकी मङ्गलकामनाके सूचक सौभाग्य-सूत्र आदि स्वल्प आभूषण ही पहनने चाहिये, विशेष शृंगार नहीं करना चाहिये। उसे पतिद्वारा प्रारम्भ किये कार्योंका प्रयत्नपूर्वक सम्पादन करते रहना चाहिये। वह देहका अधिक संस्कार न करे। रात्रिको सास आदि पूज्य स्त्रियोंके समीप सोये। बहुत अधिक खर्च न करे। व्रत, उपवास आदिके नियमोंका पालन करती रहे। दैवज्ञ आदि श्रेष्ठजनोंसे पतिके कुशल-क्षेमका वृत्तान्त जाननेकी कोशिश करे और परदेशमें उसके कल्याणकी कामनासे तथा शीघ्र आगमनकी अभिलाषासे नित्य देवताओंका पूजन करे। अत्यन्त उज्ज्वल वेष न बनाये और न सुगन्धित तैलादि द्रव्योंका प्रयोग करे। उसे सम्बन्धियोंके घर नहीं जाना चाहिये। यदि किसी आवश्यक कार्यवश जाना ही पड़ जाय तो अपनेसे बड़ोंकी आज्ञा लेकर पतिके विश्वसनीय जनोंके साथ जाय। किंतु वहाँ अधिक समयतक न रहे, शीघ्र वापस लौट आये। वहाँ स्नान आदि व्यवहारोंको न करे। प्रवाससे पतिके लौट आनेपर प्रसन्न-मनसे सुन्दर वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत होकर पतिका यथोचित भोजनादिसे सत्कार करे और देवताओंसे पतिके लिये माँगी गयी मनोतियोंको पूजादिद्वारा यथाविधि सम्पन्न करे।
इस प्रकार मन, वाणी तथा कर्मोंसे सभी अवस्थाओंमें पतिका हित-चिन्तन करती रहे, क्योंकि पतिके अनुकूल रहना स्त्रियोंके लिये विशेष धर्म है। अपने सौभाग्यपर अहंकार न करे और उद्धृत कार्योंको भी न करे तथा अत्यन्त विनम्रभावसे रहे। इस प्रकारसे पतिकी सेवा करते हुए जो स्त्री पतिके कार्योंमें प्रमाद नहीं करती, पूज्यजनोंका सदा आदर करती रहती है, नौकरोंका भरण-पोषण करती है, नित्य सदगुणोंकी अभिवृद्धिके लिये प्रयत्नशील रहती
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
- ब्राह्मपर्व *
४३
है तथा सब प्रकारसे अपने शीलकी रक्षा करती रहती है, वह स्त्री इस लोक तथा परलोकमें उत्तम सुख एवं उत्तम कीर्ति प्राप्त करती है१।
जिस स्त्रीपर पति अति क्रोधयुक्त हो और उसका आदर न करे, वह स्त्री दुर्भगा कहलाती है। उसे चाहिये कि वह नित्य व्रत-उपवासदि क्रियाओंमें संलग्न रहे और पतिके बाह्य कार्योंमें विशेषरूपसे सहयोग करे। जातिसे कोई स्त्री दुर्भगा अथवा सुभगा (सौभाग्यशालिनी) नहीं होती। वह अपने व्यवहारसे ही पतिकी प्रिय और अप्रिय हो जाती है। उत्तम स्त्री पतिके चित्तका अभिप्राय न जाननेसे, उसके प्रतिकूल चलनेसे और लोकविरुद्ध
आचरण करनेसे दुर्भगा हो जाती है एवं उसके अनुकूल चलनेसे सुभगा हो जाती है। मनोवृत्तिके अनुकूल कार्य करनेसे पराया भी प्रिय हो जाता है और मनोऽनुकूल कार्य न करनेसे अपना जन भी शीघ्र शत्रु बन जाता है। इसलिये स्त्रीको मन, वचन तथा अपने कार्यद्वारा सभी अवस्थाओंमें पतिके अनुसार ही प्रिय आचरण करना चाहिये। इस प्रकार कहे गये स्त्री-वृत्तको भलीभाँति समझकर जो स्त्री पतिकी सेवा करती है, वह पतिको अपना बना लेती है और पतिकी सेवासे सभी सुखों तथा त्रिवर्गको भी प्राप्त कर लेती है२।
(अ० १०—१५)
पञ्चमहायज्ञोंका वर्णन तथा व्रत-उपवासोंके प्रकरणमें आहारका निरूपण एवं प्रतिपदा तिथिकी उत्पत्ति, व्रत-विधि और माहात्म्य
सुमन्तु मुनिने कहा—राजन्! इस प्रकार स्त्रियोंके लक्षण और सदाचारका वर्णन करके ब्रह्माजी अपने लोक तथा ऋषिगण भी अपने-अपने आश्रमोंकी ओर चले गये। अब गृहस्थोंको कैसा आचरण करना चाहिये, उसे मैं बताता हूँ, आप ध्यानपूर्वक सुनें—
गृहस्थोंको वैवाहिक अग्निमें विधिपूर्वक गृह्यकर्मोंको करना चाहिये तथा पञ्चमहायज्ञोंका भी सम्पादन करना चाहिये। गृहस्थोंके यहाँ जीव-हिंसा होनेके पाँच स्थान हैं—ओखली, चक्की, चूल्हा, झाडू
तथा जल रखनेके स्थान। इस हिंसा दोषसे मुक्ति पानेके लिये गृहस्थोंको पञ्चमहायज्ञों—(१) ब्रह्मयज्ञ, (२) पितृयज्ञ, (३) दैवयज्ञ, (४) भूतयज्ञ तथा (५) अतिथियज्ञको नित्य अवश्य करना चाहिये। अध्ययन करना तथा अध्यापन करना यह ब्रह्मयज्ञ है, तर्पणादि कर्म पितृयज्ञ है। देवताओंके लिये हवनादि कर्म दैवयज्ञ है। बलिवैश्वदेव कर्म भूतयज्ञ है तथा अतिथि एवं अभ्यागतोंका स्वागत-सत्कार करना अतिथियज्ञ है—
१- एवमाराध्य भर्तारं तत्कार्येष्वप्रमादिनी । पूज्यानां पूजने नित्यं भूत्यानां भरणेषु च ॥ गुणानामर्जने नित्यं शीलवत्परिक्षणे । प्रेत्य चेह च निर्द्वन्द्वं सुखमाप्नोत्यनुत्तमम् ॥
(ब्राह्मपर्व १४।३१-३२)
२- न कापि दुर्भगा नाम सुभगा नाम जातितः । व्यवहाराद्भवत्येष निर्देशो रिपुमित्रवत् ॥ भर्तृचित्तापरिज्ञानादननुष्ठानतोऽपि वा । वृत्तैर्लोकविरुद्धैश्च यान्ति दुर्भगतां स्त्रियः ॥ आनुकूल्यान्यनोवृत्तेः परोऽपि प्रियतां ब्रजेत् । प्रातिकूल्यान्निजोऽप्याशु प्रियः प्रहेपतामियात् ॥ तस्मात् सर्वस्ववस्थामु मनोवाक्कायकर्मभिः । प्रियं समाचरेन्नित्यं तच्चिन्तानुविधायिनी ॥ एवमेव यथोद्दिष्टं स्त्रीवृत्तं यानुतिष्ठति । पतिमाराध्य सम्पूर्णं त्रिवर्गं साधिगच्छति ॥
(ब्राह्मपर्व १५।१६—१९, ३२)
[वर्तमान समयमें पाश्चात्य सभ्यताके प्रभावसे देशमें दूषित और उच्छृङ्खलतापूर्ण वातावरण बन गया है। स्त्रियोंसे सम्बद्ध भविष्यपुराणका यह उल्लेख रामायण, महाभारत, स्मृतियों तथा अन्य पुराणोंमें भी उपलब्ध है। आजके विश्वकी सभी समस्याओंका एकमात्र मुख्य कारण आचारका पतन है, इसका प्रभाव संततियोंपर भी पड़ता है। अतः सभीको सदाचरणपर विशेष ध्यान देनेकी आवश्यकता है।]
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
४४
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
अध्यापनं ब्रह्मयज्ञः पितृयज्ञश्च तर्पणम्। होमो दैवो बलिर्भौतस्तथाऽन्योऽतिथिपूजनम्॥
(ब्राह्मपर्व १६।७)
—इन पाँच नियमोंका पालन करनेवाला गृहस्थी घरमें रहता हुआ भी पञ्चसूना-दोषोंसे लिस नहीं होता। यदि समर्थ होते हुए भी वह इन पाँच यज्ञोंको नहीं करता है तो उसका जीवन ही व्यर्थ है।
राजा शतानीकने पूछा—जिस ब्राह्मणके घरमें अग्निहोत्र नहीं होता, वह मृतकके समान होता है—यह आपने कहा है, परंतु फिर वह देवपूजा आदि कार्योंको क्यों करे? और यदि ऐसी बात है तो देवता, पितर उससे कैसे संतुष्ट होंगे, इसका आप निराकरण करें।
सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! जिन ब्राह्मणोंके घरमें अग्निहोत्र न हो उनका उद्धार व्रत, उपवास, नियम, दान तथा देवताकी स्तुति, भक्ति आदिसे होता है। जिस देवताकी जो तिथि हो, उसमें उपवास करनेसे वे देवता उसपर विशेषरूपसे प्रसन्न होते हैं—
व्रतोपवासनियमैर्नानादानैस्तथा नृप।
देवादयो भवन्त्येव प्रीतास्तेषां न संशयः॥
विशेषादुपवासेन तिथौ किल महीपते।
प्रीता देवादयस्तेषां भवन्ति कुरुनन्दन॥
(ब्राह्मपर्व १६।१३-१४)
राजाने फिर कहा—महाराज! अब आप अलग-अलग तिथियोंमें किये जानेवाले व्रतों, तिथि-व्रतोंमें किये जानेवाले भोजनों तथा उपवासकी विधियोंका वर्णन करें, जिनके श्रवणसे तथा जिनका आचरण कर संसारसागरसे मैं मुक्त हो जाऊँ तथा मेरे सभी पाप दूर हो जायँ। साथ ही संसारके जीवोंका भी कल्याण हो जाय।
सुमन्तु मुनि बोले—मैं तिथियोंमें विहित कृत्योंका
वर्णन करता हूँ, जिनके सुननेसे पाप कट जाते हैं और उपवासके फलोंकी प्राप्ति हो जाती है।
प्रतिपदा तिथिको दूध तथा द्वितीयाको लवणरहित भोजन करे। तृतीयाके दिन तिलान्न भक्षण करे। इसी प्रकार चतुर्थीको दूध, पञ्चमीको फल, षष्ठीको शाक, सप्तमीको बिल्वहाार करे। अष्टमीको पिष्ट, नवमीको अनग्नपाक, दशमी और एकादशीको घृताहार करे। द्वादशीको खीर, त्रयोदशीको गोमूत्र, चतुर्दशीको यवान्न भक्षण करे। पूर्णिमाको कुशाका जल पीये तथा अमावास्याको हविष्य-भोजन करे। यह सब तिथियोंके भोजनकी विधि है। इस विधिसे जो पूरे एक पक्ष भोजन करता है, वह दस अश्वमेध-यज्ञोंका फल प्राप्त करता है और मन्वन्तरतक स्वर्गमें आनन्द भोगता है। यदि तीन-चार मासतक इस विधिसे भोजन करे तो वह सौ अश्वमेध और सौ राजसूय-यज्ञोंका फल प्राप्त करता है तथा स्वर्गमें अनेक मन्वन्तरोंतक सुख-भोग करता है। पूरे आठ महीने इस विधिसे भोजन करे तो हजार यज्ञोंका फल पाता है और चौदह मन्वन्तरपर्यन्त स्वर्गमें वहाँके सुखोंका उपभोग करता है। इसी प्रकार यदि एक वर्षपर्यन्त नियमपूर्वक इस भोजन-विधिके पालन करता है तो वह सूर्यलोकमें कई मन्वन्तरोंतक आनन्दपूर्वक निवास करता है। इस उपवास-विधिमें चारों वर्णों तथा स्त्री-पुरुषों—सभीका अधिकार है। जो इन तिथि-व्रतोंका आरम्भ आश्विनकी नवमी, माघकी सप्तमी, वैशाखकी तृतीया तथा कार्तिककी पूर्णिमासे करता है, वह लम्बी आयु प्राप्त कर अन्तमें सूर्यलोकको प्राप्त होता है। पूर्वजन्ममें जिन पुरुषोंने व्रत, उपवास आदि किया, दान दिया, अनेक प्रकारसे ब्राह्मणों, साधु-संतों एवं तपस्वियोंको संतुष्ट किया, माता-पिता और गुरुकी सेवा-शुश्रूषा की, विधिपूर्वक तीर्थयात्रा की, वे पुरुष स्वर्गमें दीर्घ कालतक रहकर जब
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
- ब्राह्मपर्व *
४५
पृथ्वीपर जन्म लेते हैं, तब उनके चिह्न—पुण्य-फल प्रत्यक्ष ही दिखलायी पड़ते हैं। यहाँ उन्हें हाथी, घोड़े, पालकी, रथ, सुवर्ण, रत्न, कंकण, केयूर, हार, कुण्डल, मुकुट, उत्तम वस्त्र, श्रेष्ठ सुन्दर स्त्री तथा अच्छे सेवक प्राप्त होते हैं। वे आधि-व्याधिसे मुक्त होकर दीर्घायु होते हैं। पुत्र-पौत्रादिका सुख देखते हैं और वन्दीजनोंके स्तुति-पाठद्वारा जगाये जाते हैं। इसके विपरीत जिसने व्रत, दान, उपवास आदि सत्कर्म नहीं किया वह काना, अंधा, लूला, लँगड़ा, गूँगा, कुबड़ा तथा रोग और दरिद्रतासे पीड़ित रहता है। संसारमें आज भी इन दोनों प्रकारके पुरुष प्रत्यक्ष दिखायी देते हैं। यही पुण्य और पापकी प्रत्यक्ष परीक्षा है।
राजाने कहा—प्रभो! आपने अभी संक्षेपमें तिथियोंको बताया है। अब यह विस्तारसे बतलानेकी कृपा करें कि किस देवताकी किस तिथिमें पूजा करनी चाहिये और व्रत आदि किस विधिसे करने चाहिये जिनके करनेसे मैं पवित्र हो जाऊँ और द्वन्द्वरहित होकर यज्ञके फलोंको प्राप्त कर सकूँ*।
सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! तिथियोंका रहस्य, पूजाका विधान, फल, नियम, देवता तथा अधिकारी आदिके विषयमें मैं बताता हूँ, यह सब आजतक मैंने किसीको नहीं बतलाया, इसे आप सुनें—
सबसे पहले मैं संक्षेपमें सृष्टिका वर्णन करता हूँ। प्रथम परमात्माने जल उत्पन्नकर उसमें तेज प्रविष्ट किया, उससे एक अण्ड उत्पन्न हुआ, उससे ब्रह्मा उत्पन्न हुए। उन्होंने सृष्टिकी इच्छासे उस अण्डके एक कपालसे भूमि और दूसरेसे आकाशकी रचना की। तदनन्तर दिशा, उपदिशा, देवता, दानव आदि रचे और जिस दिन यह सब काम किया उसका नाम प्रतिपदा तिथि रखा। ब्रह्माजीने इसे सर्वोत्तम
माना और सभी तिथियोंके प्रारम्भमें इसका प्रतिपादन किया इसलिये इसका नाम प्रतिपदा हुआ। इसीके बाद सभी तिथियाँ उत्पन्न हुईं।
अब मैं इसके उपवास-विधि और नियमोंका वर्णन करता हूँ। कार्तिक-पूर्णिमा, माघ-सप्तमी तथा वैशाख शुक्ल तृतीयासे इस प्रतिपदा तिथिके नियम एवं उपवासोंको विधिपूर्वक प्रारम्भ करना चाहिये। यदि प्रतिपदा तिथिसे नियम ग्रहण करना है तो प्रतिपदासे पूर्व चतुर्दशी तिथिको भोजनके अनन्तर व्रतका संकल्प लेना चाहिये। अमावास्याको त्रिकाल स्नान करे, भोजन न करे और गायत्रीका जप करता रहे। प्रतिपदाके दिन प्रातःकाल गन्ध-माल्य आदि उपचारोंसे श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी पूजा करे और उन्हें यथाशक्ति दूध दे तथा बादमें 'ब्रह्माजी मुझपर प्रसन्न हों'—ऐसा कहे। स्वयं भी बादमें गायका दूध पिये। इस विधिसे एक वर्षतक व्रत कर अन्तमें गायत्रीसहित ब्रह्माजीका पूजन कर व्रत समाप्त करे।
इस विधानसे व्रत करनेपर व्रतीके सब पाप दूर हो जाते हैं और उसकी आत्मा शुद्ध हो जाती है। वह दिव्य शरीर धारणकर विमानमें बैठकर देवलोकमें देवताओंके साथ आनन्द प्राप्त करता है और जब इस पृथ्वीपर सत्ययुगमें जन्म लेता है तो दस जन्मतक वेदविद्याका पारगामी विद्वान्, धनवान्, दीर्घ आयुष्य, आरोग्यवान्, अनेक भोगोंसे सम्पन्न, यज्ञ करनेवाला, महादानी ब्राह्मण होता है। विश्वामित्रमुनिने ब्राह्मण होनेके लिये बहुत समयतक घोर तपस्या की, किंतु उन्हें ब्राह्मणत्व प्राप्त नहीं हो सका। अतः उन्होंने नियमसे इसी प्रतिपदाका व्रत किया। इससे थोड़ेसे समयमें ब्रह्माजीने उन्हें ब्राह्मण बना दिया। क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आदि कोई इस तिथिका व्रत
- नित्य, नैमित्तिक और काम्य—ये तीन प्रकारके कर्म होते हैं। यहाँ काम्य-कर्मोंका प्रकरण चल रहा है। इन्हीं कर्मोंको निष्कामभावसे भगवत्प्रतीत्यर्थ करनेपर जन्म-मरणके बन्धनसे मुक्ति भी मिल जाती है।
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
४६
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
करे तो वह सब पापोंसे मुक्त होकर दूसरे जन्ममें ब्राह्मण होता है। हैहय, तालजंघ, तुरुष्क, यवन, शक आदि म्लेच्छ जातिवाले भी इस व्रतके प्रभावसे ब्राह्मण हो सकते हैं। यह तिथि परम
पुण्य और कल्याण करनेवाली है। जो इसके माहात्म्यको पढ़ता अथवा सुनता है वह ऋद्धि, वृद्धि और सत्कीर्ति पाकर अन्तमें सद्गति प्राप्त करता है१। (अध्याय १६)
प्रतिपत्कल्प-निरूपणमें ब्रह्माजीकी पूजा-अर्चाकी महिमा
राजा शतानीकने कहा—ब्रह्मन्! आप प्रतिपदा तिथिमें किये जानेवाले कृत्य, ब्रह्माजीके पूजनकी विधि और उसके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन करें।
सुमन्तु मुनि बोले—हे राजन्! पूर्वकल्पमें स्थावर-जङ्गमात्मक सम्पूर्ण जगत्के नष्ट हो जानेपर सर्वत्र जल-ही-जल हो गया। उस समय देवताओंमें श्रेष्ठ चतुर्मुख ब्रह्माजी प्रकट हुए और उन्होंने अनेक लोकों, देवगणों तथा विविध प्राणियोंकी सृष्टि की। प्रजापति ब्रह्मा देवताओंके पिता तथा अन्य जीवोंके पितामह हैं, इसलिये इनकी सदा पूजा करनी चाहिये। ये ही जगत्की सृष्टि, पालन तथा संहार करनेवाले हैं। इनके मनसे रूद्रका, वक्षःस्थलसे विष्णुका आविर्भाव हुआ। इनके चारों मुखोंसे अपने छः अङ्गोंके साथ चारों वेद प्रकट हुए। सभी देवता, दैत्य, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, नाग आदि इनकी पूजा करते हैं। यह सम्पूर्ण जगत् ब्रह्ममय है और ब्रह्ममें स्थित है, अतः ब्रह्माजी सबसे पूज्य हैं। राज्य, स्वर्ग और मोक्ष—ये तीनों पदार्थ इनकी सेवा करनेसे प्राप्त हो जाते हैं। इसलिये सदा प्रसन्नचित्तसे यावज्जीवन नियमसे ब्रह्माजीकी पूजा करनी चाहिये। जो ब्रह्माजीकी सदा भक्तिसे पूजा करता है, वह मनुष्य-स्वरूपमें साक्षात् ब्रह्मा ही है। ब्रह्माजीकी पूजासे अधिक पुण्य किसीमें न समझकर सदा ब्रह्माजीका पूजन करते रहना चाहिये। जो ब्रह्माजीका मन्दिर बनवाकर
उसमें विधिपूर्वक ब्रह्माजीकी प्रतिमाकी प्रतिष्ठा करता है, वह यज्ञ, तप, तीर्थ, दान आदिके फलोंसे करोड़ों गुना अधिक फल प्राप्त करता है। ऐसे पुरुषके दर्शन और स्पर्शसे इक्कीस पीढ़ीका उद्धार हो जाता है। ब्रह्माजीकी पूजा करनेवाला पुरुष बहुत कालतक ब्रह्मलोकमें निवास करता है। वहाँ निवास करनेके पश्चात् वह ज्ञानयोगके माध्यमसे मुक्त हो जाता है अथवा भोग चाहनेपर मनुष्यलोकमें चक्रवर्ती राजा या वेद-वेदाङ्गपारङ्गत कुलीन ब्राह्मण होता है। किसी अन्य कठोर तप और यज्ञोंकी आवश्यकता नहीं है, केवल ब्रह्माजीकी पूजासे ही सभी पदार्थ प्राप्त हो सकते हैं। जो ब्रह्माजीके मन्दिरमें छोटे जीवोंकी रक्षा करता हुआ सावधानीपूर्वक धीरे-धीरे झाड़ू देता है तथा उपलेपन करता है, वह चान्द्रायण-व्रतका फल प्राप्त करता है। एक पक्षतक ब्रह्माजीके मन्दिरमें जो झाड़ू लगाता है, वह सौ करोड़ युगसे भी अधिक ब्रह्मलोकमें पूजित होता है और अनन्तर सर्वगुणसम्पन्न, चारों वेदोंका ज्ञाता धर्मात्मा राजाके रूपमें पृथ्वीपर आता है। भक्तिपूर्वक ब्रह्माजीका पूजन न करनेतक ही मनुष्य संसारमें भटकता है। जिस तरह मानवका मन विषयोंमें मग्न होता है, वैसे ही यदि ब्रह्माजीमें मन निमग्न रहे तो ऐसा कौन पुरुष होगा जो मुक्ति नहीं प्राप्त कर सकता२। ब्रह्माजीके जीर्ण एवं खण्डित
१- इसका वर्णन ठीक इसी प्रकार वराहपुराणमें इससे भी अधिक विस्तारसे मिलता है और मुहूर्त-चिन्तामणि एवं अन्य ज्योतिषग्रन्थोंमें भी रमणीयतापूर्वक प्रपञ्चित है। व्रतकल्पद्वय, व्रतरत्नाकर, व्रतराज आदिमें भी संगृहीत है।
२- समासक्तं यथा चित्तं जन्तोविषयगोचरे। यद्येवं ब्रह्मणि न्यस्तं को न मुच्यते बन्धनात् ॥ (ब्राह्मपर्व १७।४०)
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
- ब्राह्मपर्व *
४७
मन्दिरका उद्धार करनेवाला प्राणी मुक्ति प्राप्त करता है। ब्रह्माजीके समान न कोई देवता है न गुरु, न ज्ञान है और न कोई तप ही है।
प्रतिपदा आदि सभी तिथियोंमें भक्तिपूर्वक ब्रह्माजीकी पूजा कर पूर्णिमाके दिन विशेषरूपसे पूजा करनी चाहिये तथा शङ्खु, घण्टा, भेरी आदि वाद्य-ध्वनियोंके साथ आरती एवं स्तुति करनी चाहिये। इस प्रकार व्यक्ति जितने पर्वोंपर आरती करता है, उतने हजार युगतक ब्रह्मलोकमें निवास और आनन्दका उपभोग करता है। कपिला गौके पञ्चगव्य और कुशाके जलसे वेदमन्त्रोंके द्वारा ब्रह्माजीको स्नान कराना ब्राह्म-स्नान कहलाता है। अन्य स्नानोंसे सौ गुना पुण्य इसमें अधिक होता है। यज्ञ एवं अग्निहोत्रादिके लिये ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यको कपिला गौ रखनी चाहिये। ब्रह्माजीकी मूर्तिका कपिला गायके घृतसे अभ्यङ्ग करना चाहिये, इससे करोड़ों वर्षोंके किये गये पापोंका विनाश होता है। यदि प्रतिपदाके दिन कोई एक बार भी घीसे स्नान कराता है तो उसके इक्कीस पीढ़ीका उद्धार हो जाता है। सुवर्ण-वस्त्रादिसे अलंकृत दस हजार सवत्सा गौ वेदज्ञ ब्राह्मणोंको देनेसे जो पुण्य होता है, वही पुण्य ब्रह्माजीको दुग्धसे स्नान करानेसे प्राप्त होता है। एक बार भी दूधसे ब्रह्माजीको स्नान करानेवाला पुरुष सुवर्णके विमानमें विराजमान हो ब्रह्मलोकमें पहुँच जाता है। दहीसे स्नान करानेपर विष्णुलोककी प्राप्ति होती है। शहदसे स्नान करानेपर वीरलोक (इन्द्रलोक)-की प्राप्ति होती है। ईखके रससे स्नान करानेपर सूर्यलोककी प्राप्ति होती है। शुद्धोदकसे स्नान करानेपर सभी पापोंसे मुक्त होकर ब्रह्मलोकमें निवास करता है। वस्त्रसे छने हुए जलसे ब्रह्माजीको स्नान करानेपर वह सदा
तृप्त रहता है और सम्पूर्ण विश्व उसके वशीभूत हो जाता है। सर्वोषधियोंसे स्नान करानेपर ब्रह्मलोक, चन्दनके जलसे स्नान करानेपर रुद्रलोक, कमलके पुष्प, नीलकमल, पाटला (लोध-लाल), कनेर आदि सुगन्धित पुष्पोंसे स्नान करानेपर ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। कपूर और अगरके जलसे स्नान करानेपर या गायत्रीमन्त्रसे सौ बार जलको अभिमन्त्रित कर उस जलसे स्नान करानेपर ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है। शीतल जल या कपिला गायके धारोष्ण दुग्धसे स्नान करानेके अनन्तर घृतसे स्नान करानेसे सभी पापोंसे मनुष्य मुक्त हो जाता है। इन तीनों स्नानोंको सम्पन्न कर भक्तिपूर्वक पूजा करनेसे पूजकको अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है। मिट्टीके घड़ेकी अपेक्षा ताँबेके घटसे ब्रह्माजीको स्नान करानेपर सौगुना, चाँदीके घटसे लाखगुना फल होता है और सुवर्ण-कलशसे स्नान करानेपर कोटिगुना फल प्राप्त होता है। ब्रह्माजीके दर्शनसे उनका स्पर्श करना श्रेष्ठ है, स्पर्शसे पूजन और पूजनसे घृतस्नान अधिक फलदायक है। सभी वाचिक और मानसिक पाप घृतस्नान करानेसे नष्ट हो जाते हैं।
राजन्! इस विधिसे स्नान कराकर भक्तिपूर्वक ब्रह्माजीकी पूजा इस प्रकार करनी चाहिये—पवित्र वस्त्र पहनकर, आसनपर बैठ सम्पूर्ण न्यास करना चाहिये। प्रथम चार हाथ विस्तृत स्थानमें एक अष्टदल-कमलका निर्माण करे। उसके मध्य नाना वर्णयुक्त द्वादशदल-यन्त्र लिखे और पाँच रंगोंसे उसको भरे। इस प्रकार यन्त्र-निर्माणकर गायत्रीके वर्णोंसे न्यास करे।
गायत्रीके अक्षरोंद्वारा शरीरमें न्यास कर देवताके शरीरमें भी न्यास करना चाहिये। प्रणवयुक्त गायत्री-मन्त्रके द्वारा अभिमन्त्रित केसर, अगर,
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
४८
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
चन्दन, कपूर आदिसे समन्वित जलसे सभी पूजाद्रव्योंका मार्जन करना चाहिये। अनन्तर पूजा करनी चाहिये। प्रणवका उच्चारण कर पीठस्थापन और प्रणवसे ही तेजःस्वरूप ब्रह्माजीका आवाहन करना चाहिये। पद्मपर विराजमान, चार मुखोंसे
युक्त चराचर विश्वकी सृष्टि करनेवाले श्रीब्रह्माजीका ध्यान कर पूजा करनी चाहिये। जो पुरुष प्रतिपदा तिथिके दिन भक्तिपूर्वक गायत्री-मन्त्रसे ब्रह्माजीका पूजन करता है, वह चिरकालतक ब्रह्मलोकमें निवास करता है। (अध्याय १७)
ब्रह्माजीकी रथयात्राका विधान और कार्तिक शुक्ल प्रतिपदाकी महिमा
सुमन्तु मुनिने कहा— हे राजा शतानीक! कार्तिक मासमें जो ब्रह्माजीकी रथयात्राका उत्सव करता है, वह ब्रह्मलोकको प्राप्त करता है। कार्तिककी पूर्णिमाको मृगचर्मके आसनपर सावित्रीके साथ ब्रह्माजीको रथमें विराजमान करे और विविध वाद्य-ध्वनिके साथ रथयात्रा निकाले। विशिष्ट उत्सवके साथ ब्रह्माजीको रथपर बैठाये और रथके आगे ब्रह्माजीके परम भक्त ब्राह्मण शाण्डिलीपुत्रको स्थापित कर उनकी पूजा करे। ब्राह्मणोंके द्वारा स्वस्तित एवं पुण्याहवाचन कराये। उस रात्रि जागरण करे। नृत्य-गीत आदि उत्सव एवं विविध क्रीडाएँ ब्रह्माजीके सम्मुख प्रदर्शित करे।
इस प्रकार रात्रिमें जागरण कर प्रतिपदाके दिन प्रातःकाल ब्रह्माजीका पूजन करना चाहिये। ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये, अनन्तर पुण्य शब्दोंके साथ रथयात्रा प्रारम्भ करनी चाहिये।
चारों वेदोंके ज्ञाता उत्तम ब्राह्मण उस रथको खींचें और रथके आगे वेद पढ़ते हुए ब्राह्मण चलते रहें। ब्रह्माजीके दक्षिण-भागमें सावित्री तथा वाम-भागमें भोजककी स्थापना करे। रथके आगे शङ्ख, भेरी, मृदङ्ग आदि विविध वाद्य बजते रहें। इस प्रकार सारे नगरमें रथको घुमाना चाहिये और नगरकी प्रदक्षिणा करनी चाहिये, अनन्तर उसे
अपने स्थानपर ले आना चाहिये। आरती करके ब्रह्माजीको उनके मन्दिरमें स्थापित करे। इस रथयात्राको सम्पन्न करनेवाले, रथको खींचनेवाले तथा इसका दर्शन करनेवाले सभी ब्रह्मलोकको प्राप्त करते हैं। दीपावलीके दिन ब्रह्माजीके मन्दिरमें दीप प्रज्वलित करनेवाला ब्रह्मलोकको प्राप्त करता है। दूसरे दिन प्रतिपदाको ब्रह्माजीकी पूजा करके स्वयं भी वस्त्र-आभूषणसे अलंकृत होना चाहिये। यह प्रतिपदा तिथि ब्रह्माजीको बहुत प्रिय है। इसी तिथिसे बलिके राज्यका आरम्भ हुआ है। इस दिन ब्रह्माजीका पूजनकर ब्राह्मण-भोजन करानेसे विष्णुलोककी प्राप्ति होती है। चैत्र मासमें कृष्णप्रतिपदाके दिन (होली जलानेके दूसरे दिन) चाण्डालका स्पर्शकर स्नान करनेसे सभी आधि-व्याधियाँ दूर हो जाती हैं। उस दिन गौ, महिष आदिको अलंकृतकर उन्हें मण्डपके नीचे रखना चाहिये तथा ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। चैत्र, आश्विन और कार्तिक इन तीनों महीनोंकी प्रतिपदा श्रेष्ठ है, किंतु इनमें कार्तिककी प्रतिपदा विशेष श्रेष्ठ है। इस दिन किया हुआ स्नान-दान आदि सौ गुने फलको देता है। राजा बलिको इसी दिन राज्य मिला था, इसलिये कार्तिककी प्रतिपदा श्रेष्ठ मानी जाती है। (अध्याय १८)
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
- ब्राह्मपर्व *
४९
द्वितीया-कल्पमें महर्षि च्यवनकी कथा एवं पुष्पद्वितीया-व्रतकी महिमा
सुमन्तु मुनि बोले—द्वितीया तिथिको च्यवन-ऋषिने इन्द्रके सम्मुख यज्ञमें अश्विनीकुमारोंको सोमपान कराया था।
राजाने पूछा—महाराज! इन्द्रके सम्मुख किस विधिसे अश्विनीकुमारोंको उन्होंने सोमरस पिलाया? क्या च्यवन-ऋषिकी तपस्याके प्रभावकी प्रबलतासे इन्द्र कुछ भी करनेमें समर्थ नहीं हुए?
सुमन्तु मुनिने कहा—सत्ययुगकी पूर्वसंध्यामें गङ्गाके तटपर समाधिस्थ हो च्यवनमुनि बहुत दिनोंसे तपस्यामें रत थे। एक समय अपनी सेना और अन्तःपुरके परिजनोंको साथ लेकर महाराज शर्याति गङ्गा-स्नानके लिये वहाँ आये। उन्होंने च्यवन-ऋषिके आश्रमके* समीप आकर गङ्गा-स्नान सम्पन्न किया तथा देवताओंकी आराधना की और पितरोंका तर्पण किया। तदनन्तर जब वे अपने नगरकी ओर जानेको उद्यत हुए तो उसी समय उनकी सभी सेनाएँ व्याकुल हो गयीं और मूत्र तथा विष्टा उनके अचानक ही बंद हो गये, आँखोंसे कुछ भी नहीं दिखायी दिया। सेनाकी यह दशा देखकर राजा घबड़ा उठे। राजा शर्याति प्रत्येक व्यक्तिसे पूछने लगे—यह तपस्वी च्यवनमुनिका पवित्र आश्रम है, किसिने कुछ अपराध तो नहीं किया? उनके इस प्रकार पूछनेपर किसिने कुछ भी नहीं कहा।
सुकन्याने अपने पितासे कहा—महाराज! मैंने एक आश्चर्य देखा, जिसका मैं वर्णन कर रही हूँ। अपनी सहेलियोंके साथ मैं वन-विहार कर रही थी
कि एक ओरसे मुझे यह शब्द सुनायी पड़ा—‘सुकन्ये! तुम इधर आओ, तुम इधर आओ।’ यह सुनकर मैं अपनी सखियोंके साथ उस शब्दकी ओर गयी। वहाँ जाकर मैंने एक बहुत ऊँचा वल्मीक देखा।
उसके अंदरके छिद्रोंमें दीपकके समान देदीप्यमान दो पदार्थ मुझे दिखलायी पड़े। उन्हें देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि ये पद्मरागमणिके समान क्या चमक रहे हैं। मैंने अपनी मूर्खता और चञ्चलतासे कुशाके अग्रभागसे वल्मीकके प्रकाशयुक्त छिद्रोंको बींध दिया, जिससे वह तेज शान्त हो गया।
यह सुनकर राजा बहुत व्याकुल हो गये और अपनी कन्या सुकन्याको लेकर वहाँ गये जहाँ च्यवनमुनि तपस्यामें रत थे। च्यवन-ऋषिको वहाँ
- अन्य पुराणोंमें तथा महाभारतके अनुसार यह आश्रम सोनभद्र और वधूसरा नदीके संगमपर था, जो आज देवकुण्डके नामसे प्रसिद्ध है। प्रायः पुराणोंमें यह श्लोक भी प्राप्त होता है—
मगधे तु गया पुण्या नदी पुण्या पुनःपुना। च्यवनस्य आश्रमं पुण्यं पुण्यं राजगृहं वनम् ॥
तथा—
वधूसरेति सरिता च्यवनस्याश्रमं प्रति।
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
५० * संक्षिप्त भविष्यपुराण *
समाधिस्थ होकर बैठे हुए इतने दिन व्यतीत हो गये थे कि उनके ऊपर वल्मीक बन गया था। जिन तेजस्वी छिद्रोंको सुकन्याने कुशके अग्रभागसे बींध दिया था, वे उस महातपस्वीके प्रकाशमान नेत्र थे। राजा वहाँ पहुँचकर अतिशय दीनताके साथ विनती करने लगे।
राजा बोले—महाराज! मेरी कन्यासे बहुत बड़ा अपराध हो गया है। कृपाकर क्षमा करें।
च्यवनमुनिने कहा—अपराध तो मैंने क्षमा किया, परंतु अपनी कन्याका मेरे साथ विवाह कर दो, इसीमें तुम्हारा कल्याण है। मुनिका वचन सुनकर राजाने शीघ्र ही सुकन्याका च्यवन-ऋषिसे विवाह कर दिया। सभी सेनाएँ सुखी हो गयीं और मुनिको प्रसन्नकर सुखपूर्वक राजा अपने नगरमें आकर राज्य करने लगे। सुकन्या भी विवाहके बाद भक्तिपूर्वक मुनिकी सेवा करने लगी। राजवस्त्र, आभूषण उसने उतार दिये और वृक्षकी छाल तथा मृगचर्म धारण कर लिया। इस प्रकार मुनिकी सेवा करते हुए कुछ समय व्यतीत हो गया और वसन्त-ऋतु आयी। किसी दिन मुनिने संतान-प्राप्तिके लिये अपनी पत्नी सुकन्याका आह्वान किया। इसपर सुकन्याने अतिशय विनयभावसे विनती की।
सुकन्या बोली—महाराज! आपकी आज्ञा मैं किसी प्रकार भी टाल नहीं सकती, किंतु इसके लिये आपको युवावस्था तथा सुन्दर वस्त्र-आभूषणोंसे अलंकृत कमनीय स्वरूप धारण करना चाहिये।
च्यवनमुनिने उदास होकर कहा—न मेरा उत्तम रूप है और न तुम्हारे पिताके समान मेरे पास धन है, जिससे सभी भोग-सामग्रियोंको मैं एकत्र कर सकूँ।
सुकन्या बोली—महाराज! आप अपने तपके प्रभावसे सब कुछ करनेमें समर्थ हैं। आपके लिये यह कौन-सी बड़ी बात है?
च्यवनमुनिने कहा—राजपुत्रि! इस कामके लिये मैं अपनी तपस्या व्यर्थ नहीं करूँगा। इतना कहकर वे पहलेकी तरह तपस्या करने लगे। सुकन्या भी उनकी सेवामें तत्पर हो गयी।
इस प्रकार बहुत काल व्यतीत होनेके बाद अश्विनीकुमार उसी मार्गसे चले जा रहे थे कि उनकी दृष्टि सुकन्यापर पड़ी।
अश्विनीकुमारोंने कहा—भद्रे! तुम कौन हो? और इस घोर वनमें अकेली क्यों रहती हो?
सुकन्याने कहा—मैं राजा शर्यातिकी सुकन्या नामकी पुत्री हूँ। मेरे पति च्यवन-ऋषि यहाँ तपस्या कर रहे हैं, उन्हींकी सेवाके लिये मैं यहाँ उनके समीप रहती हूँ। कहिये, आपलोग कौन हैं?
अश्विनीकुमारोंने कहा—हम देवताओंके वैद्य अश्विनीकुमार हैं। इस वृद्ध पतिसे तुम्हें क्या सुख मिलेगा? हम दोनोंमें किसी एकका वरण कर लो।
सुकन्याने कहा—देवताओ! आपका ऐसा कहना ठीक नहीं। मैं पतिव्रता हूँ और सब प्रकारसे अनुरक्त होकर दिन-रात अपने पतिकी सेवा करती हूँ।
अश्विनीकुमारोंने कहा—यदि ऐसी बात है तो हम तुम्हारे पतिदेवको अपने उपचारके द्वारा अपने समान स्वस्थ एवं सुन्दर बना देंगे और जब हम तीनों गङ्गामें स्नानकर बाहर निकलें फिर जिसे तुम पतिरूपमें वरण करना चाहो कर लेना।
सुकन्याने कहा—मैं बिना पतिकी आज्ञाके कुछ नहीं कह सकती।
अश्विनीकुमारोंने कहा—तुम अपने पतिसे पूछ आओ, तबतक हम यहीं प्रतीक्षामें रहेंगे। सुकन्याने च्यवनमुनिके पास जाकर उन्हें सम्पूर्ण वृत्तान्त बतलाया। अश्विनीकुमारोंकी बात स्वीकार कर च्यवनमुनि सुकन्याको लेकर उनके पास आये।
च्यवनमुनिने कहा—अश्विनीकुमारो! आपकी
- ब्राह्मपर्व *
५१
शर्त हमें स्वीकार है। आप हमें उत्तम रूपवान् बना दें, फिर सुकन्या चाहे जिसे वरण करे। च्यवनमुनिके इतना कहनेपर अश्विनीकुमार च्यवनमुनिको लेकर गङ्गाजीके जलमें प्रविष्ट हो गये और कुछ देर बाद तीनों ही बाहर निकले। सुकन्याने देखा कि ये तीनों तो समान रूप, समान अवस्था तथा समान वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत हैं, फिर इनमें मेरे पति च्यवनमुनि कौन हैं? वह कुछ निश्चित न कर सकी और व्याकुल हो अश्विनीकुमारोंकी प्रार्थना करने लगी।
सुकन्या बोली—देवो! अत्यन्त कुरूप पतिदेवका भी मैंने परित्याग नहीं किया था। अब तो आपकी कृपासे उनका रूप आपके समान सुन्दर हो गया है, फिर मैं कैसे उनका परित्याग कर सकती हूँ। मैं आपकी शरण हूँ, मुझपर कृपा कीजिये।
सुकन्याकी इस प्रार्थनासे अश्विनीकुमार प्रसन्न हो गये और उन्होंने देवताओंके चिह्नोंको धारण
कर लिया। सुकन्याने देखा कि तीन पुरुषोंमेंसे दोकी पलकें गिर नहीं रही हैं और उनके चरण भूमिको स्पर्श नहीं कर रहे हैं, किंतु जो तीसरा
पुरुष है, वह भूमिपर खड़ा है और उसकी पलकें भी गिर रही हैं। इन चिह्नोंको देखकर सुकन्याने निश्चित कर लिया कि ये तीसरे पुरुष ही मेरे स्वामी च्यवनमुनि हैं। तब उसने उनका वरण कर लिया। उसी समय आकाशसे उसपर पुष्प-वृष्टि होने लगी और देवगण दुन्दुभि बजाने लगे।
च्यवनमुनिने अश्विनीकुमारोंसे कहा—देवो! आप लोगोंने मुझपर बहुत उपकार किया है, जिसके फलस्वरूप मुझे उत्तम रूप और उत्तम पत्नी प्राप्त हुई। अब मैं आपलोगोंका क्या प्रत्युपकार करूँ, क्योंकि जो उपकार करनेवालेका प्रत्युपकार नहीं करता, वह क्रमसे इक्कीस नरकोंमें जाता है*, इसलिये आपका मैं क्या प्रिय करूँ, आप लोग कहें।
अश्विनीकुमारोंने उनसे कहा—महात्मन्! यदि आप हमारा प्रिय करना ही चाहते हैं तो अन्य देवताओंकी तरह हमें भी यज्ञभाग दिलवाइये। च्यवनमुनिने यह बात स्वीकार कर ली, फिर वे उन्हें विदाकर अपनी भार्या सुकन्याके साथ अपने आश्रममें आ गये।
राजा शर्यातिको जब यह सारा वृत्तान्त ज्ञात हुआ तो वे भी रानीको साथ लेकर सुन्दर रूप-प्राप्त महातेजस्वी च्यवन-ऋषिको देखने आश्रममें आये। राजाने च्यवनमुनिको प्रणाम किया और उन्होंने भी राजाका स्वागत किया। सुकन्याने अपनी माताका आलिङ्गन किया। राजा शर्याति अपने जामाता महामुनि च्यवनका उत्तम रूप देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुए।
च्यवनमुनिने राजासे कहा—राजन्! एक महायज्ञकी सामग्री एकत्र कीजिये, हम आपसे यज्ञ करायेंगे। च्यवनमुनिकी आज्ञा प्राप्तकर राजा शर्याति अपनी राजधानी लौट आये और यज्ञ-सामग्री एकत्रकर यज्ञकी तैयारी करने लगे। मन्त्री,
- उपकारं वरिष्ठं यो न करोत्युपकारिणः ॥ एकविंशत् स गच्छेच्च नरकाणि क्रमेण वै। (ब्राह्मपर्व १९।५०-५१)
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
५२
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
पुरोहित और आचार्यको बुलाकर यज्ञकार्यके लिये उन्हें नियुक्त किया। च्यवनमुनि भी अपनी पत्नी सुकन्याको लेकर यज्ञ-स्थलमें पधारे।
सभी ऋषिगणोंको आमन्त्रण देकर यज्ञमें बुलाया गया। विधिपूर्वक यज्ञ प्रारम्भ हुआ। ऋत्विक् अग्निकुण्डमें स्वाहाकारके साथ देवताओंको आहुति देने लगे। सभी देवता अपना-अपना यज्ञ-भाग लेने वहाँ आ पहुँचे। च्यवनमुनिके कहनेसे अश्विनीकुमार भी वहाँ आये। देवराज इन्द्र उनके आनेका प्रयोजन समझ गये।
इन्द्र बोले—मुने! ये दोनों अश्विनीकुमार देवताओंके वैद्य हैं, इसलिये ये यज्ञ-भागके अधिकारी नहीं हैं, आप इन्हें आहुतियाँ प्रदान न करवायें।
च्यवनमुनिने इन्द्रसे कहा—ये देवता हैं और इनका मेरे ऊपर बड़ा उपकार है, ये मेरे ही
आमन्त्रणपर यहाँ पधारे हैं, इसलिये मैं इन्हें अवश्य यज्ञ-भाग दूँगा। यह सुनकर इन्द्र क्रुद्ध हो उठे और कठोर स्वरमें कहने लगे।
इन्द्र बोले—यदि तुम मेरी बात नहीं मानोगे तो वज्रसे तुमपर मैं प्रहार करूँगा। इन्द्रकी ऐसी वाणी सुनकर च्यवनमुनि किंचित् भी भयभीत
नहीं हुए और उन्होंने अश्विनीकुमारोंको यज्ञ-भाग दे ही दिया, तब तो इन्द्र अत्यन्त क्रुद्ध हो उठे और उन्होंने ज्यों ही च्यवनमुनिपर प्रहार करनेके लिये अपना वज्र उठाया त्यों ही च्यवनमुनिने अपने तपके प्रभावसे इन्द्रका स्तम्भन कर दिया। इन्द्र हाथमें वज्र लिये खड़े ही रह गये।
च्यवनमुनिने अश्विनीकुमारोंको यज्ञ-भाग देकर अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर ली और यज्ञको पूर्ण किया। उसी समय वहाँ ब्रह्माजी उपस्थित हुए।
ब्रह्माजीने च्यवनमुनिसे कहा—महामुने! आप इन्द्रको स्तम्भन-मुक्त कर दें। अश्विनीकुमारोंको यज्ञ-भाग दे दें। इन्द्रने भी स्तम्भनसे मुक्त करनेके लिये प्रार्थना की।
इन्द्रने कहा—मुने! आपके तपकी प्रसिद्धिके लिये ही मैंने इन अश्विनीकुमारोंको यज्ञमें भाग लेनेसे रोका था, अब आजसे सब यज्ञोंमें अन्य देवताओंके साथ अश्विनीकुमारोंको भी यज्ञ-भाग मिला करेगा और इनको देवत्व भी प्राप्त होगा। आपके इस तपके प्रभावको जो सुनेगा अथवा पढ़ेगा, वह भी उत्तम रूप एवं यौवनको प्राप्त करेगा। इतना कहकर देवराज इन्द्र देवलोकको चले गये और च्यवनमुनि सुकन्या तथा राजा शयांतिके साथ आश्रमपर लौट आये।
वहाँ उन्होंने देखा कि बहुत उत्तम-उत्तम महल बन गये हैं, जिनमें सुन्दर उपवन और वापी आदि विहारके लिये बने हुए हैं। भाँति-भाँतिकी शय्याएँ बिछी हुई हैं, विविध रलोंसे जटित आभूषणों तथा उत्तम-उत्तम वस्त्रोंके ढेर लगे हैं। यह देखकर सुकन्यासहित च्यवनमुनि अत्यन्त प्रसन्न हो गये और उन्होंने यह सब देवराज इन्द्रद्वारा प्रदत्त समझकर उनकी प्रशंसा की।
महामुनि सुमन्तु राजा शतानीकसे बोले—रजन्! इस प्रकार द्वितीया तिथिके दिन अश्विनीकुमारोंको
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
- ब्राह्मपर्व *
५३
देवत्व तथा यज्ञ-भाग प्राप्त हुआ था। अब आप इस द्वितीया तिथिके व्रतका विधान सुनें—
शतानीक बोले —जो पुरुष उत्तम रूपकी इच्छा करे वह कार्तिक मासके शुक्ल पक्षकी द्वितीयासे व्रतको आरम्भ करे और वर्षपर्यन्त संयमित होकर पुष्प-भोजन करे। जो उत्तम हविष्य-पुष्प उस ऋतुमें हों उनका आहार करे। इस प्रकार एक वर्ष व्रत कर सोने-चाँदीके पुष्प बनाकर अथवा कमलपुष्पोंको ब्राह्मणोंको देकर व्रत सम्पन्न करे। इससे अश्विनीकुमार संतुष्ट होकर उत्तम रूप प्रदान करते हैं। व्रती उत्तम विमानोंमें बैठकर
स्वर्गमें जाकर कल्पपर्यन्त विविध सुखोंका उपभोग करता है। फिर मर्त्यलोकमें जन्म लेकर वेद-वेदाङ्गोंका ज्ञाता, महादानी, आधि-व्याधियोंसे रहित, पुत्र-पौत्रोंसे युक्त, उत्तम पत्नीवाला ब्राह्मण होता है अथवा मध्यदेशके उत्तम नगरमें राजा होता है।
राजन्! इस पुष्पद्वितीया-व्रतका विधान मैंने आपको बतलाया। ऐसी ही फल-द्वितीया भी होती है, जिसे अशून्यशयना-द्वितीया भी कहते हैं। फल-द्वितीयाको जो श्रद्धापूर्वक व्रत करता है, वह ऋद्धि-सिद्धिको प्राप्तकर अपनी भार्यासहित आनन्द प्राप्त करता है। (अध्याय १९)
फल-द्वितीया (अशून्यशयन-व्रत)-का व्रत-विधान और द्वितीया-कल्पकी समाप्ति
राजा शतानीकने कहा—मुने! कृपाकर आप फल-द्वितीयाका विधान कहें, जिसके करनेसे स्त्री विधवा नहीं होती और पति-पत्नीका परस्पर वियोग भी नहीं होता।
सुमन्तु मुनिने कहा—राजन्! मैं फल-द्वितीयाका विधान कहता हूँ, इसीका नाम अशून्यशयना-द्वितीया भी है। इस व्रतको विधिपूर्वक करनेसे स्त्री विधवा नहीं होती और स्त्री-पुरुषका परस्पर वियोग भी नहीं होता। क्षीरसागरमें लक्ष्मीके साथ भगवान् विष्णुके शयन करनेके समय यह व्रत होता है। श्रावण मासके कृष्ण पक्षकी द्वितीयाके दिन लक्ष्मीके साथ श्रीवत्सधारी भगवान् श्रीविष्णुका पूजन कर हाथ जोड़कर इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये—
श्रीवत्सधारिञ्जीकान्त श्रीवत्स श्रीपतेऽव्यय।
गाहैस्थ्यं मा प्रणाशं मे यातु धर्मार्थकामदम्॥
गावश्च मा प्रणश्यन्तु मा प्रणश्यन्तु मे जनाः॥
जामयो मा प्रणश्यन्तु मत्तो दाम्यत्वभेदतः।
लक्ष्म्या वियुज्येऽहं देव न कदाचिद्यथा भवान्॥ तथा कलत्रसम्बन्धो देव मा मे वियुज्यताम्। लक्ष्म्या न शून्यं वरद यथा ते शयनं सदा॥ शय्या ममाप्यशून्यास्तु तथा तु मधुसूदन*।
(ब्राह्मपर्व २०।७—११)
इस प्रकार विष्णुकी प्रार्थना करके व्रत करना चाहिये। जो फल भगवान्को प्रिय हैं, उन्हें भगवान्की शय्यापर समर्पित करना चाहिये और स्वयं भी रात्रिके समय उन्हीं फलोंको खाकर दूसरे दिन ब्राह्मणोंको दक्षिणा देनी चाहिये।
राजा शतानीकने पूछा—महामुने! भगवान् विष्णुको कौन-से फल प्रिय हैं, आप उन्हें बतायें। दूसरे दिन ब्राह्मणोंको क्या दान देना चाहिये? उसे भी कहें।
सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! उस ऋतुमें जो भी फल हों और पके हों, उन्हींको भगवान् विष्णुके लिये समर्पित करना चाहिये। कडुवे-कच्चे तथा
- हे श्रीवत्स-चिह्नको धारण करनेवाले लक्ष्मीके स्वामी शाश्वत भगवान् विष्णु! धर्म, अर्थ और कामको पूर्ण करनेवाला मेरा गृहस्थ-आश्रम कभी नष्ट न हो। मेरी गौई भी नष्ट न हों न कभी मेरे परिवारके लोग कष्टमें पड़ें एवं न नष्ट हों। मेरे घरकी स्त्रियाँ भी कभी विपत्तियोंमें न पड़ें और हम पति-पत्नीमें भी कभी मतभेद उत्पन्न न हो। हे देव! मैं लक्ष्मीसे कभी वियुक्त न होऊँ और पत्नीसे भी कभी मुझे वियोगकी प्राप्ति न हो। प्रभो! जैसे आपकी शय्या कभी लक्ष्मीसे शून्य नहीं होती, उसी प्रकार मेरी शय्या भी कभी शोभारहित एवं लक्ष्मी तथा पत्नीसे शून्य न हो।
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth