भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 464, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरपर्व *
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त्रिशूलसे उसका हृदय विदीर्ण कर दिया। बचे हुए दैत्यगण वहाँसे जान बचाकर भाग निकले। इस प्रकार देवीकी कृपासे देवताओंने विजय प्राप्तकर करच्छत्रपुरीमें आकर भगवतीका विशेष उत्सव मनाया। नगर तोरणों और ध्वजाओंसे अलंकृत किया गया। राजन्! जो नवमी तिथिको उपवासकर भगवतीका उत्सव करता है तथा उन्हें ध्वज अर्पण करता है, वह अवश्य ही विजयी होता है।
महाराज! अब इस व्रतकी विधि सुनिये। पौष मासके शुक्ल पक्षकी नवमी तिथिको स्नानकर पूजाके लिये पुष्प अपने हाथसे चुने और उनसे सिंहवाहिनी कुमारी भगवतीका पूजन करे। साथ ही विविध ध्वजाओंको भगवतीके सम्मुख स्थापित करे और मालती-पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, गन्ध, चन्दन, विविध फल, माला, वस्त्र, दधि एवं
बिना अग्निसे सिद्ध विविध भक्ष्य भगवतीको निवेदित करे एवं इस मन्त्रको पढ़े—
रुद्रां भगवतीं कृष्णां ग्रहं नक्षत्रमालिनीम्। प्रपन्नोऽहं शिवां रात्रिं सर्वशत्रुक्षयंकरीम्॥
—फिर कुमारियों और देवीभक्त ब्राह्मणोंको भोजन कराये, क्षमा-प्रार्थना करे, उपवास करे या भक्तिपूर्वक एकभुक्त रहे। इस प्रकारसे जो पुरुष नवमीको उपवास करता है और ध्वजाओंसे भगवतीको अलंकृत कर उनकी पूजा करता है, उसे चोर, अग्नि, जल, राजा, शत्रु आदिका भय नहीं रहता। इस नवमी तिथिको भगवतीने विजय प्राप्त की थी, अतः यह नवमी इन्हें बहुत प्रिय है। जो नवमीको भक्तिपूर्वक भगवतीकी पूजा कर इन्हें ध्वजारोपण करता है, वह सभी प्रकारके सुखोंको भोगकर अन्तमें वीरलोकको प्राप्त होता है। (अध्याय ६१)
उल्का-नवमी-व्रतका विधान और फल
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! अब आप उल्का-नवमी-व्रतके विषयमें सुनें। आश्विन मासके शुक्ल पक्षकी नवमीको नदीमें स्नानकर पितृदेवीकी विधिपूर्वक अर्चना करे। अनन्तर गन्ध, पुष्प, धूप, नैवेद्य आदिसे भैरव-प्रिया चामुण्डादेवीकी पूजा करे, तदनन्तर इस मन्त्रसे हाथ जोड़कर स्तुति करे—
महिषषि महामाये चामुण्डे मुण्डमालिनि।
द्रव्यमारोग्यविजयी देहि देवि नमोऽस्तु ते॥
(उत्तरपर्व ६२।५)
इसके बाद यथाशक्ति सात, पाँच या एक कुमारीको भोजन कराकर उन्हें नीला कञ्चुक, आभूषण, वस्त्र एवं दक्षिणा आदि देकर संतुष्ट करे। श्रद्धासे भगवती प्रसन्न होती हैं। अनन्तर भूमिका अभ्युक्षण करे। तदनन्तर गोबरका चौँका लगाकर आसनपर बैठ जाय। सामने पात्र रखकर, जो भी भोजन बना हो सारा परोस ले, फिर एक
मुट्टी तृण और सूखे पत्तोंको अग्निसे प्रज्वलित कर जितने समयतक प्रकाश रहे उतने समयमें ही भोजन सम्पन्न कर ले। अग्निके शान्त होते ही भोजन करना बंद कर आचमन करे। चामुण्डाका हृदयमें ध्यानकर प्रसन्नतापूर्वक घरका कार्य करे। इस प्रकार प्रतिमास व्रतकर वर्षके समाप्त होनेपर कुमारी-पूजा करे तथा उन्हें वस्त्र, आभूषण, भोजन आदि देकर उनसे क्षमा-याचना करे। ब्राह्मणको सुवर्ण एवं गौका दान करे। हे पार्थ! इस प्रकार जो पुरुष उल्का-नवमीका व्रत करता है, उसे शत्रु, अग्नि, राजा, चोर, भूत, प्रेत, पिशाच आदिका भय नहीं होता एवं युद्ध आदिमें उसपर शस्त्रोंका प्रहार नहीं लगता, देवी चामुण्डा उसकी सर्वत्र रक्षा करती हैं। इस उल्का-नवमी-व्रतको करनेवाले पुरुष और स्त्री उल्काकी तरह तेजस्वी हो जाते हैं। (अध्याय ६२)
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