भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

जाती है। स्त्रियोंका यह दौर्भाग्य ही दुःख भोगनेका कारण है। इसका कोई प्रतीकार नहीं, यदि है तो इसकी ओषधि है उत्तम चरित्रका आचरण और लोक-व्यवहारको ठीकसे समझना।

ब्रह्माजी बोले— मुनीश्वरो! उत्तम आचरणवाली स्त्री भी यदि बुरा सङ्ग करे या अपनी इच्छासे जहाँ चाहे चली जाय तो उसे अवश्य कलंक लगता है और झूठा दोष लगनेसे कुल भी कलंकित हो जाता है। उत्तम कुलकी स्त्रियोंके लिये यह आवश्यक है कि वे किसी भी भाँति अपने कुल—मातृकुल, पितृकुल एवं संततिको कलंक न लगने दें। ऐसी कुलीन स्त्रीसे ही धर्म, अर्थ तथा काम—इस त्रिवर्गकी सिद्धि हो सकती है। इसके विपरीत बुरे आचरणवाली स्त्रियाँ अपने कुलोंको नरकमें डालती हैं और चरित्रको ही अपना आभूषण माननेवाली स्त्रियाँ नरकमें गिरे हुओंको भी निकाल लेती हैं। जिन स्त्रियोंका चित्त पतिके अनुकूल है और जिनका उत्तम आचरण है, उनके लिये रत्न, सुवर्ण आदिके आभूषण भारस्वरूप ही हैं अर्थात् स्त्रियोंके यथार्थ आभूषण ये दो हैं—पतिकी अनुकूलता और उत्तम आचरण। जो स्त्री पतिकी और लोककी अपने यथोचित व्यवहारदिसे आराधना करती है अर्थात् पतिके अनुकूल चलती है और लोकव्यवहारको ठीक-ठीक समझकर तदनुकूल आचरण करती है, वह स्त्री धर्म, अर्थ तथा कामकी अबाधसिद्धि प्राप्त कर लेती है—

भर्तृचित्तानुकूलत्वं यासां शीलमविच्युतम् ।

तासां रत्नसुवर्णादि भार एव न मण्डनम् ॥

लोकज्ञाने परा कोटिः पत्न्यौ भक्तिश्च शाश्वती ।

शुद्धान्वयानां नारीणां विद्यादेतत्कुलव्रतम् ॥

तस्माल्लोकश्च भर्ता च सम्यगाराधितौ यया ।

धर्ममर्थ च कामं च सैवाप्रेति निरत्यया ॥

(ब्राह्मपर्व १३।६४—६६)

जिस स्त्रीका पति परदेशमें गया हो, उस स्त्रीको अपने पतिकी मङ्गलकामनाके सूचक सौभाग्य-सूत्र आदि स्वल्प आभूषण ही पहनने चाहिये, विशेष शृंगार नहीं करना चाहिये। उसे पतिद्वारा प्रारम्भ किये कार्योंका प्रयत्नपूर्वक सम्पादन करते रहना चाहिये। वह देहका अधिक संस्कार न करे। रात्रिको सास आदि पूज्य स्त्रियोंके समीप सोये। बहुत अधिक खर्च न करे। व्रत, उपवास आदिके नियमोंका पालन करती रहे। दैवज्ञ आदि श्रेष्ठजनोंसे पतिके कुशल-क्षेमका वृत्तान्त जाननेकी कोशिश करे और परदेशमें उसके कल्याणकी कामनासे तथा शीघ्र आगमनकी अभिलाषासे नित्य देवताओंका पूजन करे। अत्यन्त उज्ज्वल वेष न बनाये और न सुगन्धित तैलादि द्रव्योंका प्रयोग करे। उसे सम्बन्धियोंके घर नहीं जाना चाहिये। यदि किसी आवश्यक कार्यवश जाना ही पड़ जाय तो अपनेसे बड़ोंकी आज्ञा लेकर पतिके विश्वसनीय जनोंके साथ जाय। किंतु वहाँ अधिक समयतक न रहे, शीघ्र वापस लौट आये। वहाँ स्नान आदि व्यवहारोंको न करे। प्रवाससे पतिके लौट आनेपर प्रसन्न-मनसे सुन्दर वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत होकर पतिका यथोचित भोजनादिसे सत्कार करे और देवताओंसे पतिके लिये माँगी गयी मनोतियोंको पूजादिद्वारा यथाविधि सम्पन्न करे।

इस प्रकार मन, वाणी तथा कर्मोंसे सभी अवस्थाओंमें पतिका हित-चिन्तन करती रहे, क्योंकि पतिके अनुकूल रहना स्त्रियोंके लिये विशेष धर्म है। अपने सौभाग्यपर अहंकार न करे और उद्धृत कार्योंको भी न करे तथा अत्यन्त विनम्रभावसे रहे। इस प्रकारसे पतिकी सेवा करते हुए जो स्त्री पतिके कार्योंमें प्रमाद नहीं करती, पूज्यजनोंका सदा आदर करती रहती है, नौकरोंका भरण-पोषण करती है, नित्य सदगुणोंकी अभिवृद्धिके लिये प्रयत्नशील रहती

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