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भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

४५६

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

प्रभावसे राजपुत्र अपना राज्य, कृषक खेती, वणिक् व्यापारमें लाभ, पुत्रार्थी पुत्र तथा मानव धर्म, अर्थ एवं कामकी सिद्धि प्राप्त करते हैं। कन्या श्रेष्ठ वर प्राप्त करती है, ब्राह्मण निर्विघ्न यज्ञ सम्पन्न कर लेता है, रोगी रोगसे मुक्त हो जाता है और पतिके चिर-प्रवास हो जानेपर स्त्री उसे शीघ्र ही प्राप्त कर लेती है। शिशुके दन्तजनित पीड़ामें भी इस व्रतसे पीड़ा दूर हो जाती है और कष्ट नहीं होता। इसी प्रकार अन्य कार्योंकी सिद्धिके लिये इस आशादशमी-व्रतको करना चाहिये। जब भी जिस किसीको कोई कष्ट पड़े, उसकी निवृत्तिके लिये इस व्रतको करना चाहिये।

यह आशादशमी-व्रत किसी भी मासके शुक्ल पक्षकी दशमीको किया जाता है। इस दिन प्रातःकाल स्नान करके देवताओंकी पूजा कर रात्रिमें पुष्प, अलक तथा चन्दन आदिसे दस आशादेवियोंकी पूजा करनी चाहिये। घरके आँगनमें जैसे अथवा पिष्टातकसे पूर्वादि दसों दिशाओंके अधिपतियोंकी प्रतिमाओंको उनके वाहन तथा अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित कर उन्हें ही ऐन्द्री आदि दिशा-देवियोंके रूपमें मानकर पूजन करना चाहिये। सबको घृतपूर्ण नैवेद्य, पृथक्-पृथक् दीपक तथा ऋतुफल आदि समर्पित करना चाहिये। इसके अनन्तर अपने कार्यकी सिद्धिके लिये इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये—

आशाश्चाशाः सदा सन्तु सिद्धयन्तां मे मनोरथाः ।

भवतीनां प्रसादेन सदा कल्याणमस्त्विति ॥

(उत्तरपर्व ६४।२५)

‘हे आशादेवियो! मेरी आशाएँ सदा सफल हों, मेरे मनोरथ पूर्ण हों, आपलोगोंके अनुग्रहसे मेरा सदा कल्याण हो।’

इस प्रकार विधिवत् पूजा कर ब्राह्मणको दक्षिणा प्रदानकर प्रसाद ग्रहण करना चाहिये। इसी क्रमसे प्रत्येक मासमें इस व्रतको करना चाहिये। जबतक अपना मनोरथ पूर्ण न हो जाय, तबतक इस व्रतको करना चाहिये। अनन्तर उद्यापन करना चाहिये। उद्यापनमें आशादेवियोंकी सोने, चाँदी अथवा पिष्टातकसे प्रतिमा बनाकर घरके आँगनमें उनकी पूजा करके ऐन्द्री, आग्रेयी, याम्या, नैऋति, वारुण, वायव्या, सौम्या, ऐशानी, अधः तथा ब्राह्मी—इन दस आशादेवियों (दिशा-देवियों)—से अभीष्ट कामनाओंकी सिद्धिके लिये प्रार्थना करनी चाहिये, साथ ही नक्षत्रों, ग्रहों, ताराग्रहों, नक्षत्र-मातृकाओं, भूत-प्रेत-विनायकोंसे भी अभीष्ट-सिद्धिके लिये प्रार्थना करनी चाहिये। पुष्प, फल, धूप, गन्ध, वस्त्र आदिसे उनकी पूजा करनी चाहिये। सुहागिनी स्त्रियोंको नृत्य-गीत आदिके द्वारा रात्रि-जागरण करना चाहिये। प्रातःकाल विद्वान् ब्राह्मणको सब कुछ पूजित पदार्थ निवेदित कर देना चाहिये और उन्हें प्रणाम कर क्षमा-याचना करनी चाहिये। अनन्तर बन्धु-बान्धवों एवं मित्रोंके साथ प्रसन्न-मनसे भोजन करना चाहिये। हे पार्थ! जो इस आशादशमी-व्रतको श्रद्धापूर्वक करता है, उसके सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं। यह व्रत स्त्रियोंके लिये विशेष श्रेयस्कर है।

(अध्याय ६४)

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  • उत्तरपर्व *

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तारकद्वादशीके प्रसंगमें राजा कुशध्वजकी कथा तथा व्रत-विधान

महाराज युधिष्ठिरने कहा—भगवन्! मैं बहुत बड़ा पातकी हूँ। भीष्म, द्रोण आदि महात्माओंका मैंने वध किया। आप कृपाकर कोई ऐसा उपाय बतायें, जिससे मैं इस वधरूपी पापसमूहसे छुटकारा पा सकूँ।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! प्राचीन कालमें विदर्भ देशमें एक बड़ा प्रतापी कुशध्वज नामका राजा रहता था। किसी दिन वह मृगयाके लिये वनमें गया। वहाँ उसने मृगके धोखेमें एक तपस्वी ब्राह्मणको बाणसे मार दिया। मरनेके बाद उस पापसे उसे भयंकर रौरव नरककी प्राप्ति हुई। फिर वह बहुत दिनोंतक नरककी यातनाको भोगकर भयंकर सर्प-योनिमें गया। सर्प-योनिमें भी उसने पाप किया। इस कारण उसे सिंह-योनि प्राप्त हुई। इस प्रकार उसने कई निन्द्य योनियोंमें जन्म लिया और उस-उस योनिमें पाप-कर्म करता रहा। इस कर्मविपाकसे उसे कष्ट भोगना पड़ता था। चूँकि उसने पूर्वजन्ममें तारकद्वादशीका व्रत किया था, अतः उस व्रतके प्रभावसे इन पाप-योनियोंसे वह जल्दी-जल्दी मुक्त होता गया। अन्तमें पुनः वह विदर्भ देशका धर्मात्मा राजा हुआ। वह भक्तिपूर्वक तारकद्वादशीका व्रत किया करता था। उसके प्रभावसे बहुत समयतक निष्कण्टक राज्यकर, मरनेपर उसने विष्णुलोकको प्राप्त किया।

राजा युधिष्ठिरने पूछा—श्रीकृष्णचन्द्र! इस व्रतको किस प्रकार करना चाहिये?

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—राजन्! मार्गशीर्ष मासके शुक्ल पक्षकी द्वादशीको तारकद्वादशी-व्रत

करना चाहिये। प्रातःकाल नदी आदिमें स्नानकर तर्पण, पूजन आदि सम्पन्न कर सूर्यास्ततक हवन करता रहे। सूर्यास्त होनेपर पवित्र भूमिके ऊपर गोमयसे ताराओंसहित एक सूर्य-मण्डलका निर्माण करे। उस आकाशमें चन्दनसे ध्रुवको भी अङ्कित करे। अनन्तर ताम्रके अर्घ्यपात्रमें पुष्प, फल, अक्षत, गन्ध, सुवर्ण तथा जल रखकर मस्तकतक उस अर्घ्यपात्रको उठाकर दोनों जानुओंको भूमिपर टेककर पूर्वाभिमुख होकर 'सहस्रशीर्षा०' इस मन्त्रसे उस मण्डलको अर्घ्य प्रदान करे। अनन्तर ब्राह्मण-भोजन कराना चाहिये। मार्गशीर्ष आदि बारह महीनोंमें क्रमशः खण्ड-खाद्य, सोहालक, तिल-तण्डुल, गुड़के अपूप, मोदक, खण्डवेष्टक, सत्तू, गुड़युक्त पूरी, मधुशीर्ष, पायस, घृतपर्ण (करंज) और कसारका भोजन ब्राह्मणको कराये। तदनन्तर क्षमा-प्रार्थना कर मौन धारणपूर्वक स्वयं भी भोजन करे। उद्यापनमें चाँदीका तारकमण्डल बनाकर उसकी पूजा करे। मोदकके साथ बारह घड़े तथा दक्षिणाके साथ वह मण्डल ब्राह्मणको निवेदित कर दे। इस विधिसे जो पुरुष और स्त्री इस तारकद्वादशी-व्रतको करते हैं, वे सूर्यके समान देदीप्यमान विमानोंमें बैठकर नक्षत्र-लोकको जाते हैं। वहाँ अयुत वर्षोंतक निवास कर विष्णुलोकको प्राप्त करते हैं। इस व्रतको सती, पार्वती, सीता, राज्ञी, दमयन्ती, रुक्मिणी, सत्यभामा आदि श्रेष्ठ नारियोंने किया था। इस व्रतको करनेसे अनेक जन्मोंमें किये गये पातक नष्ट हो जाते हैं।

(अध्याय ६५)

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४५८

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

अरण्यद्व्वादशी-व्रतका विधान और फल

महाराज युधिष्ठिरने कहा—श्रीकृष्णचन्द्र ! आप अरण्यद्व्वादशी-व्रतका विधान बतलायें।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—कौन्तेय ! प्राचीन कालमें जिस व्रतको रामचन्द्रजीकी आज्ञासे वनमें सीताजीने किया था और अनेक प्रकारके भक्ष्य-भोज्य आदिसे मुनिपत्नियोंको संतुष्ट किया था, उस अरण्यद्व्वादशी-व्रतका विधान मैं बतलाता हूँ, आप प्रीतिपूर्वक सुनें। इस व्रतमें मार्गशीर्ष मासकी शुक्ला एकादशीको प्रातः स्नानकर भगवान् जनार्दनकी भक्तिपूर्वक गन्ध, पुष्पादि उपचारोंसे पूजा करनी चाहिये और उपवास रखना चाहिये। रात्रिमें जागरण करना चाहिये। दूसरे दिन स्नान आदि करके वेदज्ञ ब्राह्मणोंको उपवनमें ले जाकर प्रायः फल आदि भोजन कराना चाहिये। अनन्तर पञ्चगव्यका प्राशन कर स्वयं भी भोजन करना चाहिये।

इस विधिसे एक वर्षतक व्रत करे। श्रावण, कार्तिक, माघ तथा चैत्र मासमें वृक्षादिसे सुशोभित किसी सुन्दर वनमें अरण्यवासियों, मुनियों तथा ब्राह्मणोंको पूर्व या उत्तरमुख आसनपर बैठकर मण्डक, घृतपूर, खण्डवेष्टक, शाक, व्यञ्जन, अपूप,

मोदक तथा सोहालक आदि अनेक प्रकारके पक्वान्न, फल तथा विभिन्न भोज्य पदार्थोंसे संतुष्ट करे और दक्षिणा प्रदान करे। कर्पूर, इलायची, कस्तूरी आदिसे सुगन्धित पानक पिलाना चाहिये। वनमें रहनेवाले मुनिगण एवं उनकी पत्नियों, एक दण्डी अथवा त्रिदण्डी और गृहस्थ आदि अन्य ब्राह्मणोंको भी भोजन कराना चाहिये। वासुदेव, जनार्दन, दामोदर, मधुसूदन, पद्मनाभ, विष्णु, गोवर्धन, त्रिविक्रम, श्रीधर, हृषीकेश, पुण्डरीकाक्ष तथा वराह—इन बारह नामोंसे नमस्कारपूर्वक एक-एक ब्राह्मणको भोजन कराकर वस्त्र और दक्षिणा देकर 'विष्णुमै प्रीयताम्' यह वाक्य कहकर अपने मित्र, सम्बन्धी और बान्धवोंके साथ स्वयं भी भोजन करे। इस प्रकारसे जो अरण्यद्व्वादशी-व्रत करता है, वह अपने परिवारके साथ दिव्य विमानमें बैठकर भगवान्के धाम श्वेतद्वीपमें निवास करता है। वह वहाँ प्रलयपर्यन्त निवासकर मुक्ति प्राप्त करता है। यदि कोई स्त्री भी इस व्रतका आचरण करती है तो वह भी संसारके सभी सुखोंका उपभोग कर भगवान्की कृपासे पतिलोकको प्राप्त करती है। (अध्याय ६६)

रोहिणीचन्द्र-व्रत तथा अवियोग-व्रतका विधान

महाराज युधिष्ठिरने पूछा—भगवन् ! वर्षाकालमें आकाश नीले मेघसे आच्छादित हो जाता है। मोर चारों ओर मीठी-मीठी बोली बोलने लगते हैं। मेढकोंकी ध्वनि भी बड़ी सुहावनी लगती है, इस समय कुलीन स्त्रियाँ किसको अर्घ्य दें तथा कौन-सा सत्कर्म करें और वे किस तिथिमें कौन-सा व्रत करें ? आप इसका वर्णन करें।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज ! श्रेष्ठ स्त्रियोंको इस समय रोहिणीचन्द्र-व्रतका पालन

करना चाहिये। श्रावण मासके कृष्ण पक्षकी एकादशीको पवित्र होकर सर्वौषधिमिश्रित जलसे स्नान करे, अनन्तर उड़दके आटेकी एक सौ इन्दुरिका और पाँच घृत-मोदक बनाये। सभी सामग्रियोंको लेकर उत्तम जलाशयपर जाय और उसके तटपर गोबरसे मण्डलकी रचना करे, उसमें रोहिणीके साथ चन्द्रमाको अङ्कित कर गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, अक्षत, नैवेद्य आदिसे उनकी अर्चना करे और इस प्रकार उनकी प्रार्थना करे—

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  • उत्तरपर्व *

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सोमराज नमस्तुभ्यं रोहिण्यै ते नमो नमः। महासति महादेवि सम्पादय ममैप्सितम्॥

(उत्तरपर्व ६७।८)

अनन्तर 'सोमो मे प्रीयताम्' तथा 'देवी रोहिणी मे प्रीयताम्' ऐसा कहते हुए पूजन-द्रव्य ब्राह्मणके लिये निवेदित कर दे। अनन्तर कमरतक जलमें उतरकर मनमें रोहिणीसहित चन्द्रमाका ध्यान करते हुए उन इन्द्रुरिकाओंका भक्षण कर ले। अनन्तर जलसे बाहर आकर ब्राह्मणोंको भोजन कराकर यथाशक्ति दक्षिणा दे। प्रतिवर्ष इस विधिसे जो स्त्री अथवा पुरुष भक्तिपूर्वक व्रत करता है, वह धन-धान्य, पुत्र-पौत्रादिसे परिपूर्ण होकर बहुत दिनोंतक सुख भोगकर तीर्थ-स्थानमें मृत्युको प्राप्त करता है और ब्रह्मलोकको जाता है, अनन्तर विष्णुलोक, तदनन्तर शिवलोकमें जाता है।

महाराज युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! आप यह बतायें कि अवियोगव्रत किस विधिसे किया जाता है?

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! अवियोगव्रत सभी व्रतोंमें श्रेष्ठ है, मैं उसका विधान बतलाता

हूँ, आप ध्यानपूर्वक सुनें।

भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षकी द्वादशीको प्रातः उठकर जलाशयपर जाकर स्नान करे, शुद्ध शुक्ल वस्त्र धारणकर सुन्दर लिपे-पुते स्थानपर गोबरसे एक मण्डलका निर्माण कर, उसमें लक्ष्मीसहित विष्णु, गौरीसहित शिव, सावित्रीसहित ब्रह्मा, राज्ञी सहित सूर्यनारायणकी प्रतिमा स्थापितकर गन्ध, पुष्प, धूप, दीप आदि उपचारोंसे इन चारों देवदम्पतियोंके पृथक्-पृथक् नाम-मन्त्रोंसे आदिमें 'ॐ' कार तथा अन्तमें 'नमः' पदकी योजनाकर पूजा एवं प्रार्थना करे। अनन्तर ब्राह्मण-भोजन कराना चाहिये। फिर विविध दान देकर स्वयं भी भोजन करना चाहिये। इस अवियोगव्रतको जो करता है, उसका कभी भी इष्टजनों (मित्र, पुत्र, पत्नी आदि)-से वियोग नहीं होता और बहुत समयतक वह सांसारिक सुखोंका भोगकर क्रमशः विष्णु, शिव, ब्रह्मा और सूर्यलोकमें निवास कर अन्तमें मोक्ष प्राप्त करता है। जो स्त्री इस व्रतको करती है, वह भी अपने सभी अभीष्ट फलोंको प्राप्त कर विष्णुलोकको प्राप्त करती है। (अध्याय ६७-६८)

गोवत्सद्वादशीका विधान, गौओंका माहात्म्य, मुनियों और राजा उत्तानपादकी कथा

महाराज युधिष्ठिरने कहा—भगवन्! मेरे राज्यकी प्रासिके लिये अट्टारह अक्षौहिणी सेनाएँ नष्ट हुई हैं, इस पापसे मेरे चित्तमें बहुत घृणा उत्पन्न हो गयी है। उसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र आदि सभी मारे गये हैं। भीष्म, द्रोण, कलिंगराज, कर्ण, शल्य, दुर्योधन आदिके मरनेसे मेरे हृदयमें महान् क्लेश है। हे जगत्पते! इन पापोंसे छुटकारा पानेके लिये किसी धर्मका आप वर्णन करें।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—हे पार्थ! गोवत्सद्वादशी नामका व्रत अतीव पुण्य प्रदान करनेवाला है।

युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! यह गोवत्सद्वादशी

कौन-सा व्रत है? इसके करनेका क्या विधान है? इसकी कब और कैसे उत्पत्ति हुई है? मैं नरकार्णवमें डूब रहा हूँ, प्रभो! आप मेरी रक्षा कीजिये।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—पार्थ! सत्ययुगमें पुण्यशाली जम्बूमार्ग (भड़ौच)-में नामव्रतधरा नामक पर्वतके टंटावि नामक रमणीय शिखरपर भगवान् शंकरके दर्शन करनेकी इच्छासे करोड़ों मुनिगण तपस्या कर रहे थे। वह तपोवन अतुलनीय दिव्य काननोंसे मण्डित था। वह महर्षि भृगुका आश्रममण्डल था। विविध मृगगण और बंदरोंसे समन्वित था। सिंह आदि सभी जंगली पशु,

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

आनन्दपूर्वक निभय होकर वहाँ साथ-साथ ही निवास करते थे। उन तपस्यारत मुनियोंको दर्शन देनेके व्याजसे भगवान् शंकरने एक वृद्ध ब्राह्मणका वेश बना लिया। जर्जर-देहवाले वे वृद्ध ब्राह्मण हाथमें डंडा लिये काँपते हुए उस स्थानपर आये। जगन्माता पार्वती भी सुन्दर सवत्सा गौका रूप धारणकर वहाँ उपस्थित हुई।

पार्थ! गौका जो स्वरूप है, उसे आप सुनें— प्राचीन कालमें क्षीरसागरके मन्थनके समय अमृतके साथ पाँच गौएँ उत्पन्न हुईं—नन्दा, सुभद्रा, सुरभि, सुशीला तथा बहुला। इन्हें लोकमाता कहा गया है। इनका आविर्भाव लोकोपकार तथा देवताओंकी तृप्तिके लिये हुआ है। देवताओंने अभीष्ट कामनाओंकी पूर्ति करनेवाली इन पाँच गौओंको महर्षि जमदग्नि, भरद्वाज, वसिष्ठ, असित तथा गौतममुनिको प्रदान किया और इन महाभागोंने इन्हें ग्रहण किया। गौओंके छः अङ्ग—गोमय, रोचना, मूत्र, दुग्ध, दधि और घृत—ये अत्यन्त पवित्र और संशुद्धिके साधन भी हैं। गोमयसे शिवप्रिय श्रीमान् बिल्बवृक्ष उत्पन्न हुआ, उसमें पद्महस्ता श्रीलक्ष्मी विद्यमान हैं, इसीलिये इसे श्रीवृक्ष कहा जाता है। गोमयसे ही कमलके बीज उत्पन्न हुए हैं। गोरोचन अतिशय मङ्गलमय है, यह पवित्र और सर्वार्थसाधक है। गोमूत्रसे गुगुलकी उत्पत्ति हुई है, जो देखनेमें

प्रिय और सुगन्धियुक्त है। यह गुगुल सभी देवोंका आहार है। विशेषरूपसे शिवका आहार है। संसारमें जो कुछ भी मूलभूत बीज हैं, वे सभी गोदुग्धसे उत्पन्न हैं। प्रयोजनकी सिद्धिके लिये सभी माङ्गलिक पदार्थ दधिसे उत्पन्न हैं। घृतसे अमृत उत्पन्न होता है, जो देवोंकी तृप्तिका साधन है। ब्राह्मण और गौ एक ही कुलके दो भाग हैं। ब्राह्मणोंके हृदयमें तो वेदमन्त्र निवास करते हैं और गौओंके हृदयमें हवि रहती है। गायसे ही यज्ञ प्रवृत्त होता है और गौमें ही सभी देवगण प्रतिष्ठित हैं। गायमें ही छः अङ्गोंसहित सम्पूर्ण वेद समाहित हैं*।

गौओंके सींगकी जड़में सदा ब्रह्मा और विष्णु प्रतिष्ठित हैं। शृङ्गके अग्रभागमें सभी चराचर एवं समस्त तीर्थ प्रतिष्ठित हैं। सभी कारणोंके कारणस्वरूप महादेव शिव मध्यमें प्रतिष्ठित हैं। गौके ललाटमें गौरी, नासिकामें कार्तिकेय और नासिकाके दोनों पुटोंमें कम्बल तथा अक्षर ये दो नाग प्रतिष्ठित हैं। दोनों कानोंमें अश्विनीकुमार, नेत्रोंमें चन्द्र और सूर्य, दाँतोंमें आठों वसुगण, जिह्वामें वरुण, कुहरमें सरस्वती, गण्डस्थलोंमें यम और यक्ष, ओष्ठोंमें दोनों संध्याएँ, ग्रीवामें इन्द्र, ककुद (मौर)-में राक्षस, पाष्णि-भागमें द्यौ और जंघाओंमें चारों चरणोंसे धर्म सदा विराजमान रहता है। खुरोंके मध्यमें गन्धर्व, अग्रभागमें सर्प एवं पश्चिमभागमें

  • क्षीरोदतोयसम्भूता याः पुरामृतमन्थने । पञ्च गावः शुभाः पार्थ पञ्चलोकस्य मातरः ॥ नन्दा सुभद्रा सुरभिः सुशीला बहुला इति । एता लोकोपकाराय देवानां तर्पणाय च ॥ जमदग्निभरद्वाजवसिष्ठासितगौतमाः । जगुहः कामदाः पञ्च गावो दत्ताः सूरस्ततः ॥ गोमयं रोचनां मूत्रं क्षीरं दधिं घृतं गवाम् । षडङ्गानि पवित्राणि संशुद्धिकरणानि च ॥ गोमयादुत्थितः श्रीमान् बिल्बवृक्षः शिवप्रियः । तत्रास्ते पद्महस्ता श्रीः श्रीवृक्षस्तेन स स्मृतः । वीजान्युत्पलपद्यानां पुनर्जातानि गोमयात् ॥ गोरोचना च माङ्गल्या पवित्रा सर्वसाधिका । गोमूत्राद् गुगुलुर्जातः सुगन्धिः प्रियदर्शनः । आहारः सर्वदेवानां शिवस्य च विशेषतः ॥ यद्गीजं जगतः किंचित् तन्त्रेयं क्षीरसम्भवम् । दधिजातानि सर्वाणि मङ्गलान्यर्थसिद्धये । घृतादमृतमुत्पन्नं देवानां तृप्तिकारणम् ॥ ब्राह्मणाश्वेव गावश्च कुलमेकं द्विधा कृतम् । एकत्र मन्त्रास्तिष्ठन्ति हविरन्वत्र तिष्ठति ॥ गोषु यज्ञाः प्रवर्तन्ते गोषु देवाः प्रतिष्ठिताः । गोषु वेदाः समुत्कीर्णाः सपङ्कङ्कपदक्रमाः ॥ (उत्तरपर्व ६९। १६-२४)

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  • उत्तरपर्व *

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राक्षसगण प्रतिष्ठित हैं। गौके पृष्ठदेशमें एकादश रुद्र, सभी संधियोंमें वरुण, श्रोणि तट (कमर)-में पितर, कपोलोंमें मानव तथा अपानमें स्वाहारूप अलंकारको आश्रित कर श्री अवस्थित हैं। आदित्यरश्मियाँ केशसमूहोंमें पिण्डीभूत हो अवस्थित हैं। गोमूत्रमें साक्षात् गङ्गा और गोमयमें यमुना स्थित हैं। रोमसमूहमें तैत्तीस करोड़ देवगण प्रतिष्ठित हैं। उदरमें पर्वत और जंगलोंके साथ पृथ्वी अवस्थित है। चारों पयोधरोंमें चारों महासमुद्र स्थित हैं। क्षीरधाराओंमें मेघ, वृष्टि एवं जलविन्दु हैं, जठरमें गार्हपत्याग्नि, हृदयमें दक्षिणाग्नि, कण्ठमें आहवनीयाग्नि और तालुमें सभ्याग्नि स्थित है। गौओंकी अस्थियोंमें पर्वत और मज्जाओंमें यज्ञ स्थित हैं। सभी वेद भी गौओंमें प्रतिष्ठित हैं*।

हे युधिष्ठिर! भगवती उमाने उन सुरभियोंके रूपका स्मरणकर अपना भी रूप वैसा ही बना लिया। छः स्थानोंसे उन्नत, पाँच स्थानोंसे निम्न, मण्डूकनेत्रा, सुन्दर पूँछवाली, ताम्रके समान रक्त स्तनवाली, चाँदीके समान उज्ज्वल कटिभागवाली, सुन्दर खुर एवं सुन्दर मुखवाली, श्वेतवर्णा, सुशीला, पुत्रस्नेहवती, मधुर दूधवाली, शोभन पयोधरवाली—इस प्रकार सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न सवत्त्सा गोरूपधारिणी उस उमाको वृद्ध विप्ररूपधारी भगवान्

शंकर प्रसन्नचित्त होकर चरा रहे थे। हे पार्थ! धीरे-धीरे वे उस आश्रममें गये और कुलपति भृगुके पास जाकर उन्होंने उस गायको न्यासरूपमें दो दिनतक उसकी सुरक्षा करनेके लिये उन्हें दे दिया और कहा—‘मुने! मैं यहाँ स्नानकर जम्बूक्षेत्रमें जाऊँगा और दो दिन बाद लौटूँगा, तबतक आप इस गायकी रक्षा करें।’ मुनियोंने भी उस गौकी सभी प्रकारसे रक्षा करनेकी प्रतिज्ञा की। भगवान् शिव वहाँ अन्तर्हित हो गये और फिर थोड़ी देर बाद वे एक व्याघ्र-रूपमें प्रकट हो गये तथा बछड़ेसहित गौको डराने लगे। ऋषिगण भी व्याघ्रके भयसे आक्रान्त हो आर्तनाद करने लगे और यथासम्भव व्याघ्रको हटानेके उपाय करने लगे। व्याघ्रके भयसे सवत्त्सा वह गौ भी कूद-कूदकर रँभाने लगी। युधिष्ठिर! व्याघ्रके भयसे डरी हुई गौके भागनेपर चारों खुरोंका चिह्न शिला-मध्यमें पड़ गया। आकाशमें देवताओं एवं किन्नरोंने व्याघ्र (भगवान् शंकर) और सवत्त्सा गौ (माता पार्वती)-की वन्दना की। शिलाका वह चिह्न आज भी सुस्पष्ट दीखता है। वह नर्मदाजीका उत्तम तीर्थ है। यहाँ शम्भुतीर्थके शिवलिङ्गका जो स्पर्श करता है, वह गोहत्यासे मुक्त हो जाता है। राजन्! जम्बूमार्गमें स्थित उस महातीर्थमें स्नान कर ब्रह्महत्या आदि पापोंसे मुक्ति मिल जाती है।

  • शृङ्गमूले गवां नित्यं ब्रह्मा विष्णुश्च संस्थितौ । शृङ्गाग्रे सर्वतीर्थानि स्थावराणि चराणि च ॥ शिवो मध्ये महादेवः सर्वकारणकारणम् । ललाटे संस्थिता गौरी नासावंशे च पण्मुखः ॥ कम्बलाक्षतरो नागौ नासापुटसमाश्रितौ । कर्णयोरश्चनौ देवौ चक्षुर्भ्यां शशिभास्करौ ॥ दन्तेषु वसवः सर्वे जिह्वायां वरुणः स्थितः । सरस्वती च कुहरे यमयक्षौ च गण्डयोः ॥ संध्याद्वयं तथोष्णाभ्यां ग्रीवायां च पुरन्दरः । रक्षांसि ककुदे घोश्च पाणिंकाये व्यवस्थिता ॥ चतुष्पात्सकलो धर्मां नित्यं जह्नासु तिष्ठति । खुरमध्येषु गन्धर्वाः खुराग्रेषु च पन्नगाः ॥ खुराणां पश्चिमे भागे राक्षसाः सम्प्रतिष्ठिताः । रुद्रा एकादश पृष्ठे वरुणः सर्वसन्धिषु ॥ श्रोणीतटस्थाः पितरः कपोलेषु च मानवाः । श्रीरपाने गवां नित्यं स्वाहालंकारमाश्रिताः ॥ आदित्या रश्मयो बालाः पिण्डीभूताव्यवस्थिताः । साक्षाद्गङ्गा च गोमूत्रे गोमये यमुना स्थिता ॥ त्रयसिंशशङ् देवकोट्यो रोमकृपे व्यवस्थिताः । उदरे युधिवी सर्वा सशैलवनकानना ॥ चत्वारः सागराः प्रोक्ता गवां ये तु पयोधराः । पर्जन्यः क्षीरधारासु मेघा विन्दुव्यवस्थिताः ॥ जठरे गार्हपत्योऽग्निर्दक्षिणाग्निर्हृदि स्थितः । कण्ठे आहवनीयोऽग्निः सभ्योऽग्निस्तालुनि स्थितः ॥ अस्थिव्यवस्थिताः शैला मज्जासु ऋतवः स्थिताः । ऋग्वेदोऽथर्ववेदश्च सामवेदो यजुस्तथा ॥ (उत्तरपर्व ६१।२५—३७)

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

जब व्याघ्रसे सवत्सा गौ भयभीत हो रही थी, तब मुनियोंने क्रुद्ध होकर ब्रह्मासे प्राप्त भयंकर शब्द करनेवाले घंटेको बजाना प्रारम्भ किया। उस शब्दसे व्याघ्र भी सवत्सा गौको छोड़कर चला गया। ब्राह्मणोंने उसका नाम रखा ढुण्डागिरि। हे पार्थ! जो मानव उसका दर्शन करते हैं, वे रुद्रस्वरूप ही हो जाते हैं, इसमें संदेह नहीं है। कुछ ही क्षणोंमें भगवान् शंकर व्याघ्ररूपको छोड़कर वहाँ साक्षात् प्रकट हो गये। वे वृषभपर आरूढ़ थे, भगवती उमा उनके वाम भागमें विराजमान थीं तथा विनायक, कार्तिकेयके साथ नन्दी, महाकाल, भृङ्गी, वीरभद्रा, चामुण्डा, घण्टाकर्णा आदिसे परिवृत और मातृका, भूतसमूह, यक्ष, राक्षस, गृह्यक, देव, दानव, गन्धर्व, मुनि, विद्याधर एवं नाग तथा उनकी पत्नियोंसे वे पूजित थे। सनकादि भी उनकी पूजा कर रहे थे।

राजन्! कार्तिक मासके शुक्ल पक्ष (मतान्तरसे कृष्ण पक्ष) की द्वादशी तिथिमें ब्रह्मवादी ऋषियोंने सवत्सा गौरूपधारिणी उमादेवीकी नन्दिनी नामसे भक्तिपूर्वक पूजा की थी। इसीलिये इस दिन गोवत्सद्वादशी-व्रत किया जाता है। तभीसे उस व्रतका पृथ्वीतलपर प्रचार हुआ। राजा उत्तानपादने जिस प्रकार इस व्रतको पृथ्वीपर प्रचारित किया उसे आप सुनें—

उत्तानपाद नामक एक क्षत्रिय राजा थे। जिनकी सुरुचि और शुद्धी (सुनीति) नामकी दो रानियाँ थीं। सुनीतिसे ध्रुव नामका पुत्र हुआ। सुनीतिने अपने उस पुत्रको सुरुचिको सौंप दिया और कहा—‘हे सखि! तुम इसकी रक्षा करो। मैं सदा स्वयं सेवामें तत्पर रहूँगी।’ सुरुचि सदा गृहकार्य सँभालती और पतिव्रता सुनीति सदा पतिकी सेवा करती थी। सपत्नी-द्वेषके कारण किसी समय क्रोध और मात्सर्यसे सुरुचिने सुनीतिके शिशुको

मार डाला, किंतु वह तत्क्षण ही जीवित होकर हँसता हुआ माँकी गोदमें स्थित हो गया। इसी प्रकार सुरुचिने कई बार यह कुकृत्य किया, किंतु वह बालक बार-बार जीवित हो उठता। उसको जीवित देखकर आश्चर्यचकित हो सुरुचिने सुनीतिसे पूछा—‘देवि! यह कैसी विचित्र घटना है और यह किस व्रतका फल है, तुमने किस हवन या व्रतका अनुष्ठान किया है? जिससे तुम्हारा पुत्र बार-बार जीवित हो जाता है। क्या तुम्हें मृतसंजीवनी विद्या सिद्ध है? रत्न, महारत्न या कौन-सी विशिष्ट विद्या तुम्हारे पास है—यह सत्य-सत्य बताओ।’

सुनीतिने कहा—बहन! मैंने कार्तिक मासकी द्वादशीके दिन गोवत्सव्रत किया है, उसीके प्रभावसे मेरा पुत्र पुनः-पुनः जीवित हो जाता है। जब-जब मैं उसका स्मरण करती हूँ, वह मेरे पास ही आ जाता है। प्रवासमें रहनेपर भी इस व्रतके प्रभावसे पुत्र प्राप्त हो जाता है। इस गोवत्सद्वादशी-व्रतके करनेसे हे सुरुचि! तुम्हें भी सब कुछ प्राप्त हो जायगा और तुम्हारा कल्याण होगा। सुनीतिके कहनेपर सुरुचिने भी इस व्रतका पालन किया, जिससे उसे पुत्र, धन तथा सुख प्राप्त हुआ। सृष्टिकर्ता ब्रह्मने सुरुचिको उसके पति उत्तानपादके साथ प्रतिष्ठित कर दिया और आज भी वह आनन्दित हो रही है। दस नक्षत्रोंसे युक्त ध्रुव आज भी आकाशमें दिखायी देते हैं। ध्रुव नक्षत्रको देखनेसे सभी पापोंसे विमुक्ति हो जाती है।

युधिष्ठिरने कहा—हे भगवन्! इस व्रतकी विधि भी बतायें।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—हे कुरुश्रेष्ठ! कार्तिक मासमें शुक्ल पक्षकी द्वादशीको संकल्पपूर्वक श्रेष्ठ जलाशयमें स्नान कर पुरुष या स्त्री एक समय ही भोजन करे। अनन्तर मध्याह्नके समय वत्ससमन्वित गौकी गन्ध, पुष्प, अक्षत, कुंकुम, अलकक,

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  • उत्तरपर्व *

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दीप, उड़दके बड़े, पुष्पों तथा पुष्पमालाओंद्वारा इस मन्त्रसे पूजा करे—

ॐ माता रुद्राणां दुहिता वसूनां स्वसादित्यानाममृतस्य नाभिः। प्र नु वीचं चिकितुषे जनाय मा गामनागामदितिं वधिष्ठ नमो नमः स्वाहा ॥ (ऋ० ८।१०१।१५)

इस प्रकार पूजाकर गौको ग्रास प्रदान करे और निम्नलिखित मन्त्रसे गौका स्पर्श करते हुए प्रार्थना एवं क्षमा-याचना करे—

ॐ सर्वदेवमये देवि लोकानां शुभनन्दनि।

मातर्ममाभिलषितं सफलं कुरु नन्दनि ॥

(उत्तरपर्व ६९।८५)

इस प्रकार गौकी पूजाकर जलसे उसका पर्युक्षण करके भक्तिपूर्वक गौको प्रणाम करे। उस दिन तवापर पकाया हुआ भोजन न करे और ब्रह्मचर्यपूर्वक पृथ्वीपर शयन करे। इस व्रतके प्रभावसे व्रती सभी सुखोंको भोगते हुए अन्तमें गौके जितने रोंयें हैं, उतने वर्षातक गोलोकमें वास करता है, इसमें संदेह नहीं है।

(अध्याय ६९)

देवशयनी एवं देवोत्थानी द्वादशीव्रतोंका विधान

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! अब मैं गोविन्द-शयन नामक व्रतका वर्णन कर रहा हूँ और कटिदान, समुत्थान एवं चातुर्मास्यव्रतका भी वर्णन करता हूँ, उसे आप सुनें।

युधिष्ठिरने पूछा—महाराज! यह देव-शयन क्या है? जब देवता भी सो जाते हैं, तब संसार कैसे चलता है? देव क्यों सोते हैं? और इस व्रतका क्या विधान है—इसे कहें।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—भगवान् सूर्यके मिथुन राशिमें आनेपर भगवान् मधुसूदनकी मूर्तिको शयन करा दे और तुलाराशिमें सूर्यके जानेपर पुनः भगवान् जनार्दनको शयनसे उठाये। अधिमास आनेपर भी यही विधि है। अन्य प्रकारसे न तो हरिको शयन कराये और न उन्हें निद्रासे उठाये। आषाढ़ मासके शुक्ल पक्षकी देवशयनी एकादशीको उपवास करे। भक्तिमान् पुरुष शुक्ल वस्त्रसे आच्छादित तकियेसे युक्त उत्तम शय्यापर पीताम्बरधारी, सौम्य, शङ्खु, चक्र, गदाधारी भगवान् विष्णुको शयन कराये। इतिहास और पुराणवेत्ता विष्णुभक्त पुरुष दही, दूध, शहद, घी और जलसे भगवान्की प्रतिमाको स्नान कराकर गन्ध, धूप, कुंकुम तथा

वस्त्रोंसे अलंकृत कर निम्नलिखित मन्त्रसे प्रार्थना करे—

सुमे त्वयि जगन्नाथ जगत् सुमं भवेद्विदम्।

विबुद्धे त्वयि बुध्येत जगत् सर्वं चराचरम् ॥

(उत्तरपर्व ७०।१०)

‘हे जगन्नाथ! आपके सो जानेपर यह सारा जगत् सुस हो जाता है और आपके जग जानेपर सम्पूर्ण चराचर जगत् प्रबुद्ध हो जाता है।’

महाराज! इस प्रकार भगवान् विष्णुकी प्रतिमाको शय्यापर स्थापित कर उसीके सम्मुख वाणीपर नियन्त्रण रखनेका और अन्य नियमोंका व्रत ग्रहण करे। वर्षके चार मासतक देवाधिदेवके शयन और उसके बाद उत्थापनकी विधि कही गयी है।

राजन्! इस व्रतके त्यागने एवं ग्रहण करने योग्य पदार्थोंके अलग-अलग नियमोंको आप सुनें। गुड़का परित्याग करनेसे व्रती अगले जन्ममें मधुर वाणीवाला राजा होता है। इसी प्रकार चार मासतक तेलका परित्याग करनेवाला सुन्दर शरीरवाला होता है। कटु तेलका त्याग करनेसे उसके शत्रुओंका नाश होता है। महूएके तेलका त्याग करनेसे अतुल सौभाग्यकी प्राप्ति होती है। पुष्प आदिके भोगका

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

परित्याग करनेसे स्वर्गमें विद्याधर होता है। इन चार मासोंमें जो योगका अभ्यास करता है, वह ब्रह्मपदको प्राप्त करता है। कडुवा, खट्टा, तीता, मधुर, क्षार, कषाय आदि रसोंका जो त्याग करता है, वह वैरूप्य और दुर्गतिको कभी भी प्राप्त नहीं होता। ताम्बूलके त्यागसे श्रेष्ठ भोगोंको प्राप्त करता है और मधुर कण्ठवाला होता है। घृतके त्यागसे रमणीय लावण्य और सभी प्रकारकी सिद्धिको प्राप्त करता है। फलका त्याग करनेसे बुद्धिमान् होता है और अनेक पुत्रोंकी प्राप्ति होती है। पतोंका साग खानेसे रोगी, अपक्व अन्न खानेसे निर्मल शरीरसे युक्त होता है। तैल-मर्दनके परित्यागसे व्रती दीसिमान्, दीसकरण, राजाधिराज धनाध्यक्ष कुबेरके सायुज्यको प्राप्त करता है। दही, दूध, तक्र (मट्टा)-के त्यागका नियम* लेनेसे मनुष्य गोलोकको प्राप्त करता है। स्थालीपाकका परित्याग करनेपर इन्द्रका अतिथि होता है। तापपक्व वस्तुके भक्षणका नियम लेनेपर दीर्घायु संतानकी प्राप्ति होती है। पृथ्वीपर शयनका नियम लेनेसे विष्णुका भक्त होता है।

हे धर्मनन्दन! इन वस्तुओंके परित्यागसे धर्म होता है। नख और केशोंके धारण करनेपर, प्रतिदिन गङ्गा-स्नान करनेपर एवं मौनव्रती रहनेपर उसकी आज्ञाका कोई भी उल्लङ्घन नहीं कर सकता। जो सदा पृथ्वीपर भोजन करता है, वह पृथ्वीपति होता है। 'ॐ नमो नारायणाय' इस अष्टाक्षर-मन्त्रका निराहार रहकर जप करने एवं भगवान् विष्णुके चरणोंकी वन्दना करनेसे गोदानजन्य फल प्राप्त होता है। भगवान् विष्णुके चरणोदकके संस्पर्शसे मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है। चातुर्मास्यमें भगवान् विष्णुके मन्दिरमें उपलेपन और अर्चना करनेसे मनुष्य कल्पपर्यन्त स्थायी राजा होता है, इसमें

संशय नहीं है। स्तुतिपाठ करता हुआ जो सौ बार भगवान् विष्णुकी प्रदक्षिणा करता है एवं पुष्प, माला आदिसे पूजा करता है, वह हंसयुक्त विमानके द्वारा विष्णुलोकको जाता है। विष्णु-सम्बन्धी गान और वाद्य करनेवाला गन्धर्वलोकको प्राप्त होता है। प्रतिदिन शास्त्र-चर्चासे जो लोगोंको ज्ञान प्रदान करता है, वह व्यासरूपी भगवान्के रूपमें मान्य होता है और अन्तमें विष्णुलोकको जाता है। नित्य स्नान करनेवाला मनुष्य कभी नरकोंमें नहीं जाता। भोजनका संयम करनेवाला मनुष्य पुष्करक्षेत्रमें स्नान करनेका फल प्राप्त करता है। भगवत्सम्बन्धी लीला-नाटक आदिका आयोजन करनेवाला अप्सराओंका राज्य प्राप्त करता है। अयाचित भोजन करनेवाला श्रेष्ठ बावली और कुँआ बनानेका फल प्राप्त करता है। दिनके छठे (अन्तिम) भागमें अन्नके भक्षण करनेसे मनुष्य स्थायीरूपसे स्वर्ग प्राप्त करता है। पत्तलमें भोजन करनेवाला मनुष्य कुरुक्षेत्रमें वास करनेका फल प्राप्त करता है। शिलापर नित्य भोजन करनेसे प्रयागमें स्नान करनेका फल प्राप्त करता है। दो प्रहरतक जलका त्याग करनेसे कभी रोगी नहीं होता।

हे पार्थ! चातुर्मास्यमें इस प्रकारके व्रत एवं नियमोंके पालनसे साधक पूर्ण संतोषको प्राप्त करता है अर्थात् सभी प्रकार सुखी एवं संतुष्ट हो जाता है। गरुडध्वज जगन्नाथके शयन करनेपर चारों वर्णोंकी विवाह, यज्ञ आदि सभी क्रियाएँ सम्पादित नहीं होतीं। विवाह, यज्ञोपवीतादि संस्कार, दीक्षा-ग्रहण, यज्ञ, गृहप्रवेशादि, गोदान, प्रतिष्ठा एवं जितने भी शुभ कर्म हैं, वे सभी चातुर्मास्यमें त्याज्य हैं। संक्रान्तिरहित मासमें अर्थात् मलमासमें देवता एवं पितरोंसे सम्बन्धित कोई भी क्रिया सम्पादित नहीं की जानी चाहिये। भाद्रपद मासके

  • मकरसं मट्टा, भाद्रपदमें दही और आश्विनमें दूधका परित्याग करना चाहिये।

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  • उत्तरपर्व *

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शुक्ल पक्षकी एकादशीको भगवान् विष्णुका कटिदान होता है अर्थात् करवट बदलनेकी क्रिया सम्पन्न करनी चाहिये। इस दिन महापूजा करनी चाहिये।

राजन्! अब इस विष्णु-शयनका कारण सुनिये। किसी समय तपस्याके प्रभावसे हरिको संतुष्टकर योगनिद्राने प्रार्थना की कि भगवन्! आप मुझे भी अपने अङ्गोंमें स्थान दीजिये। तब मैंने देखा कि मेरा सम्पूर्ण शरीर तो लक्ष्मी आदिके द्वारा अधिष्ठित है। लक्ष्मीके द्वारा उरःस्थल, शङ्ख, चक्र, शाङ्खधनुष तथा असिके द्वारा बाहु, वैन्तेयके द्वारा नाभिके नीचेके अङ्ग, मुकुटसे सिर, कुण्डलोंसे कान अवरुद्ध हैं। इसलिये मैंने संतुष्ट होकर नेत्रोंमें आदरसे योगनिद्राको स्थान दिया और कहा कि तुम वर्षमें चार मास मेरे आश्रित रहोगी। यह सुनकर प्रसन्न होकर योगनिद्राने मेरे नेत्रोंमें वास किया। मैं उस मनस्विनीको आदर देता हूँ। योगनिद्रामें जब मैं क्षीरसागरमें इस महानिद्रारूपी शेषशय्यापर शयन करता हूँ, उस समय ब्रह्माके सानिध्यमें भगवती लक्ष्मी अपने करकमलोंसे मेरे दोनों चरणोंका मर्दन करती हैं और क्षीरसागरकी लहरें मेरे चरणोंको धोती हैं। हे पाण्डवश्रेष्ठ! जो मनुष्य इस चातुर्मास्यके समय अनेक व्रत-नियमपूर्वक रहता है, वह कल्पपर्यन्त विष्णुलोकमें निवास करता है। इसमें संशय नहीं। शङ्ख, चक्र, गदाधारी भगवान् विष्णु कार्तिक मासके शुक्ल पक्षकी एकादशीमें जागते हैं, उसकी व्रत-विधि आप सुनिये। भगवान्को इस मन्त्रसे जगाना चाहिये—‘इदं विष्णुर्वि चक्रमे त्रेधा नि दधे पदम्। समूढमस्य पां सुरे स्वाहा॥’ (यजु० ५। १५) अपने आसनपर विष्णुके जागनेपर संसारकी सभी धार्मिक क्रियाएँ प्रवृत्त हो जाती हैं। शङ्ख, मृदंग आदि वाद्योंकी ध्वनि एवं जयघोषके

साथ भगवान्को रात्रिमें रथपर बैठाकर घुमाना चाहिये। देवदेवेशके उठनेपर नगरको दीपादिसे देदीप्यमान कर नृत्य-गीत-वाद्य आदिसे मङ्गलोत्सव करना चाहिये। धरणीधर दामोदर भगवान् विष्णु उठकर जिस-जिसको देखते हैं, उस समय उन्हें प्रदत्त सभी वस्तुएँ मानवको स्वर्गमें प्राप्त होती हैं। एकादशीके दिन रात्रिमें मन्दिरमें जागरण करे। द्वादशीमें प्रातःकाल स्वच्छ जलसे स्नानकर विष्णुकी पूजा करे। अग्रिममें घृत आदि हव्य द्रव्योंसे हवन करे, अनन्तर स्नानकर ब्राह्मणको विशिष्ट अन्नोंका भोजन कराये। घी, दही, मधु, गुड आदिके द्वारा निर्मित मोदकको भोजनके लिये समर्पित करे। यजमान भी प्रसन्नतापूर्वक संयमित होकर ग्यारह, दस, आठ, पाँच या दो विघ्रोंकी पुष्प, गन्ध आदिसे विधिवत् पूजा करे। श्रेष्ठ संन्यासियोंको भी भोजन कराये और संकल्पमें त्यक्त पदार्थ तथा अभीष्ट पत्र-पुष्प आदि दक्षिणाके साथ देकर उन्हें बिदा करे। अनन्तर स्वयं भोजन करना चाहिये। जिस वस्तुको चार मासतक छोड़ा है, उसे भी खाना चाहिये। ऐसा करनेसे धर्मकी प्राप्ति होती है। अन्तमें व्रती विष्णुपुरी (वैकुण्ठ)-को प्राप्त करता है। जिस व्यक्ति का चातुर्मास्यव्रत निर्विघ्न सम्पन्न होता है, वह कृतकृत्य हो जाता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। हे पार्थ! जो देवशयन-व्रतको विधिपूर्वक सम्पन्न करता हुआ अन्तमें भगवान् विष्णुको जगाता है, वह विष्णुलोकको प्राप्त करता है। इस माहात्म्यको जो मनुष्य ध्यानसे सुनता है, स्तुति करता एवं कहता है, वह विष्णुलोकको प्राप्त करता है। क्षीरसागरमें भगवान् अनन्त जिस दिन सोते हैं और जागते हैं, उस दिन अनन्यचित्तसे उपवास करनेवाला पुरुष सद्गतिको प्राप्त करता है।’ (अध्याय ७०)

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

नीराजनद्वादशीव्रत-कथा एवं व्रत-विधान

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—राजन्! प्राचीन कालमें अजपाल नामके एक राजर्षि थे। एक बार प्रजाने अपने दुःखोंको दूर करनेकी उनसे प्रार्थना की, तब उन्होंने इसपर गम्भीरतापूर्वक विचार किया और फिर नीराजन-शान्तिका अनुष्ठान किया। राजन्! आपको उस व्रतकी विधि बतलाता हूँ। हे पाण्डवश्रेष्ठ! राजाको पुरोहितके द्वारा इसे सविधि सम्पन्न कराना चाहिये।

जब अजपाल राजा था, उस समय राक्षसोंका स्वामी रावण लङ्काका राजा था। देवताओंको उसने अपनी सेवामें नियुक्त कर लिया था। रावणने चन्द्रमाको छत्र, इन्द्रको सेनापति, वायुको धूल साफ करनेवाला, वरुणको जलसेवक, कुबेरको धनरक्षक, यमको शत्रुको संयत करनेवाला तथा राजेन्द्र मनुको मन्त्रणाके लिये नियुक्त किया। मेघ उसके इच्छानुसार शीतल मन्द वृष्टि करते थे। ब्रह्माके साथ सप्तर्षिगण नित्य उसकी शान्तिकी कामना करते रहते थे। रावणने गन्धर्वोंको गानके लिये, अप्सराओंको नृत्य-गीतके लिये, विद्याधरोंको वाद्य-कार्यके लिये, गङ्गादि नदियोंको जलपान करानेके लिये, अग्निको गार्हपत्य-कार्यके लिये, विश्वकर्माको अन्न-संस्कारके लिये तथा यमको शिल्प आदि कार्यके लिये नियुक्त किया और दूसरे राजागण नगरकी सेवाके विधानमें तत्पर रहते थे। रावणने ऐसा अपना प्रभाव देखकर अपने प्रसस्त नामक प्रतिहारसे कहा—‘यहाँ मेरी सेवाके लिये कौन आया है?’ प्रणाम कर निशाचरने कहा—‘प्रभो! ककुत्स्थ, मान्धाता, धनुश्चमार, नल, अर्जुन, ययाति, नहुष, भीम, राघव, विदूरथ—ये सभी तथा अन्य बहुत-से राजा आपकी सेवाके लिये यहाँ आये हैं, किंतु राजा अजपाल आपकी सेवामें नहीं आया है।’ रावणने क्रुद्ध होकर शीघ्र

ही धूम्राक्ष नामक राक्षससे कहा—‘धूम्राक्ष! जाओ और अजपालको मेरी आज्ञाके अनुसार यह सूचना दो कि तुम आकर मेरी सेवा करो, अन्यथा तलवारसे तुमको मैं मार डालूँगा।’ रावणके द्वारा ऐसा कहनेपर धूम्राक्ष गरुड़के समान तेज गतिसे उसकी रमणीय नगरीमें गया और राजकुलमें पहुँचा। धूम्राक्षने रावणके द्वारा कही गयी बातें उसे सुनार्यी, किंतु अजपालने धूम्राक्षके आक्षेपपूर्वक अन्य कारणोंको कहते हुए लौटा दिया। तदनन्तर ज्वरको बुलाकर राजाने कहा—‘तुम लङ्केश्वर रावणके पास जाओ और वहाँ यथोचित कार्य सम्पन्न करो।’ अजपालके द्वारा नियुक्त मूर्तिमान् ज्वर वहाँ गया और उसने सभी गणोंके साथ बैठे हुए राक्षसपतिको प्रकम्पित कर दिया। रावणने उस परम भयंकर ज्वरको आया जानकर कहा कि अजपाल राजा वहाँ रहे, मुझे उसकी जरूरत नहीं है। उसी बुद्धिमान् राजर्षि अजपालके द्वारा यह शान्ति प्रवर्तित हुई है, यह शान्ति सभी उपद्रवोंको दूर करनेवाली है। सभी रोगोंको नष्ट करनेवाली है।

कार्तिक मासके शुक्ल पक्षकी द्वादशी तिथिमें सायंकाल भगवान् विष्णुके जग जानेके बाद ब्राह्मणोंके द्वारा विष्णुका हवन करे। वर्धमान (एरण्ड) वृक्षोंसे प्राप्त तेलयुक्त दीपिकाओंसे भगवान् विष्णुका धीरे-धीरे नीराजन करे। पुष्प, चन्दन, अलंकार, वस्त्र एवं रत्न आदिसे उनकी पूजा करे। साथ ही लक्ष्मी, चण्डिका, ब्रह्मा, आदित्य, शंकर, गौरी, यक्ष, गणपति, ग्रह, माता-पिता तथा नाग सभीका नीराजन (आरती) करे। गौ, महिष आदिका भी नीराजन करे। घंटा आदि वाद्योंको बजाये। गौओंका सिन्दूर आदिसे तथा चित्र-विचित्र वस्त्रोंसे शृङ्गार करे और बछड़ोंके साथ उनको ले चले एवं उनके पीछे

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  • उत्तरपर्व *

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गोपाल भी ध्वनि करते चले। मङ्गलध्वनिसे युक्त गौओंके नीराजन-उत्सवमें घोड़ों आदिको भी ले चले। अपने घरके आँगनको राजचिह्नोंसे सुशोभित कर पुरोहितोंके साथ मन्त्री, नौकर आदिको लेकर राजा शङ्ख, तुरही आदिके द्वारा एवं गन्ध, पुष्प, वस्त्र, दीप आदिसे पूजा करे। पुरोहित 'शान्तिरस्तु', 'समृद्धिरस्तु' ऐसा कहते रहें। यह महाशान्ति नामसे प्रसिद्ध नीराजन जिस राष्ट्र, नगर और गाँवमें सम्पन्न होता है, वहाँके सभी

रोग एवं दुःख नष्ट हो जाते हैं तथा सुभिक्ष हो जाता है। राजा अजपालने इसी नीराजन-शान्तिसे अपने राष्ट्रकी वृद्धि की थी और सम्पूर्ण प्राणियोंको रोगसे मुक्त बना दिया था। इसलिये रोगादिकी निवृत्ति और अपना हित चाहनेवाले व्यक्तिको नीराजन-व्रतका अनुष्ठान प्रतिवर्ष करना चाहिये। भगवान् विष्णुका जो नीराजन करता है, वह गौ, ब्राह्मण, रथ, घोड़े आदिसे युक्त एवं नीरोग हो सुखसे जीवन-यापन करता है। (अध्याय ७१)

भीष्मपञ्चक-व्रतकी विधि एवं महिमा

युधिष्ठिरने कहा—हे यदुश्रेष्ठ कृष्ण! कार्तिक मासमें भीष्मपञ्चक नामका जो श्रेष्ठ व्रत होता है, अब कृपया उसका विधान बताइये।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! मैं आपसे व्रतोंमें सर्वोत्तम भीष्मपञ्चक-व्रतका वर्णन कर रहा हूँ। मैंने पहले इस व्रतका उपदेश भृगुजीको किया था, फिर भृगुने शुक्राचार्यको और शुक्राचार्यने प्रह्लाद आदि दैत्यों एवं अपने शिष्य ब्राह्मणोंको बताया। जैसे तेजस्वियोंमें अग्नि, शीघ्रगामियोंमें पवन, पूजनीयोंमें ब्राह्मण एवं दानोंमें सुवर्ण-दान श्रेष्ठ है, वैसे ही व्रतोंमें भीष्मपञ्चक-व्रत श्रेष्ठ है। लोकोंमें भूलौक, तीर्थोंमें गङ्गा, यज्ञोंमें अश्वमेध, शास्त्रोंमें वेद तथा देवताओंमें अच्युतका जैसा स्थान है, ठीक उसी प्रकारसे व्रतोंमें भीष्मपञ्चक सर्वोत्तम है। जो इस दुष्कर भीष्मपञ्चक-व्रतका अनुष्ठान कर लेता है, उसके द्वारा सभी धर्म सम्पादित हो जाते हैं। पहले सत्ययुगमें वसिष्ठ, भृगु, गर्ग आदि मुनियोंने, फिर त्रेतामें नाभाग, अम्बरीष आदि राजाओंने और द्वापरमें सीरभद्र आदि वैश्योंने तथा कलियुगमें उत्तम आचरणवाले शूद्रोंने भी इस व्रतका अनुष्ठान किया। ब्राह्मणोंने ब्रह्मचर्य-पालन, जप तथा हवन-कर्मके द्वारा और

क्षत्रियों एवं वैश्योंने सत्य-शौच आदिके पालनपूर्वक इस व्रतका अनुष्ठान किया है। सत्यहीन मूढ़ मनुष्योंके लिये इस व्रतका अनुष्ठान असम्भव है। यह भीष्मपञ्चक-व्रत पाँच दिनतक होता है। इस भीष्मपञ्चक-व्रतमें असत्यभाषण, शिकार खेलने आदि अनुचित कर्मोंका त्याग करना चाहिये। पाँच दिन विष्णुभगवान्का पूजन करते हुए शाकमात्रका ही आहार करना चाहिये। पतिकी आज्ञासे स्त्री भी सुख-प्राप्तिहेतु इस व्रतका आचरण कर सकती है। विधवा नारी भी पुत्र-पौत्रोंकी समृद्धि अथवा मोक्षार्थ इस व्रतको कर सकती है। इसमें कार्तिक मासपर्यन्त नित्य प्रातः-स्नान, दान, मध्याह्न-स्नान और भगवान् विष्णुके पूजनका विधान है। नदी, झरना, देवखात या किसी पवित्र जलाशयमें शरीरमें गोमय लगाकर स्नान कर जौ, चावल तथा तिलोंसे देवता, ऋषियों और पितरोंका तर्पण करना चाहिये। भगवान् विष्णुको भी मधु, दुग्ध, घी तथा चन्दनमिश्रित जलसे भक्तिपूर्वक स्नान कराना चाहिये। कर्पूर, पञ्चगव्य, कुंकुम (केसर), चन्दन तथा सुगन्धित पदार्थोंके द्वारा भगवान् गरुडध्वज विष्णुका उपलेपन करना चाहिये। उनके सामने एक दीपक पाँच दिनोंतक अनवरत दिन-रात प्रज्वलित रखना चाहिये।

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

भगवान्को नैवेद्य निवेदित कर 'ॐ नमो वासुदेवाय'-का अष्टोत्तरशत-जप, तदनन्तर षडक्षर-मन्त्रसे हवन करना चाहिये तथा विधिपूर्वक सार्यकालीन संध्या करनी चाहिये। जमीनपर सोना चाहिये। ये सभी कार्य पाँच दिनोंतक किये जाने चाहिये। इस व्रतमें पहले दिन भगवान् विष्णुके चरणोंकी कमल-पुष्पोंके द्वारा पूजा करनी चाहिये। दूसरे दिन बिल्वपत्रके द्वारा उनके घुटनोंकी, तीसरे दिन नाभि-स्थलपर केवड़ेके पुष्पद्वारा पूजा करनी चाहिये। चौथे दिन बिल्व एवं जपा-पुष्पोंसे भगवान्के स्कन्ध-प्रदेशकी पूजा करनी चाहिये और पाँचवें दिन मालती-पुष्पोंसे भगवान्के शिरोभागकी पूजा करनी चाहिये।

इस प्रकार हृषीकेशका पूजन करते हुए व्रतीको एकादशीके दिन व्रत कर अभिमन्त्रित गोमय तथा द्वादशीको गोमूत्रका प्राशन करना चाहिये। त्रयोदशीको दूध तथा चतुर्दशीको दधिका प्राशन करना चाहिये। कायशुद्धिके लिये चारों दिन इनका प्राशन करना चाहिये। पाँचवें दिन स्नानकर केशवकी विधिवत्

पूजा करनी चाहिये। तत्पश्चात् ब्राह्मणको भक्तिपूर्वक भोजन कराकर दक्षिणा देनी चाहिये। इसी प्रकार पुराण-वाचकोंको भी वस्त्राभूषण प्रदान करना चाहिये। रात्रिमें पहले पञ्चगव्य-पान करके पीछे अन्न भोजन करे। इस प्रकारसे भीष्मपञ्चक-व्रतका समापन करना चाहिये। यह भीष्मपञ्चक-व्रत परम पवित्र और सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाला है। राजन्! इसी भीष्मपञ्चक-व्रतका वर्णन शरशय्यापर पड़े हुए महात्मा भीष्मने स्वयं किया था। इसे मैंने आपको बता दिया। जो मानव भक्तिपूर्वक इस व्रतका पालन करता है, उसे भगवान् अच्युत मुक्ति प्रदान करते हैं। ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ अथवा संन्यासी जो कोई भी इस व्रतको करते हैं, उन्हें वैष्णव-स्थान प्राप्त होता है। कार्तिक शुक्ल एकादशीसे व्रत प्रारम्भ करके पौर्णमासीको व्रत पूर्ण करना चाहिये। जो इस व्रतको सम्पन्न करता है, वह ब्रह्महत्या, गोहत्या आदि बड़े-बड़े पापोंसे भी मुक्त हो जाता है और शुद्ध सद्गतिको प्राप्त होता है। ऐसा भीष्मका वचन है। (अध्याय ७२)

मल्लद्वादशी एवं भीमद्वादशी-व्रतका विधान

युधिष्ठिरके द्वारा मल्लद्वादशीके विषयमें पूछे जानेपर भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रने कहा—महाराज! जब मेरी अवस्था आठ वर्षकी थी, उस समय यमुना-तटपर भाण्डीर-वनमें वट-वृक्षके नीचे एक सिंहासनपर मुझे बैठाकर सुरभद्र, मण्डलीक, योगवर्धन तथा यक्षेन्द्रभद्र आदि बड़े-बड़े मल्लों और गोपाली, धन्या, विशाखा, ध्याननिष्ठिका, अनुगन्धा, सुभगा आदि गोपियोंने दही, दूध और फल-फूल आदिसे मेरा पूजन किया। तत्पश्चात् तीन सौ साठ मल्लोंने भक्तिपूर्वक मेरा पूजन करते हुए मल्लयुद्धको सम्पन्न किया तथा हमारी प्रसन्नताके लिये बड़ा भारी उत्सव मनाया। उस

महोत्सवमें भाँति-भाँतिके भक्ष्य-भोज्य, गोदान, गोष्ठी तथा पूजन आदि कार्य सम्पन्न किये गये थे। श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणोंका पूजन भी हुआ था। उसी दिनसे वह मल्लद्वादशी प्रचलित हुई। इस व्रतको मार्गशीर्ष मासके शुक्ल पक्षकी द्वादशीसे आरम्भ कर कार्तिक मासके शुक्ल पक्षकी द्वादशीतक करना चाहिये और प्रतिमास क्रमसे केशव, नारायण, माधव, गोविन्द, विष्णु, मधुसूदन, त्रिविक्रम, वामन, श्रीधर, हृषीकेश, पद्मनाभ तथा दामोदर—इन नामोंसे गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, गीत-वाद्य, नृत्यसहित पूजन करे और 'कृष्णो मे प्रीयताम्' इस प्रकार उच्चारण करे। यह द्वादशीव्रत मुझे

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  • उत्तरपर्व *

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बहुत प्रिय है। चूँकि मल्लोंने इस बातको प्रारम्भ किया था, अतः इसका नाम मल्लद्वादशी है। जिन गोपोंके द्वारा इस व्रतको सम्पन्न किया गया, उन्हें गाय, महिषी, कृषि आदि प्रचुर मात्रामें प्राप्त हुआ। जो कोई पुरुष इस व्रतको सम्पन्न करेगा, मेरे अनुग्रहसे वह आरोग्य, बल, ऐश्वर्य और शाश्वत विष्णुलोकको प्राप्त करेगा।

भगवान् श्रीकृष्ण पुनः बोले—महाराज! प्राचीन कालमें विदर्भ देशमें भीम नामक एक प्रतापी राजा थे। वे दमयन्तीके पिता एवं राजा नलके ससुर थे। राजा भीम बड़े पराक्रमी, सत्यवक्ता और प्रजापालक थे। वे शास्त्रोक्त-विधिसे राज्य-कार्य करते थे। एक दिन तीर्थयात्रा करते हुए ब्रह्माजीके पुत्र पुलस्त्यमुनि उनके यहाँ पधारे। राजाने अर्घ्य-पाद्यादिद्वारा उनका बड़ा आदर-सत्कार किया, पुलस्त्यमुनिने प्रसन्न होकर राजासे कुशल-क्षेम पूछा, तब राजाने अत्यन्त विनयपूर्वक कहा—‘महाराज! जहाँ आप-जैसे महानुभावका आगमन हो, वहाँ सब कुशल ही होता है। आपके यहाँ पधारनेसे मैं पवित्र हो गया।’ इस तरहसे अनेक प्रकारकी स्नेहकी बातें राजा तथा पुलस्त्यमुनिके बीच होती रहीं। कुछ समयके पश्चात् विदर्भाधिपति भीमने पुलस्त्यमुनिसे पूछा—प्रभो! संसारके जीव अनेक प्रकारके दुखोंसे सदा पीड़ित रहते हैं और उसमें गर्भवास सबसे बड़ा दुःख है, प्राणी अनेक प्रकारके रोगसे ग्रस्त हैं। जीवोंकी ऐसी दशाको देखकर मुझे अत्यन्त कष्ट होता है। अतः ऐसा कौन-सा उपाय है, जिसके द्वारा थोड़ा परिश्रम करके ही जीव संसारके दुःखोंसे छुटकारा पानेमें समर्थ हो जाय। यदि कोई व्रत-दानादि हो तो आप मुझे बतलायें।

पुलस्त्यमुनिने कहा—राजन्! यदि मानव माघ मासके शुक्ल पक्षकी द्वादशीको उपवास करे तो

उसे कोई कष्ट नहीं हो सकता। यह तिथि परम पवित्र करनेवाली है। यह व्रत अति गुप्त है, किंतु आपके स्नेहने मुझे कहनेके लिये विवश कर दिया है। अदीक्षितसे इस व्रतको कभी नहीं कहना चाहिये, जितेन्द्रिय, धर्मनिष्ठ और विष्णुभक्त पुरुष ही इस व्रतके अधिकारी हैं। ब्रह्मघाती, गुरुघाती, स्त्रीघाती, कृतघ्न, मित्रदोही आदि बड़े-बड़े पातकी भी इस व्रतके करनेसे पापमुक्त हो जाते हैं। इसके लिये शुद्ध तिथिमें और अच्छे मुहूर्तमें दस हाथ लम्बा-चौड़ा मण्डप तैयार करना चाहिये तथा उसके मध्यमें पाँच हाथकी एक वेदी बनानी चाहिये। वेदीके ऊपर एक मण्डल बनाये, जो पाँच रंगोंसे युक्त हो। मण्डपमें आठ अथवा चार कुण्ड बनाये। कुण्डोंमें ब्राह्मणोंको उपस्थापित करे। मण्डलके मध्यमें कर्णिकाके ऊपर पश्चिमाभिमुख चतुर्भुज भगवान् जनार्दनकी प्रतिमा स्थापित कर गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, आदि भीति-भीतिके उपचारों तथा नैवेद्योंसे शास्त्रोक्त-विधिसे ब्राह्मणोंद्वारा उनकी पूजा करानी चाहिये। नारायणके सम्मुख दो स्तम्भ गाड़कर उनके ऊपर एक आड़ा काष्ठ रख उसमें एक दृढ़ छींका बाँधना चाहिये। उसपर सुवर्ण, चाँदी, ताम्र अथवा मृत्तिकाका सहस्र, शत या एक छिद्रसमन्वित उत्तम कलश जल, दूध अथवा घीसे पूर्ण कर रखना चाहिये। पलाशकी समिधा, तिल, घृत, खीर और शमी-पत्रोंसे ग्रहोंके लिये आहुति देनी चाहिये। ईशान-कोणमें ग्रहोंका पीठ-स्थापन कर ग्रह-यज्ञविधानसे ग्रहोंकी पूजा करनी चाहिये। पूर्व आदि दिशाओंमें इन्द्र, यम, वरुण और कुबेरका पूजन कर शुक्ल वस्त्र तथा चन्दनसे भूषित, हाथमें कुश लेकर यजमानको एक पीढ़ेके ऊपर भगवान्के सामने बैठना चाहिये। यजमानको एकाग्रचित्त हो कलशसे गिरती जलधार (वसोर्धार)-

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४७०

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

को निम्नमन्त्रका पाठ करते हुए भगवान्को प्रणामपूर्वक अपने सिरपर धारण करना चाहिये—

नमस्ते देवदेवेश नमस्ते भुवनेश्वर।

व्रतेनानेन मां पाहि परमात्मन् नमोऽस्तु ते॥

(उत्तरपर्व ७४।४२)

उस समय ब्राह्मणोंको चारों दिशाओंके कुण्डोंमें हवन करना चाहिये। साथ ही शान्तिकाध्याय और विष्णूसूक्तका पाठ किया जाना चाहिये। शङ्ख-ध्वनि करनी चाहिये। भाँति-भाँतिके वाद्योंको बजाना चाहिये। पुण्य-जयघोष करना चाहिये। माङ्गलिक स्तुति-पाठ करना चाहिये। इस तरहके माङ्गलिक कार्य करते हुए यजमानको हरिवंश, सौपर्णिक (सुपर्णसूक्त) आख्यान और महाभारत आदिका श्रवण करते हुए जागरणपूर्वक रात्रि व्यतीत करनी चाहिये। भगवान्के ऊपर गिरती हुई वसोर्धारा समस्त सिद्धियोंको प्रदान करनेवाली है। दूसरे दिन प्रातः यजमान ब्राह्मणोंके साथ किसी पुण्य जलाशय अथवा नदी आदिमें स्नानकर शुक्ल वस्त्र पहनकर प्रसन्नचित्तसे भगवान् भास्करको अर्घ्य दे। पुष्प, धूप, दीप आदि उपचारोंसे भगवान् पुरुषोत्तमकी पूजा करे। हवन करके भक्तिपूर्वक पूर्णाहुति दे। यज्ञमें उपस्थित सभी ब्राह्मणोंका शय्या, भोजन, गोदान, वस्त्र, आभूषण आदिद्वारा पूजन करे और आचार्यकी विशेषरूपसे पूजा करे।

जैसे ब्राह्मण एवं आचार्य संतुष्ट हों वैसे यज्ञ करे, क्योंकि आचार्य साक्षात् देवतुल्य गुरु है। दीनों, अनाथों तथा अभ्यागतोंको भी संतुष्ट करे। अनन्तर स्वयं भी हविष्यका भोजन करे।

राजन्! इस प्रकार मैंने इस भीमद्वादशी-व्रतका विधान बतलाया, इससे पापिष्ठ व्यक्ति भी पापमुक्त हो जाते हैं, इसमें संदेह नहीं। यह विष्णुयाग सैकड़ों वाजपेय एवं अतिरात्र यागोंसे विशेष फलदायी है। इस भीमद्वादशीका व्रत करनेवाले स्त्री-पुरुष सात जन्मोंतक अखण्ड सौभाग्य, आयु, आरोग्य तथा सभी सम्पदाओंको प्राप्त करते हैं। अनन्तर मृत्युके बाद क्रमशः विष्णुपुर, रुद्रलोक तथा ब्रह्मलोकको प्राप्त करते हैं। इस पृथ्वीलोकमें आकर पुनः वह सम्पूर्ण पृथ्वीका अधिपति एवं चक्रवर्ती धार्मिक राजा होता है।

इस व्रतको प्राचीन कालमें महात्मा सगर, अज, धृंधुमार, दिलीप, ययाति तथा अन्य महान् श्रेष्ठ राजाओंने किया था और स्त्री, वैश्य एवं शूद्रोंने भी धर्मकी कामनासे इस व्रतको किया था। भृगु आदि मुनियों और सभी वेदज्ञ ब्राह्मणोंद्वारा भी इसका अनुष्ठान हुआ था। हे राजन्! आपके पृष्ठनेपर मैंने इसे बतलाया है, अतः आजसे यह द्वादशी आपके (भीमद्वादशी) नामसे पृथ्वीपर ख्याति प्राप्त करेगी। (अध्याय ७३-७४)

श्रवणद्वादशी-व्रतके प्रसंगमें एक वणिक्की कथा

युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! जो व्यक्ति दीर्घ उपवास करनेमें असमर्थ हो उसके लिये कौन-सा व्रत है? इसे आप बतलायें।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—राजन्! भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षकी द्वादशी तिथि यदि श्रवण नक्षत्रसे युक्त हो तो इसमें व्रत करनेसे सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। यह परम पवित्र एवं

महान् फल देनेवाली द्वादशी है। इस व्रतमें प्रातःकाल नदी-संगममें जाकर स्नान करके द्वादशीमें उपवास करना चाहिये। एकमात्र इस श्रवणद्वादशीके व्रत कर लेनेसे द्वादश द्वादशी-व्रतोंका फल प्राप्त हो जाता है। यदि इस तिथिमें बुधवारका भी योग हो जाय तो इसमें किये गये समस्त कर्म अक्षय हो जाते हैं। इस व्रतसे गङ्गास्नानका लाभ होता

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  • उत्तरपर्व *

४७१

है। इस व्रतमें एक सुन्दर कलशकी विधिवत् स्थापना कर उसमें भगवान् विष्णुकी प्रतिमा यथाविधि स्थापित करनी चाहिये। अनन्तर भगवान्की अङ्गपूजा करनी चाहिये। रात्रिमें जागरण करे। प्रभातकालमें स्नानकर गरुडध्वजकी पूजा करे और पुष्पाञ्जलि देकर इस प्रकार प्रार्थना करे—

नमो नमस्ते गोविन्द बुधश्रवणसंज्ञक।

अघौघसंक्षयं कृत्वा सर्वसौख्यप्रदो भव॥

(उत्तरपर्व ७५।१५)

अनन्तर वेदज्ञ एवं पुराणज्ञ ब्राह्मणोंकी पूजा करे और प्रतिमा आदि सब पदार्थ 'प्रीयतां मे जनार्दनः' कहकर ब्राह्मणको निवेदित कर दे।

श्रीकृष्णने पुनः कहा— महाराज! इस व्रतके प्रसंगमें एक प्राचीन आख्यान है, उसे आप सुने—दशार्ण देशके पश्चिम भागमें सम्पूर्ण प्राणियोंको भय देनेवाला एक मरुदेश है। वहाँके भूमिकी बालू निरन्तर तपती रहती है, यत्र-तत्र भयंकर साँप घूमते रहते हैं। वहाँ छाया बहुत कम है। वृक्षोंमें पत्ते कम रहते हैं। प्राणी प्रायः मरे-जैसे ही रहते हैं। शमी, खैर, पलाश, करील, पीलू आदि कँटीले वृक्ष वहाँ हैं। वहाँ अन्न और जल बहुत कम मिलता है। वृक्षोंके कोटरोंमें छोटे-छोटे पक्षी प्यासे ही मर जाते हैं। वहाँके प्यासे हरिण मरुभूमिमें जलकी इच्छासे दौड़ लगाते रहते हैं और जल न मिलनेसे मर जाते हैं।

उस मरुस्थलमें दैववश एक वणिक् पहुँच गया। वह अपने साथियोंसे बिछुड़ गया था। उसने इधर-उधर घूमते हुए भयंकर पिशाचोंको वहाँ देखा। वह वणिक् भूख-प्याससे व्याकुल होकर इधर-उधर घूमने लगा। कहने लगा—क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, कहाँसे मुझे अन्न-जल प्राप्त हो। तदनन्तर उसने एक प्रेतके स्कन्धप्रदेशपर बैठे एक प्रेतको देखा। जिसे चारों ओरसे अन्य प्रेत घेरे हुए थे।

कन्धेपर चढ़ा हुआ वह प्रेत वणिक्को देखकर उसके पास आया और कहने लगा—'तुम इस निर्जल प्रदेशमें कैसे आ गये?' उसने बताया—'मेरे साथी छूट गये हैं, मैं अपने किसी पूर्व-कुकृत्यके फलसे या संयोगसे यहाँ पहुँच गया हूँ। भूख और प्याससे मेरे प्राण निकल रहे हैं। मैं अपने जीनेका कोई उपाय नहीं देख रहा हूँ।' इसपर वह प्रेत बोला—'तुम इस पुत्राग-वृक्षके पास क्षणमात्र प्रतीक्षा करो। यहाँ तुम्हें अभीष्ट लाभ होगा, इसके बाद तुम यथेच्छ चले जाना।' वणिक् वहीं ठहर गया। दोपहरके समय कोई व्यक्ति पुत्राग-वृक्षसे एक कसोरेंमें जल तथा दूसरे कसोरेंमें दही और भात लेकर प्रकट हुआ और उसने वह वणिक्को प्रदान किया। वणिक् उसे ग्रहणकर संतुष्ट हुआ। उसी व्यक्तिने प्रेत-समुदायको भी जल और दही-भात दिया, इससे वे सभी संतुष्ट हो गये। शेष भागको उस व्यक्तिने स्वयं भी ग्रहण किया। इसपर आश्चर्यचकित होकर वणिक्ने उस प्रेताधिपसे पूछा—'ऐसे दुर्गम स्थानमें अन्न-जलकी प्राप्ति आपको कहाँसे होती है? थोड़ेसे ही अन्न-जलसे बहुतसे लोग कैसे तृप्त हो जाते हैं। मुझे सहारा देनेवाले इस स्थानमें आप कैसे मिल गये? हे शुभव्रत! आप यह बतलायें कि ग्रासमात्रसे ही आपको संतुष्टि कैसे हो गयी? इस घोर अटवीमें आपने अपना स्थान कहाँ बनाया है? मुझे बड़ा कौतूहल हो रहा है, मेरा संशय आप दूर करें।'

प्रेताधिपने कहा— हे भद्र! मैंने पहले बहुत दुष्कृत किया था। दुष्ट बुद्धिवाला मैं पहले रमणीय शाकल नगरमें रहता था। व्यापारमें ही मैंने अपना अधिकांश जीवन बिता दिया। प्रमादवश मैंने धनके लोभसे कभी भी भूखेको न अन्न दिया और न प्यासेकी प्यास ही बुझायी। मेरे ही घरके पास एक गुणवान् ब्राह्मण रहता था। वह

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४७२

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

भाद्रपद मासकी श्रवण नक्षत्रसे युक्त द्वादशीके योगमें कभी मेरे साथ तोषा नामकी नदीमें गया। तोषा नदीका संगम चन्द्रभागासे हुआ है। चन्द्रभागा चन्द्रमाकी तथा तोषा सूर्यकी कन्या हैं। उन दोनोंका शीतोष्ण जल बड़ा मनोहर है। उस तीर्थमें जाकर हमलोगोंने स्नान किया और उपवास किया। हमने वहाँ दध्योदन, छत्र, वस्त्र आदि उपचारोंसे भगवान् विष्णुकी प्रतिमाकी पूजा की। इसके अनन्तर हमलोग घर आ गये। मरनेके अनन्तर नास्तिक होनेसे मैं प्रेतत्वको प्राप्त हुआ। इस घोर अटवीमें जो हो रहा है, वह तो आप देख ही रहे हैं। ये जो अन्य प्रेतगण आप देख रहे हैं, इनमें कुछ ब्राह्मणोंके धनका अपहरण करनेवाले, कोई परदारारत हैं, कोई अपने स्वामीसे द्रोह करनेवाले तथा कोई मित्रद्रोही हैं। मेरा अन्न-पान करनेसे ये सब मेरे सेवक बन गये हैं। भगवान् श्रीकृष्ण अक्षय, सनातन परमात्मा हैं। उनके उद्देश्यसे जो कुछ भी दान किया जाता है वह अक्षय होता है। हे महाभाग! आप हिमालयमें

जाकर धन प्राप्त करेंगे, अनन्तर मुझपर कृपाकर आप इन प्रेतोंकी मुक्तिके लिये गयामें जाकर श्राद्ध करें। इतना कहकर वह प्रेताधिप मुक्त होकर विमानमें बैठकर स्वर्गलोक चला गया।

प्रेताधिपके चले जानेपर वह वणिक् हिमालयमें गया और वहाँ धन प्राप्त कर अपने घर आ गया और उस धनसे उसने गया तीर्थमें अक्षयवटके समीप उन प्रेतोंके उद्देश्यसे श्राद्ध किया। वह वणिक् जिस-जिस प्रेतकी मुक्तिके निमित्त श्राद्ध करता था, वह प्रेत वणिक्को स्वप्नमें दर्शन देकर कहता था कि 'हे महाभाग! आपकी कृपासे मैं प्रेतत्वसे मुक्त हो गया और मुझे परमगति प्राप्त हुई।' इस प्रकार वे सभी प्रेत मुक्त हो गये। राजन् वह वणिक् पुनः घर लौट आया और उसने भाद्रपद मासके श्रवण द्वादशीके योगमें भगवान् जनार्दनकी पूजा की, ब्राह्मणोंको गो-दान किया। जितेन्द्रिय होकर प्रतिवर्ष नदीके संगमोंपर यह सब कार्य किया और अन्तमें उसने मानवोंके लिये दुर्लभ स्थानको प्राप्त किया। (अध्याय ७५)

विजय-श्रवण-द्वादशीव्रतमें वामनावतारकी कथा तथा व्रत-विधि

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—युधिष्ठिर! भाद्रपद मासकी एकादशी तिथि यदि श्रवण नक्षत्रसे युक्त हो तो उसे विजया तिथि कहते हैं, वह भक्तोंको विजय प्रदान करनेवाली है। एक बार दैत्यराज बलिसे पराजित होकर सभी देवता भगवान् विष्णुकी शरणमें पहुँचे और कहने लगे—'प्रभो! सभी देवताओंके एकमात्र आश्रय आप ही हैं। आप महान् कष्टसे हमारा उद्धार कीजिये। इस दैत्य बलिका आप विनाश कीजिये।' इसपर भगवान्ने कहा—'देवगणों! मैं यह जानता हूँ कि विरोचन-पुत्र बलि तीनों लोकोंका कण्टक बना हुआ है, पर उसने तपस्याद्वारा अपनी आत्माकी अपनेमें

भावना कर ली है, वह शान्त है, जितेन्द्रिय है और मेरा भक्त है, उसके प्राण मुझमें ही लगे हैं। वह सत्यप्रतिज्ञ है। बहुत दिनोंके बाद उसकी तपस्याका अन्त होगा। जब मैं इसे अविनयसम्पन्न समझूँगा, तब उसका अभीष्ट हरण कर लूँगा और आपको दे दूँगा। पुत्रकी इच्छासे देवमाता अदिति भी मेरे पास आयी थीं। देवताओ! मैं उनका भी कल्याण करूँगा, अवतार लेकर देवताओंका संरक्षण और असुरोंका विनाश करूँगा। इसलिये आपलोग निश्चिन्त होकर जायँ और समयकी प्रतीक्षा करें। देवगण भगवान् विष्णुको स्मरण करते हुए वापस आ गये। इधर अदिति भी भगवान् विष्णुका

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  • उत्तरपर्व *

४७३

ध्यान करती थीं। कुछ कालमें उन्होंने गर्भमें भगवान्‌को धारण किया। नवें मासमें वामनभगवान्‌ अदितिके गर्भसे प्रादुर्भूत हुए। उनके पैर छोटे, शरीर छोटा, सिर बड़ा और छोटे बच्चेके समान हाथ-पैर, उदर आदि थे। वामनरूपमें जब अदितिने पुत्रको देखा और जब वह कुछ कहनेको उद्यत हुई तो देवमायासे उनकी वाणी अवरुद्ध हो गयी।

हे नरोत्तम! भाद्रपद मासके श्रवण नक्षत्रसे युक्त एकादशी तिथिमें जब त्रिविक्रम वामन-भगवान्‌का पृथ्वीपर अवतार हुआ तब पृथ्वी डगमगाने लगी। दैत्योंमें भय छा गया और देवगण प्रसन्न हो गये। महामुनि कश्यपने शिशुके जातकमार्दि संस्कार स्वयं ही किये। वामनभगवान्‌ दण्ड, मेखला, यज्ञोपवीत, कमण्डलु तथा छत्र धारणकर राजा बलिके यज्ञस्थलमें गये। उन्होंने बलिसे कहा—‘यज्ञपते! मुझे तीन पग भूमि प्रदान करो।’ बलिनै कहा—‘मैंने दे दिया।’ उसी समय भगवान्‌ वामनने अपना शरीर बढ़ाना प्रारम्भ किया। भगवान्‌ने अपना शरीर इतना विशाल बना लिया कि एक पगसे सम्पूर्ण पृथ्वीलोकको नाप लिया तथा द्वितीय पगसे ब्रह्मलोक नाप लिया। तीसरा पग रखनेके लिये जब कोई स्थान न मिला तो देवगण, सिद्ध, ऋषि-मुनि इस कृत्यको देखकर साधु-साधु कहने लगे और भगवान्‌की स्तुति करने लगे। तदनन्तर सभी दैत्यगणोंको जीतकर उन्होंने दैत्यराज बलिसे कहा—‘तुम अपने परिजनोंके साथ सुतललोकमें चले जाओ। मेरे द्वारा सुरक्षित रहकर तुम वहाँ अभीप्सित भोगोंका उपभोग करोगे। वर्तमानमें जो इन्द्र हैं, उनके बाद तुम इन्द्रत्वको प्राप्त करोगे।’ बलि भगवान्‌को प्रणामकर प्रसन्न हो

सुतललोकको चला गया। भगवान्‌ने देवताओंसे कहा—‘आपलोग अपने-अपने स्थानपर निश्चिन्त होकर रहें।’ भगवान्‌ भी संसारका कल्याण करके वहाँ अन्तर्धान हो गये।

राजन्! ये सभी कर्म एकादशी तिथिको हुए थे। अतः यह तिथि देवताओंकी विजयतिथि मानी गयी है। यही एकादशी तिथि फाल्गुन मासमें पुष्य नक्षत्रसे युक्त होनेपर विजया तिथि कही गयी है। एकादशीके दिन उपवासकर रात्रिमें भगवान्‌ वामनकी प्रतिमा बनाकर पूजा करनी चाहिये। प्रतिमाके समीप ही कुण्डिका, छत्र, चरणपादुका, यष्टि, यज्ञोपवीत, कमण्डलु तथा मुगचर्म आदि स्थापित करना चाहिये। अनन्तर विधिवत्‌ उनकी पूजा करनी चाहिये। निम्न मन्त्रोंसे उन्हें नमस्कार करे और प्रार्थना करे—

अनेककर्मनिर्वन्धवृत्तिसिन् जलशायिनम्। नतोऽस्मि मधुरावासं माधवं मधुसूदनम्॥ नमो वामनरूपाय नमस्तेऽस्तु त्रिविक्रम। नमस्ते मणिबन्धाय वासुदेव नमोऽस्तु ते॥ नमो नमस्ते गोविन्द वामनेश त्रिविक्रम॥ अघौघसंक्षयं कृत्वा सर्वकामप्रदो भव॥

(उत्तरपर्व ७६। ४८—५१)

इसके अनन्तर भगवान्‌को शयन कराये। गीत-वाद्य, स्तुति आदिके द्वारा जागरण करे। प्रातःकाल उस प्रतिमाकी पूजाकर मन्त्रपूर्वक उसे ब्राह्मणको निवेदित कर दे। ब्राह्मणोंको भोजन कराकर स्वयं भी मौन होकर भोजन करे। इस व्रतके करनेसे व्रतीका एक मन्वन्तरपर्यन्त विष्णुलोकमें वास होता है, तदनन्तर वह इस लोकमें आकर चक्रवर्ती दानी राजा होता है। वह नीरोग, दीर्घायु एवं पुत्रवान्‌ होता है। (अध्याय ७६)

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४७४

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

सम्प्राप्ति-द्वादशी एवं गोविन्द-द्वादशीव्रत

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—पौष मासके कृष्ण पक्षकी द्वादशीसे ज्येष्ठ मासकी द्वादशीतक प्रत्येक मासकी कृष्ण द्वादशीको षण्मासिक सम्प्राप्ति-द्वादशीव्रत किया जाता है। प्रत्येक मासमें क्रमशः पुण्डरीकाक्ष, माधव, विश्वरूप, पुरुषोत्तम, अच्युत तथा जय—इन नामोंसे उपवासपूर्वक भगवान्की पूजा करनी चाहिये। पुनः आषाढ़ कृष्ण द्वादशीसे व्रत ग्रहणकर मार्गशीर्षतक व्रतका नियम लेना चाहिये। पूर्वविधानसे उपवासपूर्वक उन्हीं नामोंसे क्रमशः भगवान्का पूजन करना चाहिये। प्रतिमास ब्राह्मणको भोजन कराकर दक्षिणा देनी चाहिये। तेल एवं क्षार पदार्थ नहीं ग्रहण करने चाहिये। इस प्रकार एक वर्षतक इस व्रतके करनेसे सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं और अन्तमें वह भगवान्के अनुग्रहसे उनके लोकको प्राप्त कर लेता है।

भगवान् श्रीकृष्णने पुनः कहा—महाराज! इसी प्रकार गोविन्द-द्वादशी नामका एक अन्य व्रत है, जिसके करनेसे सभी अभीष्ट सिद्ध हो जाते हैं। पौष मासके शुक्ल पक्षकी द्वादशीको उपवास कर पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदिसे कमलनयन भगवान्

गोविन्दका पूजनकर अन्तर्मनमें भी इसी नामका उच्चारण करते रहना चाहिये। इस दिन पाखण्डियोंसे बात नहीं करनी चाहिये। ब्राह्मणोंको यथाशक्ति दक्षिणा देनी चाहिये। व्रतीको गोमूत्र, गोमय, दधि अथवा गोदुग्धका प्राशन करना चाहिये। दूसरे दिन स्नानकर उसी विधिसे गोविन्दका पूजन कर ब्राह्मणको भोजन कराकर स्वयं भी भोजन करना चाहिये। इसके साथ ही इस दिन गौको तृसिपूर्वक भोजन कराना चाहिये। इसी प्रकार प्रतिमास व्रत करते हुए वर्ष समाप्त होनेपर भगवती लक्ष्मीके साथ सुवर्णकी भगवान् गोविन्दकी प्रतिमा बनवाकर पुष्प, धूप, दीप, माला, नैवेद्य आदिसे उसका पूजनकर सवत्सा गौसहित ब्राह्मणोंको देना चाहिये। प्रतिमास गौओंकी पूजा तथा उन्हें ग्रासादिसे तृप्त करना चाहिये। पारणाके दिन विशेषरूपसे उनकी सेवा-भक्ति करनी चाहिये। इस व्रतको करनेसे वही फल प्राप्त होता है जो सुवर्णशृङ्गी सौ गोओंके साथ एक उत्तम वृषका दान देनेसे होता है। इस व्रतको सम्यक्-रूपसे करनेवाला सब सुख भोगकर अन्तमें गोलोकको प्राप्त होता है। (अध्याय ७७-७८)

अखण्ड-द्वादशी, मनोरथ-द्वादशी एवं तिल-द्वादशी-व्रतोंका विधान

राजा युधिष्ठिरने पूछा—श्रीकृष्ण! व्रतोपवास, दान, धर्म आदिमें जो कुछ वैकल्प्य अर्थात् किसी बातकी न्यूनता रह जाय तो क्या फल होता है? इसे आप बतलायें।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! राज्य पाकर भी जो निर्धन, उत्तम रूप पाकर भी काने, अंधे, लँगड़े हो जाते हैं, वे सब धर्म-वैकल्प्यके प्रभावसे ही होते हैं। धर्म-वैकल्प्यसे ही स्त्री-पुरुषोंमें वियोग एवं दुर्भाग्य होता है, उत्तम कुलमें जन्म पाकर भी लोग दुःशील हो जाते हैं, धनाढ्य होकर भी

धनका भोग तथा दान नहीं कर सकते तथा वस्त्र-आभूषणोंसे हीन रहते हैं। वे सुख प्राप्त नहीं कर पाते। अतः यज्ञमें, व्रतमें और भी अन्य धर्म-कृत्योंमें कभी कोई त्रुटि नहीं होने देनी चाहिये।

युधिष्ठिरने पुनः कहा—भगवन्! यदि कदाचित् उपवास आदिमें कोई त्रुटि हो ही जाय तो उसके निवारणार्थ क्या करना चाहिये?

श्रीकृष्ण बोले—महाराज! अखण्ड-द्वादशी-व्रत करनेसे सभी प्रकारकी धार्मिक त्रुटियाँ दूर हो जाती हैं। अब आप उसका भी विधान सुनें। मार्गशीर्ष

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  • उत्तरपर्व *

४७५

मासके शुक्ल पक्षकी द्वादशीको स्नानकर जनार्दन भगवान्का भक्तिपूर्वक पूजन कर उपवास रखना चाहिये और नारायणका सतत स्मरण करते रहना चाहिये। जितेन्द्रिय पुरुष पञ्चगव्यमिश्रित जलसे स्नान करके जौ और ब्रीहि (धान)-से भरा पात्र ब्राह्मणको दान करे और फिर भगवान्से यह प्रार्थना करे —

समजन्मनि यत्किंचिन्मया खण्डव्रतं कृतम्। भगवन् त्वत्प्रसादेन तदखण्डमिहास्तु मे॥ यथाखण्डं जगत् सर्वं त्वयैव पुरुषोत्तम। तथाखिला न्यखण्डानि व्रतानि मम सन्तु वै॥

(उत्तरपर्व ७९।१४-१५)

‘भगवन्! मुझसे सात जन्मोंमें जो भी व्रत करनेमें न्यूनता हुई हो, वह सब आपके अनुग्रहसे परिपूर्ण हो जाय। पुरुषोत्तम! जिस प्रकार आपसे यह सारा जगत् परिपूर्ण है, उसी प्रकार मेरे खण्डित सभी व्रत पूर्ण हो जायें।’

इस व्रतमें चार महीनेमें व्रतकी पारणा करनी चाहिये। चैत्रादि चार मासके अनन्तर दूसरी पारणा कर सत्-पात्र ब्राह्मणको देनेका विधान है। श्रावणादि चार मासके अनन्तर तीसरा पारण कर नारायणका पूजन करते हुए अपनी शक्तिके अनुसार सुवर्ण, चाँदी, मृत्तिका अथवा पलाश-पत्रके पात्रमें घृत-दान करना चाहिये। संवत्सर पूर्ण होनेपर जितेन्द्रिय बारह ब्राह्मणोंको खीरका भोजन कराकर वस्त्राभूषण देकर वृत्तियोंके लिये क्षमा माँगनी चाहिये। इसमें आचार्यका विधिपूर्वक पूजन करनेका भी विधान है। इस तरहसे जो अखण्ड-द्वादशीका व्रत करता है, उसके सात जन्मतक किये हुए व्रत सम्पूर्ण फलदायक हो जाते हैं। अतः स्त्री-पुरुषोंको व्रतोंका वैकल्प्य दूर करनेके लिये अवश्य ही इस व्रतको सम्पादित करना चाहिये।

भगवान् श्रीकृष्णने पुनः कहा— महाराज! स्त्री अथवा पुरुष दोनोंको फाल्गुन मासके शुक्ल पक्षकी एकादशीको उपवास कर जगत्पति भगवान्का पूजन-

भजन और उठते-बैठते नित्य हरिका स्मरण करते रहना चाहिये। द्वादशीके दिन प्रभातमें ही स्नान-पूजन तथा घृतसे हवनके बाद ब्राह्मणको दक्षिणा देनेका विधान है। तदनन्तर भगवान्से अपने अभीष्ट मनोरथोंकी संसिद्धिके लिये प्रार्थना करनी चाहिये। तत्पश्चात् हविष्य-भोजन ग्रहण करना चाहिये। इस व्रतमें फाल्गुनसे ज्येष्ठतक प्रथम चार महीनोंमें रक्त पुष्प, गुग्गुल-धूप और हविष्यान्न-नैवेद्यसे भगवान्की पूजा-अर्चनाके बाद गोशुद्धछालित जल तथा हविष्यान्न ग्रहण करनेका विधान है। फिर आषाढ़से आश्विनतक चार महीनोंमें चमेलीके पुष्प, धूप और शाल्यन्न (साठी धान) आदिके नैवेद्योंद्वारा भगवान्की पूजा-स्तुति करनेके बाद कुशोदकका प्राशन तथा निवेदित नैवेद्य भक्षण करना चाहिये। कार्तिकसे माघ मासतक तीसरी पारणामें जपापुष्प (अड़हुल), उत्तम धूप और कसारके नैवेद्यसे नारायणके पूजोपरान्त गोमूत्र-प्राशन तथा कसार-भक्षण करनेका विधान है। प्रतिमास ब्राह्मणोंको दक्षिणा देनी चाहिये। वर्षके अन्तमें एक कर्ष (माशा) सुवर्णकी भगवान् नारायणकी प्रतिमाका पूजन कर, दो वस्त्र और दक्षिणासहित ब्राह्मणको निवेदित करना चाहिये। इसीके साथ बारह ब्राह्मणोंको भी भोजन कराकर प्रत्येकको अन्न, जलका घट, छतरी, जूता, वस्त्र और दक्षिणा देनी चाहिये। इस द्वादशी-व्रतके करनेसे सभी मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं। इसीसे इसका नाम मनोरथ-द्वादशी है। इन्द्रको त्रैलोक्यका राज्य भी इसी व्रतके परिणामस्वरूप प्राप्त हुआ है। शुक्लाचार्यने धन तथा महर्षि धौम्यने निर्विघ्न विद्या प्राप्त की है। अन्य श्रेष्ठ पुरुषोंने तथा स्त्रियोंने भी इस व्रतके प्रभावसे अपने अभीष्ट मनोरथोंको प्राप्त किया है। जो कोई भी जिस-किसी अभिलाषासे इस व्रतको करता है, वह अवश्य पूर्ण होती है। जो पुरुष भगवान् पुरुषोत्तमका पूजन नहीं करते, गौ, ब्राह्मण आदिकी सेवा नहीं करते और मनोरथ-द्वादशीका

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