भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 461, कुल 654 में से

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

यज्ञ, दान तथा तप नहीं कर सकता। सातों द्वीपोंमें केवल वही ढाल, तलवार तथा धनुष-बाणवाला है। जैसे बाज पक्षीको अन्य पक्षी डरसे अपने समीप ही समझते हैं, वैसे ही अन्य राजा लोग दूरसे ही इससे भय खाते हैं। इसकी सम्पत्ति कभी नष्ट नहीं होती, इसके राज्यमें न कहीं शोक दिखायी पड़ता है न कोई क्लान्त ही। यह अपने प्रभावसे पृथ्वीपर धर्मपूर्वक प्रजाओंका पालन करता है।'

भगवान् श्रीकृष्ण पुनः बोले— नराधिप! कार्तवीर्य इस पृथ्वीपर पचासी हजार वर्षतक अखण्ड शासन करता रहा। वह अपने योगबलसे पशुओंका पालक तथा खेतोंका रक्षक भी था। समयानुसार मेघ बनकर वृष्टि भी करता था। धनुषकी प्रत्यञ्चाके आधातसे कठोर त्वचायुक्त अपनी सहस्रों भुजाओंद्वारा वह सूर्यके समान उद्घासित होता था। उसने अपनी हजार भुजाओंके बलसे समुद्रको मथ डाला और नागलोकमें कर्कोटक आदि नागोंको जीतकर वहाँ भी अपनी नगरी बसा ली। उसकी भुजाओंद्वारा समुद्रके उद्भेलित होनेसे पातालवासी महान् असुर भी निश्चेष्ट हो जाते थे। बड़े-बड़े नाग उसके पराक्रमको देखकर सिर नीचा कर लेते थे। सभी धनुर्धरोंको उसने जीत लिया। अपने पराक्रमसे रावणको भी उसने अपनी माहिष्मती नगरीमें लाकर बंदी बना रखा था, जिसे पुलस्त्य ऋषिने छुड़वाया। एक बार भूखे-प्यासे चित्रभानु (अग्निदेव)-को राजा कार्तवीर्यर्जुनने समस्त ससद्वीपा वसुन्धराको दानमें दे दिया। इस प्रकार वह कार्तवीर्यर्जुन बड़ा पराक्रमी एवं गुणवान् राजा हुआ था।

योगाचार्य भगवान् अनघ (दत्तात्रेय)-से वर प्राप्तकर कार्तवीर्यर्जुनने पृथ्वीलोकमें इस अनघाष्टमी-व्रतको प्रवर्तित किया। अघको पाप कहा जाता है यह तीन प्रकारका होता है—कायिक, वाचिक और मानसिक। यह अनघाष्टमी त्रिविध पापोंको नष्ट करनेवाली है, इसलिये इसे अनघा कहते हैं। इस व्रतके प्रभावसे अष्टविध ऐश्वर्य (अणिमा, महिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, लघिमा, ईशित्व, वशिन्त्व तथा सर्वकामावसायिता) प्राप्त कर लेना मानो विनोद ही है।

महाराज युधिष्ठिरने पूछा— पुण्डरीकाक्ष! राजा कार्तवीर्यर्जुनके द्वारा प्रवर्तित यह अनघाष्टमी-व्रत किन मन्त्रोंके द्वारा, कब और कैसे किया जाता है? इसे आप बतलानेकी कृपा करें।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा— राजन्! इस व्रतकी विधि इस प्रकार है—मार्गशीर्ष मासके कृष्ण पक्षकी अष्टमीको कुशोंसे स्त्री-पुरुषकी प्रतिमा बनाकर भूमिपर स्थापित करनी चाहिये। उनमें एकमें सौम्य एवं शान्तिस्वरूपयुक्त अनघ (दत्तात्रेय)-की तथा दूसरेमें अनघा (लक्ष्मी)-की भावना करनी चाहिये और ऋग्वेदके विष्णुसूक्तसे* पूजा करनी चाहिये। पूजामें फल, कन्द, शृंगारकी सामग्री, बेर, विविध धान्य, विविध पुष्पका उपयोग करना चाहिये। दीपक जलाना चाहिये तथा ब्राह्मणों एवं बन्धु-बान्धवोंको भोजन कराना चाहिये। इस प्रकार पूजा करनेवाला सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है, लक्ष्मी प्राप्त करता है तथा भगवान् विष्णु उसपर प्रसन्न हो जाते हैं। (अध्याय ५८)

  • अतो देवा अवन्तु नो यतो विष्णुर्विचक्रमे । पृथिव्याः सप्त धामभिः ॥ इदं विष्णुर्वि चक्रमे त्रेधा नि दधे पदम् । समूहलमस्य पांसुरे ॥ त्रीणि पदा वि चक्रमे विष्णुर्गीपा अदाभ्यः । अतो धर्माणि धारयन् ॥ विष्णोः कर्माणि पश्यत यतो व्रतानि पस्पशे । इन्द्रस्य युज्यः सखा ॥ तद् विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूर्यः । दिवीव चक्षुराततम् ॥ तद् विप्रासो विपन्यवो जागृवांसः समिन्धते । विष्णोर्यत् परमं पदम् ॥ (ऋग्वेद १।२२।१६-२१)

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