भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

अतः भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षकी नवमी तिथिको श्रीवृक्ष-नवमी-व्रत करना चाहिये। सूर्योदयके समय भक्तिपूर्वक अनेक पुष्पों, गन्ध, वस्त्र, फल, तिलपिष्ट, अन्न, गोधूम, धूप तथा माला आदिसे निम्नलिखित मन्त्रसे बिल्बवृक्षकी पूजा करें—

श्रीनिवास नमस्तेऽस्तु श्रीवृक्ष शिववल्लभ।

ममाभिलषितं कृत्वा सर्वविघ्नहरो भव ॥

इस विधिसे पूजा कर श्रीवृक्षकी सात प्रदक्षिणा

कर उसे प्रणाम करे। अनन्तर ब्राह्मणभोजन करकर ‘श्रीदेवी प्रीयताम्’ ऐसा कहकर प्रार्थना करे। तदनन्तर स्वयं भी तेल और नमकसे रहित बिना अग्निके संयोगसे तैयार किया गया भोजन, दही, पुष्प, फल आदिको मिट्टीके पात्रमें रखकर मौन हो ग्रहण करे। इस प्रकार भक्तिपूर्वक जो पुरुष या स्त्री श्रीवृक्षका पूजन करते हैं, वे अवश्य ही सभी सम्पत्तियोंको प्राप्त करते हैं। (अध्याय ६०)

ध्वजनवमी-व्रत-कथा

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! भगवती दुर्गाद्वारा महिषासुरके वध किये जानेपर दैत्योंने पूर्व-वैरका स्मरण कर देवताओंके साथ अनेक संग्राम किये। भगवतीने भी धर्मकी रक्षाके लिये अनेक रूप धारण कर दैत्योंका संहार किया। महिषासुरके पुत्र रक्तासुरने बहुत लम्बे समयतक घोर तपस्या कर ब्रह्माजीको प्रसन्न किया और ब्रह्माजीने प्रसन्न होकर उसे तीनों लोकोंका राज्य दे दिया। उसने वर प्राप्तकर दैत्योंको एकत्रित किया तथा इन्द्रके साथ युद्ध करनेके लिये अमरावतीपर आक्रमण कर दिया। देवताओंने देखा कि दैत्य-सेना युद्धके लिये आ रही है, तब वे भी एकत्रित होकर देवराज इन्द्रकी अध्यक्षतामें युद्धके लिये आ डटे। घोर युद्ध प्रारम्भ हो गया। दानवोंने इतना भयंकर युद्ध किया कि देवगण रण छोड़कर भाग गये। दैत्य रक्तासुर अमरावतीको अपने अधीन कर राज्य करने लगा। देवगण वहाँसे भागकर करछत्रपुरीमें गये, जहाँ भववल्लभा दुर्गा निवास करती हैं। चामुण्डा भी नवदुर्गाके साथ वहाँ विराजमान रहती हैं। वहाँ देवताओंने महालक्ष्मी, नन्दा, क्षेमकरी, शिवदूती, महारुण्डा, भ्रामरी, चन्द्रमङ्गला, रेवती और हरसिद्धि—इन नौ दुर्गाओंकी भक्तिपूर्वक स्तुति करते हुए कहा—‘भगवति! इस

घोर संकटसे आप हमारी रक्षा करें, हमारे लिये अब दूसरा कोई भी अवलम्ब नहीं है।’

देवताओंकी यह आर्त वाणी सुनकर बीस भुजाओंमें विभिन्न आयुध धारण किये सिंहारूढ़ा नवदुर्गाके साथ कुमारीस्वरूपा भगवती प्रकट हो गयीं। तदनन्तर परम पराक्रमी और ब्रह्माजीके वरदानसे अभिमानी अथम अब्रह्मण्य प्रचण्ड दैत्यगण भी वहाँ आये, जिनमें इन्द्रमारी, गुरुकेशी, प्रलम्ब, नरक, कुष्ठ, पुलोमा, शरभ, शम्बर, दुन्दुभि, इल्लल, नमुचि, भौम, वातापि, धेनुक, कलि, मायावृत्त, बलबन्धु, कैटभ, कालजित्, राहु, पौण्ड्र आदि दैत्य मुख्य थे। ये प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी, विविध वाहनोंपर आरूढ़ अनेक प्रकारके शस्त्र, अस्त्र और ध्वजाओंको धारण किये हुए थे। उनके आगे पणव, भेरी, गोमुख, शङ्खु, डमरू, डिण्डिम आदि बाजे बज रहे थे। दैत्योंने युद्ध आरम्भ कर दिया और भगवतीपर शर, शूल, परिघ, पट्टिश, शक्ति, तोमर, कुन्त, शतश्री, गदा, मुद्गर आदि अनेक आयुधोंकी वृष्टि करने लगे। भगवती भी क्रोधसे प्रज्वलित हो दैत्योंका संहार करने लगीं। उनके ध्वज आदि चिह्नोंको बलपूर्वक छीनकर देवगणोंको सौंप दिया। क्षणभरमें ही उन्होंने अनन्त दैत्योंका नाश कर दिया। रक्तासुरके कण्ठको पकड़कर पृथ्वीपर पटककर

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