भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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  • उत्तरपर्व *

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अनघाष्टमीव्रतकी कथा एवं विधि

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज ! प्राचीन कालमें ब्रह्माजीके महातेजस्वी अत्रि पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए। अत्रिकी भार्याका नाम था अनसूया, वह महान् भाग्यशालिनी एवं पतिव्रता थी। कुछ कालके बाद उनके महातेजस्वी पुत्र दत्त हुए। दत्त महान् योगी थे। ये विष्णुके अंशसे उत्पन्न हुए थे। इनका दूसरा नाम था अनघ। इनकी भार्याका नाम था नदी। ब्राह्मणोंके सभी गुणोंसे सम्पन्न इनके आठ पुत्र थे। 'दत्त' विष्णुरूपमें थे तथा 'नदी' लक्ष्मीकी रूप थीं। दत्त अपनी भार्या नदीके साथ योगाभ्यासमें लीन थे, उसी समय जम्भ* नामक दैत्यसे पीड़ित तथा पराजित देवता विन्ध्यगिरिमें स्थित इनके आश्रममें आये और उन्होंने इनकी शरण ग्रहण की। दत्तात्रेयजीने इन्द्रके साथ उन सभी देवताओंको अपने योगबलसे अपने आश्रममें रख लिया और कहा—'आपलोग निर्भय तथा निश्चिन्त होकर यहाँ रहें।' देवगण अत्यन्त प्रसन्न हो गये और वे वहाँ रहने लगे।

दैत्य-समुदाय भी देवताओंको खोजते-खोजते इसी आश्रमपर आ पहुँचा। वे क्रोधपूर्वक ललकारकर कहने लगे—'इस मुनिकी पत्नीको पकड़ लो और यह सारा आश्रम उजाड़ डालो।' यह कहते हुए दैत्यगण आश्रममें घुस गये और उनकी पत्नीको उठाकर अपने सिरपर रखकर चल पड़े। लक्ष्मीको सिरपर उठाते ही सभी दैत्य श्रीहीन हो गये और दत्तकी दृष्टि पड़नेसे वे सभी दैत्य भागने और नष्ट होने लगे। देवताओंने भी उन्हें मारना प्रारम्भ कर दिया। निश्चैष्ठ होकर दैत्यगण हाहाकार करने लगे। दत्तमुनिके प्रभावसे वहाँ प्रलय मच गया। इन्द्रादि देवताओंने सभी असुरोंको पराजित कर दिया और फिर वे सभी अपने-अपने लोक चले

गये तथा पूर्ववत् आनन्दसे रहने लगे। देवताओंने उन भगवान् दत्तात्रेयकी महिमा और प्रभावको ही इसमें कारण माना।

दत्तात्रेयजी भी संसारके कल्याणके लिये ऊर्ध्वबाहु होकर कठिन तपस्या करने लगे। वे योगमार्गका आश्रय लेकर ध्यान-समाधिमें स्थित हो गये। इसी प्रकार समाधिमें उन्हें तीन हजार वर्ष व्यतीत हो गये। एक दिन माहिष्मतीके राजा हैहयाधिपति कार्तवीर्यार्जुन उनके पास आया और रात-दिन उनकी सेवा करने लगा। दत्त उसकी सेवासे अत्यन्त प्रसन्न हो गये और उन्होंने उसकी याचनापर उसे चार वर प्रदान किये—पहला वर था हजार हाथ हो जायें, दूसरे वरसे सारी पृथ्वीको अधर्मसे बचाते हुए धर्मपूर्वक पृथ्वीका शासन करना। तीसरे वरसे लड़ाईके मैदानमें किसीसे पराजित न होना तथा चौथे वरसे भगवान् विष्णुके हाथों मृत्यु होना।

कौन्तेय ! योगाभ्यासमें लीन उन दत्तमुनिने कार्तवीर्यार्जुनको अष्टसिद्धियोंसे समन्वित चक्रवर्ती-पदवाले राज्यको प्रदान किया। कार्तवीर्यार्जुनने भी सप्तद्वीपा वसुमतीको धर्मपूर्वक अपने अधीन कर लिया। यह सब उसके हजार बाहुओंका प्रभाव था। वह अपनी मायाद्वारा यज्ञोंके माध्यमसे ध्वजावाला रथ उत्पन्न कर लेता था। उसके प्रभावसे सभी द्वीपोंमें दस हजार यज्ञ निरन्तर होते रहते थे। उन यज्ञोंकी वेदियाँ, यूप तथा मण्डप आदि सभी सोनेके रहते थे। उनमें प्रचुर दक्षिणाएँ दी जाती थीं। विमानमें बैठकर सभी देवता, गन्धर्व तथा अप्सराएँ पृथ्वीपर आकर यज्ञकी शोभा बढ़ाते रहते थे। नारद नामका गन्धर्व उसके यज्ञकी गाथा इस प्रकार गाया करता था—'कार्तवीर्यके पराक्रमकी बात सुननेसे यह पता चलता है कि संसारका कोई भी राजा उसके समान

  • यह अनेक राक्षसोंका नाम है। इसका वर्णन श्रीमद्भागवत ६।१८।१२, ब्रह्माण्ड ३।६।१०, वायु ९७।१०३, मत्स्य ४७।७२ और विष्णु ४।६।१४ आदि पुराणोंमें आया है। इसे इन्द्रने मारा था, अतः इन्द्रका एक नाम जम्भधेदी भी है।

584 Sankshipta Bhavishya Puran_Section_1011.Pdf