भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 462, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरपर्व *
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सोमाष्टमी-व्रत-विधान
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज ! अब मैं एक दूसरा व्रत बतला रहा हूँ, जो सर्वसम्मत, कल्याणप्रद एवं शिवलोक-प्रापक है। शुक्ल पक्षकी अष्टमीके दिन यदि सोमवार हो तो उस दिन उमासहित भगवान् चन्द्रचूड़का पूजन करे। इसके लिये एक ऐसी प्रतिमाकी स्थापना करनी चाहिये, जिसका दक्षिण भाग शिवस्वरूप और वाम भाग उमास्वरूप हो। अनन्तर विधिपूर्वक उसे पञ्चामृतसे स्नान कराकर उसके दक्षिणभागमें कर्पूरयुक्त चन्दनका उपलेपन करे। श्वेत तथा रक्त पुष्प चढ़ाये और घृतमें पकाये गये नैवेद्यका भोग लगाये। पचीस प्रज्वलित दीपकोंसे उमासहित भगवान् चन्द्रचूड़की आरती करे। उस दिन निराहार रहकर दूसरे दिन प्रातः इसी प्रकार पूजन सम्पन्न कर तिल तथा घीसे हवन कर ब्राह्मणोंको भोजन कराये। यथाशक्ति सपत्नीक ब्राह्मणकी पूजा करे और पितरोंका भी अर्चन करे। एक वर्षतक इस प्रकार व्रत करके एक त्रिकोण तथा दूसरा चतुष्कोण (चौकोर) मण्डल बनाये। त्रिकोणमें भगवती पार्वती तथा चौकोर मण्डलमें भगवान् शंकरको स्थापित करे। तदनन्तर पूर्वोक्त विधिके अनुसार पार्वती एवं शंकरकी पूजा करके श्वेत एवं पीत वस्त्रके दो वितान, पताका, घण्टा, धूपदानी, दीपमाला आदि पूजनके उपकरण ब्राह्मणको समर्पित करे और यथाशक्ति ब्राह्मण-
भोजन भी कराये। ब्राह्मण-दम्पतिका वस्त्र, आभूषण, भोजन आदिसे पूजनकर पचीस प्रज्वलित दीपकोंसे धीरे-धीरे नीराजन करे। इस प्रकार भक्तिपूर्वक पाँच वर्षोंतक या एक वर्ष ही व्रत करनेसे व्रती उमासहित शिवलोकमें निवास कर अनामय पद प्राप्त करता है। जो पुरुष आजीवन इस व्रतको करता है, वह तो साक्षात् विष्णुरूप ही हो जाता है। उसके समीप आपत्ति, शोक, ज्वर आदि कभी नहीं आते। इतना विधान कहकर भगवान् श्रीकृष्ण पुनः बोले—महाराज इसी प्रकार रविवारयुक्त अष्टमीका भी व्रत होता है। उस दिन एक प्रतिमाके दक्षिण भागमें शिव और वाम भागमें पार्वतीजीकी पूजा करे। दिव्य पद्मरागसे भगवान् शंकरको और सुवर्णसे पार्वतीको अलंकृत करे। यदि रत्नोंकी सुविधा न हो सके तो सुवर्ण ही चढ़ाये। चन्दनसे भगवान् शिवको और कुंकुमसे देवी पार्वतीको अनुलिप्त करे। भगवती पार्वतीको लाल वस्त्र और लाल माला तथा भगवान् शंकरको रुद्राक्ष निवेदित कर नैवेद्यमें घृतपक्व पदार्थ निवेदित करे। शेष सारा विधान पूर्ववत् कर पारण गव्य-पदार्थोंसे करे। उद्यापन पूर्वरीत्या करना चाहिये। इस व्रतको एक वर्ष अथवा लगातार पाँच वर्ष करनेवाला सूर्य आदि लोकोंमें उत्तम भोगको प्राप्तकर अन्तमें परमपदको प्राप्त करता है। (अध्याय ५९)
श्रीवृक्षनवमी-व्रत-कथा
भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज ! देवता और दैत्योंने जब समुद्र-मन्थन किया था, तब उस समय समुद्रसे निकली हुई लक्ष्मीको देखकर सभीकी यह इच्छा हुई कि मैं ही लक्ष्मीको प्राप्त कर लूँ। लक्ष्मीकी प्राप्तिको लेकर देवता और
दैत्योंने परस्पर युद्ध होने लगा। उस समय लक्ष्मीने कुछ देरके लिय बिल्बवृक्षका आश्रय ग्रहण कर लिया। भगवान् विष्णुने सभीको जीतकर लक्ष्मीका वरण किया। लक्ष्मीने बिल्बवृक्षका आश्रय ग्रहण किया था, इसलिये उसे श्रीवृक्ष भी कहते हैं।
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