भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
अच्छी तरह धो लेना चाहिये। रात्रिमें धुएँ-आगके द्वारा तथा दिनमें धूपमें उन्हें सुखा लेना चाहिये, जिससे उन पात्रोंमें रखा जानेवाला दूध-दही आदि खराब न होने पाये। बिना शोधित पात्रोंमें रखा दूध-दही विकृत हो जाता है। दूध-दही, घी तथा बने हुए पाकादिको सावधानीसे रखना चाहिये और उसका निरीक्षण करते रहना चाहिये।
स्नानादि आवश्यक कृत्य करके उसे अपने हाथसे पतिके लिये भोजन बनाना चाहिये। उसे यह विचार करना चाहिये कि मधुर, क्षार, अम्ल आदि रसोंमें कौन-कौन-सा भोजन पतिको प्रिय है, किस भोजनसे अग्निकी वृद्धि होती है, क्या पथ्य है और कौन भोजन कालके अनुरूप होगा, क्या अपथ्य है, उत्तम स्वास्थ्य किस भोजनसे प्राप्त होगा और कौन भोजन कालके अनुरूप होगा आदि बातोंका भलीभाँति विचारकर और निर्णयकर उसे वैसा ही भोजन प्रीतिपूर्वक बनाना चाहिये। रसोई-घरमें सदासे काम करनेवाले, विश्वस्त तथा आहारका परीक्षण करनेवाले व्यक्तिको ही सूपकारके रूपमें नियुक्त करना चाहिये। रसोईके स्थानमें किसी अन्य दुष्ट स्त्री-पुरुषोंको न आने दे। इस विधिसे भोजन बनाकर सब पदार्थोंको स्वच्छ पात्रोंसे आच्छादित कर देना चाहिये, फिर रसोई-घरसे बाहर आकर पसीने आदिको पोंछकर, स्वच्छ होकर, गन्ध, ताम्बूल, माला-वस्त्र आदिसे अपनेको थोड़ा-सा भूषित करे। फिर भोजनके निमित्त यथोचित समयपर विनयपूर्वक पतिको बुलाये। सब प्रकारके व्यञ्जन परोसे, जो देश-कालके विपरीत न हो और जिनका परस्पर विरोध भी न हो, जैसे दूध और लवणका है। जिस पदार्थमें पतिकी अधिक रुचि देखे उसे और परसे। इस प्रकार पतिको प्रीतिपूर्वक भोजन कराये।
सपत्नियोंको अपनी बहिनके समान तथा उनकी
संतानोंको अपनी संतानसे भी अधिक प्रिय समझे। उनके भाई-बन्धुओंको अपने भाइयोंके समान ही समझे। भोजन, वस्त्र, आभूषण, ताम्बूल आदि जबतक सपत्नियोंको न दे दे, तबतक स्वयं भी ग्रहण न करे। यदि सपत्नीको अथवा किसी आश्रित जनको कुछ रोग हो जाय तो उसकी चिकित्साके लिये औषधि आदिकी भलीभाँति व्यवस्था कराये। नौकर, बन्धु और सपत्नीको दुःखी देख स्वयं भी उन्हींके समान दुःखी होवे और उनके सुखमें सुख माने। सभी कार्योंसे अवकाश मिलनेपर सो जाय और रात्रिमें उठकर अनावश्यक धन-व्यय कर रहे पतिको एकान्तमें धीरे धीरे समझाये। घरका सब वृत्तान्त पतिको एकान्तमें बताये, परंतु सपत्नियोंके दोषोंको न कहे, किंतु यदि कोई उनका व्यभिचार आदि बड़ा दोष देखें, जिसे गुप्त रखनेसे कोई अनर्थ हो तो ऐसा दोष पतिको अवश्य बता देना चाहिये। दुर्भगा, निःसंतान तथा पतिद्वारा तिरस्कृत सपत्नियोंको सदा आश्वासन दे। उन्हें भोजन, वस्त्र, आभूषण आदिसे दुःखी न होने दे। यदि किसी नौकर आदिपर पति कोप करे तो उसे भी आश्वस्त करना चाहिये, परंतु यह अवश्य विचार कर लेना चाहिये कि इसे आश्वासन देनेसे कोई हानि नहीं होनेवाली है।
इस प्रकार स्त्री अपने पतिकी सम्पूर्ण इच्छाओंको पूर्ण करे। अपने सुखके लिये जो अभीष्ट हो, उसका भी परित्याग कर पतिके अनुकूल ही सब कार्य करे; क्योंकि स्त्रियोंके देवता पति, वर्णोंके देवता ब्राह्मण हैं तथा ब्राह्मणोंके देवता अग्नि हैं और प्रजाओंका देवता राजा है।
स्त्रियोंके त्रिवर्ग-प्राप्तिके दो मुख्य उपाय हैं—प्रथम सब प्रकारसे पतिको प्रसन्न रखना और द्वितीय आचरणकी पवित्रता। पतिके चित्तेके अनुकूल चलनेसे जैसी प्रीति पतिकी स्त्रीपर होती
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