भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 50, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- ब्राह्मपर्व *
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पशुओं और सर्पोंसे रहित, घास और जलसे युक्त, छायादार घने वृक्षोंवाले तथा पशुओंके रोगसे रहित स्थानपर गायोंके रहनेके लिये गोष्ठ या गोशाला बनानी चाहिये। कृषि-कार्यमें लगे सेवकोंके लिये देश-काल और उनके कार्यके अनुरूप भोजन तथा वेतनका प्रबन्ध करना चाहिये। खेत, खलिहान अथवा वाटिका आदिमें जहाँ भी सेवक कामपर लगे हों वहाँ बार-बार जाकर उनके कार्य एवं कार्यके प्रति उनके मनोयोगकी जानकारी करनी चाहिये। उनमेंसे जो योग्य हो, अच्छा कार्य करता हो, उसका अधिक सत्कार करे और उसके लिये भोजन, आवास आदिकी औरोंसे विशेष व्यवस्था करे। समय-समयपर सब प्रकारके अन्न और कन्द-मूलके बीजोंका संग्रह करे तथा यथासमय उनकी बुआई कर दे।
घरका मूल है स्त्री और गृहस्थाश्रमका मूल है अन्न। इसलिये भोज्यादि अन्न पदार्थोंमें घरकी स्त्रीको मुक्तहस्त नहीं होना चाहिये अर्थात् अन्नको वह वृथा नष्ट न करे, सदा सँजोकर रखे। उसे मितव्ययी होना चाहिये। अन्नदिमें मुक्तहस्त होना गृहिणियोंके लिये अच्छा नहीं माना जाता। वह संचय करनेमें और खर्च करनेमें मधुमक्खी, वल्मीक और अंजनके समान हानि-लाभ देखकर अन्नको थोड़ा-सा समझकर उसकी अवज्ञा न करे। क्योंकि थोड़ा-थोड़ा ही मधु एकत्र करती हुई मधुमक्खी कितना एकत्र कर लेती है? इसी प्रकार दीमक जरा-जरा-सी मिट्टी लाकर कितना ऊँचा वल्मीक बना लेती है? किंतु इसके विपरीत बहुत-सा बनाया गया अंजन भी नित्य थोड़ा-थोड़ा आँखमें डालते रहनेसे कुछ दिनोंमें समाप्त हो जाता है। इसी रीतिसे सभी वस्तुओंका संग्रह और खर्च हो जाता है। इसमें थोड़ी वस्तुकी अवज्ञा नहीं करनी चाहिये। घरके सभी कार्य स्त्री-पुरुषके एकमत
होनेपर ही अच्छे होते हैं।
जगत्में ऐसे भी हजारों पुरुष हैं, जिनके सब कार्यमें स्त्रीकी प्रधानता रहती है। यदि स्त्री बुद्धिमान् और सुशील हो तो कुछ हानि नहीं होती, किंतु इसके विपरीत होनेपर अनेक प्रकारके दुःख होते हैं। इसलिये स्त्रीकी योग्यता-अयोग्यताको ठीकसे समझकर बुद्धिमान् पुरुषको उसे कार्यमें नियुक्त करना चाहिये। इस प्रकार योग्यतासे कार्यमें नियुक्त की गयी स्त्रीको चाहिये कि वह सौभाग्यवश या अपने उद्यम आदिसे अपने पतिकी भलीभाँति सेवा कर उसे अपने अनुकूल बनाये।
ब्रह्माजी बोले—हे मुनीश्वरो! घरमें स्त्री प्रातःकाल सबसे पहले उठे और अपने कार्यमें प्रवृत्त हो जाय तथा रात्रिमें सबसे पीछे भोजन करे और सबके बादमें सोये। पति तथा ससुर आदिके उपस्थित न रहनेपर स्त्रीको घरकी देहली पार नहीं करनी चाहिये। वह बड़े सबेरे ही जग जाय। स्त्री पतिके समीप बैठकर ही सब सेवकोंको कामकी आज्ञा दे, बाहर न जाय। जब पति भी जग उठे तब वहाँके सभी आवश्यक कार्य करके, घरके अन्य कार्योंको भी प्रमादरहित होकर करे। रात्रिके पहले ही उत्तम वस्त्राभूषणोंको उतारकर घरके कार्योंको करने योग्य साधारण वस्त्रोंको पहनकर तत्त् समयमें करने योग्य कार्योंको यथाक्रम करना चाहिये। उसे चाहिये कि सबसे पहले रसोई, चूल्ला आदिको भलीभाँति लीप-पोतकर स्वच्छ करे। रसोईके पात्रोंको माँज-धो और पोंछकर वहाँ रखे तथा अन्य भी सब रसोईकी सामग्री वहाँ एकत्र करे। रसोई-घर न तो अधिक गुप्त (बंद) हो और न एकदम खुला ही हो। स्वच्छ, विस्तीर्ण और जिसमेंसे धुआँ निकल जाय ऐसा होना चाहिये। रसोई-घरके भोजन पकानेवाले पात्रोंको तथा दूध-दहीके पात्रोंको सीपी, रस्सी अथवा वृक्षकी छालसे खूब रगड़कर अंदर-बाहरसे
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