भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 467, कुल 654 में से
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
प्रभावसे राजपुत्र अपना राज्य, कृषक खेती, वणिक् व्यापारमें लाभ, पुत्रार्थी पुत्र तथा मानव धर्म, अर्थ एवं कामकी सिद्धि प्राप्त करते हैं। कन्या श्रेष्ठ वर प्राप्त करती है, ब्राह्मण निर्विघ्न यज्ञ सम्पन्न कर लेता है, रोगी रोगसे मुक्त हो जाता है और पतिके चिर-प्रवास हो जानेपर स्त्री उसे शीघ्र ही प्राप्त कर लेती है। शिशुके दन्तजनित पीड़ामें भी इस व्रतसे पीड़ा दूर हो जाती है और कष्ट नहीं होता। इसी प्रकार अन्य कार्योंकी सिद्धिके लिये इस आशादशमी-व्रतको करना चाहिये। जब भी जिस किसीको कोई कष्ट पड़े, उसकी निवृत्तिके लिये इस व्रतको करना चाहिये।
यह आशादशमी-व्रत किसी भी मासके शुक्ल पक्षकी दशमीको किया जाता है। इस दिन प्रातःकाल स्नान करके देवताओंकी पूजा कर रात्रिमें पुष्प, अलक तथा चन्दन आदिसे दस आशादेवियोंकी पूजा करनी चाहिये। घरके आँगनमें जैसे अथवा पिष्टातकसे पूर्वादि दसों दिशाओंके अधिपतियोंकी प्रतिमाओंको उनके वाहन तथा अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित कर उन्हें ही ऐन्द्री आदि दिशा-देवियोंके रूपमें मानकर पूजन करना चाहिये। सबको घृतपूर्ण नैवेद्य, पृथक्-पृथक् दीपक तथा ऋतुफल आदि समर्पित करना चाहिये। इसके अनन्तर अपने कार्यकी सिद्धिके लिये इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये—
आशाश्चाशाः सदा सन्तु सिद्धयन्तां मे मनोरथाः ।
भवतीनां प्रसादेन सदा कल्याणमस्त्विति ॥
(उत्तरपर्व ६४।२५)
‘हे आशादेवियो! मेरी आशाएँ सदा सफल हों, मेरे मनोरथ पूर्ण हों, आपलोगोंके अनुग्रहसे मेरा सदा कल्याण हो।’
इस प्रकार विधिवत् पूजा कर ब्राह्मणको दक्षिणा प्रदानकर प्रसाद ग्रहण करना चाहिये। इसी क्रमसे प्रत्येक मासमें इस व्रतको करना चाहिये। जबतक अपना मनोरथ पूर्ण न हो जाय, तबतक इस व्रतको करना चाहिये। अनन्तर उद्यापन करना चाहिये। उद्यापनमें आशादेवियोंकी सोने, चाँदी अथवा पिष्टातकसे प्रतिमा बनाकर घरके आँगनमें उनकी पूजा करके ऐन्द्री, आग्रेयी, याम्या, नैऋति, वारुण, वायव्या, सौम्या, ऐशानी, अधः तथा ब्राह्मी—इन दस आशादेवियों (दिशा-देवियों)—से अभीष्ट कामनाओंकी सिद्धिके लिये प्रार्थना करनी चाहिये, साथ ही नक्षत्रों, ग्रहों, ताराग्रहों, नक्षत्र-मातृकाओं, भूत-प्रेत-विनायकोंसे भी अभीष्ट-सिद्धिके लिये प्रार्थना करनी चाहिये। पुष्प, फल, धूप, गन्ध, वस्त्र आदिसे उनकी पूजा करनी चाहिये। सुहागिनी स्त्रियोंको नृत्य-गीत आदिके द्वारा रात्रि-जागरण करना चाहिये। प्रातःकाल विद्वान् ब्राह्मणको सब कुछ पूजित पदार्थ निवेदित कर देना चाहिये और उन्हें प्रणाम कर क्षमा-याचना करनी चाहिये। अनन्तर बन्धु-बान्धवों एवं मित्रोंके साथ प्रसन्न-मनसे भोजन करना चाहिये। हे पार्थ! जो इस आशादशमी-व्रतको श्रद्धापूर्वक करता है, उसके सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं। यह व्रत स्त्रियोंके लिये विशेष श्रेयस्कर है।
(अध्याय ६४)
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