भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें- ब्राह्मपर्व *
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है तथा सब प्रकारसे अपने शीलकी रक्षा करती रहती है, वह स्त्री इस लोक तथा परलोकमें उत्तम सुख एवं उत्तम कीर्ति प्राप्त करती है१।
जिस स्त्रीपर पति अति क्रोधयुक्त हो और उसका आदर न करे, वह स्त्री दुर्भगा कहलाती है। उसे चाहिये कि वह नित्य व्रत-उपवासदि क्रियाओंमें संलग्न रहे और पतिके बाह्य कार्योंमें विशेषरूपसे सहयोग करे। जातिसे कोई स्त्री दुर्भगा अथवा सुभगा (सौभाग्यशालिनी) नहीं होती। वह अपने व्यवहारसे ही पतिकी प्रिय और अप्रिय हो जाती है। उत्तम स्त्री पतिके चित्तका अभिप्राय न जाननेसे, उसके प्रतिकूल चलनेसे और लोकविरुद्ध
आचरण करनेसे दुर्भगा हो जाती है एवं उसके अनुकूल चलनेसे सुभगा हो जाती है। मनोवृत्तिके अनुकूल कार्य करनेसे पराया भी प्रिय हो जाता है और मनोऽनुकूल कार्य न करनेसे अपना जन भी शीघ्र शत्रु बन जाता है। इसलिये स्त्रीको मन, वचन तथा अपने कार्यद्वारा सभी अवस्थाओंमें पतिके अनुसार ही प्रिय आचरण करना चाहिये। इस प्रकार कहे गये स्त्री-वृत्तको भलीभाँति समझकर जो स्त्री पतिकी सेवा करती है, वह पतिको अपना बना लेती है और पतिकी सेवासे सभी सुखों तथा त्रिवर्गको भी प्राप्त कर लेती है२।
(अ० १०—१५)
पञ्चमहायज्ञोंका वर्णन तथा व्रत-उपवासोंके प्रकरणमें आहारका निरूपण एवं प्रतिपदा तिथिकी उत्पत्ति, व्रत-विधि और माहात्म्य
सुमन्तु मुनिने कहा—राजन्! इस प्रकार स्त्रियोंके लक्षण और सदाचारका वर्णन करके ब्रह्माजी अपने लोक तथा ऋषिगण भी अपने-अपने आश्रमोंकी ओर चले गये। अब गृहस्थोंको कैसा आचरण करना चाहिये, उसे मैं बताता हूँ, आप ध्यानपूर्वक सुनें—
गृहस्थोंको वैवाहिक अग्निमें विधिपूर्वक गृह्यकर्मोंको करना चाहिये तथा पञ्चमहायज्ञोंका भी सम्पादन करना चाहिये। गृहस्थोंके यहाँ जीव-हिंसा होनेके पाँच स्थान हैं—ओखली, चक्की, चूल्हा, झाडू
तथा जल रखनेके स्थान। इस हिंसा दोषसे मुक्ति पानेके लिये गृहस्थोंको पञ्चमहायज्ञों—(१) ब्रह्मयज्ञ, (२) पितृयज्ञ, (३) दैवयज्ञ, (४) भूतयज्ञ तथा (५) अतिथियज्ञको नित्य अवश्य करना चाहिये। अध्ययन करना तथा अध्यापन करना यह ब्रह्मयज्ञ है, तर्पणादि कर्म पितृयज्ञ है। देवताओंके लिये हवनादि कर्म दैवयज्ञ है। बलिवैश्वदेव कर्म भूतयज्ञ है तथा अतिथि एवं अभ्यागतोंका स्वागत-सत्कार करना अतिथियज्ञ है—
१- एवमाराध्य भर्तारं तत्कार्येष्वप्रमादिनी । पूज्यानां पूजने नित्यं भूत्यानां भरणेषु च ॥ गुणानामर्जने नित्यं शीलवत्परिक्षणे । प्रेत्य चेह च निर्द्वन्द्वं सुखमाप्नोत्यनुत्तमम् ॥
(ब्राह्मपर्व १४।३१-३२)
२- न कापि दुर्भगा नाम सुभगा नाम जातितः । व्यवहाराद्भवत्येष निर्देशो रिपुमित्रवत् ॥ भर्तृचित्तापरिज्ञानादननुष्ठानतोऽपि वा । वृत्तैर्लोकविरुद्धैश्च यान्ति दुर्भगतां स्त्रियः ॥ आनुकूल्यान्यनोवृत्तेः परोऽपि प्रियतां ब्रजेत् । प्रातिकूल्यान्निजोऽप्याशु प्रियः प्रहेपतामियात् ॥ तस्मात् सर्वस्ववस्थामु मनोवाक्कायकर्मभिः । प्रियं समाचरेन्नित्यं तच्चिन्तानुविधायिनी ॥ एवमेव यथोद्दिष्टं स्त्रीवृत्तं यानुतिष्ठति । पतिमाराध्य सम्पूर्णं त्रिवर्गं साधिगच्छति ॥
(ब्राह्मपर्व १५।१६—१९, ३२)
[वर्तमान समयमें पाश्चात्य सभ्यताके प्रभावसे देशमें दूषित और उच्छृङ्खलतापूर्ण वातावरण बन गया है। स्त्रियोंसे सम्बद्ध भविष्यपुराणका यह उल्लेख रामायण, महाभारत, स्मृतियों तथा अन्य पुराणोंमें भी उपलब्ध है। आजके विश्वकी सभी समस्याओंका एकमात्र मुख्य कारण आचारका पतन है, इसका प्रभाव संततियोंपर भी पड़ता है। अतः सभीको सदाचरणपर विशेष ध्यान देनेकी आवश्यकता है।]
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